ईरान की होर्मुज़ नाकेबंदी से वैश्विक आपूर्ति बाधित, एशिया ऊर्जा आपातकाल में

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ईरान की होर्मुज़ नाकेबंदी से वैश्विक आपूर्ति बाधित, एशिया ऊर्जा आपातकाल में

वैश्विक ऊर्जा धमनी ठप

दुनिया 1970 के दशक के तेल संकट के बाद से अब तक की सबसे बड़ी ऊर्जा आपदा का सामना कर रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने चेतावनी दी है कि मौजूदा स्थिति "बहुत गंभीर" है और 1973 के तेल प्रतिबंध तथा 1979 की ईरानी क्रांति, दोनों से हुए नुकसान को मिलाकर भी उससे अधिक विनाशकारी हो सकती है। बिरोल ने इस संकट को "दो तेल संकट और एक गैस संकट, सब एक साथ" बताया।

विषय-सूची
  1. वैश्विक ऊर्जा धमनी ठप
  2. नाकेबंदी और होर्मुज़ के लिए संघर्ष
  3. संकट से जूझते देश
  4. ईंधन की कीमतों से परे आर्थिक झटके
  5. भू-राजनीतिक दरारें
  6. विकासशील दुनिया असर झेलने को तैयार
  7. आगे के खतरे और लंबे समय के घाव
  8. मुख्य बातें

इस संकट के केंद्र में होर्मुज़ जलडमरूमध्य है। ओमान और ईरान के बीच स्थित 40 किलोमीटर चौड़ा यह संकरा जलमार्ग आम तौर पर दुनिया की कुल तेल खपत का करीब पांचवां हिस्सा और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस की खेपों को रास्ता देता है। फरवरी के अंत में अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हमले शुरू करने के बाद से तेहरान ने इस अहम मार्ग की प्रभावी नाकेबंदी कर दी है। विश्लेषक इसे "आंशिक बंदी" कह रहे हैं। टैंकरों की आवाजाही रोज़ाना करीब 80 जहाज़ों से घटकर केवल दो रह गई है, जबकि सैकड़ों जहाज़ दोनों ओर इंतज़ार कर रहे हैं। यहां से गुजरने के लिए शिपिंग कंपनियों को अब असाधारण रूप से ऊंचा बीमा शुल्क या लाखों डॉलर तक के अनौपचारिक पारगमन शुल्क चुकाने पड़ रहे हैं।

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इसका तत्काल असर गंभीर रहा है। खाड़ी से अपने तेल का 98 प्रतिशत आयात करने वाले फिलीपींस में राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस ने राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित किया। युद्ध शुरू होने के बाद दुनिया में ऐसा करने वाला यह पहला देश है। टेलीविज़न पर दिए संबोधन में मार्कोस ने तेल की निर्बाध आपूर्ति का वादा किया और देश के मौजूदा 45 दिन के भंडार में इज़ाफ़ा करने के लिए 10 लाख बैरल तेल खरीदने की घोषणा की। इस घोषणा से उनकी सरकार को सीधे ईंधन खरीदने, ज़रूरी वस्तुओं के वितरण को प्राथमिकता देने और सरकारी कर्मचारियों के लिए संकुचित कार्य-सप्ताह समेत असाधारण ऊर्जा-बचत उपाय लागू करने का अधिकार मिला है।

ऊर्जा अनुसंधान फर्म वुड मैकेंज़ी ने अनुमान जताया है कि युद्ध जारी रहने पर आने वाले महीनों में ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। फर्म ने चेतावनी दी कि इस साल औसतन 125 डॉलर प्रति बैरल की कीमत वैश्विक मंदी को जन्म देगी। संघर्ष शुरू होने के बाद से कीमतें पहले ही करीब 40 प्रतिशत बढ़ चुकी हैं और ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा है।

नाकेबंदी और होर्मुज़ के लिए संघर्ष

जलडमरूमध्य में सैन्य स्थिति अस्थिर और जटिल बनी हुई है। अमेरिका ने दक्षिणी मोर्चे पर ईरान की तेज़ हमलावर नौकाओं और ड्रोन को निशाना बनाने के लिए ए-10 वॉरहॉग ज़मीनी हमला करने वाले विमान और अपाचे हेलीकॉप्टर तैनात किए हैं। इज़राइली मीडिया की खबरों के अनुसार, व्हाइट हाउस ने सहयोगियों को बताया है कि जलमार्ग फिर से खोलने का अभियान दिनों में नहीं, बल्कि "कई हफ्तों" में पूरा हो सकता है।

नाकेबंदी पूरी तरह से लागू नहीं है। ईरान ने चुनिंदा नीति अपनाई है: मित्र देशों के जहाज़ों को गुजरने दे रहा है, जबकि अमेरिका और इज़राइल समेत शत्रु देशों के जहाज़ों को रोक रहा है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की कि चीन, रूस, पाकिस्तान, इराक और भारत के जहाज़ों को सुरक्षित मार्ग दिया गया है। हाल में कम से कम दो भारतीय टैंकर यहां से गुज़रे हैं। इससे समुद्री यातायात बंट गया है: कुछ अर्थव्यवस्थाओं को सीमित आपूर्ति मिल रही है, जबकि अन्य की आपूर्ति पूरी तरह कट गई है।

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मामले को और पेचीदा बनाते हुए, अमेरिका वैश्विक आपूर्ति की कमी कम करने के लिए कुछ ईरानी टैंकरों को चुपचाप जलडमरूमध्य से गुजरने दे रहा है। वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्वीकार किया कि ईरानी जहाज़ पहले से ही बाहर निकल रहे हैं और वॉशिंगटन ने दुनिया के बाकी हिस्सों को आपूर्ति बनाए रखने के लिए ऐसा होने दिया है। यह विरोधाभासी रवैया अमेरिका के सामने मौजूद दुविधा को उजागर करता है: ईरान पर सैन्य दबाव बनाए रखना और साथ ही वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को पूरी तरह ढहने से रोकना।

बुनियादी ढांचे को नुकसान जहाज़रानी मार्गों तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, पूरे क्षेत्र में कम से कम 40 अहम ऊर्जा परिसंपत्तियों को गंभीर नुकसान पहुंचा है। अगर कूटनीतिक बातचीत से जलडमरूमध्य तुरंत फिर खुल भी जाए, तब भी तेल और गैस निकालने तथा प्रसंस्करण की भौतिक क्षमता प्रभावित हो चुकी है। कतर के रास लफ़ान और मेसाईद औद्योगिक शहरों समेत कई ठिकानों पर हमलों के चलते दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातक को उत्पादन रोकना पड़ा है।

संकट से जूझते देश

एशिया भर की सरकारें ऊर्जा बचाने के अभियानों से लेकर उद्योगों में राशनिंग तक के आपात उपाय लागू कर रही हैं। दक्षिण कोरिया अपनी ऊर्जा का 84 प्रतिशत आयात करता है और तेल के 70 प्रतिशत तथा प्राकृतिक गैस के 20 प्रतिशत के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है, जिससे वह खास तौर पर असुरक्षित है। समुद्र और बंद उत्तर कोरियाई सीमा से घिरे होने के कारण उसका बिजली ग्रिड अलग-थलग है; पड़ोसी देशों से आपात बिजली लेना उसके लिए संभव नहीं है। राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने जून में समावेशी विकास और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव पर केंद्रित प्रगतिशील एजेंडे के साथ पद संभाला था, लेकिन अब उनकी प्राथमिकताएं सीधे टकराव में हैं। उनके प्रशासन ने नागरिकों से बिजली बचाने के लिए कम समय तक नहाने और दिन के उजाले में फोन चार्ज करने की सलाह दी है। साथ ही, नैफ्था के निर्यात पर सीमा लगाने पर विचार किया जा रहा है। पेट्रोलियम का यह उपोत्पाद प्लास्टिक निर्माण के लिए अहम है।

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संकट के चलते ली को तय समय से पहले परमाणु रिएक्टर फिर शुरू करने पड़े हैं और कोयले से बिजली उत्पादन बढ़ाने पर विचार करना पड़ रहा है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा के उनके वादों से पीछे हटना पड़ रहा है। सरकार के पास एलएनजी का भंडार केवल करीब 35 लाख टन है, जो स्थिर मांग के लगभग दो से चार हफ्तों के लिए पर्याप्त है। शुद्ध तेल आयात जीडीपी का 2.7 प्रतिशत होने के कारण चालू खाते पर पड़ने वाले झटकों के लिहाज़ से दक्षिण कोरिया सबसे असुरक्षित अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।

जापान ने अपने इतिहास में पहली बार आपातकालीन तेल भंडार से सबसे बड़ी मात्रा निकालनी शुरू की है। उसने अपने 254 दिन के रणनीतिक भंडार से करीब 45 दिन की आपूर्ति निकाली है। संभावित उपभोक्ता वस्तुओं की कमी की आशंका से लोगों के टॉयलेट पेपर जमा करने के बाद सरकार ने शांति बनाए रखने की अपील की है। इस महीने के अंत में राष्ट्रपति ट्रंप से मुलाकात के दौरान जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची के अधिक अमेरिकी एलएनजी खरीदने और अतिरिक्त परमाणु संयंत्र फिर शुरू करने पर चर्चा करने की उम्मीद है।

चीन इस संकट से निपटने की सबसे बेहतर स्थिति में दिखता है, हालांकि वह भी इससे अछूता नहीं है। दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक चीन कई साल से रणनीतिक भंडार बना रहा है, जिसके 90 करोड़ से 1.4 अरब बैरल के बीच होने का अनुमान है। इससे लगभग तीन महीने के आयात के बराबर आपूर्ति मिल सकती है। दक्षिण चीन सागर में टैंकरों पर फिलहाल 4.6 करोड़ बैरल से अधिक ईरानी कच्चा तेल मौजूद है। साथ ही, रूस मध्य पूर्व के संघर्ष से अप्रभावित पाइपलाइन मार्गों के ज़रिए चीन के ऊर्जा आयात का करीब पांचवां हिस्सा दे रहा है। इससे चीन के पास आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते हैं। घरेलू भंडार सुरक्षित रखने के लिए देश ने अपनी रिफाइनरियों से ईंधन निर्यात पर भी रोक लगा दी है। विशाल नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र और इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते इस्तेमाल से तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के असर को कम करने में मदद मिल रही है।

ईंधन की कीमतों से परे आर्थिक झटके

ऊर्जा संकट पूरे महाद्वीप में विनिर्माण और कृषि क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है। दक्षिण कोरिया और जापान में नैफ्था की कमी से पेट्रोकेमिकल कंपनियों को उत्पादन घटाना पड़ रहा है। इससे वॉशिंग मशीन से लेकर कारों तक में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक की आपूर्ति शृंखला पर खतरा मंडरा रहा है। इस कमी से दक्षिण कोरिया की सेमीकंडक्टर कंपनियों सैमसंग और एसके हाइनिक्स को खास जोखिम है। दोनों मिलकर दुनिया के मेमोरी चिप बाज़ार के बड़े हिस्से की आपूर्ति करती हैं, जिन पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्लाउड ढांचा निर्भर है।

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बैंकॉक के बाहर धान के खेतों में काम करने वाले थाई किसान थेरासिन ने आने वाले बुवाई के मौसम को लेकर चिंता जताई। उन्होंने मीडिया संस्थानों से कहा कि अगर ईंधन को लेकर अनिश्चितता जारी रही, तो वह मई में अगली फसल की बुवाई छोड़ देंगे।

हम उत्पादक हैं। सीधे शब्दों में कहें तो, हम शृंखला की शुरुआत में हैं, इसलिए सबसे पहले उत्पादन पर असर पड़ता है। ईंधन सबसे अहम चीज़ है। हम हाथ से खेत नहीं जोत सकते और न ही मिट्टी तोड़ सकते हैं, अब हाथों से फसल काटने के लिए लोगों को नहीं लगा सकते, और खेतों में हाथ से पानी भी नहीं डाल सकते। हर काम के लिए मशीनरी चाहिए।

उनकी दुविधा विकासशील एशिया में भी दिखाई देती है, जहां डीज़ल से चलने वाले सिंचाई और कटाई के उपकरणों ने हाथ के श्रम की जगह ले ली है। तेल की कीमतों में उछाल से भी अधिक गंभीर नतीजे उर्वरक संकट के हो सकते हैं। नाकेबंदी ने नाइट्रोजन आधारित उर्वरक उत्पादन के लिए ज़रूरी प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित कर दी है। अफ्रीका और मध्य एशिया में बुवाई का मौसम नज़दीक है और कमी से कृषि उत्पादकता तथा खाद्य सुरक्षा को खतरा है। भूख के अस्थायी दौर भी बच्चों के संज्ञानात्मक और शारीरिक विकास को स्थायी नुकसान पहुंचा सकते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी के जाल बना सकते हैं।

भू-राजनीतिक दरारें

यह युद्ध वैश्विक गठबंधनों और भरोसे की धारणाओं को बदल रहा है। अमेरिका सहयोगियों पर जलडमरूमध्य की सुरक्षा के सैन्य प्रयासों में शामिल होने का दबाव बना रहा है, लेकिन जापान ने कहा है कि वह समुद्री सुरक्षा अभियानों पर विचार नहीं कर रहा। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और ग्रीस ने भी नौसैनिक जहाज़ भेजने से इनकार किया है। इसके बजाय यूरोपीय संघ दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा रणनीतियों को और तेज़ कर रहा है, ताकि खपत घटाई जा सके।

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इस संकट ने ऊर्जा आयात करने वाले देशों के लिए चीन को अपेक्षाकृत अधिक स्थिर साझेदार के रूप में उभारा है। रणनीतिक भंडार, नवीकरणीय ऊर्जा ढांचे और ईरान तथा रूस जैसे प्रतिबंधित देशों के साथ संबंधों में बीजिंग के दशकों के निवेश से अब ठोस लाभ मिल रहे हैं, जिनकी बराबरी वॉशिंगटन नहीं कर सकता। ऊर्जा अर्थशास्त्र के एक शोधकर्ता ने कहा कि चीन भाग्यशाली है कि उसने 25 साल पहले नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश शुरू किया था और अब उसे उसका लाभ मिल रहा है।

फिलीपींस, नेपाल और बांग्लादेश के लाखों परिवारों के लिए संघर्ष से न केवल ऊर्जा आपूर्ति, बल्कि आजीविका भी खतरे में है। ये देश सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात में काम करने वाले प्रवासी श्रमिकों से मिलने वाली धनराशि पर निर्भर हैं। नेपाल और फिलीपींस में जीडीपी के अनुपात में प्रेषण 25 प्रतिशत से अधिक है। खाड़ी की अर्थव्यवस्थाएं नाकेबंदी के दबाव में हैं और प्रवासी श्रमिक संघर्ष से हुई हताहतों की संख्या में बड़ा हिस्सा हैं, जिससे आय का यह अहम स्रोत जोखिम में है।

विकासशील दुनिया असर झेलने को तैयार

दक्षिण एशिया में आपूर्ति की भौतिक कमी सबसे गंभीर है। कतर से बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली अपनी 25 प्रतिशत गैस आयात करने वाले बांग्लादेश ने बिजली बचाने के लिए सभी विश्वविद्यालय बंद कर दिए हैं। गर्मियों में तापमान बढ़ने के साथ संकट और गहराने की आशंका है। देश में रोज़ाना 1,300 मिलियन घन फुट से अधिक की संरचनात्मक गैस कमी है। पाकिस्तान ने सरकारी नियंत्रण वाली ऊर्जा की कीमतें पहले ही 20 प्रतिशत बढ़ा दी हैं। व्यवसाय महंगे डीज़ल जनरेटर चलाने की तैयारी कर रहे हैं, जिससे पहले से प्रदूषित शहरों की हवा और खराब होगी।

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ईरान से तेल की खेपों के लिए छूट मिलने के बावजूद भारत घरेलू तरलीकृत पेट्रोलियम गैस की कमी से जूझ रहा है। गरीब परिवारों को बचाने के लिए सरकार ने वैश्विक कीमतों में हुई बढ़ोतरी का आधे से अधिक हिस्सा खुद वहन किया है, लेकिन रेस्तरां और होटल पहले से ही अपने खुलने के घंटे घटा रहे हैं या ऊर्जा की अधिक खपत वाले व्यंजन मेनू से हटा रहे हैं। भंडारण क्षमता सीमित होने के कारण विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि कुछ ही हफ्तों में उर्वरक कारखानों और छोटे उद्योगों को आपूर्ति की कमी महसूस होने लगेगी।

आगे के खतरे और लंबे समय के घाव

इस संकट के और बढ़ने की आशंका है। ईरान ने बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य तक व्यवधान फैलाने की धमकी दी है। यह जलमार्ग लाल सागर को स्वेज नहर से जोड़ता है और वैश्विक समुद्री व्यापार का दसवें हिस्से से अधिक माल इसी से गुजरता है। ऐसा होने पर होर्मुज़ की नाकेबंदी का असर और बढ़ेगा और यूरोप-एशिया के समुद्री संपर्क पूरी तरह कट सकते हैं।

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अगर जल्द ही शत्रुता समाप्त हो भी जाए, तब भी आर्थिक नुकसान महीनों या वर्षों तक बना रहेगा। उत्पादन रुकने, ऊर्जा ढांचे के नष्ट होने और रणनीतिक भंडार खत्म होने के बाद उबरने में लंबा समय लगेगा। वियतनाम, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत क्षेत्र की एयरलाइंस पहले ही उड़ानें रद्द या कम कर चुकी हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने मांग घटाने के उपायों की सिफारिश की है, जिनमें हवाई यात्रा से बचना, बिजली के चूल्हों का इस्तेमाल और घर से काम करना शामिल है।

अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक भंडार से 40 करोड़ बैरल तेल को मिलकर जारी करने से केवल अस्थायी राहत मिलेगी। फातिह बिरोल ने ज़ोर देकर कहा कि ये भंडार सीमित समय के लिए राहत देने वाले पुल हैं, स्थायी समाधान नहीं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य जितने लंबे समय तक बंद रहेगा, महंगाई का दबाव उतना ही बढ़ेगा और वैश्विक मंदी का जोखिम उतना ही गहरा होगा।

मुख्य बातें

  • फिलीपींस राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित करने वाला पहला देश बना। उसने संकुचित कार्य-सप्ताह लागू किया और आपातकालीन तेल आपूर्ति के लिए 10 लाख बैरल खरीदने की मांग की।
  • होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी से टैंकरों की आवाजाही रोज़ाना करीब 80 जहाज़ों से घटकर केवल दो रह गई है। ईरान चुनिंदा तौर पर भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान और इराक के जहाज़ों को गुजरने दे रहा है।
  • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने चेतावनी दी है कि यह संकट 1973 और 1979 के तेल संकटों को मिलाकर भी उनसे बड़ा है। पूरे क्षेत्र में कम से कम 40 अहम ऊर्जा परिसंपत्तियों को गंभीर नुकसान पहुंचा है।
  • दक्षिण कोरिया का अलग-थलग बिजली ग्रिड उसे ऊर्जा की कमी के प्रति बेहद असुरक्षित बनाता है। आपूर्ति बचाने के लिए वह परमाणु रिएक्टर फिर शुरू कर रहा है और नैफ्था निर्यात पर सीमा लगाने पर विचार कर रहा है।
  • जापान ने रणनीतिक तेल भंडार से अब तक की सबसे बड़ी मात्रा निकालनी शुरू की है और अपने 254 दिन के भंडार से 45 दिन की आपूर्ति जारी कर रहा है।
  • 90 करोड़ से 1.4 अरब बैरल के भंडार, रूस से पाइपलाइन के ज़रिए आयात और अपनी कुल स्थापित क्षमता के आधे से अधिक हिस्से को कवर करने वाले नवीकरणीय ऊर्जा ढांचे से चीन अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है।
  • उर्वरक की कमी से अफ्रीका और एशिया में कृषि उत्पादकता को खतरा है। इससे व्यापक भुखमरी और बच्चों के विकास पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
  • अमेरिका का अनुमान है कि जलडमरूमध्य को फिर खोलने में "कई हफ्ते" के सैन्य अभियान लगेंगे। इसके लिए ए-10 वॉरहॉग विमानों और अपाचे हेलीकॉप्टरों से ईरान की तेज़ हमलावर नौकाओं को हटाया जाएगा।
  • बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत विकासशील देशों में बिजली की तत्काल कमी है। बांग्लादेश ने विश्वविद्यालय बंद कर दिए हैं और पाकिस्तान ने ऊर्जा की कीमतें 20 प्रतिशत बढ़ा दी हैं।
  • विश्लेषकों का अनुमान है कि युद्ध जारी रहने पर ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। कीमतें लगातार 125 डॉलर से ऊपर रहने पर वैश्विक मंदी आ सकती है।
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