जब सबसे बुरे वक्त पर आई आपदा
इंद्राणी रविचंद्रन अब भी अपने घर के उस इकलौते हिस्से में सोती हैं, जो खड़ा बचा है। श्रीलंका के कैंडी जिले के कुडुगलहेना गांव में बाढ़ का पानी घुसने के तीन महीने बाद भी वह और उनका परिवार अपने पुराने जीवन के मलबे के बीच रह रहे हैं। "पानी का स्तर तेजी से बढ़ा। हम बाहर भागे और घर से कुछ भी उठाने का समय मुश्किल से मिला," वह उस रात को याद करते हुए बताती हैं, जब चक्रवात दितवाह ने कहर बरपाया था। "घुप्प अंधेरा था और बारिश जोरदार हो रही थी। भागते समय हमें डर था कि कहीं जहरीले जीवों पर पैर न पड़ जाए। लेकिन हम बच गए, यह हमारी किस्मत थी।"
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उनकी कहानी इस दक्षिण एशियाई द्वीपीय देश के लाखों लोगों की कहानी जैसी है, जहां दो दशकों की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदा ऐसे समय आई जब देश बेहद कमजोर स्थिति में था। श्रीलंका इस समय उस स्थिति से जूझ रहा है जिसे अर्थशास्त्री "तीनहरी मार" कहते हैं: नवंबर 2025 की विनाशकारी बाढ़, 2022 में राज्य को लगभग ध्वस्त कर देने वाला लंबा आर्थिक संकट और अब ईरान युद्ध से बढ़ता आर्थिक नुकसान। इन संकटों के एक साथ आने से मानवीय और आर्थिक तबाही पैदा हुई है, जिससे मुश्किल से हुई वर्षों की आर्थिक बहाली पटरी से उतरने का खतरा है।
महज तीन दिनों में श्रीलंका के मध्यवर्ती ऊंचाई वाले इलाकों में 500 मिमी तक बारिश हुई, जो औसतन दो महीने की बारिश के बराबर है। इससे आई बाढ़ और भूस्खलन में 643 लोगों की मौत हुई, 173 लोग लापता हुए और 165,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए। विश्व बैंक ने कुल नुकसान का अनुमान करीब 4 अरब डॉलर लगाया है, जो जीडीपी का 4% है, हालांकि देश के कुछ अनुमानों में यह आंकड़ा 6-7 अरब डॉलर तक है। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने इसे देश की अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक आपदा बताया है, जो बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान के मामले में 2004 की सुनामी से भी बड़ी है।
"2004 की सुनामी की तुलना में जानमाल का नुकसान उतना अधिक नहीं था। लेकिन बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान के लिहाज से दितवाह ने सुनामी से भी ज्यादा तबाही मचाई।"
डॉ. गणेशन विग्नराजा, लंदन स्थित ओडीआई ग्लोबल इंस्टीट्यूट में विजिटिंग सीनियर फेलो
इससे बुरा समय शायद ही हो सकता था। बाढ़ का पानी उतरने पर जहां पूरी बस्तियां बह चुकी थीं और कृषि के उपजाऊ इलाके बंजर जमीन में बदल गए थे, वहीं वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई। अमेरिका और इजराइल के ईरान के खिलाफ युद्ध से ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगीं। इससे उस देश पर सीधा खतरा मंडराने लगा, जो अपने कुल आयात का 20-25% पेट्रोलियम के रूप में आयात करता है और खाड़ी देशों में काम करने वाले श्रमिकों से सालाना करीब 7 अरब डॉलर का धन प्रेषण हासिल करता है।
दितवाह का कहर
चक्रवात दितवाह 26 नवंबर, 2025 को श्रीलंका के दक्षिण-पूर्वी तट पर पहुंचा और फिर पूर्वी तट के साथ उत्तर की ओर बढ़ा। इस तूफान को पहले की मौसमी घटनाओं से अलग करने वाली बात सिर्फ इसकी तीव्रता नहीं, बल्कि बहुत कम समय में हुई असाधारण बारिश थी। 28 नवंबर को ही द्वीप पर करीब 13 अरब घन मीटर पानी बरसा, जो श्रीलंका की औसत सालाना बारिश का लगभग 10% है।
पानी के बहाव की दर करीब 150,000 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच गई, जो अमेजन नदी के सबसे तेज प्रवाह के बराबर है। लेकिन अमेजन बेसिन जहां 7 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला है, वहीं श्रीलंका का जलग्रहण क्षेत्र बहुत छोटा है। पिछली बारिशों से मिट्टी पहले ही संतृप्त हो चुकी थी, इसलिए लगभग सारा पानी बहकर निकल गया। इससे जलाशयों पर दबाव बढ़ा और केलानी, महावेली और देदुरु ओया समेत प्रमुख नदियां एक साथ उफान पर आ गईं।
इस आपदा की मानवीय कीमत विनाशकारी रही। चाय उगाने वाले पहाड़ी इलाकों की पूरी बस्तियां भूस्खलन में दबकर गायब हो गईं। नुवारा एलिया जिले के थलावाकेले में बागान मजदूर सुंदरम मुथुपिल्लई ने न केवल अपना घर, बल्कि अपनी रोजी-रोटी भी खो दी। अस्थायी आश्रय से पत्रकारों से उन्होंने कहा, "सब कुछ खत्म हो गया। हम जानते हैं कि पहाड़ियां अस्थिर हैं और समय-समय पर मिट्टी के धंसने की घटनाएं होती रही हैं। अब सड़कें बंद हैं। हमारे पास जरूरी सामान नहीं है और न ही चक्रवात के असर से उबरने की कोई उम्मीद।"
राष्ट्रीय भवन अनुसंधान संगठन ने सात जिलों में 215 बड़े भूस्खलन दर्ज किए। 41,000 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हुए, जिनमें से 4,500 पूरी तरह नष्ट हो गए। चालीस पुल बह गए और 247 किलोमीटर सड़कें आवागमन के लिए बंद हो गईं। मध्यवर्ती पहाड़ी इलाकों से गुजरने वाली मुख्य रेल लाइन के कई हिस्से तबाह हो गए, जिससे इस अहम मार्ग पर रेल सेवा अनिश्चितकाल के लिए रोक दी गई।
2022 के आर्थिक संकट के लंबे असर से पहले ही जूझ रहे समुदायों के लिए, जब खाना पकाने की गैस, दवाओं और भोजन की व्यापक कमी हो गई थी, इस आपदा का मनोवैज्ञानिक असर भी गहरा रहा। इंद्राणी के पति रविचंद्रन ने कहा, "30 साल में पहली बार हमने इतनी भयंकर बाढ़ देखी।" दंपति को अपने आंशिक रूप से तबाह घर की मरम्मत के लिए सरकार से 50,000 रुपये (325 डॉलर) मिले, साथ ही छोटे बच्चों के लिए अतिरिक्त सहायता भी मिली। जिन लोगों ने सब कुछ खो दिया, उन्हें 50 लाख रुपये तक देने का वादा किया गया था, हालांकि महीनों बाद भी कई लोग इंतजार कर रहे हैं।
पानी उतरने के बाद भी आर्थिक तबाही
चक्रवात ने श्रीलंका के कृषि और औद्योगिक केंद्र पर हमला किया। भूस्खलन से सबसे ज्यादा प्रभावित मध्यवर्ती पहाड़ी इलाके देश में चाय और सब्जियों के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। परिधान के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा निर्यात राजस्व स्रोत चाय उद्योग सालाना करीब 1.3 अरब डॉलर कमाता है और अब उसे भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक उत्पादन में 35% तक गिरावट आ सकती है और पूरी तरह उबरने में महीनों या वर्षों का समय लग सकता है।
उवा प्रांत के बदुल्ला में चाय बागान में काम करने वाले 34 वर्षीय सेंथिलनाथन पलनसामी ने कहा, "हमने जो कुछ झेला, उसके लिए कोई भी पिछला अनुभव हमें तैयार नहीं कर सकता था।" उन्होंने कहा, "बागान सुरक्षित नहीं हैं। कई महीनों तक कोई काम नहीं होगा। हमें बागान की जिंदगी छोड़कर कहीं और काम करना पड़ेगा।" उनकी पत्नी मरियप्पन शर्मिला ने वहां के नजारे को "बंजर जमीन जैसा" बताया।
आर्थिक झटके का असर तुरंत राष्ट्रीय खातों में दिखा। जनगणना और सांख्यिकी विभाग के अनुसार, 2025 की चौथी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर घटकर 4.8% रह गई, जबकि पिछली तिमाही में यह 5.3% थी। श्रीलंका के चाय निर्यातक संघ ने 2025 के लिए 1.5 अरब डॉलर के निर्यात राजस्व का अनुमान लगाया था, लेकिन अब यह लक्ष्य हासिल करना असंभव माना जा रहा है।
कोलंबो के स्वतंत्र थिंक टैंक एडवोकेटा इंस्टीट्यूट के मुख्य कार्यकारी धननाथ फर्नांडो ने चेतावनी दी कि इस आपदा से अर्थव्यवस्था को संभाले रखने के लिए जरूरी विदेशी मुद्रा आय घटेगी। उन्होंने कहा, "श्रीलंका की ऋण स्थिरता की नीति आर्थिक विकास पर आधारित है। हमारा ध्यान अर्थव्यवस्था को बढ़ाकर कर्ज चुकाने पर है। ऐसा करने के लिए हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि लोग दूसरे विकल्प तलाशने के लिए बागानों से काम छोड़कर चले जाएं।"
इस आपदा ने श्रीलंका की सार्वजनिक वित्त व्यवस्था की कमजोरी भी उजागर कर दी। करीब 100 अरब डॉलर का सार्वजनिक कर्ज, यानी जीडीपी का 99.5%, होने के कारण द्वीप के पास आगे के झटकों से निपटने की गुंजाइश बहुत कम है। पुनर्निर्माण और बहाली के लिए जरूरी 750 मिलियन डॉलर में से सरकार को अब तक मुश्किल से पांचवां हिस्सा मिला है, जिससे तत्काल राहत और दीर्घकालीन मजबूती के बीच कठिन चुनाव करने पड़ रहे हैं।
व्यवस्था की नाकामियों ने बढ़ाई आपदा
जलवायु परिवर्तन ने चक्रवात दितवाह की विनाशकारी ताकत बढ़ाई, लेकिन मानवीय फैसलों ने एक भीषण तूफान को राष्ट्रीय आपदा में बदल दिया। वैज्ञानिकों ने हिंद महासागर में श्रेणी 3-5 के चक्रवातों की बढ़ती संख्या दर्ज की है, जो पहले की तुलना में तेजी से तीव्र होते हैं और अधिकारियों को प्रतिक्रिया देने के लिए कम समय देते हैं। हालांकि, श्रीलंका में तबाही का पैमाना दशकों के अव्यवस्थित विकास और पर्यावरण के क्षरण का नतीजा था।
1977 में आर्थिक उदारीकरण शुरू होने के बाद से श्रीलंका की सरकारें दीर्घकालीन योजना और नियामकीय निगरानी से पीछे हटती गईं। आवास, एक्सप्रेसवे और वाणिज्यिक परियोजनाओं के लिए आर्द्रभूमियों को पाट दिया गया। नदियों और नहरों में अतिक्रमण से उनका प्रवाह बाधित हो गया। पहाड़ी इलाकों में जंगलों की कटाई और निर्माण कार्यों ने ढलानों को अस्थिर कर दिया। कई साल पहले अधिकारियों ने बाढ़ और भूस्खलन के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की थी, फिर भी वहां के निवासियों को हटाए बिना निर्माण जारी रहा।
इस कमजोरी की जड़ें औपनिवेशिक इतिहास में गहराई तक जाती हैं। 1880 से 1950 के बीच ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान बागान अर्थव्यवस्था के विस्तार ने श्रीलंका के लगभग 40% वन क्षेत्र को नष्ट कर दिया। 1930 तक ऊपरी नदी बेसिन के आधे से अधिक क्षेत्र को चाय की खेती के लिए साफ कर दिया गया था। इससे हर साल 500,000 से 800,000 टन मिट्टी का कटाव हुआ और भूस्खलन का जोखिम बहुत बढ़ गया।
बाढ़ नियंत्रण, पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक क्षमता में सरकारी निवेश बेहद कम रहा है। 2020 में शुरू हुए आर्थिक संकट के दौरान संस्थागत कमजोरी और बढ़ गई। पांच साल तक भर्ती रोक दी गई और बजट की तंगी के कारण जलनिकासी तंत्र, जलाशयों और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों का बुनियादी रखरखाव तक नहीं हुआ। मौसम विज्ञान विभाग के पास मुश्किल से काम करने वाला रडार नेटवर्क, अपर्याप्त स्वचालित मौसम स्टेशन और पुराने उपग्रह-संकेत ग्रहण उपकरण हैं।
सिंचाई इंजीनियर पालिथा देशप्रिय ने बताया, "कोलंबो के पास से बहने वाली केलानी नदी के किनारे के निचले इलाकों में भी लाखों लोग असुरक्षित हालात में रहते हैं। इनमें से ज्यादातर लोग इतनी गरीबी में हैं कि सुरक्षित जगहों पर जमीन नहीं खरीद सकते।" पुल और तटबंध इसलिए टूट गए क्योंकि उनकी लंबाई या ऊंचाई कम रखी गई थी और पानी के अधिकतम बहाव की संभावना को नजरअंदाज किया गया था।
बचाव अभियानों में हजारों सैनिक तैनात करने वाली सेना भी लंबे समय से पूंजीगत खर्च की सीमाओं का सामना कर रही है। रक्षा पर सालाना 1.5 अरब डॉलर से अधिक आवंटित होने के बावजूद, ज्यादातर धन उपकरणों के बजाय रोजमर्रा के खर्च पर जाता है। सशस्त्र बलों के पास लोगों को निकालने के लिए भारी सामान उठाने वाले कुछ ही हेलीकॉप्टर हैं, दूरदराज के समुदायों तक पहुंचने के लिए ऊंचे पानी में चलने वाले वाहन बहुत कम हैं और आधुनिक आपदा प्रबंधन की जरूरतों के लिए नावों, ड्रोन तथा इंजीनियरिंग उपकरणों की भी कमी है।
ईरान युद्ध: दूसरा तूफान
जब श्रीलंका कीचड़ और मलबा हटाने में जुटा था, तब 2,700 मील दूर एक और संकट खड़ा हो गया। अमेरिका-इजराइल गठजोड़ और ईरान के बीच युद्ध छिड़ने से वैश्विक तेल कीमतों में 40% उछाल आया, जिससे आयात पर निर्भर इस द्वीप पर भुगतान संतुलन का तत्काल दबाव बढ़ा। पिछले साल श्रीलंका को विदेशों में काम करने वाले श्रमिकों से करीब 7 अरब डॉलर का धन प्रेषण मिला था, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आया। बड़े पैमाने पर छंटनी अभी नहीं हुई है, लेकिन श्रीलंकाई लोगों के लिए रोजगार के नए अवसरों को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
सरकार ने आपात कदम उठाए, जिनसे 2022 के आर्थिक पतन की कड़वी यादें ताजा हो गईं। वाहन श्रेणियों के आधार पर साप्ताहिक सीमा तय करने वाली क्यूआर कोड प्रणाली के जरिए ईंधन राशनिंग फिर शुरू हुई। ईंधन और खाना पकाने की गैस की कीमतें तेजी से बढ़ीं। सब्सिडी के बिना डीजल की कीमत 600 रुपये प्रति लीटर से अधिक हो सकती है। बिजली की लागत 40% तक बढ़ गई, जबकि घटते संसाधनों की भरपाई के लिए राज्य ने पानी और बिजली की कटौती की। परिवहन ईंधन बचाने के लिए सरकारी कर्मचारियों के लिए चार दिन का कार्य सप्ताह लागू किया गया।
सिंहली और तमिल नववर्ष से पहले जनता की नाराजगी का सामना कर रहे राष्ट्रपति दिसानायके ने तीन महीनों के लिए 100 अरब रुपये (317 मिलियन डॉलर) के राहत पैकेज की घोषणा की। इसमें डीजल पर 100 रुपये प्रति लीटर और पेट्रोल पर 20 रुपये प्रति लीटर तक की सब्सिडी शामिल है। यह राशि नए कर्ज के बजाय मौजूदा बजट से दी जाएगी। धान किसानों के लिए उर्वरक सब्सिडी 25,000 से बढ़ाकर 30,000 रुपये कर दी गई है और चाय उत्पादकों को भी अतिरिक्त सहायता मिलेगी। हर महीने 90 यूनिट से कम बिजली इस्तेमाल करने वालों के बिल पर सरकार सब्सिडी देगी।
संसद में दिसानायके ने कहा, "हम बैंक ब्याज दरों को 10% से नीचे और महंगाई को 5% से कम रखने की कोशिश कर रहे हैं। हमने जो राहत उपाय लागू किए हैं, वे मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप हैं। हम मई के अंत तक ऊर्जा और ईंधन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे।"
इन आपूर्तियों को सुरक्षित करने के लिए सावधानी भरी कूटनीति की जरूरत पड़ी है। राष्ट्रपति दिसानायके और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच फोन पर बातचीत के बाद भारत ने मार्च के आखिर में 38,000 मीट्रिक टन पेट्रोलियम भेजा। आपूर्ति बढ़ाने के लिए कोलंबो रूस और चीन से भी बातचीत कर रहा है, हालांकि प्रतिबंधित रूसी तेल की खरीद के लिए अमेरिकी छूट जरूरी है, जिसकी अवधि अप्रैल की शुरुआत में खत्म हो गई।
सहायता की भू-राजनीति: समुद्र पार का मित्र
दितवाह के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया ने बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और दानदाताओं की घटती तत्परता को उजागर किया। 2004 में सुनामी से दुनिया स्तब्ध थी और अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं ने अरबों डॉलर की सहायता देने का वादा किया था। इस बार प्रतिक्रिया उल्लेखनीय रूप से फीकी रही। पुनर्निर्माण के लिए जरूरी 750 मिलियन डॉलर में से श्रीलंका सरकार को मुश्किल से पांचवां हिस्सा मिला है। घटना के महीनों बाद भी 165,000 विस्थापित लोग अस्थायी आश्रयों में रह रहे हैं।
भारत सबसे पहले मदद पहुंचाने वाला देश और सबसे बड़ा योगदानकर्ता बनकर उभरा। नई दिल्ली ने ऑपरेशन सागर बंधु शुरू किया, जिसका हिंदी में अर्थ है "समुद्र पार का मित्र"। राहत अभियान के लिए विमानवाहक पोत समेत दो युद्धपोत भेजे गए। भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टरों ने कई उड़ानें भरकर सैकड़ों लोगों को बचाया, जिनमें विदेशी नागरिक भी शामिल थे। बचाव दलों ने अस्थायी अस्पताल बनाए, जरूरी बुनियादी ढांचे को बहाल किया और 1,000 टन से अधिक आवश्यक सामग्री पहुंचाई। भारत की कुल सहायता अनुदान और मदद के रूप में 450 मिलियन डॉलर तक पहुंची।
इसके उलट, श्रीलंका के प्रमुख निवेशकों और बेल्ट एंड रोड पहल के जरिए लंबे समय से सहयोगी रहे चीन ने 2 मिलियन डॉलर से भी कम की सहायता और करीब 100 टन सामग्री दी। जनवरी में श्रीलंका ने चक्रवात से क्षतिग्रस्त अहम बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण में मदद के लिए बीजिंग से औपचारिक अनुरोध किया था, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया भारत की सक्रिय भागीदारी की तुलना में सीमित रही।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष प्राकृतिक आपदाओं के बाद भुगतान संतुलन की तात्कालिक जरूरतों के लिए बनाए गए रैपिड फाइनेंसिंग इंस्ट्रूमेंट के तहत 200 मिलियन डॉलर के आपात वित्तपोषण अनुरोध पर विचार कर रहा है। इसके अलावा, आईएमएफ के कर्मचारियों ने श्रीलंका के 2.9 अरब डॉलर के राहत कार्यक्रम की पांचवीं और छठी समीक्षा को मिलाकर एक समझौता किया है। कार्यकारी बोर्ड की मंजूरी मिलने पर इससे करीब 700 मिलियन डॉलर का वित्तपोषण जारी हो सकता है।
हालांकि, इस धन के साथ शर्तें जुड़ी हैं। कर्मचारियों के स्तर पर हुए समझौते के तहत लागत-वसूली के आधार पर बिजली और ईंधन की कीमतें तय करनी होंगी, साथ ही कमजोर उपभोक्ताओं की सुरक्षा भी करनी होगी। इसके अलावा, बहुपक्षीय साझेदारों के योगदान की पुष्टि के लिए वित्तपोषण आश्वासन की समीक्षा पूरी करनी होगी। सार्वजनिक कर्ज जीडीपी के करीब 100% पर होने और कोयला संकट गहराने के बीच ये शर्तें सरकार के लिए राजनीतिक चुनौतियां खड़ी करती हैं।
राजनीतिक दबाव और कोयला संकट
राष्ट्रपति दिसानायके पर कई मोर्चों से दबाव बढ़ रहा है। तीनहरे आर्थिक संकट से निपटने के बीच उनका प्रशासन निम्न गुणवत्ता वाले कोयले के आयात को लेकर विवादों में घिरा है। इससे नोराचोलाई लखविजया कोयला बिजलीघर में बिजली उत्पादन पर खतरा मंडरा रहा है। यह संयंत्र सामान्य तौर पर 270 यूनिट बिजली बनाता है, लेकिन भारत की ट्राइडेंट केम्फर कंपनी से आए घटिया कोयले के कारण क्षमता से कम उत्पादन कर रहा है।
ऊर्जा मंत्री कुमारा जयकोडी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। वह पहले ही 2016 में लंका फर्टिलाइजर कंपनी में अपने कार्यकाल से जुड़े आरोपों पर रिश्वत या भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच आयोग द्वारा आरोपित किए जाने के बाद दबाव में हैं। विपक्षी दल उन पर पर्याप्त गुणवत्ता वाला कोयला सुनिश्चित न करने का आरोप लगा रहे हैं। राष्ट्रीय लेखा परीक्षा कार्यालय की एक रिपोर्ट में पाया गया कि लंका कोल कंपनी ने आपूर्तिकर्ताओं के पंजीकरण मानदंडों को "अस्वीकार्य स्तर तक" ढीला कर दिया, जिससे पहले खारिज की गई गुणवत्ता के कोयले का अनुभव रखने वाले आपूर्तिकर्ताओं को ठेके मिल गए।
लेखा परीक्षा में गणना की गई कि शुरुआती नौ घटिया खेपों के अधिक इस्तेमाल से सरकारी खजाने को 2.2 अरब रुपये का नुकसान हुआ। विपक्षी सांसदों का दावा है कि दबावग्रस्त बिजली व्यवस्था को संतुलित करने के लिए बिना घोषणा के बिजली कटौती शुरू हो चुकी है, हालांकि मंत्री इससे इनकार करते हैं। राष्ट्रपति दिसानायके ने खरीद प्रक्रिया का बचाव करते हुए कोयले की गुणवत्ता की समस्या स्वीकार की और जोर दिया कि इसका खर्च उपभोक्ताओं के बजाय आपूर्तिकर्ता कंपनियां उठाएंगी।
कोयला संकट से शुष्क मौसम में बिजली आपूर्ति बनाए रखने की सरकार की कोशिशें जटिल हो गई हैं। इस मौसम में पनबिजली उत्पादन घट जाता है और ताप बिजलीघरों को इसकी भरपाई करनी पड़ती है। अल नीनो की स्थितियों के कारण जलाशयों में पानी का स्तर गिर रहा है, जिससे देश के सामने अन्य चुनौतियों के साथ ऊर्जा सुरक्षा का भी नाजुक संकट खड़ा है।
सरकारी दबाव के बीच जमीनी स्तर पर एकजुटता
जहां सरकारी राहत प्रयासों में देरी हुई और नौकरशाही की बाधाओं का सामना करना पड़ा, वहीं श्रीलंकाई नागरिक समाज ने उल्लेखनीय तेजी से संगठित होकर काम किया। चक्रवात ने 2022 के विरोध प्रदर्शनों जैसी स्वयंसेवा की भावना जगा दी, जिनके चलते पूर्व राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को सत्ता छोड़नी पड़ी थी। लेकिन इस बार यह भावना राजनीतिक विरोध के बजाय मानवीय राहत की ओर मुड़ी।
कोलंबो के विजेरामा इलाके में पहले सरकार विरोधी प्रदर्शनों का आयोजन करने वाले कार्यकर्ताओं ने सामुदायिक रसोई शुरू कीं, जहां बड़ी मात्रा में राहत भोजन तैयार किया जा रहा था। 2016 की बाढ़ के दौरान अपना स्वयंसेवी नेटवर्क चलाने वाले सोशल मीडिया कार्यकर्ता ससिंदु सहन थारका ने कहा, "कुछ स्वयंसेवक काम के बाद आए, कुछ ने बारी-बारी से काम किया और कुछ तो वहां रहने के लिए छुट्टी लेकर आए। हमने समुदाय से जो भी मांगा, जवाब में जरूरत से ज्यादा मिला।"
श्रीलंकाई अभिनेता और संगीतकार जीके रेजिनोल्ड ने मोटर लगी मछली पकड़ने वाली नावों के जरिए उन उपनगरीय परिवारों तक भोजन और पानी पहुंचाया, जिन्हें कई दिनों से मदद नहीं मिली थी। उन्होंने कहा, "मैं ऐसा इसलिए करना चाहता था ताकि कम से कम उन्हें एक वक्त का खाना मिल सके।" उन्होंने कहा, "और मैं बहुत खुश था कि ऐसा कर पाया।"
ऑनलाइन मंचों ने प्रयासों का कुशलतापूर्वक समन्वय किया। स्वयंसेवकों ने दान पहुंचाने और जरूरतों के अनुसार मददगारों को जोड़ने के लिए सार्वजनिक डेटाबेस बनाए। निजी कंपनियों ने दान अभियान चलाए और स्थानीय टीवी चैनलों ने साबुन, टूथब्रश तथा बुनियादी जरूरतों का सामान जुटाने के प्रयास शुरू किए। इस नागरिक पहल ने उन दूरदराज के समुदायों तक पहुंचने में औपचारिक राहत अभियानों की नाकामी से पैदा हुई अहम कमियों को पूरा किया, जहां भूस्खलन के कारण रास्ते कट गए थे।
तैयारी की कमी को लेकर आलोचना का सामना कर रहे राष्ट्रपति दिसानायके ने श्रीलंकाई लोगों से "सभी राजनीतिक मतभेदों को अलग रखकर" और "राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए एकजुट होने" की अपील की। विपक्षी नेताओं ने संसद से बहिर्गमन कर आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल ने आपदा प्रबंधन पर बहस सीमित की। लेकिन जमीनी स्तर पर स्वयंसेवकों के बीच एकता की भावना बनी रही।
रणनीतिक मोड़: ऊर्जा और गठबंधन
तीनहरे संकट ने श्रीलंका को रणनीतिक फैसलों पर नए सिरे से विचार करने के लिए मजबूर किया है। विश्लेषकों का कहना है कि देश अब संकट आने पर तात्कालिक नीतियां बनाने और एक संकट से दूसरे संकट की ओर भटकने का जोखिम नहीं उठा सकता। मौजूदा कमजोरी के दो अस्थिर आधार हैं: मध्य पूर्व में काम करने वाले लोगों से मिलने वाला धन प्रेषण और आयातित जीवाश्म ईंधन। वैश्विक तेल कीमतों में 10 डॉलर की बढ़ोतरी से श्रीलंका का आयात बिल सैकड़ों मिलियन डॉलर बढ़ सकता है, जबकि खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक संघर्ष रहने से धन प्रेषण का प्रवाह तेजी से घट सकता है।
रणनीतिक विश्लेषकों का सुझाव है कि कार्बन उत्सर्जन घटाने की प्रक्रिया तेज की जाए। इसे केवल पर्यावरण नीति नहीं, बल्कि आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत भी माना जाए। अनुकूल जलवायु वाले वर्षों में श्रीलंका पहले से ही अपनी 50-60% बिजली नवीकरणीय स्रोतों से पैदा करता है, लेकिन सूखे के दौरान यह हिस्सा काफी गिर जाता है। समाधान है कि सौर और पवन ऊर्जा क्षमता का विस्तार किया जाए और अनियमित आपूर्ति की समस्या से निपटने के लिए द्वीप की प्राकृतिक भू-आकृति का इस्तेमाल करते हुए पंप्ड हाइड्रो भंडारण बढ़ाया जाए, न कि महंगी आयातित लिथियम-आयन बैटरियों पर निर्भर रहा जाए।
विदेश नीति को भी बहुध्रुवीय दुनिया के अनुरूप ढालना होगा। श्रीलंका के सामने भारत और चीन, दोनों के साथ उत्पादक संबंध बनाए रखने की चुनौती है। भारत उसका सबसे अहम रणनीतिक साझेदार और संकट के समय मदद पहुंचाने वाला पहला देश है, जबकि चीन हम्बनटोटा बंदरगाह और कोलंबो पोर्ट सिटी जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में बड़ा निवेशक है। दितवाह राहत अभियान ने भारत की तात्कालिक भौगोलिक और सांस्कृतिक निकटता का फायदा दिखाया, जबकि चीन की प्रतिक्रिया अधिक नपी-तुली रही।
हाल के एक रणनीतिक आकलन में कहा गया, "इसलिए श्रीलंका के सामने चुनौती भारत और चीन में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार रखते हुए दोनों के साथ उत्पादक संबंध बनाए रखने की है।" गुटनिरपेक्षता का यह दृष्टिकोण, जो बाहरी दबाव का सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से दृढ़ और व्यापक सहयोग के लिए पर्याप्त लचीला हो, तब भी जरूरी रहेगा जब वैश्विक व्यापार बिखर रहा है और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा आपूर्ति शृंखलाओं को नया रूप दे रही है।
आने वाले महीने यह तय करेंगे कि राष्ट्रपति दिसानायके की सरकार संकट को बदलाव के अवसर में बदल पाती है या नहीं। आईएमएफ से संभावित 700 मिलियन डॉलर की मदद, भारत की नियमित ईंधन सहायता और पुनर्निर्माण के लिए सक्रिय नागरिक समाज के साथ बहाली के लिए जरूरी आधार मौजूद हैं। लेकिन गहरे ढांचागत मुद्दे अब भी बने हुए हैं: उच्च जोखिम वाले इलाकों से परिवारों को हटाना, आपदा सहने में सक्षम बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण करना, आपदा प्रतिक्रिया क्षमता का आधुनिकीकरण और ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करना।
आधे तबाह घरों में रह रही इंद्राणी रविचंद्रन और उनके जैसे हजारों लोगों के लिए ये रणनीतिक बहसें दूर की बात लगती हैं। फिर भी उनका भविष्य इस पर निर्भर करता है कि श्रीलंका संकटों से निपटने के तात्कालिक चक्र को आखिरकार तोड़ पाता है या नहीं और जलवायु संकट तथा वैश्विक अस्थिरता के दौर के लिए जरूरी संस्थागत क्षमता बना पाता है या नहीं।
मुख्य बातें
- चक्रवात दितवाह में 643 लोगों की मौत हुई और इससे 7 अरब डॉलर तक का नुकसान हुआ, जो बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान के मामले में 2004 की सुनामी से अधिक है
- नवंबर 2025 की आपदा के महीनों बाद भी 165,000 से अधिक लोग विस्थापित हैं और पुनर्निर्माण के लिए जरूरी धन का केवल 20% ही उपलब्ध है
- ईरान युद्ध से तेल कीमतों में 40% उछाल आया, जिसके चलते ईंधन राशनिंग, बिजली की कीमतों में 40% तक बढ़ोतरी और सरकार के 317 मिलियन डॉलर के राहत पैकेज की जरूरत पड़ी
- भारत ने ऑपरेशन सागर बंधु के जरिए 450 मिलियन डॉलर की तत्काल सहायता दी, जबकि चीन ने 2 मिलियन डॉलर से भी कम की मदद दी
- आईएमएफ 200 मिलियन डॉलर की आपात वित्तीय सहायता और मौजूदा कार्यक्रम की समीक्षाओं के तहत 700 मिलियन डॉलर देने पर विचार कर रहा है, लेकिन इसके लिए उपयोगिता सेवाओं की कीमतों से जुड़ी शर्तें हैं
- श्रीलंका के चाय उद्योग के उत्पादन में 35% गिरावट की आशंका है, जिससे सालाना 1.3 अरब डॉलर का निर्यात राजस्व खतरे में है
- वनों की कटाई, आर्द्रभूमियों को पाटने और अपर्याप्त शुरुआती चेतावनी प्रणालियों जैसी व्यवस्था की नाकामियों ने चक्रवात का असर बढ़ाया
- राष्ट्रपति दिसानायके को नोराचोलाई बिजलीघर के समानांतर चल रहे कोयला संकट और ऊर्जा मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है






