बहिष्करण का पैमाना
मुहम्मद दाऊद अली ने वर्षों तक भारतीय सेना में तकनीशियन के रूप में सेवा दी और कारगिल युद्ध के दौरान लड़ाई में घायल हुए। 65 वर्ष की उम्र में उनके पास पासपोर्ट, पेंशन के रिकॉर्ड और सैन्य सेवा के दस्तावेज थे, जो नागरिकता की पुष्टि के लिए पर्याप्त होने चाहिए थे। फिर भी, इस साल की शुरुआत में जब पश्चिम बंगाल की मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पूरा हुआ, तो अली ने पाया कि उनका और उनके तीन बच्चों का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है। केवल उनकी पत्नी का नाम सूची में बचा था। अली ने पत्रकारों से कहा, "मैं स्तब्ध हूं। मुझे गहरी ठेस पहुंची है और अपमानित महसूस कर रहा हूं। हमारे विवाद सुलझाए बिना चुनाव कैसे करा सकते हैं? मुझे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा कि न्याय के लिए किससे गुहार लगाऊं।"
विषय-सूची
अली अकेले नहीं हैं। वह उन करीब 90 लाख मतदाताओं में शामिल हैं, जो पश्चिम बंगाल के 7.6 करोड़ मतदाताओं का लगभग 12% हैं और जिन्हें 2026 की मतदाता सूचियों से हटा दिया गया है। ये नाम अप्रैल 23 और 29 को होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों से पहले भारत निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए मतदाता सूची के बड़े पुनरीक्षण के दौरान हटाए गए। जहां छह लाख से अधिक नाम अनुपस्थित या मृत मतदाताओं के रूप में काटे गए, वहीं अली के परिवार सहित अन्य 27 लाख लोगों का भविष्य कानूनी अधर में है। उनके मामलों पर फैसला नहीं हुआ है और वे न्यायाधिकरणों तथा स्थगित मतदाता सूचियों की नौकरशाही भूलभुलैया में फंसे हुए हैं।
तेरह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन पश्चिम बंगाल एकमात्र ऐसा मामला है जहां इसके बाद विशेष न्यायिक जांच की एक और परत जोड़ी गई। निर्वाचन आयोग का कहना है कि पुनरीक्षण का मकसद दोहरी या पुरानी प्रविष्टियां हटाना और असली मतदाताओं को जोड़ना है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने से अभूतपूर्व राजनीतिक संकट पैदा हुआ है, कानूनी चुनौतियां खड़ी हुई हैं और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं।
सूचियों से लाखों नाम कैसे गायब हुए
विशेष गहन पुनरीक्षण 2002 के बाद से पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची की सबसे व्यापक सफाई है। नियमित पुनरीक्षण के विपरीत, एसआईआर में घर-घर जाकर सत्यापन, दस्तावेजों की कड़ी जांच और उन चीजों को चिह्नित करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल शामिल है, जिन्हें अधिकारी "तार्किक विसंगतियां" कहते हैं। नवंबर 2025 में यह प्रक्रिया 7.66 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं के साथ शुरू हुई। फरवरी 2026 तक मसौदा सूचियों में यह संख्या तेजी से घटकर करीब 7.04 करोड़ रह गई।
नाम हटाए जाने की तीन श्रेणियां हैं। पहली, नियमित प्रशासनिक कार्रवाई के तहत दोहरी प्रविष्टियों, मृत मतदाताओं और बिना रिकॉर्ड अपडेट किए जगह बदलने वालों के नाम हटाए गए। दूसरी, वे अनुपस्थित मतदाता थे जिन्हें बूथ लेवल अधिकारियों के सत्यापन के दौरान ढूंढा नहीं जा सका। तीसरी और सबसे विवादित श्रेणी में 27 लाख मतदाता शामिल हैं, जिन्हें एआई-आधारित एल्गोरिदम ने "तार्किक विसंगतियों" के लिए चिह्नित किया। इस एल्गोरिदम ने 2002 की सूचियों, जिन्हें व्यापक रूप से आखिरी साफ आधार माना जाता है, और मौजूदा आंकड़ों के बीच असामान्यताओं की तलाश की।
एआई प्रणाली ने कई तरह की चेतावनियां चिह्नित कीं: दशकों के दौरान नामों की वर्तनी में अंतर, एक पूर्वज से जुड़े छह से अधिक मतदाता, माता-पिता और संतान की उम्र में 15-45 वर्ष की सीमा से बाहर का असंगत अंतर, दादा-दादी और मतदाता की उम्र में 40 वर्ष से कम का अंतर, और नाम तथा लिंग में असंगति। अली जैसे मतदाताओं ने 2002 के रिकॉर्ड से संबंध दर्शाने वाले गणना फॉर्म और पर्याप्त दस्तावेज जमा किए, फिर भी उन्हें संदिग्ध मामलों की श्रेणी में डाल दिया गया। दोबारा सत्यापन की सुनवाइयों के बाद भी कई लोगों को सूची से बाहर कर दिया गया।
राजनीतिक दलों द्वारा संकलित निर्वाचन क्षेत्र के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि अधर में पड़े 27 लाख लोगों में करीब 65% मुसलमान हैं। हटाए गए कुल 90 लाख नामों में मुसलमानों की संख्या 31.1 लाख, यानी करीब 34% है, जो 2011 की जनगणना के मुताबिक पश्चिम बंगाल की आबादी में उनके 27% हिस्से से काफी अधिक है। हालांकि, इस कार्रवाई की चपेट में कई समुदाय आए हैं: मतुआ शरणार्थी समुदाय के हिंदू दलित, शहरी इलाकों में हिंदी बोलने वाले प्रवासी और यहां तक कि वरिष्ठ सरकारी अधिकारी भी।
मताधिकार छिनने की कहानियां
आंकड़ों के पीछे अपमान और असमंजस की व्यक्तिगत कहानियां हैं। 88 वर्षीय इंजीनियर सुप्रबुद्ध सेन ने दामोदर घाटी निगम में 32 साल काम किया था और वह महान कलाकार नंदलाल बोस के नाती हैं। मैट्रिक प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, नौकरी के रिकॉर्ड और पेंशन के दस्तावेज जमा करने के बावजूद उनका नाम सूची से हटा दिया गया। सेन ने कहा, "अब मुझे मताधिकार छिनने की परवाह नहीं है। मेरा नाम हटाने वालों को यह बताना चाहिए कि मैं सूची में क्यों नहीं हूं।"
विंग कमांडर एमडी शमीम अख्तर भारतीय वायुसेना के सम्मानित अधिकारी हैं। उनके पास कभी राजनयिक पासपोर्ट था और उन्होंने 17 साल तक देश की सेवा की। उन्होंने देखा कि उनका नाम अंतिम सूची से हटकर "न्यायिक जांच के अधीन" हुआ और फिर पूरी तरह मिटा दिया गया। बूथ लेवल अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगने की उनकी कोशिश बेकार रही। अख्तर ने बताया, "मैंने अपने बीएलओ मंडल से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने मुझे कोई प्रक्रिया नहीं बताई और भरोसा दिलाया कि नाम अपने आप बहाल हो जाएगा। फिर 28 मार्च को जब दूसरी सूची में मेरा नाम हटा दिया गया, तो बीएलओ ने मुझसे वकील करने और न्यायाधिकरण जाने को कहा।"
इस प्रक्रिया की मनमानी अजीब विरोधाभासों में सामने आती है। कुछ परिवारों में मृत सदस्य सूची में बने हुए हैं, जबकि उनके जीवित रिश्तेदारों के नाम हटा दिए गए हैं। राज्य मंत्री गुलाम रब्बानी, जो चार चुनाव लड़ चुके हैं और दशकों से नियमित मतदान करते आए हैं, ने पाया कि उनका नाम न्यायिक जांच के अधीन है। कैबिनेट मंत्री शशि पांजा के परिवार के सदस्य पात्र बने रहे, लेकिन उन्हें खुद जांच के लिए चिह्नित किया गया। यहां तक कि पश्चिम बंगाल की मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती और भारत की 2025 महिला क्रिकेट विश्व कप विजेता टीम की 22 वर्षीय सदस्य ऋचा घोष को भी जांच का सामना करना पड़ा, जब वे विदेश में प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही थीं।
बांग्लादेश सीमा से लगे मालदा जिले के हरिश्चंद्रपुर निर्वाचन क्षेत्र में 35 वर्षीय हसनारा खातून इस कार्रवाई के पीढ़ियों तक पहुंचने वाले सदमे की मिसाल हैं। वह कहती हैं, "मैं बहुत गुस्से में हूं।" उनके पिता, दादा और परदादा मतदाता रहे हैं। अब उनके परिवार के सात में से पांच सदस्यों का मतदान अधिकार निलंबित है। उन्होंने पूछा, "हमें प्रभावी तौर पर गैर-नागरिक बना दिया गया है। कौन जानता है कि आगे क्या होगा? अब इस व्यवस्था पर भरोसा नहीं किया जा सकता।"
अगर हम वोट नहीं देंगे, तो किसी को यह याद रखने की भी परवाह नहीं होगी कि गरीब लोग मौजूद हैं।
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की मानवविज्ञानी मुकुलिका बनर्जी से पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र के एक मतदाता ने यह बात कही। यह भावना मताधिकार से वंचित होने के अस्तित्वगत पहलू को सामने लाती है। बनर्जी कहती हैं कि मतदान केवल एक प्रक्रियागत अधिकार नहीं, बल्कि हाशिये पर पड़े समुदायों के लिए गहरे अर्थ वाला कार्य है। उन्होंने कहा, "उनका वोट देने का अधिकार छीनकर उनके मूलभूत अधिकारों में से एक छीन लिया जाता है। यह अधिकार उनके लिए बेहद मायने रखता है और उन्हें अपनी आवाज उठाने का मौका देता है।"
राजनीतिक संघर्ष की रेखाएं
मतदाताओं के नाम हटाए जाने के संकट ने पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को परस्पर विरोधी दावों के अखाड़े में बदल दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का आरोप है कि निर्वाचन आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ मिलकर काम कर रहा है, ताकि विपक्षी मतदाताओं, खासकर मुसलमानों को मताधिकार से वंचित किया जा सके। बनर्जी ने विरोध प्रदर्शन करने और फिर सुप्रीम कोर्ट जाने की योजना घोषित करते हुए सवाल किया, "27 लाख मतदाताओं के मामलों का निपटारा किए बिना चुनाव कैसे शुरू हो सकते हैं?"
बीजेपी इस प्रक्रिया को जरूरी राष्ट्रीय सफाई बताती है। केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार का तर्क है कि संविधान के तहत केवल भारतीय नागरिक ही अपने नेताओं को चुन सकते हैं। उन्होंने कहा, "इसलिए गैर-नागरिकों के नाम हटाना जरूरी था," और इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाकर प्रक्रिया धीमी करने के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया। प्रधानमंत्री मोदी ने चुनावी भाषणों में कहा है कि इस सफाई का निशाना अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। टीएमसी का कहना है कि यह शब्द मुसलमानों के लिए सांकेतिक भाषा के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
हालांकि, आंकड़े आसान सांप्रदायिक दावों को जटिल बनाते हैं। मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में मुसलमानों पर असमान रूप से अधिक असर पड़ा है, लेकिन दूसरे इलाकों में हिंदू समुदायों को भी भारी नुकसान हुआ है। उत्तर 24-परगना और नदिया में बांग्लादेश से आए मतुआ समुदाय के दलित हिंदुओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाए गए। इस समुदाय ने ऐतिहासिक रूप से बीजेपी का समर्थन किया है। कोलकाता में उत्तर के करीब 29.6% और दक्षिण के 27.5% मतदाताओं के नाम काटे गए। हटाए गए लोगों में 80% हिंदू थे, जिनमें से कई उत्तर भारत से ताल्लुक रखने वाले हिंदीभाषी समुदायों के थे।
विवाद उस वक्त चरम पर पहुंचा जब टीएमसी के एक प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मुलाकात की। सात मिनट की बैठक के बाद प्रतिनिधिमंडल के सदस्य डेरेक ओ'ब्रायन ने आरोप लगाया कि कुमार ने सवालों के जवाब देने से इनकार किया और टीम का अपमान करते हुए उन्हें "दफा हो जाने" को कहा। निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया और दावा किया कि टीएमसी नेताओं ने ऊंची आवाज में बात की और बैठक में बाधा डाली। यह टकराव संवैधानिक संस्थाओं के बीच भरोसे के टूटने को दिखाता है।
नाम हटाए जाने का भौगोलिक पैटर्न
पश्चिम बंगाल में नाम समान रूप से नहीं हटाए गए, बल्कि उन चुनिंदा इलाकों में अधिक संख्या में हटे हैं जिनका चुनावी महत्व बड़ा है। बांग्लादेश से लगे सीमावर्ती जिलों उत्तर 24-परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और कूचबिहार में भारी गिरावट दर्ज हुई। अकेले उत्तर 24-परगना में 12.6 लाख मतदाताओं के नाम हटे, जो वहां के कुल मतदाताओं का 15% है। भारत के सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले जिले मुर्शिदाबाद में 7.49 लाख नाम काटे गए, यानी वहां के करीब 13% मतदाता।
पश्चिम बर्धमान जिले में राज्य की दूसरी सबसे बड़ी गिरावट दर्ज हुई, जहां मतदाताओं की संख्या 16.9% घट गई। यह पैटर्न अहम है, क्योंकि पश्चिम बंगाल के चुनाव अक्सर कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में बेहद कम अंतर से तय होते हैं। नंदीग्राम में, जहां ममता बनर्जी 2021 में बीजेपी के सुवेंदु अधिकारी से केवल 1,956 वोटों से हार गई थीं, हटाए गए मतदाताओं में से 95.5% मुसलमान बताए जाते हैं, जबकि स्थानीय मतदाताओं में इस समुदाय की हिस्सेदारी केवल 25% है।
बनर्जी के अपने निर्वाचन क्षेत्र भवानीपुर में 51.8% मुस्लिम मतदाताओं को न्यायिक जांच के अधीन रखा गया, जबकि आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी केवल 21.9% है। इस निर्वाचन क्षेत्र में हजारों मतदाताओं के नाम काटे गए। राजनीतिक रूप से निर्णायक सीटों पर इस तरह की कार्रवाई से संकेत मिलता है कि पुनरीक्षण चुनावी नतीजों को समर्थन हासिल करके नहीं, बल्कि मतदाताओं की संख्या घटाकर बदल सकता है।
मतुआ समुदाय इस क्षेत्र की पहचान-आधारित राजनीति की जटिलता को दर्शाता है। यह अनुसूचित जाति का ऐसा समूह है, जिसका सीमावर्ती जिलों में अच्छा-खासा राजनीतिक प्रभाव है। बागदा और बोंगांव उत्तर जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में हिंदू मतुआ मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिससे यह दावा कमजोर पड़ता है कि कार्रवाई केवल मुसलमानों को निशाना बना रही है। आधुनिक बांग्लादेश से पलायन करके आए मतुआ समुदाय का कई दर्जन विधानसभा सीटों पर प्रभाव है। 2021 में उसने बड़े पैमाने पर बीजेपी का समर्थन किया था और पार्टी की सीटों की संख्या 3 से बढ़कर 77 होने में योगदान दिया था। अब इस समुदाय का मताधिकार छिनने से वही गठबंधन बिखरने का खतरा है, जिसे बीजेपी ने तैयार किया था।
कानूनी अधर और न्यायिक प्रतिक्रिया
भारत का सुप्रीम कोर्ट चुनावी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक समावेशन के बीच मुश्किल संतुलन साध रहा है। बार-बार कानूनी चुनौती मिलने के बाद शीर्ष अदालत ने निर्वाचन आयोग को नाम हटाए जाने से जुड़े सभी विवाद सुलझाए बिना अप्रैल में चुनाव कराने की अनुमति दी। इससे मतदाता सूचियां स्थगित हो गईं, जबकि 27 लाख मामले लंबित हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने संवैधानिक संस्था और निर्वाचित सरकार के बीच की स्थिति को "भरोसे की कमी" बताया।
अदालत ने एक असाधारण कदम उठाने का आदेश दिया: पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के करीब 700 न्यायिक अधिकारियों को तैनात कर चुनावी पंजीकरण अधिकारियों की अर्ध-न्यायिक भूमिका संभालने को कहा गया। अपीलों की बाढ़ पर सुनवाई के लिए 19 विशेष न्यायाधिकरण बनाए गए, जिनकी अध्यक्षता उच्च न्यायालयों के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों को सौंपी गई। हालांकि, मामलों की भारी संख्या से व्यवस्था पर दबाव पड़ गया है। निर्वाचन आयोग का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने अदालत को बताया कि फिलहाल 30 से 34 लाख अपीलें लंबित हैं और हर न्यायाधिकरण एक लाख से अधिक मामलों को देख रहा है।
न्यायमूर्ति बागची ने असामान्य भावुकता के साथ दांव पर लगी बात कही। उन्होंने कहा, "जिस देश में आपका जन्म हुआ, वहां वोट देने का अधिकार केवल संवैधानिक नहीं, भावनात्मक भी है। यह लोकतंत्र का हिस्सा बनने और सरकार चुनने में मदद करने की बात है।" फिर भी अदालत ने कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप का मकसद चुनाव कराने में मदद करना है, उन्हें रोकना नहीं। पीठ ने जोर दिया कि जब तक बड़ी संख्या में मतदाताओं को इस हद तक बाहर न कर दिया जाए कि चुनावी नतीजे ठोस रूप से प्रभावित हों, प्रक्रिया रोकी नहीं जा सकती।
नाम बहाल कराने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए व्यावहारिक नतीजे बेहद निराशाजनक रहे हैं। जांच के बाद हटाए गए 27 लाख नामों में से अब तक केवल दो बहाल हुए हैं, दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट के विशेष हस्तक्षेप के बाद। फरक्का से कांग्रेस उम्मीदवार महताब शेख और मानिकचक से कांग्रेस उम्मीदवार तथा पूर्व विधायक मोत्ताकिन आलम ने मतदान का अधिकार फिर हासिल किया। बाकी लाखों लोगों के लिए न्यायाधिकरण अब भी बड़े पैमाने पर काम शुरू नहीं कर पाए हैं, जबकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय जल एवं स्वच्छता संस्थान जैसे स्थानों पर तैयारियां की गई हैं।
मतदाता सूचियां स्थगित हैं और मतदान की तारीखें नजदीक आ रही हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने यह तय करने के लिए 13 अप्रैल को अहम सुनवाई रखी है कि स्थगन के बाद न्यायाधिकरणों से मंजूरी पाने वाले मतदाता अब भी वोट डाल पाएंगे या नहीं। मुख्य सवाल यह है कि क्या समयसीमा के बाद मंजूरी मिलने पर इस चुनाव में मतदान का अधिकार बहाल हो सकता है, या पात्र नागरिकों को भाग लेने के अगले मौके के लिए वर्षों इंतजार करना होगा।
चुनावी गणित और लोकतंत्र के दांव
90 लाख मतदाताओं के नाम हटाया जाना महज नौकरशाही का फेरबदल नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के चुनावी गणित में संरचनात्मक बदलाव है। कई जिलों में हटाए गए मतदाताओं की संख्या 2021 के विधानसभा चुनावों में जीत के अंतर से अधिक है। हुगली में 2021 में टीएमसी 2.79 लाख वोटों से जीती थी, जबकि अब 8.68 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। पूर्व बर्धमान में 2.75 लाख वोटों की जीत के अंतर के सामने अब 8.35 लाख नाम हटाए जाने का आंकड़ा है। पश्चिम बर्धमान में केवल 43,893 वोटों का मामूली अंतर 3.14 लाख नाम हटाए जाने से कहीं छोटा है।
यह गणित चुनावी मुकाबले की बुनियादी गतिशीलता बदल देता है। पश्चिम बंगाल के चुनाव अक्सर निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर मामूली अंतर से तय होते हैं। खासकर शहरी और अर्ध-शहरी सीटों पर कुछ बूथों से कुछ हजार मतदाताओं का कम होना भी नतीजे बदल सकता है। मतदाता आधार सिमटने के साथ दलों को अपनी रणनीतियां पूरी तरह नए सिरे से तय करनी होंगी और मतदाताओं को मनाने के बजाय बाकी पंजीकृत मतदाताओं को मतदान के लिए जुटाने पर ध्यान देना होगा।
राजनीतिक वैज्ञानिक सिबाजी प्रतिम बसु कहते हैं कि भारत में मतदाताओं के अधिकार निलंबित रहते हुए चुनाव कराने की कोई मिसाल नहीं है। उन्होंने कहा, "भारत में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहां मतदाताओं के अधिकार निलंबित रहते हुए चुनाव हुए हों। यह लोकतंत्र के लिए शर्म की बात है।" इस विवाद ने चुनावी निष्पक्षता और समावेशी भागीदारी के संबंध पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विश्वसनीय चुनावों के लिए मतदाता सूचियों की सफाई जरूरी है, लेकिन इस प्रक्रिया का पैमाना, तरीका और समय भरोसे के बजाय भय पैदा कर रहा है।
मानवीय कीमत सिर्फ व्यक्तियों के मताधिकार छिनने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे लोकतंत्र में लोगों का भरोसा भी कमजोर होता है। जब सेना के पूर्व सैनिक, कैबिनेट मंत्री, सम्मानित खिलाड़ी और जीवनभर के नागरिक वैध दस्तावेजों के बावजूद सूचियों से मिटा दिए जाते हैं, तो इसका संदेश उन समुदायों तक पहुंचता है जो पहले से ही राज्य की शक्ति को लेकर सशंकित हैं। हसनारा खातून के परिवार की कई पीढ़ियों का मतदान अधिकार छिनने से यह जोखिम है कि प्रशासनिक गलती राजनीतिक अलगाव में बदल जाए।
पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय राजनीति में एक अहम दांव है और लोकसभा सीटों की संख्या के मामले में देश में चौथे स्थान पर है। इसलिए इस संकट का समाधान राज्य की सीमाओं से परे असर डालेगा। न्यायाधिकरण समय पर न्याय दे पाते हैं या नहीं, सुप्रीम कोर्ट स्थगित सूचियों और मतदाताओं के अधिकारों के बीच तालमेल बिठा पाता है या नहीं, और निर्वाचन आयोग जनता का भरोसा बहाल कर पाता है या नहीं, यह न केवल अप्रैल के चुनावों के नतीजे तय करेगा, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता भी।
मुख्य बिंदु
- पश्चिम बंगाल की मतदाता सूचियों से 90 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जो राज्य के 7.6 करोड़ मतदाताओं का 12% है
- 27 लाख मतदाता "न्यायिक जांच के अधीन" स्थिति में कानूनी अधर में हैं; चुनाव अप्रैल 23 और 29 को होने हैं
- न्यायाधिकरण बनाए जाने के बावजूद विवादित 27 लाख मामलों में से अब तक केवल दो नाम बहाल हुए
- सुप्रीम कोर्ट ने विवादों का निपटारा लंबित रहते हुए स्थगित मतदाता सूचियों पर चुनाव कराने की अनुमति दी
- एआई-आधारित प्रक्रिया ने मौजूदा रिकॉर्ड की तुलना 2002 के आधार से करके "तार्किक विसंगतियां" चिह्नित कीं
- कुल हटाए गए मतदाताओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी 34% है, जबकि आबादी में उनका हिस्सा 27% है; हिंदू मतुआ समुदाय भी भारी संख्या में प्रभावित हुआ
- मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24-परगना समेत सीमावर्ती जिलों में नाम हटाए जाने की दर सबसे अधिक रही
- प्रभावित प्रमुख लोगों में कारगिल युद्ध के पूर्व सैनिक, राज्य मंत्री, मुख्य सचिव और क्रिकेट विश्व कप विजेता ऋचा घोष शामिल हैं
- टीएमसी का आरोप है कि निर्वाचन आयोग विपक्षी मतदाताओं का मताधिकार छीनने के लिए बीजेपी के साथ मिलीभगत कर रहा है
- बीजेपी इस प्रक्रिया को अवैध घुसपैठियों और मृत मतदाताओं के नाम हटाने की जरूरी कार्रवाई बताती है






