चीन का हर मौसम में काम करने वाला इलेक्ट्रोलाइट ईवी बैटरियों की रेंज दोगुनी करता है और भीषण ठंड को मात देता है

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चीन का हर मौसम में काम करने वाला इलेक्ट्रोलाइट ईवी बैटरियों की रेंज दोगुनी करता है और भीषण ठंड को मात देता है

शून्य से नीचे तापमान का समाधान

सर्दियों का मौसम लंबे समय से बैटरी से चलने वाले उपकरणों का दुश्मन रहा है। स्की यात्रा के दौरान स्मार्टफोन अचानक बंद हो जाते हैं, ड्रोन जमा देने वाले आसमान से नीचे गिरते हैं और तापमान गिरने पर इलेक्ट्रिक वाहन चालक अपनी गाड़ी की अनुमानित रेंज घटते देखते हैं। इन खराबियों की जड़ पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरियों की रसायनिकी की बुनियादी सीमाएं हैं। ठंड में आयनों की वह गति धीमी पड़ जाती है जो बिजली पहुंचाने के लिए जरूरी है, और भीषण ठंड में उपलब्ध क्षमता आधी या उससे भी कम रह जाती है। उत्तरी जलवायु वाले इलाकों के लोगों के लिए, ठीक जरूरत के समय उपकरणों का काम करना बंद कर देना मौसम के साथ आने वाली एक स्वीकृत झुंझलाहट बन गया है। अब चीनी शोधकर्ताओं की एक टीम का दावा है कि उसने बैटरी इलेक्ट्रोलाइट में आमूलचूल बदलाव करके इन सीमाओं को दूर कर दिया है। इलेक्ट्रोलाइट वह अहम रासायनिक माध्यम है जो इलेक्ट्रोडों के बीच आयनों को पहुंचाता है और सेल के भीतर ऊर्जा हस्तांतरण के राजमार्ग का काम करता है।

विषय-सूची
  1. शून्य से नीचे तापमान का समाधान
  2. अणुओं के तालमेल पर नए सिरे से विचार
  3. रेंज की चिंता को चुनौती
  4. सड़क से आगे के इस्तेमाल
  5. प्रयोगशाला से उत्पादन लाइन तक
  6. वैश्विक बैटरी होड़
  7. एक नजर में

पिछले महीने प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन में नानकाई विश्वविद्यालय और शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस पावर-सोर्सेज के वैज्ञानिकों ने हाइड्रोफ्लोरोकार्बन-आधारित एक नए इलेक्ट्रोलाइट का विवरण दिया। यह लिथियम-मेटल बैटरियों को कमरे के तापमान पर 700 वाट-घंटे प्रति किलोग्राम से अधिक ऊर्जा घनत्व हासिल करने में सक्षम बनाता है, साथ ही शून्य से 94 डिग्री फ़ारेनहाइट तक के तापमान में स्थिर रूप से काम करता है। तुलना के लिए, पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरियां कमरे के तापमान पर आम तौर पर लगभग 136 वाट-घंटे प्रति किलोग्राम ऊर्जा देती हैं, जबकि शून्य से नीचे तापमान में उनका प्रदर्शन 68 वाट-घंटे प्रति किलोग्राम से भी कम हो जाता है। यह प्रगति समान वजन की बैटरी में ऊर्जा भंडारण क्षमता को दोगुना या तिगुना करने की संभावना दिखाती है और ऊर्जा भंडारण तकनीक की दो सबसे पुरानी बाधाओं—ऊर्जा घनत्व और ठंड में भरोसेमंद प्रदर्शन—का समाधान पेश करती है। यह शोध इलेक्ट्रोलाइट रसायनिकी से जुड़ी दशकों पुरानी धारणाओं को चुनौती देता है और अगली पीढ़ी के ऊर्जा भंडारण के लिए बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकने वाला समाधान प्रस्तुत करता है।

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अणुओं के तालमेल पर नए सिरे से विचार

हर बैटरी के केंद्र में इलेक्ट्रोलाइट होता है—वह पदार्थ जो आवेशित कणों को धनात्मक और ऋणात्मक इलेक्ट्रोडों के बीच प्रवाहित होने देता है। पारंपरिक लिथियम बैटरियों के इलेक्ट्रोलाइट में ऑक्सीजन परमाणुओं वाले कार्बोनेट सॉल्वेंट इस्तेमाल होते हैं, जो मजबूत आयन-द्विध्रुवीय अंतःक्रियाओं के जरिए लिथियम लवणों को प्रभावी ढंग से घोलते हैं। घुले हुए लवणों को स्थिर रखने के कारण ऑक्सीजन के साथ तालमेल पर आधारित यह रसायनिकी दशकों से उद्योग पर हावी रही है, लेकिन इसके साथ ऐसे समझौते जुड़े हैं जो समग्र प्रदर्शन को सीमित करते हैं। लिथियम और ऑक्सीजन के बीच मजबूत अंतःक्रिया इलेक्ट्रोड की सतह पर आवेश हस्तांतरण में बाधा डालती है और ठंडे वातावरण में प्रदर्शन घटाती है। इससे ऊर्जा घनत्व और कम तापमान पर काम करने, दोनों के लिए अड़चन पैदा होती है। इन सामग्रियों को प्रभावी ढंग से काम करने के लिए बड़ी मात्रा में भी इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे वजन और आकार बढ़ते हैं; साथ ही तापमान के दबाव में आवेश का हस्तांतरण भी कुशलता से नहीं हो पाता।

नानकाई विश्वविद्यालय के जुन चेन और छिंग झाओ तथा शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस पावर-सोर्सेज के योंग ली के नेतृत्व वाली शोध टीम ने इस पुरानी धारणा को चुनौती दी कि प्रभावी इलेक्ट्रोलाइट के लिए ऑक्सीजन-आधारित लिगैंड अनिवार्य हैं। उन्होंने फ्लोरीन-युक्त हाइड्रोकार्बन सॉल्वेंट के नए अणु तैयार और संश्लेषित किए, जिनमें 1,3-डाइफ्लोरो-प्रोपेन को मुख्य घटक बनाया गया। यह यौगिक फ्लोरीन-आधारित समन्वय प्रणाली बनाता है, जो लिथियम और ऑक्सीजन के पारंपरिक अंतःक्रिया की जगह कमजोर लिथियम-फ्लोरीन बंधों का इस्तेमाल करती है। कमजोर समन्वय से आयनों का प्रवाह सुचारु होता है और घुलने की बाधाएं घटती हैं। इससे अत्यधिक तापीय दबाव में भी आवेश का हस्तांतरण तेज होता है और प्रणाली कम मात्रा में इलेक्ट्रोलाइट सामग्री के साथ काम कर पाती है।

नेचर में प्रकाशित तकनीकी विवरण इस रासायनिक बदलाव का पैमाना बताते हैं। हाइड्रोफ्लोरोकार्बन इलेक्ट्रोलाइट की श्यानता बेहद कम, 0.95 सेंटीपॉइज़ है; इसकी ऑक्सीकरण स्थिरता 4.9 वोल्ट से अधिक है और शून्य से 70 डिग्री सेल्सियस तापमान पर यह 0.29 मिलीसीमेंस प्रति सेंटीमीटर की आयनिक चालकता बनाए रखता है। इन गुणों से लिथियम-मेटल पाउच सेल चक्रों के दौरान आवेश हस्तांतरण की दक्षता का माप—कूलॉम्बिक दक्षता—कमरे के तापमान पर 99.7% और शून्य से 70 डिग्री सेल्सियस पर 98% तक हासिल कर पाते हैं। सोच-समझकर बनाए गए स्टेरिक अवरोध वाले फ्लोरीन-आधारित लिगैंड लवण को 2 मोल प्रति लीटर से अधिक सांद्रता में घोलने देते हैं, जिससे फ्लोरीन-युक्त हाइड्रोकार्बन की क्षमता को लेकर पुरानी धारणाओं को चुनौती मिलती है।

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रेंज की चिंता को चुनौती

इलेक्ट्रिक परिवहन पर इसके व्यावहारिक असर बड़े हैं और उन सभी को तुरंत समझ में आएंगे जिन्होंने लंबी दूरी की यात्रा या सर्दियों में प्रदर्शन की चिंता के कारण इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने से परहेज किया है। मौजूदा ईवी बैटरियां अनुकूल परिस्थितियों में एक बार चार्ज करने पर आम तौर पर 310 से 370 मील की रेंज देती हैं। ठंड में ये आंकड़े काफी घट जाते हैं, क्योंकि हीटिंग सिस्टम बिजली खींचते हैं और रासायनिक प्रतिक्रियाएं धीमी पड़ जाती हैं। शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस पावर-सोर्सेज के शोधकर्ता ली योंग के मुताबिक, नई तकनीक ठंड में प्रदर्शन बनाए रखते हुए रेंज में काफी बढ़ोतरी कर सकती है। आधिकारिक मंत्रालयी अखबार साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेली को दिए साक्षात्कार में ली ने उपभोक्ता उपयोग के लिए इस खोज की परिवर्तनकारी क्षमता समझाई।

ली ने कहा, "समान वजन वाली बैटरियों की कमरे के तापमान पर ऊर्जा भंडारण क्षमता दो से तीन गुना बढ़ने से इलेक्ट्रिक वाहनों की रेंज 500-600 किलोमीटर से बढ़कर 1,000 किलोमीटर से अधिक हो सकती है।" इससे एक बार चार्ज करने पर करीब 620 मील की दूरी तय की जा सकेगी—डेनवर से डलास के बीच की दूरी के लगभग बराबर। इससे लंबी यात्राओं और शहरों के बीच आवागमन में रेंज की चिंता प्रभावी ढंग से खत्म हो सकती है।

सिर्फ दूरी की क्षमता ही नहीं, यह तकनीक सर्द जलवायु में ईवी के इस्तेमाल को फिलहाल प्रभावित करने वाली मौसमी प्रदर्शन गिरावट का भी समाधान करती है। पारंपरिक बैटरियां सर्दियों में अपनी काफी क्षमता खो देती हैं। जमाव बिंदु से नीचे के तापमान में कभी-कभी उनकी रेंज घोषित क्षमता के आधे से भी कम रह जाती है और उन्हें चालू रखने के लिए ऊर्जा खपत करने वाले हीटिंग सिस्टम की जरूरत पड़ती है। हाइड्रोफ्लोरोकार्बन इलेक्ट्रोलाइट शून्य से 58 डिग्री फ़ारेनहाइट पर लगभग 400 वाट-घंटे प्रति किलोग्राम क्षमता बनाए रखता है। इससे वाहन कड़ी सर्दियों में भी इस्तेमाल लायक रहते हैं और बैटरी गर्म करने वाले उपकरणों या अतिरिक्त बिजली खपत करने वाले ताप प्रबंधन सिस्टम की जरूरत नहीं पड़ती। प्रयोगशाला की परिस्थितियों में प्रदर्शित 99.7% चार्जिंग दक्षता से संकेत मिलता है कि लंबे इस्तेमाल के दौरान ये बैटरियां बिजली को बेहतर तरीके से संभाल सकती हैं।

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सड़क से आगे के इस्तेमाल

ऑटोमोटिव उपयोग पर लोगों का ध्यान तुरंत जाता है, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तकनीक यात्री वाहनों से कहीं आगे विशेष औद्योगिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में भी काम आ सकती है। शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस पावर-सोर्सेज, चाइना एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी कॉरपोरेशन के अधीन काम करता है। इससे संकेत मिलता है कि अंतरिक्ष यानों, उपग्रहों और ग्रहों की खोज करने वाली जांच प्रणालियों में इसके तत्काल उपयोग हो सकते हैं। ये उपकरण ऐसे चरम तापीय वातावरण में काम करते हैं जहां एक ही कक्षा या सतह पर अभियान के दौरान तापमान भीषण गर्मी से लेकर अत्यधिक ठंड तक बदल सकता है। इस इलेक्ट्रोलाइट वाली उच्च ऊर्जा बैटरियां आर्कटिक में काम करने वाले निगरानी ड्रोन की सहनशक्ति और पेलोड क्षमता बढ़ा सकती हैं, बुद्धिमान रोबोटिक प्रणालियों को तापीय सुरक्षा के बिना ध्रुवीय रातों में काम करने में सक्षम बना सकती हैं और अंटार्कटिक शोध केंद्रों में वैज्ञानिक उपकरणों को बिजली दे सकती हैं, जहां पारंपरिक बैटरियां तेजी से काम करना बंद कर देती हैं।

ठंड में काम करने की क्षमता से उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स को भी उतना ही फायदा हो सकता है। मौजूदा स्मार्टफोन और पोर्टेबल उपकरण ठंड में बैटरी की कम चलने वाली अवधि से जूझते हैं। उत्तरी जलवायु के उपयोगकर्ताओं और शीतकालीन खेलों के शौकीनों की यह आम शिकायत है कि आंशिक चार्ज दिखने के बावजूद उनके उपकरण अचानक बंद हो जाते हैं। फ्लोरीन-आधारित रसायनिकी ऐसे उपकरण बना सकती है जो उन तापमानों पर भी पूरी तरह काम करें जहां पारंपरिक बैटरियां निष्क्रिय हो जाती हैं। इससे जंगल जैसे दुर्गम इलाकों में आपातकालीन बीकन, जीपीएस यूनिट और संचार उपकरण अधिक समय तक काम कर सकते हैं। अंतरिक्ष खोज अभियानों में तापमान भीषण गर्मी से लेकर अत्यधिक ठंड तक बदलता है। चंद्रमा या मंगल की सतह पर अभियान के दौरान ये सेल इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जहां मिशन की सफलता के लिए तापीय स्थिरता जरूरी है और पारंपरिक ताप प्रबंधन से वजन इतना बढ़ जाता है कि वह वहन करना मुश्किल होता है।

इस इलेक्ट्रोलाइट के भौतिक स्वरूप में बुनियादी बदलाव इसकी बहुउपयोगिता का आधार है। सॉल्वेंट की श्यानता घटाकर और सतह पर फैलने की क्षमता बढ़ाकर यह प्रणाली कुल मिलाकर कम इलेक्ट्रोलाइट सामग्री में काम करती है। इससे बैटरी का वजन घटता है और तापमान की पूरी सीमा में प्रदर्शन बेहतर होता है। उच्च विशिष्ट ऊर्जा और व्यापक तापमान सीमा में काम करने का यह मेल मौजूदा वाणिज्यिक बैटरी प्रणालियों में अब तक हासिल नहीं हो सका है। इसलिए हाइड्रोफ्लोरोकार्बन वाला तरीका एयरोस्पेस उपयोगों के लिए खास तौर पर मूल्यवान है, जहां हर ग्राम अहम होता है और धूप में रहने तथा छाया में जाने के बीच तापीय परिस्थितियां नाटकीय रूप से बदलती हैं।

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प्रयोगशाला से उत्पादन लाइन तक

समीक्षित शोध पत्र में प्रकाशित उत्साहजनक नतीजों के बावजूद, उपभोक्ताओं के लिए व्यावसायिक उत्पादों में इन बैटरियों के आने से पहले कई बड़ी इंजीनियरिंग चुनौतियां बाकी हैं। शोध टीम मानती है कि उच्च तापमान पर स्थिरता के लिए और विकास तथा सुधार जरूरी हैं। इलेक्ट्रोलाइट अत्यधिक ठंड में अच्छा प्रदर्शन करता है, लेकिन सभी जलवायु में काम करने के लिए 212 डिग्री फ़ारेनहाइट से ऊपर इसका प्रदर्शन और सुरक्षा बेहतर करनी होगी। यह गर्म रेगिस्तानी इलाकों या तेजी से चार्ज करने की परिस्थितियों के लिए जरूरी है, जिनमें काफी गर्मी पैदा होती है। कम तापमान पर मिलने वाले फायदे बरकरार रखते हुए हाइड्रोफ्लोरोकार्बन यौगिकों का क्वथनांक बढ़ाना शोधकर्ताओं के सामने अगली तकनीकी बाधा है।

व्यावसायिक उत्पादन की समयसीमा बैटरी विकास के आम चक्रों की तुलना में काफी महत्वाकांक्षी है। उद्योग जगत के सूत्रों के मुताबिक, शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस पावर-सोर्सेज समेत चीनी निर्माता 2026 के आखिर तक बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रख रहे हैं। यह महत्वाकांक्षी समयसीमा वैश्विक बैटरी उत्पादन और स्वच्छ ऊर्जा तकनीक में अपना दबदबा बनाए रखने की चीन की व्यापक रणनीति को दर्शाती है। फिलहाल दुनिया की लिथियम-आयन विनिर्माण क्षमता का करीब 60% चीन के नियंत्रण में है और देश अगली पीढ़ी की तकनीकों में बढ़त हासिल करने के लिए बुनियादी शोध में लगातार भारी निवेश कर रहा है। यह विकास चीन की अन्य हालिया खोजों के साथ मेल खाता है, जिनमें स्थिर ग्रिड भंडारण के लिए टोफू के नमकीन पानी से बनी जलीय बैटरियां शामिल हैं, जो 120,000 चार्ज चक्र हासिल करती हैं। इससे पता चलता है कि ऊर्जा भंडारण को बेहतर बनाने के लिए अलग-अलग रसायनियों और उपयोगों पर व्यापक स्तर पर काम हो रहा है।

व्यावसायीकरण की रणनीति में अकादमिक संस्थानों और औद्योगिक भागीदारों का सहयोग अहम दिखाई देता है। चीनी विज्ञान अकादमी के शिक्षाविद और नानकाई विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष चेन जुन ने तकनीक हस्तांतरण की प्रक्रिया पर हाल के बयानों में सैद्धांतिक खोज के बजाय व्यावहारिक उपयोग के महत्व पर जोर दिया।

चेन ने कहा, "हम हमेशा हाथीदांत की मीनार में नहीं रह सकते। हमारा लक्ष्य असली औद्योगिक चुनौतियों का समाधान करना है।" उनकी टीम प्रयोगशाला के निष्कर्षों को ऐसे ड्राइवट्रेन पुर्जों में बदलने के लिए वाहन निर्माताओं के साथ साझेदारियां पहले ही कर चुकी है, जो वास्तविक सड़क परिस्थितियों का सामना कर सकें।

नानकाई विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान कॉलेज के प्रोफेसर यान झेनहुआ ने कहा कि यह तकनीक लिथियम-मेटल बैटरियों से जुड़ी सुरक्षा और लागत, दोनों की चिंताओं को दूर करती है। स्वयं विकसित कंपोजिट इलेक्ट्रोलाइट आंतरिक सुरक्षा बेहतर करता है और चक्र-आयु में भी काफी सुधार लाता है। इससे उन बैटरियों की जोखिमपूर्ण छवि दूर हो सकती है, जिसने मौजूदा लिथियम-आयन संरचनाओं पर सैद्धांतिक बढ़त के बावजूद उनके व्यावसायीकरण को अब तक सीमित रखा है।

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वैश्विक बैटरी होड़

यह खोज बैटरी तकनीक में प्रभुत्व हासिल करने की तेज होती अंतरराष्ट्रीय होड़ के बीच आई है। इस होड़ का नतीजा संभवतः तय करेगा कि ऊर्जा परिवर्तन से किन देशों को आर्थिक लाभ होगा। जहां कुछ देशों ने घरेलू विनिर्माण क्षमता की रक्षा के लिए नियामकीय बाधाओं और व्यापार प्रतिबंधों पर ध्यान दिया है, वहीं चीन ने सरकारी समर्थन वाली प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों तथा उद्योग के करीबी सहयोग के जरिए बुनियादी शोध और तेजी से व्यावसायीकरण पर जोर दिया है। हाइड्रोफ्लोरोकार्बन इलेक्ट्रोलाइट स्थापित रसायनिकी से बुनियादी तौर पर अलग है। इससे चीनी निर्माता मौजूदा क्षमताओं की मामूली बढ़त हासिल करने के बजाय मौजूदा पीढ़ी की तकनीकों को पीछे छोड़ सकते हैं। शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस पावर-सोर्सेज की भागीदारी—जो सरकारी समर्थन वाली एक बड़ी एयरोस्पेस अनुसंधान संस्था है—इन नवाचारों को बड़े पैमाने पर विकसित करने के लिए मिलने वाले पर्याप्त सरकारी समर्थन का संकेत देती है।

यह नवाचार अकादमिक प्रकाशन और बड़े पैमाने के उत्पादन के बीच लगातार बने रहने वाले अंतर को उजागर करता है, जो उन्नत पदार्थ विज्ञान की विशेषता है। बैटरी शोधकर्ता आम तौर पर मानते हैं कि नेचर में शोध पत्र छपने और कारखाने की असेंबली लाइन तक पहुंचने के बीच इंजीनियरिंग की चुनौतियों, बड़े पैमाने पर उत्पादन की मुश्किलों, आपूर्ति श्रृंखला के विकास और लागत घटाने में कई साल लगते हैं। हालांकि, सरकारी समर्थन वाले एयरोस्पेस और ऑटोमोटिव संस्थानों की भागीदारी से संकेत मिलता है कि इन बाधाओं को दूर करने के लिए पर्याप्त संसाधन लगाए जाएंगे, जिनमें पायलट उत्पादन लाइनें और परीक्षण केंद्र बनाना भी शामिल है। तकनीक सफल हुई तो इलेक्ट्रिक वाहन बाजार में प्रतिस्पर्धा का परिदृश्य बदल सकता है, खासकर उन बाजारों में जहां सर्दियां बहुत कठोर होती हैं, मौजूदा बैटरी तकनीक जूझती है और उपभोक्ता स्वाभाविक रूप से ईवी अपनाने से हिचकते हैं।

इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने पर विचार कर रहे उपभोक्ताओं के लिए यह विकास संकेत देता है कि 2027 या 2028 तक अगली पीढ़ी के वाहनों का इंतजार करने पर मामूली बढ़त के बजाय रेंज और भरोसेमंद प्रदर्शन में सचमुच बड़ा सुधार मिल सकता है। 600 मील की रेंज और ठंड में बेहतर प्रदर्शन का मेल ईवी अपनाने को लेकर आम खरीदारों की दो सबसे बड़ी आपत्तियों का समाधान करता है। चीन ऑटोमोटिव न्यू एनर्जी बैटरी टेक्नोलॉजी के महाप्रबंधक लू तियानजुन ने चीन के नवाचार तंत्र में बैटरी से जुड़े अन्य उन्नत विकासों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रदर्शन मौजूदा उपभोक्ता तकनीकों से करीब 50% बेहतर है। इससे ये बैटरियां देश और विदेश, दोनों में अग्रणी स्तर पर पहुंचती हैं और लंबी दूरी की यात्रा में इलेक्ट्रिक वाहन आंतरिक दहन इंजन वाले वाहनों से सचमुच बेहतर हो सकते हैं।

एक नजर में

  • चीनी शोधकर्ताओं ने हाइड्रोफ्लोरोकार्बन-आधारित इलेक्ट्रोलाइट विकसित किया है, जो लिथियम-मेटल बैटरियों को 700 वाट-घंटे प्रति किलोग्राम से अधिक ऊर्जा घनत्व हासिल करने में सक्षम बनाता है। यह पारंपरिक लिथियम-आयन सेल से दोगुने से भी अधिक है।
  • यह तकनीक शून्य से 94 डिग्री फ़ारेनहाइट तक के तापमान में काम करती है और शून्य से 58 डिग्री फ़ारेनहाइट पर लगभग 400 वाट-घंटे प्रति किलोग्राम क्षमता बनाए रखती है।
  • इन बैटरियों से चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहन एक बार चार्ज करने पर 620 मील से अधिक की रेंज हासिल कर सकते हैं, जबकि मौजूदा औसत रेंज 310 से 370 मील है।
  • यह खोज पारंपरिक ऑक्सीजन-समन्वय रसायनिकी की जगह फ्लोरीन-आधारित लिगैंड का इस्तेमाल करती है। इसमें 1,3-डाइफ्लोरो-प्रोपेन को मुख्य सॉल्वेंट घटक बनाया गया है।
  • नानकाई विश्वविद्यालय और शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस पावर-सोर्सेज की शोध टीमों ने अपने निष्कर्ष 25 फरवरी, 2026 को नेचर पत्रिका में प्रकाशित किए।
  • उच्च तापमान पर स्थिरता अभी एक सीमा है। सभी जलवायु में काम करने की क्षमता हासिल करने से पहले इस पर और शोध जरूरी है।
  • बड़े पैमाने पर उत्पादन का लक्ष्य 2026 का आखिर है। इसके संभावित उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर एयरोस्पेस, ड्रोन, रोबोटिक्स और गहरे अंतरिक्ष की खोज तक फैले हैं।
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