बीजिंग के नए कानूनी हथियार को लेकर ताइवान ने चेताया
ताइपे के अधिकारियों ने कड़ी चेतावनी दी है कि "जातीय एकता" को बढ़ावा देने वाला चीन का नया कानून बीजिंग का ताइवानी नागरिकों को निशाना बनाने का नवीनतम हथियार बन सकता है। इससे द्वीप की विशिष्ट पहचान और लोकतांत्रिक शासन का समर्थन अपराध की श्रेणी में आ सकता है। 12 मार्च, 2026 को चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस से मंजूर इस कानून का घोषित उद्देश्य चीन के आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त 55 जातीय अल्पसंख्यक समूहों में साझा राष्ट्रीय चेतना विकसित करना है, लेकिन इसके 62 अनुच्छेदों में ऐसे प्रावधान भी हैं जिनका दायरा चीन की सीमाओं से कहीं आगे तक जाता है।
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ताइवान की मेनलैंड अफेयर्स काउंसिल के उपमंत्री शेन यू-चुंग ने पत्रकारों से कहा कि कानून में राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा का उल्लेख करने वाली भाषा खतरनाक अस्पष्टता पैदा करती है। शेन ने कहा, "एकीकरण या एकता को बढ़ावा कैसे देना है, यह अस्पष्ट और खोखला छोड़ा गया है, लेकिन सज़ाएं ठोस हैं।" उन्होंने चेताया कि कानून "दोनों तटों के मुद्दों से निपटने का कानूनी आधार बन सकता है" और इस तरह ताइवानी स्वतंत्रता समर्थकों को चीनी जातीय एकता के लिए खतरा बताकर उन पर मुकदमा चलाने की व्यवस्था बना सकता है।
यह कानून ताइवान के प्रति बीजिंग के रुख में एक बड़ा बदलाव है। पहले चीनी कानून मुख्य रूप से ताइवानी स्वतंत्रता की खुली वकालत को निशाना बनाते थे। लेकिन इस नए ढांचे के तहत लोगों को सिर्फ अलगाव का समर्थन करने के लिए ही नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से एकीकरण को बढ़ावा न देने के लिए भी कानूनी नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। ताइवान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहा, "पहले ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन करने पर सज़ा मिलती थी। अब आपको एकीकरण का सक्रिय समर्थन भी करना होगा, वरना आप मुसीबत में पड़ेंगे।"
जातीय समूहों में समानीकरण अनिवार्य
ताइपे की चिंताएं जहां दोनों तटों के बीच पड़ने वाले असर पर केंद्रित हैं, वहीं यह कानून चीन के विविध जातीय समुदायों के शासन के तरीके को बुनियादी तौर पर बदलता है। कानून के तहत प्री-स्कूल से अनिवार्य शिक्षा के अंत तक मंदारिन चीनी को पढ़ाई की प्रमुख भाषा बनाना होगा, जिससे अल्पसंख्यक भाषाएं प्रभावी रूप से गौण हो जाएंगी। अनुच्छेद 15 के अनुसार, बच्चों को 15 वर्ष की उम्र तक मंदारिन पर "मूल रूप से अच्छी पकड़" हासिल करनी होगी। जहां मंदारिन और अल्पसंख्यक भाषाओं, दोनों का इस्तेमाल हो, वहां आधिकारिक दस्तावेजों में मंदारिन को अधिक प्रमुखता देनी होगी।
भाषा थोपने का यह कदम शिक्षा तक सीमित नहीं है। कानून के अनुसार, माता-पिता और अभिभावकों को नाबालिगों को "चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेम करना सिखाना और उनका मार्गदर्शन करना" होगा तथा "यह धारणा स्थापित करनी होगी कि चीनी राष्ट्र के सभी जातीय समूह एक परिवार हैं।" बच्चों को यह भी सिखाना होगा कि वे "नाबालिगों को जातीय एकता और प्रगति के लिए हानिकारक विचार नहीं सिखाएं।" ये प्रावधान पारिवारिक जीवन को राज्य की विचारधारा का औजार बना देते हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान पहुंचाने को अपराध की श्रेणी में रखते हैं।
धार्मिक संस्थानों पर भी इसी तरह अनुरूप बनने का दबाव है। कानून धार्मिक समूहों, स्कूलों और स्थलों को "चीन में धर्म के चीनीकरण की दिशा" के अनुरूप चलने का निर्देश देता है। इस नीति के चलते पहले ही शिनजियांग में मस्जिदें ढहाई गई हैं और तिब्बती मठों में निगरानी उपकरण लगाए गए हैं। विवाह की परंपराएं भी जांच के दायरे में हैं। कानून जातीयता या धर्म के आधार पर विवाह के चुनाव में हस्तक्षेप पर रोक लगाता है, जिससे प्रभावी रूप से समानीकरण के साधन के रूप में अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा मिलता है।
वास्तविक स्वायत्तता का अंत
चीन का संविधान और 1984 का क्षेत्रीय जातीय स्वायत्तता कानून कभी जातीय अल्पसंख्यकों को अपनी भाषाओं के इस्तेमाल और विकास का अधिकार, साथ ही सीमित स्वशासन की गारंटी देते थे। नया जातीय एकता कानून इन सुरक्षा प्रावधानों को प्रभावी रूप से पीछे छोड़ देता है। यह चीन की "पहली पीढ़ी की जातीय नीति" से "दूसरी पीढ़ी" के ऐसे ढांचे की ओर निर्णायक बदलाव है, जिसमें विविधता के बजाय समानीकरण को प्राथमिकता दी जाती है।
ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेम्स लीबोल्ड ने, जो दशकों से चीन की जातीय नीतियों का अध्ययन कर रहे हैं, कहा कि नया कानून "पार्टी के वास्तविक स्वायत्तता के मूल वादे पर आखिरी कील ठोकता है।" यह कानून उन नीतियों को कानूनी रूप देता है जिन्हें तिब्बत, शिनजियांग और इनर मंगोलिया में पहले ही प्रशासनिक आदेशों के जरिए लागू किया जा चुका है। इससे तदर्थ दमन एक व्यवस्थित कानूनी सिद्धांत में बदल जाता है।
तिब्बत में यह बदलाव सरकारी आवासीय स्कूलों के विस्तार के रूप में दिखा है। इन स्कूलों में लगभग दस लाख तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों और समुदायों से अलग रखा गया है। यहां पढ़ाई मुख्य रूप से मंदारिन में होती है और रोजमर्रा की गतिविधियों में भी तिब्बती भाषा के इस्तेमाल पर पाबंदी रहती है। वह पारंपरिक परीक्षा प्रणाली भी लगभग खत्म हो चुकी है, जिसके तहत जातीय अल्पसंख्यक छात्र अपनी मातृभाषा में विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा दे सकते थे। अब तिब्बती छात्रों को मंदारिन में मुकाबला करना पड़ता है या शिक्षा के बेहद सीमित अवसरों का सामना करना पड़ता है।
2020 में इनर मंगोलिया में भी ऐसा ही रुझान दिखा, जब अधिकारियों ने मंगोलियाई भाषा की पाठ्यपुस्तकों की जगह चीनी भाषा की किताबें लागू कर दीं। इसके खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिन्हें तुरंत कुचल दिया गया। अब इस क्षेत्र के छात्र रोज़ाना केवल एक घंटे मंगोलियाई पढ़ते हैं और अपनी मातृभाषा को अपने ही वतन में विदेशी भाषा की तरह सीखते हैं। नया कानून इन पाबंदियों को पूरे देश में लागू करता है, ताकि किसी भी जातीय अल्पसंख्यक क्षेत्र में शैक्षिक स्वायत्तता न बनी रहे।
चीन से बाहर भी लागू होने का दायरा और सीमापार दमन
अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के लिए शायद सबसे चिंताजनक प्रावधान अनुच्छेद 61 में है। इसमें कहा गया है कि चीन के जनवादी गणराज्य के क्षेत्र से बाहर मौजूद "संगठनों और व्यक्तियों" के खिलाफ भी "कानूनी जवाबदेही" तय की जाएगी, यदि वे "जातीय एकता और प्रगति को कमजोर करते हैं या जातीय अलगाववाद भड़काते हैं।" यह प्रावधान 2020 के हांगकांग राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के चीन से बाहर लागू होने वाले प्रावधानों जैसा है। उस कानून के तहत अधिकारियों ने देश से बाहर रह रहे 34 कार्यकर्ताओं पर विध्वंसक गतिविधियों के आरोप लगाकर उनके लिए इनाम घोषित किए हैं।
ताइवानी अधिकारियों ने इस व्यवस्था को "लंबी बांह वाला अधिकार-क्षेत्र" कहा है। उनका कहना है कि इससे बीजिंग को विदेशों में असंतुष्टों को निशाना बनाने का कानूनी आधार मिलता है। इसमें वे लाखों ताइवानी नागरिक भी शामिल हो सकते हैं जो विदेश यात्रा करते हैं या मुख्यभूमि चीन के साथ कारोबारी संबंध रखते हैं। यह कानून दुनिया में कहीं भी तिब्बती, उइगर या ताइवानी आत्मनिर्णय की वकालत को प्रभावी रूप से अपराध बनाता है और प्रवासी समुदायों तथा विदेशी नागरिकों पर चीनी कानूनी मानदंड लागू करता है।
मानवाधिकार संगठनों ने सीमापार दमन के व्यापक अभियान दर्ज किए हैं। इनमें चीनी सुरक्षा एजेंसियां विदेश में पढ़ रहे छात्रों को परेशान करती हैं और चीन में रह रहे उनके परिजनों को धमकाकर वैचारिक अनुरूपता के लिए मजबूर करती हैं। जुलाई 2025 में अधिकारियों ने विदेश में पढ़ाई के दौरान तिब्बती अधिकारों के समर्थन में बोलने के बाद एक चीनी छात्र को "अलगाववाद भड़काने" के आरोप में गिरफ्तार किया। नया कानून इन तौर-तरीकों को औपचारिक रूप देता है और अभियोजकों को विदेश में रहने वाले लोगों के खिलाफ मामले चलाने का स्पष्ट वैधानिक अधिकार देता है।
ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उपनिदेशक माया वांग ने अभिव्यक्ति पर कानून के व्यापक असर का विश्लेषण किया।
जातीय एकता पर यह मसौदा कानून देश के भीतर और बाहर, दोनों जगह चीन के बारे में लोगों के विचारों और अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने की चीनी सरकार की खुली कोशिश है।
वांग ने कहा कि यह कानून वैचारिक नियंत्रण को और कड़ा करने में मदद करता है और चीनी कानून के तहत पहले से मिले भाषा अधिकारों को मिटाकर जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है।
दोनों तटों के संबंधों पर रणनीतिक असर
तत्काल कानूनी प्रावधानों से आगे, जातीय एकता कानून ताइवान के खिलाफ बीजिंग की व्यापक राजनीतिक युद्ध रणनीति का हिस्सा है। द्वीप के 2.4 करोड़ निवासियों को चीनी राष्ट्र के भीतर महज एक और जातीय समूह के रूप में पेश करके यह कानून ताइवान की विशिष्ट राजनीतिक पहचान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता को कमजोर करने की कोशिश करता है। यह विमर्श जारी दुष्प्रचार अभियानों को बल देता है। इनमें "यीमेलुन" यानी अमेरिका पर संदेह जताने वाला नैरेटिव भी शामिल है, जिसका मकसद सहयोगी के रूप में अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर ताइपे और वॉशिंगटन के बीच दरार पैदा करना है।
वित्तीय विश्लेषकों ने चेताया है कि इस कानून से ताइवान पर आर्थिक दबाव का नया दौर शुरू हो सकता है। जातीय एकता की रक्षा के नाम पर दोनों तटों के बीच व्यापार और क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखलाओं पर पाबंदियां लग सकती हैं। यह कानून ताइवानी निर्यात और निवेश प्रवाह को अधिक व्यवस्थित ढंग से निशाना बनाने का कानूनी आधार देता है, जिससे ताइवान के बाजार में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाली कंपनियों के लिए लगातार अनिश्चितता पैदा होती है।
यह कानून ताइवान जलडमरूमध्य में सैन्य दबाव बढ़ाने की सीमा भी कम कर सकता है। जातीय एकता को सीमा-पार लागू होने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा के अनिवार्य लक्ष्य के रूप में स्थापित करके यह ताइवान की स्थिति को लेकर अस्पष्टता के प्रति कम सहनशील राजनीतिक माहौल बनाता है। सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि कानून का पारित होना बीजिंग के नेतृत्व में कट्टरपंथियों की जीत का संकेत है, जिससे आक्रामक सैन्य रणनीति पर आंतरिक रोक कम हो सकती है।
ताइवान के विदेश मंत्री लिन चिया-लुंग ने हाल ही में चीनी राजनयिकों के उन दावों को खारिज किया कि बीजिंग संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का पालन करता है। लिन ने कहा कि चीन की हालिया सैन्य उकसावे की कार्रवाइयां "एक बार फिर ऐसी वर्चस्ववादी सोच उजागर करती हैं, जिसमें उसकी कथनी और करनी मेल नहीं खाती।" उन्होंने जोर देकर कहा कि बीजिंग जातीय एकता को चाहे जिस तरह पेश करे, ताइवान की संप्रभुता कभी भी चीन के जनवादी गणराज्य की नहीं रही है।
जानने योग्य बातें
- चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने 12 मार्च, 2026 को जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने का कानून 2,756 मतों के समर्थन, तीन विरोधी मतों और तीन अनुपस्थितियों के साथ पारित किया।
- कानून के तहत प्री-स्कूल से अनिवार्य शिक्षा तक मंदारिन चीनी पढ़ाई की प्रमुख भाषा होगी, जिससे तिब्बती, उइगर और मंगोलियाई समेत अल्पसंख्यक भाषाएं प्रभावी रूप से हाशिये पर चली जाएंगी।
- ताइवानी अधिकारियों ने चेताया है कि "राष्ट्रीय एकता" से जुड़े प्रावधानों का इस्तेमाल ताइवानी स्वतंत्रता समर्थकों को निशाना बनाने और ताइवानी नागरिकों पर चीन के साथ एकीकरण का समर्थन करने की कानूनी बाध्यता डालने के लिए किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 61 चीन से बाहर लागू होने वाला अधिकार-क्षेत्र स्थापित करता है, जिससे चीनी अधिकारी जातीय एकता को कमजोर करने के आरोपी चीन से बाहर के व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं।
- कानून माता-पिता को बच्चों को "चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेम करना" सिखाने का आदेश देता है और जातीय एकता के लिए हानिकारक माने जाने वाले विचार सिखाने पर रोक लगाता है।
- मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि यह कानून जबरन समानीकरण की उन नीतियों को कानूनी रूप देता है जिन्हें तिब्बत, शिनजियांग और इनर मंगोलिया में बड़े पैमाने पर आवासीय स्कूलों और भाषा संबंधी पाबंदियों के जरिए पहले ही लागू किया जा चुका है।
- यह कानून चीन की पहले की "पहली पीढ़ी" की जातीय नीति से बदलाव को दर्शाता है। उस नीति में क्षेत्रीय स्वायत्तता और भाषा अधिकारों का वादा था, जबकि "दूसरी पीढ़ी" का नया ढांचा सांस्कृतिक एकरूपता को प्राथमिकता देता है।






