पाइपलाइन विकल्प अपर्याप्त साबित होने से होर्मुज़ की नाकेबंदी ने एशिया की ऊर्जा निर्भरता उजागर की

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Tankers showing caution around Strait of Hormuz after U.S. attack on ...

महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बंद होने से वैश्विक बाज़ारों में हलचल

अरब प्रायद्वीप और ईरान के बीच स्थित संकरा जलमार्ग, होर्मुज़ जलडमरूमध्य, दुनिया के तेल टैंकरों के लिए लगभग प्रतिबंधित क्षेत्र बन गया है। 28 फ़रवरी 2026 से ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के सैन्य हमलों के बाद तेहरान ने इस अहम मार्ग से समुद्री यातायात रोकने की कार्रवाई की। इसका तत्काल नतीजा दशकों में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आई सबसे गंभीर बाधाओं में से एक के रूप में सामने आया है। अस्थिर कारोबार के दौरान बेंचमार्क ब्रेंट कच्चे तेल का भाव 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर उछलकर 119 डॉलर तक पहुंच गया।

विषय-सूची
  1. महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बंद होने से वैश्विक बाज़ारों में हलचल
  2. आपूर्ति बाधित होने का सबसे बड़ा असर एशिया पर
  3. पाइपलाइन से वैकल्पिक रास्तों से सीमित राहत
  4. सुरक्षा जोखिम बरकरार
  5. बुनियादी ढांचा अब भी अपर्याप्त क्यों
  6. भारत के आपातकालीन आपूर्ति विविधीकरण के प्रयास
  7. प्राकृतिक गैस बाज़ार भी समानांतर संकट की चपेट में
  8. आर्थिक असर दुनिया भर में
  9. प्रशांत पार के विकल्प सामने आए
  10. मुख्य बातें

यह समुद्री संकरा मार्ग अपने सबसे संकरे हिस्से में महज़ 33 किलोमीटर चौड़ा है और इससे रोज़ाना लगभग 2 करोड़ बैरल तेल का परिवहन होता है। यह मात्रा वैश्विक पेट्रोलियम खपत का पांचवां हिस्सा और समुद्र के रास्ते होने वाले कुल तेल व्यापार का एक चौथाई है। जलमार्ग बंद होने पर करीब 150 तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) टैंकरों ने शत्रुतापूर्ण जलक्षेत्र से गुज़रने का जोखिम लेने के बजाय लंगर डालना चुना। इससे आपूर्ति का ऐसा झटका लगा जिसका असर मध्य पूर्व से कहीं दूर तक पहुंचा।

आपूर्ति बाधित होने का सबसे बड़ा असर एशिया पर

वैश्विक तेल प्रवाह का भूगोल इस संकट के प्रति एशिया को सबसे संवेदनशील क्षेत्र बनाता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक, होर्मुज़ से गुज़रने वाला करीब 84% कच्चा तेल और 83% एलएनजी एशियाई बाज़ारों की ओर जाता है। चीन और भारत अकेले होर्मुज़ से होने वाले कच्चे तेल के कुल प्रवाह का 44% हिस्सा लेते हैं। संकट से पहले इन दोनों देशों को मिलाकर रोज़ाना 82 लाख बैरल तेल मिलता था।

जापान और दक्षिण कोरिया की कुल मात्रा भले ही कम हो, लेकिन घरेलू उत्पादन के मुकाबले उनकी निर्भरता कहीं अधिक है। इन देशों में घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन लगभग नहीं के बराबर है, जिससे उनकी अर्थव्यवस्थाएं आयात की स्थिरता पर पूरी तरह निर्भर हैं। ताइवान भी इसी तरह जोखिम के दायरे में है। ऊर्जा सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने से इन औद्योगिक केंद्रों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

चीन भी इस संकट से पूरी तरह बच नहीं सकता। वह घरेलू स्तर पर रोज़ाना करीब 43 लाख बैरल तेल का उत्पादन करता है और उसके रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में अनुमानित 1.2 अरब बैरल तेल है। इसके बावजूद उसकी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए भारी मात्रा में पेट्रोलियम आयात की ज़रूरत है। बीजिंग ने इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार को तेज़ी से बढ़ावा दिया है, लेकिन मौजूदा संकट इन तैयारियों की सीमाओं की परीक्षा ले रहा है।

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पाइपलाइन से वैकल्पिक रास्तों से सीमित राहत

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास ही ऐसा चालू ढांचा है जो होर्मुज़ जलडमरूमध्य से बचकर तेल पहुंचा सकता है। सऊदी ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन, जिसे आम तौर पर पेट्रोलाइन कहा जाता है, फारस की खाड़ी के पास अबकैक प्रसंस्करण केंद्र से लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक 1,200 किलोमीटर लंबी है। यूएई की अबू धाबी कच्चा तेल पाइपलाइन हबशान से ओमान की खाड़ी के फुजैराह तक 360 किलोमीटर चलती है।

लेकिन इन वैकल्पिक मार्गों की क्षमता होर्मुज़ से होने वाली आपूर्ति के मुकाबले बहुत कम है। सऊदी अरामको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमीन नासिर ने पुष्टि की कि ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन अपनी पूरी परिचालन क्षमता, लगभग 70 लाख बैरल प्रतिदिन, तक पहुंच चुकी है। हालांकि, करीब 20 लाख बैरल पश्चिमी तट की घरेलू रिफाइनरियों में इस्तेमाल होते हैं, जिससे निर्यात के लिए सिर्फ 50 लाख बैरल बचते हैं। यूएई की पाइपलाइन रोज़ाना 15 लाख से 18 लाख बैरल तेल ले जा सकती है, लेकिन परिचालन संबंधी बाधाओं और हाल की सुरक्षा घटनाओं ने वास्तविक प्रवाह सीमित कर दिया है।

दोनों बाईपास पाइपलाइनें मिलकर रोज़ाना करीब 60 से 70 लाख बैरल तेल ले जा सकती हैं, जो होर्मुज़ के सामान्य प्रवाह का अधिकतम 30% है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के मुताबिक, सामान्य हालात में ये पाइपलाइनें पूरी क्षमता से नहीं चलतीं। अनुमान है कि संकट से पहले वास्तव में अतिरिक्त उपलब्ध क्षमता केवल 26 लाख बैरल प्रतिदिन थी। इनका अधिकतम इस्तेमाल करने पर भी भारी कमी बनी रहती है।

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सुरक्षा जोखिम बरकरार

ये वैकल्पिक रास्ते जोखिम खत्म करने के बजाय नए जोखिम पैदा करते हैं। यानबू के रास्ते निर्यात किए जाने वाले सऊदी तेल को लाल सागर के दक्षिणी छोर पर बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुज़रना पड़ता है। यमन में हूती लड़ाकों ने पहले इस जलमार्ग को निशाना बनाने की धमकी दी है। फुजैराह टर्मिनल तकनीकी रूप से होर्मुज़ के बाहर है, लेकिन ईरान की मिसाइलों और ड्रोन की मारक दूरी के इतना करीब है कि 16 मार्च के हमलों के बाद वहां तेल लदान का काम रोक दिया गया। फुजैराह के भंडारण केंद्रों पर भी हमले हुए, जिसके चलते टैंकरों को रवाना होने से पहले आंशिक रूप से ही तेल भरना पड़ा।

बुनियादी ढांचा अब भी अपर्याप्त क्यों

मौजूदा संकट वैकल्पिक निर्यात मार्गों को लेकर दशकों की रणनीतिक उपेक्षा उजागर करता है। 1980 के दशक से यह पता होने के बावजूद कि होर्मुज़ एक गंभीर जोखिम है, खाड़ी देशों के तेल उत्पादकों ने वैकल्पिक व्यवस्था के बजाय दक्षता को प्राथमिकता दी। ईरान-इराक युद्ध के दौरान सऊदी अरब ने समुद्री हमलों से बचने के लिए ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन बनाई थी, लेकिन उसके बाद के सुधारों में पूरी तरह स्वतंत्र समानांतर प्रणालियां बनाने के बजाय क्षमता में सीमित बढ़ोतरी पर ध्यान दिया गया।

राजनीतिक और आर्थिक बाधाओं ने अतिरिक्त बुनियादी ढांचा बनाने में रुकावट डाली है। पड़ोसी देशों में पाइपलाइन बिछाने के लिए संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े जटिल मुद्दों से निपटना पड़ता है। इराक, कुवैत, कतर और बहरीन के पास होर्मुज़ को बाईपास करने का कोई विकल्प नहीं है और वे पूरी तरह इसी रास्ते पर निर्भर हैं। ट्रांस-अरेबियन पाइपलाइन कभी सऊदी अरब को लेबनान के भूमध्यसागरीय तट से जोड़ती थी, लेकिन 1990 में इसका परिचालन बंद हो गया। अब यह सिर्फ़ एक जर्जर ऐतिहासिक अवशेष है।

ऊर्जा इतिहासकार और एस&पी ग्लोबल के उपाध्यक्ष डैनियल येरगिन ने कहा कि तत्काल वाणिज्यिक चिंताओं पर ध्यान देने वाले नीति-निर्माताओं को संकट का सबसे बुरा परिदृश्य असंभव लगता था। आम धारणा थी कि उपभोक्ता देश जलडमरूमध्य को खुला रखने के लिए पर्याप्त सैन्य सुरक्षा मुहैया कराएंगे, जिससे महंगे वैकल्पिक बुनियादी ढांचे में निवेश का आर्थिक प्रोत्साहन कम हो गया।

सबसे बुरे परिदृश्य की आशंका हमेशा से रही है, लेकिन वह बहुत संभावित नहीं लगती थी। विविधता या सुरक्षा इस बात से मिलती कि तेल की रक्षा के लिए उपभोक्ता देश मौजूद रहेंगे।

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भारत के आपातकालीन आपूर्ति विविधीकरण के प्रयास

भारत दिखाता है कि आपूर्ति शृंखला को तेज़ी से बदलने की संभावनाएं और सीमाएं क्या हैं। संकट से पहले भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 40% हिस्सा होर्मुज़ से आता था, यानी रोज़ाना 25 लाख से 27 लाख बैरल। भारतीय पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक, घरेलू रिफाइनरियों ने अब आपूर्ति के 70% हिस्से के लिए होर्मुज़ से इतर मार्गों का इंतज़ाम किया है, लेकिन आपूर्ति में उल्लेखनीय कमी अब भी बनी हुई है।

भारतीय रिफाइनरियों ने सऊदी अरब के यानबू टर्मिनल और यूएई के फुजैराह बंदरगाह की ओर तेज़ी से रुख किया है। कमोडिटी विश्लेषण कंपनी केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, यानबू से भारत आने वाले सऊदी कच्चे तेल की खेप मार्च 2026 में बढ़कर 88 लाख बैरल हो गई, जबकि पिछले महीनों में यह शून्य थी। फुजैराह पाइपलाइन के ज़रिये भी अतिरिक्त तेल आ रहा है, हालांकि इसका पता लगाना मुश्किल है क्योंकि कुछ जहाज़ संघर्ष क्षेत्रों के पास अपनी गतिविधियां छिपाने के लिए ट्रांसपोंडर बंद कर देते हैं।

नई दिल्ली ने अमेरिका से करीब 10 लाख टन गैस ला रहे 20 बहुत बड़े गैस वाहक जहाज़ों का भी इंतज़ाम किया है। ये जहाज़ लाल सागर और ओमान की खाड़ी के वैकल्पिक रास्तों से आ रहे हैं। सरकारी सूत्रों ने पुष्टि की है कि आपातकालीन खेप पहुंच रही हैं, लेकिन उन्होंने माना कि इससे मध्य पूर्व से होने वाली आपूर्ति की पूरी भरपाई नहीं हो सकती।

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प्राकृतिक गैस बाज़ार भी समानांतर संकट की चपेट में

जहां कच्चा तेल सुर्खियों में छाया है, वहीं एलएनजी बाज़ार पर भी उतनी ही गंभीर पाबंदियां हैं। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलएनजी निर्यातक कतर अपनी लगभग पूरी गैस होर्मुज़ से भेजता है। यूएई भी गैस निर्यात के लिए इसी जलडमरूमध्य पर निर्भर है। ये दोनों देश मिलकर वैश्विक एलएनजी व्यापार का लगभग 20% हिस्सा हैं और मुख्य रूप से एशियाई बाज़ारों को आपूर्ति करते हैं।

कच्चे तेल के उलट, एलएनजी के लिए पाइपलाइन से कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं है। द्रवीकरण संयंत्र बंद हो जाएं या वहां से टैंकरों में गैस न भरी जा सके, तो यह बाज़ारों तक नहीं पहुंच सकती। संघर्ष शुरू होने के कुछ ही समय बाद कतर एनर्जी ने अनुबंध संबंधी बाध्यता से छूट की घोषणा की और उन संयंत्रों में उत्पादन रोक दिया जहां आम तौर पर सालाना 112 अरब घन मीटर से अधिक गैस का प्रसंस्करण होता है।

इसका असर बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों पर असमान रूप से अधिक पड़ रहा है। ये देश होर्मुज़ के रास्ते अपने एलएनजी आयात का लगभग दो तिहाई हिस्सा मंगाते हैं और बिजली उत्पादन के लिए गैस पर काफी निर्भर हैं। पाकिस्तान अपनी 50% बिजली प्राकृतिक गैस से बनाता है, जबकि बांग्लादेश की 25% बिजली गैस से आती है। एक ही कारोबारी सत्र में कीमतें 39% बढ़ने से इन सरकारों को बिजली की चरणबद्ध कटौती और ऊर्जा बचाने के उपाय लागू करने पड़े हैं, जिनमें विश्वविद्यालय बंद करना भी शामिल है।

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आर्थिक असर दुनिया भर में

आपूर्ति में बाधा से दुनिया भर में महंगाई का दबाव तुरंत बढ़ा है। कच्चे तेल के अलावा पेट्रोल, डीज़ल, विमान ईंधन, पेट्रोकेमिकल, उर्वरक और रोज़मर्रा की खाद्य वस्तुओं के दाम तेज़ी से बढ़े हैं। उत्तरी गोलार्ध के किसान, जो अभी बुआई के मौसम में प्रवेश कर रहे हैं, खेती की बढ़ती लागत का सामना कर रहे हैं। इससे आने वाले महीनों में खाद्य कीमतें बढ़ने का खतरा है।

एशियाई सरकारों ने ईंधन निर्यात पर रोक से लेकर कीमतों पर नियंत्रण तक आपातकालीन कदम उठाए हैं। चीन ने घरेलू आपूर्ति बचाने के लिए रिफाइनरियों को ईंधन निर्यात रोकने का आदेश दिया है। दक्षिण कोरिया ने तीन दशकों में पहली बार ईंधन की कीमतों पर सीमा तय की है। करीब 150 दिनों की मांग पूरी करने वाले मजबूत रणनीतिक भंडार के चलते जापान को फिलहाल कमी का सामना नहीं करना पड़ा है, लेकिन कीमतों का दबाव बना हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने की सिफारिश करने की योजना बना रही है। यह एजेंसी के इतिहास में समन्वित रूप से भंडार जारी करने की सबसे बड़ी कार्रवाई होगी। फिर भी इतना बड़ा कदम रोज़ाना 2 करोड़ बैरल की लगातार आपूर्ति की जगह अनिश्चितकाल तक नहीं ले सकता।

प्रशांत पार के विकल्प सामने आए

मध्य पूर्व से आपूर्ति सीमित रहने के कारण एशियाई खरीदारों का रुख प्रशांत महासागर पार उत्तरी अमेरिका की ओर बढ़ रहा है। कनाडा का प्रशांत तटवर्ती ऊर्जा ढांचा, खासकर ब्रिटिश कोलंबिया के किटिमैट में एलएनजी कनाडा परियोजना और वैंकूवर तक पहुंचने वाली विस्तारित ट्रांस माउंटेन पाइपलाइन, ऐसे मार्ग मुहैया कराते हैं जो होर्मुज़ के साथ-साथ मलक्का जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर जैसे अन्य संकरे समुद्री मार्गों से भी बचते हैं।

जून 2025 से चालू एलएनजी कनाडा टर्मिनल सीधे उत्तरी प्रशांत में गैस की खेप भेजता है। वहां से पूर्वोत्तर एशिया के टर्मिनलों तक पहुंचने में 10 से 11 दिन लगते हैं। इसके मुकाबले, अमेरिकी खाड़ी तट से आने वाली एलएनजी को पनामा नहर से गुज़रने में 24 दिन लगते हैं। ट्रांस माउंटेन विस्तार पाइपलाइन से भेजा जाने वाला अल्बर्टा का कच्चा तेल भी मध्य पूर्व के समुद्री मार्गों से पूरी तरह बचता है। इस पाइपलाइन की क्षमता रोज़ाना 8.9 लाख बैरल है।

हालांकि, इन विकल्पों की आपूर्ति बढ़ाने में कई साल लगेंगे। एलएनजी कनाडा के दूसरे चरण पर 2026 के आखिर या 2027 की शुरुआत में अंतिम निवेश निर्णय किए जाने पर विचार चल रहा है। इससे सालाना 1.4 करोड़ टन क्षमता बढ़ेगी। ट्रंप प्रशासन के समर्थन वाली प्रस्तावित अलास्का एलएनजी परियोजना के लिए अभी बाध्यकारी अनुबंध नहीं हैं और इसके 2031 से पहले निर्यात शुरू करने की संभावना नहीं है।

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मुख्य बातें

  • होर्मुज़ जलडमरूमध्य से आम तौर पर रोज़ाना 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है, जो वैश्विक खपत का 20% और समुद्री व्यापार का 25% है।
  • होर्मुज़ से गुजरने वाला 84% कच्चा तेल और 83% एलएनजी एशिया पहुंचता है। चीन और भारत मिलकर कच्चे तेल के प्रवाह का 44% हिस्सा लेते हैं।
  • सऊदी अरब की ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन और यूएई की हबशान-फुजैराह पाइपलाइन मिलकर रोज़ाना केवल 60 से 70 लाख बैरल तेल का वैकल्पिक रास्ता दे सकती हैं, जो होर्मुज़ की सामान्य मात्रा का करीब 30% है।
  • भारत ने आयात का रास्ता बदलकर 70% आपूर्ति होर्मुज़ से इतर स्रोतों से हासिल की है, लेकिन कमी अब भी है और अमेरिका तथा पश्चिमी अफ्रीका से आपातकालीन खेपें मंगानी पड़ रही हैं।
  • कतर और यूएई वैश्विक एलएनजी निर्यात का लगभग 20% हिस्सा देते हैं, जो पूरी तरह होर्मुज़ से गुजरता है। प्राकृतिक गैस के लिए कोई वैकल्पिक पाइपलाइन नहीं है।
  • ब्रेंट कच्चे तेल का भाव 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर उछलकर 119 डॉलर तक पहुंच गया है, जबकि एलएनजी के बेंचमार्क भाव एक ही कारोबारी सत्र में 39% बढ़ गए।
  • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी आपूर्ति की कमी से निपटने के लिए रणनीतिक भंडार से ऐतिहासिक रूप से 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने की योजना बना रही है।
  • कनाडा का प्रशांत तटवर्ती ऊर्जा ढांचा भू-राजनीतिक रूप से स्थिर विकल्प देता है, लेकिन इसकी आपूर्ति बढ़ाने में कई साल लगेंगे।
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