आजीविका का तर्क ढह रहा है
दशकों से इंडोनेशिया के मीठे पानी के कछुओं के व्यापार के समर्थक एक प्रभावशाली तर्क देते आए हैं: हर साल हजारों कछुओं के शिकार से ग्रामीण समुदायों को जरूरी आमदनी मिलती है, जबकि इसके बिना उनके लिए गुजारा करना मुश्किल होगा। इस दलील ने ऐसे व्यावसायिक कारोबार को बनाए रखने में मदद की है, जो हर साल करीब 50,000 कछुए निर्यात करता है। इनकी मुख्य मांग चीन में कछुए के मांस की खपत से आती है। लेकिन Discover Animals पत्रिका में प्रकाशित नए शोध ने इस औचित्य को खारिज करते हुए बताया है कि 28.5 करोड़ आबादी वाले देश में यह वैध व्यापार न्यूनतम वेतन के स्तर पर 400 से भी कम लोगों को रोजगार देता है।
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ऑक्सफोर्ड ब्रूक्स यूनिवर्सिटी के वन्यजीव व्यापार शोधकर्ता विंसेंट निजमान और सेंटर फॉर बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी के उनके सहकर्मी क्रिस शेफर्ड ने उस आजीविका संबंधी परिकल्पना की जांच की, जिसने लंबे समय से इस उद्योग को सख्त नियमन से बचाए रखा है। उन्होंने इंडोनेशिया में मीठे पानी के कछुओं की चार प्रजातियों के वैध शिकार के अर्थशास्त्र का अध्ययन किया: संवेदनशील एशियाई सॉफ्टशेल कछुआ (Amyda cartilaginea), संकटग्रस्त दक्षिण-पूर्व एशियाई बॉक्स कछुआ (Cuora amboinensis), एशियाई लीफ कछुआ (Cyclemys dentata) और मलायन सॉफ्टशेल कछुआ (Dogania subplana)। इन प्रजातियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केवल CITES के तहत परमिट के साथ बेचा जा सकता है। CITES वन्यजीव व्यापार से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय संधि है। इंडोनेशिया के भीतर भी शिकारियों को लाइसेंस चाहिए और हर प्रांत शिकार की सीमा तय करता है।
निजमान ने Mongabay से बातचीत में बताया कि अध्ययन क्यों किया गया। उन्होंने कहा, "हम इस विचार के समर्थन में कुछ सबूत तलाश रहे थे कि वन्यजीव व्यापार सचमुच लोगों की आजीविका में योगदान देता है।" इसके बजाय, उनके विश्लेषण ने ऐसी आर्थिक हकीकत उजागर की, जो इस सवाल को उठाती है कि क्या यह व्यापार जारी रहना चाहिए, खासकर तब जब इसकी चपेट में आने वाली कई प्रजातियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है।
घाटे के सौदे का गणित
यह जानने के लिए कि कितने इंडोनेशियाई कछुए पकड़कर वास्तव में अपना गुजारा कर सकते हैं, शोधकर्ताओं ने संभावित आय का आकलन किया। उन्होंने प्रति कछुए 1.10 से 20 डॉलर तक की बाजार कीमत को 2016 से 2022 के बीच 27 प्रांतों में शिकार की अनुमति वाले कछुओं की संख्या से गुणा किया। फिर इन आंकड़ों की तुलना इंडोनेशियाई सरकार की ओर से सुझाए गए प्रांतीय न्यूनतम वेतन से की। नतीजे चौंकाने वाले थे। यह वैध व्यापार न्यूनतम गुजारे लायक वेतन पर 241 से 306 शिकारियों को रोजगार दे सकता है। अगर शिकारी गुजारे लायक वेतन, यानी न्यूनतम वेतन का करीब डेढ़ गुना, पाना चाहें तो देशभर में यह संख्या घटकर 161 से 204 रह जाती है।
इन अनुमानों में भी परमिट, परिवहन और उपकरण जैसे कारोबारी खर्च शामिल नहीं हैं, इसलिए ये उदार आकलन हैं। बोर्नियो द्वीप पर उत्तरी और पूर्वी कालीमंतान प्रांतों में मिलाकर सबसे ज्यादा, 41 शिकारी, गुजारा कर सकते थे। सात अन्य प्रांतों में केवल एक या दो लोगों को न्यूनतम वेतन के बराबर आमदनी मिल सकती थी। निजमान ने कहा, "इससे ज्यादा लोगों को न्यूनतम वेतन दिलाने का एक ही तरीका है: उन प्रांतों में अधिक कछुए पकड़ने की अनुमति देना, जहां न्यूनतम वेतन सबसे कम है।" लेकिन कछुओं की आबादी पहले ही घट रही है। ऐसे में 50,000 की मौजूदा कोटा संख्या टिकाऊ प्रबंधन की ऊपरी सीमा है और इसे बढ़ाने की गुंजाइश नहीं है।
शोधकर्ताओं ने उन स्थितियों का भी मॉडल बनाया, जिनमें शिकारी सिर्फ कछुओं पर निर्भर रहने के बजाय उनसे अपनी आय का कुछ हिस्सा पूरा करते हैं। उन्होंने माना कि व्यापार से सालाना कमाई का करीब 10% मिलता है। इस उदार अनुमान के बावजूद यह उद्योग इंडोनेशिया के विशाल द्वीपसमूह में केवल 2,400 से 3,000 लोगों को रोजगार दे सकता है। कनाडा में मॉनिटर कंजर्वेशन रिसर्च सोसाइटी के साथ काम कर चुके सह-लेखक क्रिस शेफर्ड ने कहा, "जंगली कछुओं का व्यापार टिकाऊ नहीं है, इसलिए इसे आजीविका का जरिया बताकर बढ़ावा देने का कोई मतलब नहीं।"
जीवविज्ञान बनाम कारोबार
कछुओं के व्यापार की आर्थिक कमजोरियों के साथ-साथ उनकी जैविक कमजोरियां भी हैं, जो उन्हें व्यावसायिक दोहन के लिए बेहद अनुपयुक्त बनाती हैं। कछुओं में देर से यौन परिपक्वता, प्रजनन की कम दर और बच्चों की अधिक मृत्यु दर जैसी विशेषताएं विकसित हुई हैं। इन विशेषताओं ने उन्हें उन सामूहिक विलुप्तियों के दौरान जीवित रहने में मदद की, जिनमें डायनासोर खत्म हो गए थे। लेकिन यही गुण उनकी आबादी को लगातार शिकार का दबाव सहने में असमर्थ बनाते हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ रिचमंड में कछुओं के अवैध व्यापार से निपटने वाली कोलैबोरेटिव की सह-संस्थापक जेनिफर सेविन ने बताया कि ये जैविक सीमाएं लंबे समय तक नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने चेताया, "एक बार आबादी घटने लगे तो उसके लिए फिर से उबरना बेहद मुश्किल हो सकता है। व्यावसायिक पैमाने पर दोहन होने पर यह खास तौर पर सच है।" स्थिति इसलिए और गंभीर है क्योंकि मांस के व्यापार में खास तौर पर बड़े, वयस्क कछुओं को निशाना बनाया जाता है। उनकी कीमत अधिक होती है, लेकिन वे आबादी को बनाए रखने के लिए जरूरी प्रजनन करने वाले कछुए भी होते हैं।
व्यापार की प्रकृति कम कीमत वाली ऐसी वस्तु-श्रृंखला बनाती है, जिसमें मुनाफे के लिए बड़ी मात्रा में कछुए पकड़ने पड़ते हैं। निजमान के अनुसार, कछुओं के मांस का कारोबार "तभी व्यावसायिक रूप से लाभदायक है, जब यह बड़े पैमाने पर किया जाए।" इस दबाव में शिकारी टिकाऊ सीमा से अधिक कछुए पकड़ते हैं। इससे 21वीं सदी की शुरुआत के आसपास जीवविज्ञानियों द्वारा बताए गए "एशियाई कछुआ संकट" को बढ़ावा मिला। उस समय अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के शोधकर्ताओं ने पाया कि एशिया की करीब तीन-चौथाई कछुआ प्रजातियां खतरे में थीं। इसका मुख्य कारण मांस और पालतू जानवरों के व्यापार के लिए उनका शिकार था। मौजूदा आकलन बताते हैं कि हालात और बिगड़े हैं: अब एशिया की 83% कछुआ प्रजातियां संकटग्रस्त मानी जाती हैं।
यह संकट एशिया की सीमाओं तक सीमित नहीं है। एशियाई कछुओं की घटती आबादी के कारण दुनिया भर में कछुओं की प्रजातियों का शिकार बढ़ा है। इसमें अमेरिका भी शामिल है, जहां करीब 40% कछुआ प्रजातियां खतरे में हैं। अमेरिका हर साल लाखों कछुए निर्यात करता है। हाल के नियामकीय सुधारों के बावजूद कई राज्यों में जंगली आबादी के व्यावसायिक शिकार की अनुमति है।
खोलों का छाया कारोबार
अध्ययन के अनुसार, वैध कोटा व्यापार की आर्थिक जरूरतें पूरी नहीं कर सकता। इससे संकेत मिलता है कि कारोबार को मुनाफे में बनाए रखने के लिए अवैध शिकार से इस कमी को पूरा करना पड़ता है। निजमान और शेफर्ड का अनुमान है कि इंडोनेशिया से होने वाला कछुए के मांस और खोल का 90% तक व्यापार अवैध रास्तों से हो सकता है। यह इंडोनेशिया के वन्यजीवों के अन्य व्यापारों में दिखने वाले रुझानों से मेल खाता है। इनमें गाने वाले पक्षी, टोके गेको, जंगल के पक्षी और तेंदुए शामिल हैं, जिनका शिकार अक्सर कानूनी कोटे से अधिक होता है या वे नियमों को पूरी तरह दरकिनार कर देते हैं।
बड़े पैमाने पर जरूरत से ज्यादा शिकार के सबूत बहुत हैं। 2022 में प्रकाशित शोध में बताया गया कि इंडोनेशिया के एक प्रांत में दो व्यापारियों को शिकारियों से हर साल 19,000 से 45,000 दक्षिण-पूर्व एशियाई बॉक्स कछुए मिलते थे, जबकि दोनों के पास कुल मिलाकर केवल 400 कछुओं का वैध कोटा था। यह अंतर बताता है कि कानूनी परमिट का इस्तेमाल मुख्य रूप से अवैध रूप से पकड़े गए कछुओं को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में वैध दिखाकर पहुंचाने के लिए किया जाता है।
अवैध व्यापार को जोड़ने पर भी आर्थिक लाभ बेहद कम रहता है। शोधकर्ताओं का आकलन है कि अवैध शिकार बढ़ने पर शायद 1,500 से 3,000 लोग जंगल से कछुए पकड़कर न्यूनतम वेतन कमा सकते हैं। यानी हर दस लाख लोगों पर लगभग 5 से 10 लोग। लेकिन कछुओं के लिए शिकार की यह दर विनाशकारी साबित होती है। 2014 की इंडियन ओशन साउथ ईस्ट एशिया मरीन टर्टल मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग की एक रिपोर्ट ने पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध शिकार का दस्तावेजीकरण किया। इसमें इंडोनेशियाई जलक्षेत्र को चीन, जापान और ताइवान तक पहुंचाने वाले तस्करी नेटवर्क का प्रमुख स्रोत बताया गया। इंडोनेशियाई अधिकारियों ने 2012 में चेताया था कि पूर्वी एशिया में मांग बढ़ने से समुद्री कछुओं की अंतरराष्ट्रीय तस्करी देशभर में बढ़ रही है।
वर्गीकरण संबंधी नई खोज से संरक्षण संकट गहराया
संरक्षण के प्रयासों को एक और चुनौती मिली है। हालिया वर्गीकरण संशोधनों से पता चला है कि इंडोनेशिया के शिकार कोटे में पहले के अनुमान से कम प्रजातियां संरक्षित हैं। 2023 में वैज्ञानिकों ने पाया कि दक्षिण-पूर्व एशियाई बॉक्स कछुआ, जिसे लंबे समय तक एक ही प्रजाति माना जाता था, वास्तव में छह अलग-अलग प्रजातियों और उप-प्रजातियों से मिलकर बना है। इनमें इंडोनेशिया का गंभीर रूप से संकटग्रस्त पालू बॉक्स कछुआ (Cuora amboinensis aurantiae) भी शामिल है। इस पर शिकारियों का दबाव और बढ़ गया है, क्योंकि वे इसे इसकी अधिक आम निकट संबंधी प्रजातियों से अलग नहीं पहचान पाते।
टर्टल सर्वाइवल एलायंस के जॉर्डन ग्रे, जो IUCN के कछुआ और मीठे पानी के कछुआ विशेषज्ञ समूह में भी हैं, ने इस खोज की तात्कालिकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, "पालू बॉक्स कछुए को एक अलग, गंभीर रूप से संकटग्रस्त उप-प्रजाति के रूप में मान्यता मिलने के बाद, इस खास जीव को अपूरणीय नुकसान से बचाने के लिए शिकार कोटे में तेजी से संशोधन या उन्हें निलंबित करना जरूरी है।" यह खोज दिखाती है कि पहले से मान ली गई प्रजातियों की सीमाओं पर बने कोटा तंत्र अनजाने में दुर्लभ प्रजातियों को विलुप्ति की ओर धकेल सकते हैं।
ग्रे ने कहा कि इंडोनेशिया के पास स्पष्ट प्रमाण हैं कि मौजूदा व्यवस्था आर्थिक और पारिस्थितिक, दोनों कसौटियों पर विफल है। उन्होंने कहा, "इस बात के स्पष्ट सबूत हैं कि यह व्यापार न तो आर्थिक रूप से कुशल है, न पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ। इसलिए इंडोनेशिया इस जानकारी के आधार पर अपने शिकार कोटे या संभावित प्रतिबंधों पर फिर से विचार कर सकता है।"
बदलते इंडोनेशिया में विकल्पों की तलाश
यह अध्ययन ऐसे समय आया है, जब राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के नेतृत्व में इंडोनेशिया की सरकार बड़े पैमाने पर सामाजिक हस्तक्षेप की क्षमता दिखा रही है। प्रशासन ने कई व्यापक सामाजिक सहायता कार्यक्रम लागू किए हैं। इनमें makan bergizi gratis (स्कूली बच्चों और गर्भवती माताओं के लिए मुफ्त भोजन), sekolah rakyat (गरीब बच्चों के लिए मुफ्त आवासीय स्कूल) और kooperasi desa merah-putih (सरकार द्वारा संचालित ग्राम सहकारी समितियां) शामिल हैं। सामूहिक रूप से "प्रबोवोनॉमिक्स" कहे जाने वाले इन कार्यक्रमों पर 2024 में ही करीब 15 अरब डॉलर खर्च हुए। इससे पता चलता है कि मौजूदा व्यापार पर निर्भर कुछ सौ कछुआ शिकारियों के लिए आजीविका के विकल्प मुहैया कराने की संस्थागत क्षमता मौजूद है।
संरक्षणवादियों ने इस क्षेत्र में मौजूद वैकल्पिक मॉडलों की ओर ध्यान दिलाया है। मलेशिया के तेरेंगानु राज्य में दशकों पुरानी कछुए के अंडे वापस खरीदने की योजना के तहत 2016 से अब तक 71,000 से अधिक हरे कछुओं के अंडों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। इनमें से 77.6% अंडों से बच्चे निकले। हालांकि, इस मॉडल की दीर्घकालिक टिकाऊपन को लेकर आलोचना होती है। यह सवाल भी उठता है कि क्या धन को गैर-शोषणकारी उपायों, जैसे इकोटूरिज्म या पूर्व शिकारियों को समुद्र तट की निगरानी में लगाने, पर खर्च करना बेहतर होगा। पेरू इसका एक अलग उदाहरण पेश करता है। वहां समुदाय पीले धब्बों वाले नदी कछुए के अंडे इकट्ठा कर उन्हें सेने के लिए अपने प्रबंधित कछुआ पालन कार्यक्रम का इस्तेमाल करते हैं। फिर कुछ बच्चों को जंगल में छोड़ दिया जाता है और बाकी को पालतू जानवरों के रूप में अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचा जाता है। इस कार्यक्रम से प्रबंधित क्षेत्रों में कछुओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन निगरानी आंकड़े बताते हैं कि पूरे पेरू में अवैध शिकार अब भी बड़े पैमाने पर जारी है। 2015 से 2020 के बीच यह प्रजाति देश में सबसे अधिक तस्करी की जाने वाली प्रजातियों में तीसरे स्थान पर थी।
संरक्षण कानून लागू करने के इंडोनेशिया के मौजूदा तरीके में अवसर और जोखिम, दोनों हैं। सुमात्रा के टेसो निलो राष्ट्रीय उद्यान में सरकार की सख्त कार्रवाई के तहत सेना की निगरानी में अवैध बागानों से सैकड़ों परिवारों को हटाया जा रहा है। यह सख्त नियम लागू करने की क्षमता दिखाता है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने और विस्थापित समुदायों के लिए आजीविका के कारगर विकल्प सुनिश्चित करने हेतु ऐसे तरीकों में सुरक्षा उपाय जरूरी हैं। नागरिक समाज संगठन पाराडिग्मा के रिको कुर्नियावान ने चेताया, "लोगों को आजीविका की गारंटी के बिना खाली जमीन पर न भेजें।"
शेफर्ड का कहना है कि कछुआ शिकारियों के लिए मौजूदा तरीकों की जगह टिकाऊ विकल्प होने चाहिए। उन्होंने कहा, "आजीविका के समाधान टिकाऊ होने चाहिए। जंगली कछुओं का व्यापार टिकाऊ नहीं है, इसलिए इसे आजीविका का जरिया बताकर बढ़ावा देने का कोई मतलब नहीं।" कछुए अवसरवादी सर्वाहारी के रूप में अहम पारिस्थितिक भूमिका निभाते हैं। वे मरे हुए जीवों को खाते और जलमार्गों को साफ रखते हैं। उनकी आबादी खत्म होने पर ये सेवाएं भी समाप्त हो जाती हैं।
मुख्य बिंदु
- इंडोनेशिया का वैध कछुआ व्यापार न्यूनतम वेतन के स्तर पर केवल 241 से 306 लोगों को रोजगार देता है, न कि व्यापार के समर्थकों के आम दावों के मुताबिक हजारों लोगों को।
- शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वैध व्यापार में कम मुनाफे की भरपाई के लिए इंडोनेशिया में कछुए के मांस का 90% तक कारोबार अवैध रूप से होता है।
- चार प्रजातियां वैध शिकार में प्रमुख हैं: एशियाई सॉफ्टशेल कछुआ, दक्षिण-पूर्व एशियाई बॉक्स कछुआ, एशियाई लीफ कछुआ और मलायन सॉफ्टशेल कछुआ। इन सभी की आबादी घट रही है।
- 2023 के वर्गीकरण संशोधनों में गंभीर रूप से संकटग्रस्त पालू बॉक्स कछुए को अलग उप-प्रजाति के रूप में पहचाना गया। इसके लिए कोटे में तत्काल बदलाव जरूरी है।
- इंडोनेशिया की मौजूदा सरकार सामाजिक सहायता कार्यक्रमों पर अरबों डॉलर खर्च कर रही है। इससे प्रभावित शिकारियों के लिए आजीविका के विकल्पों को वित्तपोषित करने की क्षमता का संकेत मिलता है।
- देर से परिपक्वता और कम प्रजनन दर समेत कछुओं की जैविक विशेषताओं के कारण जंगली आबादी मौजूदा व्यावसायिक शिकार का दबाव सहने में सक्षम नहीं है।






