नए चीतों के आगमन से विवाद फिर तेज़
बोत्सवाना से भारत तक 10 घंटे की यात्रा पूरी कर नौ जंगली अफ्रीकी चीते पिछले सप्ताह पहुँचे। भारतीय वायुसेना के विमान से उन्हें ग्वालियर लाया गया और फिर हेलीकॉप्टर से मध्य प्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान स्थित संगरोध बाड़ों में पहुँचाया गया। इस खेप के साथ प्रोजेक्ट चीता के तहत चीतों की कुल संख्या 53 हो गई है। इनमें नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका और बोत्सवाना से लाए गए 20 वयस्क चीते और देश में जन्मे 33 शावक शामिल हैं। इनके आगमन के साथ ही खबर आई कि दो मादाओं, ज्वाला और गामिनी, ने हाल ही में क्रमशः पाँच और चार शावकों को जन्म दिया है। इससे चीतों की संख्या 2032 तक 17,000 वर्ग किलोमीटर में 60 से 70 जानवरों की आत्मनिर्भर मेटापॉपुलेशन स्थापित करने के सरकार के लक्ष्य की आधी से अधिक हो गई है।
विषय-सूची
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2022 में इस पहल की शुरुआत की थी। अपने जन्मदिन पर उन्होंने नामीबिया से लाए गए पहले आठ चीतों को छोड़ा और कहा कि यह परियोजना भारत की पारिस्थितिक विरासत की टूटी कड़ी को फिर जोड़ देगी। सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों में इस प्रयास को वैश्विक संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया है। इनमें कहा गया है कि चीते प्रमुख प्रजाति के रूप में घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र और संकटग्रस्त प्रजातियों, जैसे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, के संरक्षण में मदद करेंगे और इको-टूरिज्म के ज़रिये स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा देंगे। लेकिन जश्न मनाने वाली घोषणाओं के पीछे वन्यजीव वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों की बढ़ती तादाद का तर्क है कि यह परियोजना वैज्ञानिक सिद्धांतों से खतरनाक रूप से भटक गई है। कुछ लोगों के मुताबिक, यह प्रजाति को वास्तव में बहाल करने के बजाय उसे लंबे समय तक कैद में रखकर किया जा रहा महँगा प्रयोग बन गई है।
कैद में प्रजनन का विरोधाभास
वन्यजीव जीवविज्ञानी और मेटास्ट्रिंग फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी रवि चेल्लम परियोजना की मौजूदा दिशा के सबसे मुखर आलोचकों में से एक बनकर उभरे हैं। उनका कहना है कि कैद में पले चीतों के शावकों के जन्म को सफलता का प्रमाण बताना बुनियादी तौर पर भ्रामक है। वह बताते हैं कि मूल चीता कार्ययोजना में कैद में प्रजनन कार्यक्रम की कल्पना ही नहीं की गई थी। 748.76 वर्ग किलोमीटर में फैले कुनो राष्ट्रीय उद्यान की वहन क्षमता पारिस्थितिक आकलनों के अनुसार लगभग 10 वयस्क चीतों की है। बड़े बाड़ों में हर नए शावक के जन्म के साथ आबादी का दबाव इस निश्चित सीमा पर बढ़ता जाता है। इससे जनसांख्यिकीय संकट पैदा होता है, जिसे प्रबंधक केवल आवास का विस्तार करके दूर नहीं कर सकते।
वहन क्षमता की यह सीमा बुनियादी पारिस्थितिक बाधाओं से पैदा होती है। अफ्रीकी आवासों में चीतों का घनत्व आम तौर पर प्रति 100 वर्ग किलोमीटर में एक से भी कम होता है और कुछ पारिस्थितिक तंत्रों में उनका विचरण क्षेत्र हजारों वर्ग किलोमीटर तक फैला होता है। बाघों या शेरों के विपरीत, शिकारी जीवों के पदानुक्रम में चीते निचले स्थान पर होते हैं, इसलिए प्रतिस्पर्धा से बचने के लिए उन्हें बड़े इलाकों में घूमना पड़ता है। कुनो का परिदृश्य, जिसे दशकों पहले एशियाई शेरों को स्थानांतरित करने के लिए चुना गया था, खुले घास के मैदानों और झाड़ीदार जंगलों के बजाय घने होते वनों से बना है, जिन्हें चीते पसंद करते हैं। आवास का यह बेमेल चीतों को या तो कृत्रिम बाड़ों में रहने या मानव-बहुल इलाकों में फैलने पर मजबूर करता है, जहाँ उनके जीवित रहने की संभावना तेज़ी से घटती है।
अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट के फेलो नितिन राय का कहना है कि यह परियोजना विफल होने के लिए अभिशप्त है, क्योंकि आबादी बढ़ाने की बुनियादी शर्त, यानी पर्याप्त आवास, मौजूद ही नहीं है। वह इस पहल को ‘ग्रीन ग्रैब’ बताते हैं। उनके अनुसार, करिश्माई चीता भूमि पर नियंत्रण का बहाना बनता है, जिससे अधिकारियों को वनवासी समुदायों को संरक्षित क्षेत्रों से हटाने में मदद मिलती है। यह आरोप दुनिया भर की संरक्षण परियोजनाओं को लेकर व्यापक चिंताओं से मेल खाता है, जहाँ कभी-कभी वन्यजीव संरक्षण की आड़ में मूलनिवासी आबादी को विस्थापित किया जाता है। राय का तर्क है कि घास के मैदानों को बचाने के लिए चीतों का इस्तेमाल करना उलटी गंगा बहाने जैसा है। उनका कहना है कि शिकारियों को फिर से बसाने से पहले बड़े पैमाने पर आवास बहाल करना ज़रूरी है, न कि यह उम्मीद करना कि शिकारी किसी तरह अपना पारिस्थितिकी तंत्र खुद बना लेंगे।
मौतों का आँकड़ा और प्रबंधन की चुनौतियाँ
प्रोजेक्ट चीता में हुई मौतों के आँकड़े दूसरे महाद्वीप से चीतों को स्थानांतरित करने की चुनौतियों की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। परियोजना शुरू होने के बाद से कुनो में आयात किए गए नौ वयस्क चीते और भारत में जन्मे 12 शावक मर चुके हैं। मौतों के कारणों में अचानक हृदयगति रुकना, हिंसक संभोग, डूबना, ज़हर देना और रेडियो कॉलर की नमी-भरे मानसूनी मौसम में प्रतिक्रिया से हुआ गंभीर त्वचाशोथ शामिल हैं। अदालत के अभिलेखों में दर्ज एक खास तौर पर चिंताजनक घटना में, दक्षा नाम की मादा को एक नर ने बाड़े में मौत के घाट उतार दिया। प्रबंधक वहाँ संभोग को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे थे। पवन नाम का एक और चीता अस्पष्ट परिस्थितियों में डूब गया। कुछ अधिकारियों को शक है कि उसे ज़हर दिया गया था।
हाल के महीनों में इस गंभीर आँकड़े में और मौतें जुड़ी हैं। दिसंबर में ग्वालियर के पास आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक वाहन की चपेट में आने से एक शावक की मौत हो गई। वह उद्यान की सीमा से बहुत दूर निकल गया था। पहली खेप के साथ आई पाँच वर्षीय नामीबियाई मादा आशा की पिछले महीने गुर्दे के संक्रमण से मौत हो गई। ये मौतें प्रबंधन की व्यवस्थागत चुनौतियाँ उजागर करती हैं। इनमें जंगली परिस्थितियों में जन्मे जानवरों को ऐसे हालात में बनाए रखने की कठिनाई शामिल है जहाँ कैद और आज़ादी के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। सरकार की सलाहकार समिति में रहे दक्षिण अफ्रीकी पशुचिकित्सक एड्रियन टॉर्डिफ ने निराशा जताई कि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और भारतीय अधिकारियों के बीच संवाद की कमी ने कई मामलों में समय पर पशु-चिकित्सा हस्तक्षेप को रोका हो सकता है।
कितनी मौतों को स्वीकार्य माना जाए, इस पर बहस विवादास्पद हो गई है। सरकारी अधिकारी आईयूसीएन के दिशानिर्देशों का हवाला देते हैं, जिनके मुताबिक स्थानांतरण के पहले वर्ष में 50 प्रतिशत जीवित रहने की दर ऐसी परियोजनाओं के लिए अपेक्षित दायरे में आती है। वे पहले वर्ष में वयस्क चीतों की 70 प्रतिशत और दूसरे वर्ष में 85.71 प्रतिशत जीवित रहने की दर को बेहतर होते प्रबंधन का प्रमाण बताते हैं। लेकिन आलोचकों का जवाब है कि कई मौतें नियंत्रित बाड़ों के भीतर हुईं, जहाँ सैद्धांतिक रूप से पशु-चिकित्सा देखभाल से मौतें रोकी जानी चाहिए थीं। शावकों में मौतों की ऊँची दर, जंगली अफ्रीकी आबादियों में स्वाभाविक रूप से ऊँची दरों के अनुरूप होने के बावजूद, एक प्रयोगात्मक परियोजना में जानवरों को ऐसे जोखिमों के सामने रखने के नैतिक सवाल खड़े करती है, जबकि खुले में विचरण करने वाली आबादियों का अंतिम लक्ष्य अनिश्चित बना हुआ है।
सामाजिक न्याय और विस्थापन की चिंताएँ
पारिस्थितिकी संबंधी बहसों से परे, प्रोजेक्ट चीता ने सामाजिक न्याय और समुदायों के अधिकारों को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा की हैं। संरक्षण पत्रिकाओं में प्रकाशित अकादमिक शोध में दर्ज किया गया है कि कुनो के लिए शुरुआती स्थल-चयन की प्रक्रिया में संदिग्ध तरीके अपनाए गए और वास्तविक सामुदायिक भागीदारी के बजाय विस्थापन को प्राथमिकता दी गई। 1999 से 2001 के बीच 24 गाँवों के लगभग 5,000 लोगों को कुनो से हटाया गया, ताकि एशियाई शेरों को फिर से बसाने की योजना लागू की जा सके। लेकिन गुजरात सरकार के राजनीतिक विरोध के कारण यह योजना कभी साकार नहीं हुई। शेरों को स्थानांतरित करने की योजना रुकने के बाद, तैयार लेकिन खाली पड़े परिदृश्य ने चीता परियोजना के लिए सुविधाजनक आधार दिया। फिर भी, विस्थापित परिवारों में से कई अब भी अपर्याप्त पुनर्वास, मुआवज़े के अधूरे वादों और जंगल पर आधारित पारंपरिक आजीविका के नुकसान से जूझ रहे हैं।
पर्यावरणीय न्याय के ढाँचों के ज़रिये परियोजना का विश्लेषण करने वाले हाल के अकादमिक अध्ययन में अन्याय के तीन आयाम पहचाने गए हैं: वितरणात्मक, प्रक्रियागत और मान्यता संबंधी। वितरणात्मक अन्याय इस रूप में दिखता है कि संरक्षण की लागत का असमान बोझ हाशिये पर पड़े समुदायों पर पड़ता है, जबकि इको-टूरिज्म से होने वाला राजस्व जैसे लाभ अनिश्चित हैं या विस्थापित आबादी की पहुँच से बाहर हैं। प्रक्रियागत अन्याय स्थानीय हितधारकों से परियोजना की रूपरेखा बनाते समय सार्थक परामर्श की कमी में दिखाई देता है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने समुदायों के कल्याण का आकलन ठोस बातचीत के बजाय सतही दृश्य निरीक्षण से किया। मान्यता संबंधी अन्याय तब होता है जब स्थानीय ज्ञान प्रणालियों की विविधता, भूमि से सांस्कृतिक जुड़ाव और पारंपरिक पारिस्थितिक समझ को दरकिनार कर ऊपर से थोपे गए नौकरशाही फैसलों को तरजीह दी जाती है।
पुनर्वास की प्रक्रिया ने स्वैच्छिकता और सहमति को लेकर भी चिंताएँ पैदा की हैं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और वन अधिकार अधिनियम के तहत पहले से सूचित सहमति के साथ स्वैच्छिक पुनर्वास अनिवार्य है। लेकिन ज़मीनी रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि प्रक्रियागत शॉर्टकट और आर्थिक बदहाली ने कई परिवारों को उनकी पारंपरिक भूमि छोड़ने के लिए प्रभावी रूप से मजबूर किया। विस्थापित लोग अब भी अपने हटाए जाने के दशकों बाद बुनियादी सेवाओं की कमी, पानी की किल्लत और बेरोज़गारी की शिकायत करते हैं। परियोजना की आधिकारिक जानकारी में इन सामाजिक लागतों को बड़े पैमाने पर स्वीकार नहीं किया गया है। इसमें परिदृश्य प्रबंधन के मानवीय पहलू को कम करके, पारिस्थितिकी की बहाली पर ज़ोर दिया जाता है।
राजनीतिक पहलू और स्थल चयन
चीता पुनर्वास गहरे राजनीतिक प्रतीकवाद और राज्यों के बीच प्रतिद्वंद्विता की पृष्ठभूमि में आगे बढ़ा है। प्रधानमंत्री मोदी की निजी भागीदारी, जिसमें उनके जन्मदिन पर पहले चीतों को छोड़ना और परियोजना की गति की तुलना अपने शासन के तरीके से करना शामिल है, ने इस पहल को देश की प्रमुख उपलब्धि बना दिया है। राजनीति के उच्चतम स्तर पर इस निवेश के कारण निष्पक्ष आलोचना मुश्किल हो गई है। सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों में वैज्ञानिक आपत्तियों को वैचारिक रूप से प्रेरित या सनसनीखेज़ बताया गया है। परियोजना की शुरुआत की तारीख जानबूझकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की शांति के प्रतीक कबूतर छोड़ने की परंपरा से अलग रखी गई थी। इससे संरक्षण के अधिक मुखर और ताकत-प्रदर्शक राष्ट्रवाद की ओर बदलाव का संकेत दिया गया।
कुनो के अलावा अन्य स्थलों के चयन पर भी राजनीतिक विचारों का असर पड़ा है। राजस्थान के मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिज़र्व की पहचान वर्षों पहले संभावित दूसरे स्थल के रूप में हुई थी, लेकिन राज्य में विपक्षी कांग्रेस पार्टी की सरकार रहते हुए चीतों के स्थानांतरण के लिए केंद्र सरकार की मंज़ूरी अटकी रही। राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद ही वहाँ विस्तार की नौकरशाही बाधाएँ कम होती दिखीं। इसी तरह, गुजरात सरकार ने कुनो के लिए एशियाई शेर देने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद कि 2013 से इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश मौजूद थे, योजनाकारों को इसके बजाय अफ्रीकी चीतों की ओर रुख करना पड़ा। इस घटनाक्रम से कुछ पर्यवेक्षक इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि प्रजाति का चयन पारिस्थितिक ज़रूरत के बजाय राजनीतिक सुविधा के हिसाब से हुआ, क्योंकि कुनो वैज्ञानिक रूप से शेरों के लिए तैयार किया गया था और कानूनन भी उन्हीं के लिए निर्धारित था, चीतों के लिए नहीं।
अतिरिक्त स्थलों तक विस्तार की योजनाओं ने नया विवाद खड़ा किया है। मध्य प्रदेश के गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य को अगले छोड़े जाने वाले स्थल के रूप में तैयार किया गया है और अधिकारियों का दावा है कि ज़रूरी बुनियादी ढाँचा पूरा हो चुका है। लेकिन नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य में तीसरा स्थल बनाने के प्रस्तावों की वैज्ञानिकों ने कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में 20 से अधिक वयस्क बाघ और कई अन्य बाघ अस्थायी रूप से मौजूद हैं। उनका तर्क है कि शिकारियों के अधिक घनत्व वाले ऐसे वन क्षेत्र में चीतों को छोड़ने से उन्हें प्रतिस्पर्धा का भारी दबाव झेलना पड़ेगा और उनके शावकों की मौत होने की आशंका होगी। वन्यजीव वैज्ञानिक अर्जुन गोपालस्वामी, जिन्होंने 2022 में परियोजना के वैज्ञानिक आधार पर सवाल उठाने वाले शोधपत्र का सह-लेखन किया था, का कहना है कि हर नए स्थल का चयन वह पुराना ही रुझान दिखाता है: वहन क्षमता का बढ़ा-चढ़ाकर आकलन और शिकारियों के बीच टकराव को कम करके आँकना।
सरकारी बचाव और अनुकूलनशील प्रबंधन
सरकारी अधिकारियों और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के वैज्ञानिकों ने बढ़ती आलोचनाओं के खिलाफ प्रोजेक्ट चीता का पुरज़ोर बचाव किया है। फ्रंटियर्स इन कंज़र्वेशन साइंस में हाल ही में प्रकाशित एक शोधपत्र में उनका तर्क था कि आलोचक अफ्रीका और भारत के पारिस्थितिकी तंत्रों की जरूरत से ज़्यादा सरल तुलना करते हैं और चीतों के व्यवहार में लचीलेपन को नज़रअंदाज़ करते हैं। शोधपत्र के मुताबिक, खुले में विचरण करने वाले चीतों के शुरुआती आँकड़े बताते हैं कि वे चीतल, सांभर, चौसिंगा और नीलगाय समेत कई तरह के शिकार सफलतापूर्वक कर रहे हैं। वे सवाना घास के मैदानों से लेकर मिश्रित पर्णपाती वनों तक अलग-अलग आवासों का इस्तेमाल कर रहे हैं। अधिकारी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि रेडियो-कॉलर के आँकड़ों से पता चलता है कि कुनो में तेंदुओं का घनत्व ऊँचा होने के बावजूद चीते समय और स्थान के हिसाब से उनसे सफलतापूर्वक दूरी बनाए रख सकते हैं।
सरकार ने बाड़ों को लेकर बहस का नया अर्थ देने की भी कोशिश की है और ज़ोर दिया है कि सॉफ्ट-रिलीज़ बोमा कैदखाने नहीं, बल्कि प्राकृतिक आवास जैसे क्षेत्र हैं। अधिकारियों का कहना है कि मांसाहारी जीवों को फिर से बसाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य इस तरीके से तत्काल खुले में छोड़ने की तुलना में सफलता की संभावना 2.5 गुना बढ़ जाती है। 2023 में मौतों की घटनाओं के बाद खुले में घूमने वाले चीतों को अस्थायी तौर पर फिर से बाड़ों में रखना, टिक के संक्रमण और सर्दियों में कोट संबंधी दिक्कतों जैसी अनपेक्षित चुनौतियों से निपटने के लिए अनुकूलनशील प्रबंधन का हिस्सा था, न कि परियोजना की विफलता का प्रमाण। अधिकारी इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि 2.5 वर्षों में 21 शावकों का जन्म हुआ है और उनमें से 11 अब अपनी माँओं के साथ खुले में घूम रहे हैं। उनके मुताबिक, शुरुआती झटकों के बावजूद आबादी भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हो रही है।
सामाजिक प्रभाव के बारे में आधिकारिक जानकारी में कहा गया है कि प्रोजेक्ट चीता के तहत कोई अनुचित विस्थापन नहीं हुआ है और अधिकतर पुनर्वास दशकों पहले शेरों की परियोजना के लिए हुए थे। अधिकारियों के मुताबिक, पुनर्वास स्वैच्छिक प्रक्रिया के तहत ग्राम सभा की बैठकों में किए गए और इनमें कृषि भूमि, आवास सहायता तथा पाँच साल तक सहयोग जैसे व्यापक पैकेज शामिल थे। परियोजना में सैकड़ों स्थानीय युवाओं को वन रक्षक और चीता ट्रैकर के रूप में रोज़गार दिया गया है और आसपास के समुदायों को लाभ पहुँचाने के मकसद से इको-टूरिज्म का बुनियादी ढाँचा विकसित किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि संरक्षण और विकास साथ-साथ चल सकते हैं और चीते कई राज्यों में नष्ट हो चुके घास के मैदानों को बहाल करने में प्रमुख प्रजाति की भूमिका निभा सकते हैं।
पारिस्थितिक ज़रूरतें और वैश्विक संदर्भ
समर्थकों और आलोचकों के बीच बुनियादी मतभेद पारिस्थितिक ज़रूरतों और संरक्षण की सफलता की परिभाषा को लेकर है। चीते सबसे बड़े शिकारी जीवों में सबसे दूर तक विचरण करने वाली प्रजातियों में शामिल हैं। कुछ अफ्रीकी पारिस्थितिकी तंत्रों में उनके आवास क्षेत्र का फैलाव 5,441 वर्ग किलोमीटर तक दर्ज किया गया है। गोपालस्वामी और उनके सहलेखकों का तर्क है कि एक टिकाऊ, खुले में विचरण करने वाली आबादी स्थापित करने के लिए 10,000 से 20,000 वर्ग किलोमीटर का ऐसा जुड़ा हुआ आवास चाहिए, जहाँ पर्याप्त शिकार हो और मानव-वन्यजीव टकराव न हो। घनी आबादी वाले भारत में फिलहाल इतने बड़े क्षेत्र की उपलब्धता नहीं है। दूसरा विकल्प, यानी जानवरों को बाड़ों में रखना या अलग-अलग स्थलों में प्रबंधित मेटापॉपुलेशन बनाए रखना, अपने मूल निवास स्थान से बाहर संरक्षण का एक तरीका है। यह मूल रूप से परिकल्पित जंगली आबादी की बहाली से बुनियादी तौर पर अलग है।
यह बहस तेज़ी से बदलते पर्यावरण के दौर में दूसरे महाद्वीपों से प्रजातियों को स्थानांतरित करने के बारे में बड़े सवाल उठाती है। चीतों की नवीनतम खेप देने वाले बोत्सवाना में भी जंगली चीतों की आबादी घट रही है। इससे दबाव झेल रही मूल आबादियों से जानवरों को प्रयोगात्मक परियोजनाओं के लिए बाहर भेजने को लेकर नैतिक चिंताएँ पैदा होती हैं। पुनर्वास के लिए आईयूसीएन के दिशानिर्देश ज़ोर देते हैं कि ऐसे प्रयास ऐतिहासिक दायरे में और उपयुक्त उप-प्रजातियों के साथ ही होने चाहिए। लेकिन भारत में लाए गए अफ्रीकी चीते उस विलुप्त एशियाई आबादी से अलग उप-प्रजाति के हैं। आनुवंशिक अंतर को संभालना संभव हो सकता है, लेकिन 70 साल की अनुपस्थिति के बाद भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप उनके पारिस्थितिक और व्यवहारगत अनुकूलन अब भी अनिश्चित हैं।
परियोजना को शुरुआत में सलाह देने वाले अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने राजनीतिक दबाव के कारण वैज्ञानिक सुझावों को दरकिनार किए जाने पर निराशा जताई है। दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया के पशुचिकित्सकों ने सुप्रीम कोर्ट को लिखे पत्र में शिकायत की कि उनकी सलाहकार भूमिका दिखावे तक सीमित कर दी गई थी और आपात स्थिति के दौरान स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी उनसे साझा नहीं की गई। विदेशी सलाहकारों का लगातार बदलना, जिसमें चीता कंज़र्वेशन फंड की संस्थापक लॉरी मार्कर का सक्रिय भागीदारी से हटना भी शामिल है, परियोजना के प्रबंधन को लेकर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चिंता का संकेत देता है। आनुवंशिक विविधता बढ़ाने के लिए भारत जहाँ केन्या से और चीतों के आयात पर बातचीत कर रहा है, वहीं आयात पर निर्भर आबादी की रणनीति की दीर्घकालिक टिकाऊपन को लेकर सवाल लगातार गंभीर होते जा रहे हैं।
मुख्य बिंदु
- प्रोजेक्ट चीता के तहत 2022 से 20 वयस्क अफ्रीकी चीते आयात किए गए हैं। भारत में जन्मे 33 शावकों को मिलाकर आबादी 53 हो गई है, जबकि कुल 21 चीतों की मौत हुई है (9 वयस्क और 12 शावक)
- वैज्ञानिकों का कहना है कि कुनो राष्ट्रीय उद्यान की वहन क्षमता लगभग 10 वयस्क चीतों की है। स्थायी कैद या मौतों की ऊँची दर के बिना मौजूदा आबादी टिकाऊ नहीं है
- आलोचक इस परियोजना को ‘ग्रीन ग्रैब’ बताते हैं, जो वनवासी समुदायों को विस्थापित करने और भूमि पर नियंत्रण का ज़रिया बनती है। पहले हुए विस्थापनों में प्रक्रियागत अन्याय का अकादमिक शोध में दस्तावेज़ीकरण किया गया है
- सरकार इस पहल को अनुकूलनशील प्रबंधन की सफलता बताती है और वयस्क चीतों की 70-85% जीवित रहने की दर तथा खुले में विचरण करने वाले चीतों द्वारा अलग-अलग शिकार किए जाने का हवाला देती है। ये चीते अब कई स्थलों पर हैं
- गांधी सागर अभयारण्य तक विस्तार और नौरादेही के प्रस्तावित स्थल का विरोध हो रहा है। इसकी वजह आवास की अपर्याप्तता और बाघों का अधिक घनत्व है, जिससे चीतों का जीवित रहना खतरे में पड़ सकता है
- अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने संवाद में कमी, वैज्ञानिक सलाह की अनदेखी और घटती अफ्रीकी आबादियों से जानवरों के निर्यात से जुड़े नैतिक सवाल उठाए हैं






