समन्वित यूरेशियाई खतरा: चीन-रूस साझेदारी ऑस्ट्रेलिया की सुरक्षा को कैसे नया रूप दे रही है

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समन्वित यूरेशियाई खतरा: चीन-रूस साझेदारी ऑस्ट्रेलिया की सुरक्षा को कैसे नया रूप दे रही है

‘बिना सीमाओं’ वाली साझेदारी का उदय

वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य दशकों के सबसे बड़े बदलाव से गुजर रहा है। चीन और रूस ऐसी साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं जिसका स्पष्ट उद्देश्य पश्चिमी नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को खत्म करना है। शीत युद्ध के बाद शुरू हुआ सीमित सहयोग अब एक व्यापक गठबंधन का रूप ले चुका है। ऑस्ट्रेलिया के रणनीतिक योजनाकार अब इसे समूचे यूरेशिया में समन्वित खतरे के रूप में देखते हैं, जैसा कम से कम आधी सदी से नहीं देखा गया है।

विषय-सूची
  1. ‘बिना सीमाओं’ वाली साझेदारी का उदय
  2. सैन्य अभिसरण और आधुनिकीकरण
  3. आर्थिक मदद और प्रतिबंधों से बचने के तरीके
  4. ऑस्ट्रेलिया की रक्षा योजना पर असर
  5. क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं और रणनीतिक टकराव
  6. वैश्विक सूचना युद्ध और सत्तावादी गठजोड़
  7. निष्कर्ष

फरवरी 2022 में, रूसी सेनाओं के यूक्रेन में प्रवेश करने से कुछ ही सप्ताह पहले, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग ने औपचारिक रूप से ‘बिना सीमाओं’ वाली साझेदारी की घोषणा की। उन्होंने ऐसी मित्रता की बात कही जिसकी कोई सीमा न हो और ऐसे सहयोग की, जिसमें कोई निषिद्ध क्षेत्र न हो। इस घोषणा ने केवल उस प्रक्रिया को स्वीकार किया जो तीन दशकों से चल रही थी। पश्चिमी देश जहां आर्थिक समृद्धि पर ध्यान केंद्रित कर रहे थे और शीत युद्ध के बाद शांति के लाभांश की उम्मीद कर रहे थे, वहीं मॉस्को और बीजिंग ने उदार लोकतांत्रिक मूल्यों से कथित खतरे के खिलाफ अपनी सत्तावादी व्यवस्थाओं को बचाने के लिए ऐतिहासिक मतभेदों को व्यवस्थित रूप से दरकिनार किया।

यह साझेदारी एक साथ कई क्षेत्रों में काम करती है। बीजिंग मॉस्को को आर्थिक सहारा देता है, जिससे रूस को पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना करने में मदद मिली है। वहीं, रूस की रक्षा तकनीक और संचालन का अनुभव चीन के सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रमों को गति दे रहे हैं। यह सहयोग द्विपक्षीय व्यवस्थाओं से आगे बढ़कर संयुक्त प्रचार प्रयासों, संयुक्त राष्ट्र में समन्वित कूटनीतिक रुख और लगातार अधिक जटिल होते सैन्य अभ्यासों तक फैला है, जिनमें कई क्षेत्रों में आपसी तालमेल की परीक्षा ली जाती है।

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सैन्य अभिसरण और आधुनिकीकरण

चीन और रूस के बीच सैन्य सहयोग अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है। इससे ऐसी क्षमताएं विकसित हो रही हैं जो ऑस्ट्रेलिया की रक्षा योजनाओं के लिए सीधी चुनौती हैं, क्योंकि देश आगामी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति तैयार कर रहा है। दोनों सेनाओं के संयुक्त अभ्यास 2000 के दशक की शुरुआत में सालाना एक-दो से बढ़कर 2024 में 14 अलग-अलग आयोजन तक पहुंच गए, जबकि रूस यूक्रेन में अपना युद्ध जारी रखे हुए है। एक साथ कई मोर्चों पर प्रयास जारी रखने की यह क्षमता, हाल के समय तक पश्चिमी सहयोगियों की क्षमता पर लगी सीमाओं से एक बुनियादी फर्क दिखाती है।

हाल के घटनाक्रमों में संयुक्त मिसाइल-रोधी अभ्यास, जापान सागर से लेकर दक्षिण चीन सागर तक समन्वित नौसैनिक गश्त और उन्नत सैन्य-तकनीकी सहयोग शामिल हैं। अगस्त 2025 में मॉस्को और बीजिंग ने व्यापक संयुक्त नौसैनिक अभ्यास किए, जिनमें तोपखाने, पनडुब्बी-रोधी युद्ध और वायु रक्षा अभियान शामिल थे। ये गतिविधियां महज कूटनीतिक संकेत नहीं, बल्कि क्षमताओं की सुव्यवस्थित जांच और समन्वित अभियानों का व्यावहारिक प्रशिक्षण हैं।

तकनीकी आदान-प्रदान से बीजिंग को काफी लाभ मिलता है। चीन का रक्षा बजट 1995 में 7.7 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में लगभग 250 अरब डॉलर हो गया है, फिर भी उसका आखिरी बड़ा सैन्य संघर्ष 1979 में वियतनाम के खिलाफ हुआ था, जिसमें नतीजे उम्मीद से कमजोर रहे। लगातार युद्ध अभियानों से रूस ने आधुनिक युद्ध में जो महारत हासिल की है, उससे चीन को ऐसे सबक मिलते हैं जिनकी नकल सिमुलेशन से नहीं की जा सकती। मॉस्को ने बीजिंग को उन्नत एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली, एसयू-35 लड़ाकू विमान की तकनीक और उच्च प्रदर्शन वाले टर्बोफैन इंजन जैसे अहम कलपुर्जे मुहैया कराए हैं, जिन्हें चीनी निर्माताओं के लिए अपने दम पर बनाना अब भी मुश्किल है।

एएसपीआई के विश्लेषण के मुताबिक, यह सैन्य अभिसरण पश्चिमी सैन्य गठबंधनों के वास्तविक विकल्प की बुनियाद तैयार कर रहा है। दोनों देश धीरे-धीरे कमान और नियंत्रण की प्रक्रियाओं, डेटा साझा करने के तरीकों और वास्तविक समय में मिसाइलों की निगरानी करने वाली प्रणालियों को मानकीकृत कर रहे हैं। अमेरिका के पूर्व रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स ने चेताया था कि अमेरिका ने इससे पहले कभी एक साथ चार सहयोगी विरोधियों—रूस, चीन, उत्तर कोरिया और ईरान—का सामना नहीं किया है। इनका कुल परमाणु शस्त्रागार जल्द ही अमेरिका के अपने शस्त्रागार से दोगुना हो सकता है।

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आर्थिक मदद और प्रतिबंधों से बचने के तरीके

चीन और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2023 में रिकॉर्ड 240 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष से 26.3 प्रतिशत अधिक था। यह आर्थिक संबंध साधारण वस्तु-विनिमय से विकसित होकर ऐसी परिष्कृत व्यवस्था बन गया है जो व्यापक पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था को सहारा देती है। रूस को होने वाले चीनी निर्यात अब पहले उपलब्ध यूरोपीय और अमेरिकी सामानों की जगह ले रहे हैं। साथ ही, बीजिंग रूस के लिए पश्चिमी दोहरे उपयोग वाली तकनीक के आयात का माध्यम बन गया है।

संवेदनशील कलपुर्जों का व्यापार वैश्विक सुरक्षा के लिए खास चिंता का विषय है। सीमा शुल्क के आंकड़ों पर आधारित अनुमानों के मुताबिक, चीन हर महीने 30 करोड़ डॉलर से अधिक के ऐसे दोहरे उपयोग वाले उत्पाद रूस को निर्यात करता है जिन्हें पश्चिमी सरकारों ने हथियार उत्पादन के लिए उच्च प्राथमिकता वाली वस्तुओं के रूप में चिह्नित किया है। इनमें बैलिस्टिक मिसाइल बनाने में इस्तेमाल होने वाली मशीनें, सैन्य प्रकाशिकी में उपयोग किए जाने वाले सेमीकंडक्टर और रूसी मानवरहित विमानों को शक्ति देने वाले ड्रोन इंजन शामिल हैं। रूस के माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स आयात का 90 प्रतिशत तक अब चीन से आता है। इनमें टैंकों, बख्तरबंद वाहनों और विमानों में इस्तेमाल होने वाले कलपुर्जे भी शामिल हैं।

वित्तीय सहयोग भी इसी तरह गहरा हुआ है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने अप्रैल 2024 में कहा था कि दोनों देशों ने अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल करते हुए द्विपक्षीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की जगह लगभग पूरी तरह ले ली है। चीनी रेनमिन्बी रूस में जमा की जाने वाली सबसे बड़ी विदेशी मुद्रा बन गई है। 2023 में नकदी के रूप में इसकी जमा राशि दोगुनी होकर 68.7 अरब डॉलर के बराबर पहुंच गई। यह वित्तीय एकीकरण मॉस्को को पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने में मदद करता है और साथ ही बीजिंग के उस लक्ष्य को आगे बढ़ाता है जिसके तहत वह वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां स्थापित कर वैश्विक वित्तीय ढांचे को अमेरिकी बुनियादी ढांचे पर निर्भरता से मुक्त करना चाहता है।

यूरोपीय नीति विश्लेषकों का कहना है कि बीजिंग की मदद ने चीन को केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धी से बदलकर ऐसा सुरक्षा खतरा बना दिया है जिसे रोकने की जरूरत है। रूस को यूक्रेन के खिलाफ आक्रामकता जारी रखने में सक्षम बनाने वाली आर्थिक और तकनीकी बुनियाद मुहैया कराकर चीन यूरोप की अस्थिरता को निर्णायक रूप से बढ़ावा दे रहा है। पश्चिमी नेताओं की बार-बार दी गई चेतावनियों के बावजूद यह समर्थन जारी है। इनमें यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लायेन और अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन भी शामिल हैं, जिन्होंने कहा है कि ऐसी मदद के बुनियादी संबंधों पर असर पड़ता है।

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ऑस्ट्रेलिया की रक्षा योजना पर असर

चीन-रूस साझेदारी कैनबरा की रणनीतिक सोच को सीधे प्रभावित करती है, क्योंकि रक्षा योजनाकार राष्ट्रीय रक्षा रणनीति को अंतिम रूप दे रहे हैं। यह गठबंधन 1945 के बाद की उस वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देता है जिसने ऑस्ट्रेलिया की समृद्धि और संप्रभुता को आधार दिया है। इससे ऐसा प्रतिस्पर्धी माहौल बन रहा है जिसमें रक्षा नीति और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों में बड़े बदलाव जरूरी हैं। दोनों शक्तियों की आर्थिक दबाव की नीति, रक्षा सहयोग और संयुक्त सूचना अभियान ऐसे अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की मांग करते हैं जो पारंपरिक चार-वर्षीय बजट अनुमानों से आगे जाते हैं।

ऑस्ट्रेलिया की प्रतिक्रिया केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय सुरक्षा साझेदारियों के नेटवर्क को विस्तार देना है। हाल में ऑस्ट्रेलिया-यूरोपीय संघ सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी इसी विविधीकरण का उदाहरण है। इसके तहत समान विचारधारा वाले उन देशों से संबंध बनाए जा रहे हैं जो मिलती-जुलती चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हालांकि, विश्लेषक जोर देते हैं कि ये पूरक संबंध अमेरिका की जगह नहीं ले सकते। रणनीतिक क्षमता और प्रतिबद्धता की विश्वसनीयता को लेकर चिंताओं के बावजूद अमेरिका ऑस्ट्रेलिया का सबसे अहम सुरक्षा सहयोगी बना हुआ है।

खतरे की स्थिति में ऑस्ट्रेलियाई नीति-निर्माताओं को कई वास्तविकताओं को एक साथ ध्यान में रखना होगा। चीन एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति भी है और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी। सत्तावादी गठजोड़ यूरोप और हिंद-प्रशांत, दोनों क्षेत्रों में रक्षा, व्यापार और विचारधारा के स्तर पर सक्रिय है। मॉस्को के युद्ध प्रयास को जारी रखने में बीजिंग सबसे अहम मददगार है, जबकि दोनों सरकारें सूचना अभियानों और कूटनीतिक दबाव के जरिए दुनिया भर में सत्तावादी मूल्यों को थोपना चाहती हैं।

रक्षा योजनाकारों को इस संभावना का आकलन करना होगा कि चीन-रूस धुरी भविष्य में संघर्ष की स्थितियों में औपचारिक सैन्य समन्वय तक पहुंच सकती है। मौजूदा सहयोग पारस्परिक रक्षा संधि तक नहीं पहुंचा है, लेकिन इसका रुझान गहरे एकीकरण की ओर है, जिसमें संयुक्त अभियान, साझा रसद और समन्वित रणनीतिक संकेत शामिल हो सकते हैं। यह साझेदारी ईरान और उत्तर कोरिया समेत व्यापक सत्तावादी समूह का आधार भी बन गई है। इससे कई परमाणु शक्तियों वाला गठबंधन बनता है, जिसमें चीन सबसे मजबूत और रूस सबसे अधिक अस्थिरता पैदा करने वाला सदस्य है।

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क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं और रणनीतिक टकराव

चीन-रूस साझेदारी समन्वित चुनौती पेश करती है, लेकिन हिंद-प्रशांत के क्षेत्रीय देश ऐसी रणनीतिक रुकावटें पैदा कर रहे हैं जो इस गठबंधन को और गहरा होने से जटिल बनाती हैं। भारत रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाता है, जिससे मॉस्को के साथ ऐतिहासिक रक्षा संबंधों के बावजूद चीन और रूस के साथ त्रिपक्षीय सहयोग नहीं हो पाता। क्वाड में नई दिल्ली की भागीदारी और गुटबंदी की राजनीति का विरोध, इस बात पर सीमाएं लगाते हैं कि बीजिंग और मॉस्को अपनी क्षेत्रीय रणनीतियों में कितना तालमेल बिठा सकते हैं।

इंडोनेशिया अपनी bebas dan aktif (स्वतंत्र और सक्रिय) विदेश नीति के तहत संतुलित अस्पष्टता की नीति अपनाता है। वह दोनों शक्तियों के साथ संबंध रखता है, लेकिन किसी उलझाव से बचता है। जकार्ता ने हाल ही में पापुआ में लंबी दूरी के विमानों का अड्डा बनाने के रूस के अनुरोध को ठुकरा दिया और क्षेत्रीय संतुलन की अपनी प्राथमिकता दोहराई। इसी तरह दक्षिण चीन सागर के तटीय देश, जिनमें वियतनाम और फिलीपींस शामिल हैं, कानूनी उपायों और विविध रक्षा साझेदारियों के जरिए अपनी संप्रभुता की रक्षा करते हैं। इससे विवादित जलक्षेत्रों में महाशक्तियों के बीच एकजुटता बिखरती है।

जापान पर उत्तर और पश्चिम, दोनों दिशाओं से एक साथ खासा दबाव है। टोक्यो को अपने हवाई क्षेत्र में रूसी सैन्य विमानों की घुसपैठ और अनसुलझे कुरिल द्वीप विवाद के साथ-साथ चीन के समुद्री विस्तार का सामना करना पड़ रहा है। ‘बिना सीमाओं’ वाले गठबंधन ने ऐतिहासिक चीन-रूस अविश्वास से जापान को पहले जो रणनीतिक लाभ मिलता था, उसे खत्म कर दिया है। इससे टोक्यो को अपने शांतिवादी संवैधानिक प्रतिबंधों पर फिर से विचार करने और रक्षा खर्च में बड़ी बढ़ोतरी करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। जापान की तीन-आयामी रणनीति में अमेरिका के साथ गठबंधन मजबूत करना, क्वाड के तहत ऑस्ट्रेलिया और भारत के साथ सहयोग बढ़ाना, और बीजिंग तथा मॉस्को के साथ सक्रिय संपर्क बनाए रखना शामिल है।

क्षेत्रीय परिस्थितियां बताती हैं कि चीन-रूस साझेदारी दूर से जितनी ताकतवर दिखती है, स्थानीय देशों की भूमिका से गुजरने पर उसे व्यवहार में लागू करना उतना आसान नहीं है। क्षेत्रीय देश उन शर्तों को आकार देते हैं जिनके तहत बाहरी शक्तियों को काम करना पड़ता है। इससे समन्वित रुख अपनाने की लागत बढ़ती है और उसकी एकजुटता घटती है। यह टकराव ऑस्ट्रेलियाई कूटनीति के लिए मौजूदा प्रतिरोध को मजबूत करने के अवसर पैदा करता है। इसके लिए कानूनी क्षमता निर्माण, समुद्री निगरानी कार्यक्रमों और निर्भरता के बजाय विविधता को बढ़ावा देने वाली रक्षा साझेदारियों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

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वैश्विक सूचना युद्ध और सत्तावादी गठजोड़

पारंपरिक सैन्य और आर्थिक सहयोग से आगे बढ़कर चीन-रूस साझेदारी लोकतांत्रिक संस्थाओं और पश्चिमी एकजुटता को कमजोर करने के लिए सूचना क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर काम करती है। दोनों सरकारें ऐसे संदेशों का समन्वय करती हैं जिनमें रूस की आक्रामकता के लिए नाटो के विस्तार को दोष दिया जाता है, पश्चिमी साम्राज्यवाद की अवधारणा को बढ़ावा दिया जाता है और वैश्विक दक्षिण में उपनिवेशवाद से जुड़ी शिकायतों को हवा दी जाती है। इस समन्वित प्रचार ने कई गैर-पश्चिमी देशों को रूस के आक्रमण की निंदा करने से रोकने में मदद की है, जिससे मॉस्को को अलग-थलग करने के कूटनीतिक प्रयास काफी जटिल हो गए हैं।

बीजिंग और मॉस्को के बीच साइबर और खुफिया सहयोग में उल्लेखनीय तेजी आई है। दोनों देश ऑस्ट्रेलियाई नेटवर्क सहित पश्चिमी ठिकानों के खिलाफ औद्योगिक जासूसी, राजनीतिक प्रभाव अभियान और साइबर हमले करते हैं। यूरोप में चीनी और रूसी खुफिया अभियान एक-दूसरे से जुड़ते हैं। वहां उन्होंने धुर दक्षिणपंथी और धुर वामपंथी, दोनों तरह के अतिवादी राजनीतिक दलों में पैठ बनाई है, ताकि लोकतंत्र को लेकर संदेह फैलाया जा सके और सामाजिक विभाजन पैदा किए जा सकें। फिनलैंड की सुरक्षा एजेंसियों ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि दोनों देशों के लक्ष्य समान हैं और जब ऐसे प्रयास उनके हित में होते हैं तो वे उन्हें मिलकर बढ़ावा देते हैं।

यह सत्तावादी गठजोड़ उन परित्यक्त देशों को समर्थन देने तक फैला है जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा हैं। मॉस्को और बीजिंग, दोनों ने उत्तर कोरिया की परमाणु कूटनीति का पूरा समर्थन किया है और उन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का खुलेआम उल्लंघन किया है जिनका उन्होंने स्वयं सुरक्षा परिषद में समर्थन किया था। रूस प्योंगयांग को हाइड्रोकार्बन और संभावित रूप से दोहरे उपयोग वाली मिसाइल तकनीक मुहैया कराता है, जबकि चीन उसे कूटनीतिक संरक्षण और आर्थिक सहारा देता है। इस सहयोग से कोरियाई संकट का शांतिपूर्ण समाधान निकलने की संभावनाएं कम हुई हैं और पूर्वोत्तर एशिया में अमेरिकी सहयोगियों को घेरने वाले खतरे बढ़े हैं।

हूवर इंस्टीट्यूशन के स्टीफन कोटकिन का कहना है कि यह साझेदारी एक बुनियादी सच्चाई दिखाती है: रूस और चीन इस बात पर सहमत न हों कि वे किसका समर्थन करते हैं, लेकिन वे इस पर एकजुट हैं कि वे किसका विरोध करते हैं। उनका विरोध पश्चिमी उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, सार्वभौमिक मानवाधिकारों पर उसके जोर और सामूहिक सुरक्षा के उसके संस्थागत तरीकों को निशाना बनाता है। सत्तावादी सरकारों के लिए उदार लोकतांत्रिक विचारों का खतरा सैन्य शक्ति जितना ही गंभीर है। यही उन्हें सूचना नियंत्रण, इंटरनेट प्रशासन और ऐसे प्रचार तरीकों में सहयोग के लिए प्रेरित करता है जो नागरिक भागीदारी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।

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निष्कर्ष

चीन-रूस की ‘बिना सीमाओं’ वाली साझेदारी वैश्विक राजनीति में संरचनात्मक बदलाव है, जिस पर ऑस्ट्रेलिया के रक्षा योजनाकारों और नीति-निर्माताओं को तत्काल ध्यान देना होगा। शीत युद्ध के बाद की सीमित नजदीकी से विकसित होकर यह गठबंधन नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए व्यापक चुनौती बन चुका है।

  • यह साझेदारी रूस को आर्थिक सहारा और चीन को सैन्य आधुनिकीकरण देती है। इससे ऐसा चक्र बनता है जो पश्चिमी दबाव के खिलाफ दोनों सत्तावादी सरकारों को मजबूत करता है।
  • संयुक्त सैन्य अभ्यास छिटपुट आयोजनों से बढ़कर सालाना 14 समन्वित अभियानों तक पहुंच गए हैं। इनमें मिसाइल रक्षा अभ्यास और हिंद-प्रशांत में नौसैनिक गश्त शामिल हैं।
  • चीन हर महीने रूस को 30 करोड़ डॉलर से अधिक के दोहरे उपयोग वाले सामान निर्यात करता है, जिससे पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोनों और बख्तरबंद वाहनों का उत्पादन जारी रहता है।
  • यह सत्तावादी धुरी ईरान और उत्तर कोरिया समेत व्यापक गठबंधन का आधार है। इससे कई परमाणु शक्तियों वाला खतरा पैदा होता है, जो ऑस्ट्रेलिया और उसके सहयोगियों के लिए प्रतिरोध की रणनीति बनाना जटिल करता है।
  • भारत, इंडोनेशिया और दक्षिण चीन सागर के तटीय देशों समेत क्षेत्रीय शक्तियां रणनीतिक टकराव पैदा करती हैं, जिससे चीन-रूस की एकजुटता सीमित होती है। इससे ऑस्ट्रेलिया को अपनी साझेदारियां बढ़ाने के अवसर मिलते हैं।
  • आगामी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति में इस समूचे यूरेशिया के खतरे को ध्यान में रखते हुए अधिक बजट, विविध साझेदारियों और ऐसी क्षमताओं की जरूरत होगी जो यूरोप और हिंद-प्रशांत, दोनों क्षेत्रों की सुरक्षा चुनौतियों से एक साथ निपट सकें।
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