दूरी, भाषा और समय की सीमाओं को मात देने वाली नौका पर मुलाकात

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दूरी, भाषा और समय की सीमाओं को मात देने वाली नौका पर मुलाकात

1983 में एक संयोगवश हुई मुलाकात

1980 के दशक की शुरुआत में, केरी कॉक्स नाम का एक युवा न्यूज़ीलैंडवासी अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ा था, जिससे बीस की उम्र के कई बेचैन लोग परिचित होते हैं। न्यूज़ीलैंड की स्थिर नौकरी छोड़कर कॉक्स मार्शल आर्ट सीखने सिडनी चला आया था। उसे शारीरिक अनुशासन और रोमांच का जुनून था। एशिया की उसकी यात्रा आखिरकार उसे 1982 में हांगकांग में हुई विश्व मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप में हिस्सा लेने तक ले गई, लेकिन उसके प्रशिक्षण में ऐसा कुछ नहीं था जो दिल के मामलों में आने वाली चुनौतियों के लिए उसे तैयार कर पाता। जुदाई, ख़ामोशी और वक्त खुद उसके सामने मज़बूत प्रतिद्वंद्वी साबित होने वाले थे।

विषय-सूची
  1. 1983 में एक संयोगवश हुई मुलाकात
  2. सफ़र के साथी से हमख़याल तक
  3. पहाड़ी घाटी में इज़हार
  4. प्रशांत महासागर पार प्रेम-पत्र
  5. ख़ामोशी, गायकी और जुदाई
  6. शिनागावा स्टेशन पर फिर मुलाकात
  7. थेम्स में शादी
  8. चालीस साल का साथ और आख़िरी विदाई
  9. मुख्य बातें

जनवरी 1983 तक कॉक्स कोरिया जाने वाली एक नौका पर सवार हो रहा था। उसके पास बस यह सुनी-सुनाई बात थी कि सियोल से हवाई किराया जापान के मुकाबले सस्ता पड़ेगा। इंटरनेट और तत्काल संपर्क के साधन न होने के कारण यात्रियों को जानकारी के लिए लोगों की बातों और संयोग से हुई मुलाकातों पर निर्भर रहना पड़ता था। नौका पर चढ़ने की तैयारी के दौरान एक आकर्षक जापानी महिला उसके पास आई। उसे अंग्रेज़ी बहुत कम आती थी, लेकिन उसने उसे एक ख़ास सलाह दी। उसने बताया कि एक पेटी केले और जॉनी वॉकर ब्लैक लेबल व्हिस्की की एक बोतल खरीदने से कोरिया में उसके यात्रा खर्च का अधिकांश हिस्सा निकल आएगा, क्योंकि उस दौर के एशियाई बाज़ारों में इन पश्चिमी लक्ज़री सामानों की काफ़ी ऊंची कीमत मिलती थी।

उसका नाम हितोमी था। वह एक दोस्त के साथ जापान में दोबारा बेचने के लिए कपड़े और सामान खरीदने कोरिया जा रही थी। जापान के आर्थिक उछाल के दौर में यह कारोबार आम था। जापानी न जानने वाले कॉक्स ने एक अनजान देश में साथ यात्रा करने का उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। हितोमी शौक के तौर पर अंग्रेज़ी सीख रही थी, जिससे उनकी भाषाओं के बीच एक नाज़ुक पुल बन रहा था। दोनों में से किसी ने नहीं सोचा था कि यह व्यावहारिक व्यवस्था चार दशक तक चलने वाले जीवनभर के साथ में बदल जाएगी।

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सफ़र के साथी से हमख़याल तक

दोनों ने एक हफ़्ता दक्षिण कोरिया के व्यस्त बंदरगाह शहर बुसान में और फिर एक हफ़्ता राजधानी सियोल में बिताया। उन्होंने साथ मिलकर स्थानीय मंदिर देखे, बुसान टावर पर चढ़े, भोजन साझा किया और अनजान सड़कों पर रास्ता तलाशा। कॉक्स को याद है कि उस समय दोनों में से किसी के मन में रोमांटिक ख़याल नहीं थे। उनका रिश्ता पूरी तरह व्यावहारिक लगता था: दो अकेले यात्री, अनजान संस्कृति के बीच साथ और साधन साझा करते हुए। भाषा की बाधा बड़ी थी, लेकिन हावभाव, धैर्य और हितोमी की बढ़ती अंग्रेज़ी की मदद से वे एक-दूसरे को समझ लेते थे।

लेकिन 1983 की आर्थिक हक़ीक़त जल्द ही सामने आ गई। कोरिया से हवाई किराया उम्मीद से कहीं ज़्यादा था, जिससे कॉक्स की यात्रा योजनाएं बिगड़ गईं। हितोमी ने एक और रास्ता सुझाया: उसके साथ जापान के दक्षिणतम मुख्य द्वीप क्यूशू के मियाज़ाकी प्रांत लौट चलो। वहां वह अपनी मां के साथ एक ग्रामीण घाटी में रहती थी, जिसके चारों ओर धान के खेत और कोई मछलियों वाले तालाब थे। करीब एक किलोमीटर तक किसी भी दिशा में कोई और घर नज़र नहीं आता था। यह जगह सादगी और शहरी अफ़रातफ़री से राहत का वादा करती थी।

क्यूशू में उन हफ़्तों के दौरान कॉक्स ने भाषा से परे हितोमी के स्वभाव को जाना। वह इलाके में दूर-दूर तक उन बुज़ुर्गों से मिलने जाती थी जो अकेले रहते थे, और दिव्यांग लोगों से भी। अक्सर वह उनके लिए छोटे-छोटे तोहफ़े ले जाती और उनके साथ वक्त बिताती। उसकी मां ने शुरुआत में इस विदेशी मेहमान का स्वागत किया और उसे लेकर हंसी-मज़ाक भी किया, हालांकि बाद में उनके बीच छिपे तनाव सामने आए। इलाके के एक निवासी ने हितोमी के बारे में ख़ास श्रद्धा से बात की।

एक स्थानीय व्यक्ति ने मुझसे कहा कि उन्हें लगता है, वह एक फ़रिश्ता हैं।

कॉक्स ने अपनी यादों में यह बात साझा की। इससे हितोमी के सौम्य स्वभाव और अपने आसपास के लोगों पर उसके असर की झलक मिलती है। उसकी दयालुता दिखावे के लिए नहीं थी, बल्कि उसकी आदत का हिस्सा थी। वह समाज के सबसे कमज़ोर लोगों के प्रति छोटे-छोटे उदार इशारों से इसे जताती थी।

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पहाड़ी घाटी में इज़हार

भावनाओं का निर्णायक मोड़ मियाज़ाकी प्रांत की मशहूर ताकाचिहो घाटी की यात्रा के दौरान आया। यह जगह अपनी नाटकीय चट्टानों और शिंतो धर्म में आध्यात्मिक महत्व के लिए जानी जाती है। सर्दियों के मौसम ने पूरे इलाके को बर्फ़ और फिसलन से भरे ख़तरनाक रास्तों में बदल दिया था। लौटने का जोखिम लेने के बजाय दोनों को एक स्थानीय सराय में रात गुज़ारनी पड़ी। एकांत और कॉक्स के जल्द ही वहां से चले जाने की संभावना ने ऐसा माहौल बना दिया, जिसमें अनकही भावनाओं को और दबाए रखना मुमकिन नहीं था।

उस शाम हितोमी ने कॉक्स से पूछा कि वह ऑस्ट्रेलिया कब लौटने की सोच रहा है। सवाल उनके बीच हवा में ठहर गया, अपने भीतर कई मायने समेटे हुए। कॉक्स ने पूरी ईमानदारी से जवाब दिया: उसे हितोमी से प्यार होने लगा था और वह अनिश्चित समय तक वहीं रुकना चाहता था। हितोमी का जवाब एक ऐसा खुलासा था जिसने दोनों का भविष्य बदल दिया। उसने उसकी ओर देखा और वे शब्द कहे जिन्होंने उनकी अलग-अलग दुनियाओं को जोड़ दिया।

मुझे भी!

कॉक्स हैरान रह गया। उसे अंदाज़ा नहीं था कि हितोमी भी ऐसा ही महसूस करती है। इसके बाद उन्होंने पहली बार एक-दूसरे को चूमा। बाद में कॉक्स ने उस चुंबन को कोमल और नाज़ुक बताया, ठीक हितोमी के स्वभाव की तरह। यह पल दोस्ती से प्रतिबद्ध रिश्ते की ओर बढ़ने का संकेत था, हालांकि जल्द ही व्यावहारिक मुश्किलें उनके नए बंधन की परीक्षा लेने वाली थीं।

वीज़ा की अवधि खत्म होने पर कॉक्स को ऑस्ट्रेलिया लौटना पड़ा। हितोमी उसे नारिता हवाई अड्डे तक छोड़ने गई। वहां उनकी विदाई इतनी लंबी खिंची कि कॉक्स की उड़ान छूटते-छूटते बची। उन्होंने तय किया कि आगे चलकर हितोमी ऑस्ट्रेलिया आएगी, हालांकि दोनों ने अभी शादी के बारे में नहीं सोचा था। यह रिश्ता इतनी अप्रत्याशित रूप से शुरू हुआ था कि दोनों को उसकी दिशा और गहराई समझने के लिए वक्त चाहिए था।

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प्रशांत महासागर पार प्रेम-पत्र

दूरी ने उस बात को साफ़ कर दिया, जिसका बस पास रहने से अंदाज़ा हुआ था। ऑस्ट्रेलिया लौटते ही कॉक्स को यक़ीन हो गया कि हितोमी ही वह शख़्स है जिसके साथ वह पूरी ज़िंदगी बिताना चाहता है। भौगोलिक दूरी, जो दूसरे रिश्तों को कमज़ोर कर सकती थी, उसके इरादे को और मज़बूत कर गई। 1983 में संपर्क बनाए रखना आसान नहीं था। विदेशों में फ़ोन करना इतना महंगा था कि नियमित बातचीत मुमकिन नहीं थी। लिहाज़ा दोनों अंग्रेज़ी में हाथ से लिखे ख़तों पर निर्भर रहे।

कॉक्स अपनी भाषा जितनी हो सके उतनी सरल रखता था, फिर भी उसे पता नहीं था कि हितोमी उसके लिखे हुए में से कितना समझ पाती है। उसके जवाब पढ़ना भी उतना ही मुश्किल था और इसके लिए धैर्य और समझ की ज़रूरत पड़ती थी। लेकिन उनकी भावनाएं शब्दों से परे थीं। कॉक्स के मुताबिक, बस इतना मायने रखता था कि हर ख़त के आखिर में उसे "लव यू" शब्द मिल जाएं। डाक सेवा के ज़रिए महासागर पार पहुंचने वाले ये ख़त उनके संपर्क का मुख्य सहारा बन गए।

हितोमी ने ऑस्ट्रेलिया जाने की व्यवस्था करने की कोशिश की, लेकिन उसकी मां इस रिश्ते के सख़्त खिलाफ़ थीं। उनकी चिंता समझ में आती थी: कॉक्स उनके लिए अनजान था, एक विदेशी जो उनकी बेटी को अलग रीति-रिवाज़ों और अनिश्चित भविष्य वाले दूर देश ले जा सकता था। एक साल की जुदाई और सीमित संपर्क के बाद कॉक्स जापान लौटा। वह दक्षिण की ओर हिचहाइकिंग करते हुए क्यूशू के एक बिज़नेस होटल पहुंचा, जहां हितोमी देर रात तक काम कर रही थी। जब उसने आखिरकार उसके दरवाज़े पर दस्तक दी और उसकी बांहों में दौड़कर आ गई, तो सालभर से जमा भावनाएं उमड़ पड़ीं। उस बिल्कुल भी रोमांटिक न लगने वाली जगह पर कॉक्स ने शादी का प्रस्ताव रखा और हितोमी ने उसे स्वीकार कर लिया।

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ख़ामोशी, गायकी और जुदाई

सगाई से हितोमी की मां के साथ मूल विवाद नहीं सुलझा। वह अब भी इस रिश्ते को मंज़ूर नहीं करती थीं और औपचारिक बंधन के बाद उनका विरोध और बढ़ गया। यह समझते हुए कि हितोमी के लिए जापान छोड़ना आसान नहीं होगा, कॉक्स जापान में स्थायी रूप से रहने का वीज़ा पाने की जटिल प्रक्रिया शुरू करने ऑस्ट्रेलिया लौट गया। उसकी गैरमौजूदगी में एक दिल तोड़ देने वाली बात हुई, जिसकी उसे भनक तक नहीं लगी। हितोमी की मां ने कॉक्स के भेजे ख़त जलाने शुरू कर दिए और जब भी वह फ़ोन करने की कोशिश करता, फ़ोन काट देतीं। इस तरह उनका संपर्क पूरी तरह टूट गया।

जब 1988 में कॉक्स को आखिरकार वीज़ा मिल गया और वह जापान लौटा, तो उनकी पहली मुलाकात के पांच साल बाद भी वह हितोमी को ढूंढ़ नहीं पाया। इसकी वजह एक साथ ख़ुशी और दिल टूटने वाली थी। हितोमी एक गायन प्रतियोगिता में शामिल हुई थी, उसने रिकॉर्डिंग का पेशेवर अनुबंध जीता था और अब एक गायिका के तौर पर देशभर में दौरे कर रही थी। उसके मैनेजर और मां ने मिलकर कॉक्स को उससे मिलने से रोक दिया। उनका मानना था कि हितोमी की पेशेवर ज़िम्मेदारियां थीं और कॉक्स की मौजूदगी से उनमें मुश्किल पैदा होगी। यह ख़बर कॉक्स के लिए किसी शारीरिक चोट जैसी थी। वह एक विदेशी देश में अकेला रह गया था, उस रिश्ते से कटकर जिसे फिर पाने के लिए उसने महासागर पार किया था।

यह समझकर कि मियाज़ाकी में उसका स्वागत नहीं है, कॉक्स टोक्यो में रहने लगा और अपनी बातचीत बेहतर करने के लिए जापानी भाषा स्कूल में दाख़िला लिया। अपना गुज़ारा करने के लिए उसने पब, पचिंको पार्लर और जिम में कई तरह की नौकरियां कीं। वह ख़ामोशी टूटने का इंतज़ार और उम्मीद करता रहा। जापान के शहरों में आम पचिंको पार्लर मशीनों से चलने वाले जुए के अड्डे थे। वहां और जिम में काम से उसे पढ़ाई के दौरान आमदनी होती रही, लेकिन उसका जीवन धैर्य और अनिश्चितता के बीच ठहर-सा गया।

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शिनागावा स्टेशन पर फिर मुलाकात

फिर एक साझा दोस्त का फ़ोन आया और अचानक सब बदल गया। उसने बस इतनी-सी, मगर ज़िंदगी बदल देने वाली ख़बर दी: हितोमी टोक्यो में है और मिलना चाहती है। उन्होंने टोक्यो के मध्य में एक बड़े परिवहन केंद्र शिनागावा स्टेशन के एक कॉफ़ी शॉप में मिलने का तय किया। बीते सालों ने दोनों को बदल दिया था। हितोमी अब बीस की उम्र के आखिरी पड़ाव में थी। उसकी खूबसूरती और सौम्य अंदाज़ बरकरार था, लेकिन पेशेवर अनुभवों का बोझ भी उसके साथ था। कॉक्स अब वह विदेशी नहीं रहा था जिसे जापानी नहीं आती थी। अब उसकी जापानी, हितोमी की अंग्रेज़ी से बेहतर थी। यह बदलाव उसे हैरान भी कर गया और अच्छा भी लगा।

उनकी मुलाकात के बाद रिश्ता तेज़ी से फिर खिल उठा। जबरन हुई सालों की जुदाई ने उनके जुड़ाव को कम नहीं किया था। उलटे, मुश्किलों ने उनके यक़ीन को और पक्का किया था। कॉक्स के मुताबिक, वे एक-दूसरे के प्यार में पागल थे। इस समय तक दोनों तीस साल के हो चुके थे। 1980 के दशक के जापानी सामाजिक माहौल में इस उम्र का ख़ास महत्व था। बताया जाता है कि हितोमी की मां ने यह देखते हुए कि उनकी बेटी ऐसी उम्र के करीब पहुंच रही थी जहां परंपरागत रूप से शादी की संभावनाएं घटने लगती थीं, मान लिया कि इस उम्र में उससे कोई और शादी नहीं करेगा। ख़त जलाने और फ़ोन कॉल रोकने वाला विरोध आखिरकार व्यावहारिक स्वीकृति में बदल गया।

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थेम्स में शादी

1990 में, कोरिया जाने वाली उस नौका पर पहली मुलाकात के सात साल बाद, कॉक्स और हितोमी ने न्यूज़ीलैंड के थेम्स शहर के एक ख़ूबसूरत पुराने चर्च में शादी की। इस समारोह में दो संस्कृतियों का मेल था, जिसने कॉक्स के छोटे-से गृहनगर के लोगों का ध्यान खींचा। हितोमी ने शादी के समारोह में पश्चिमी शैली का पारंपरिक सफ़ेद जोड़ा पहना, फिर दावत के लिए औपचारिक किमोनो पहन लिया। उसके इस अंदाज़ ने स्थानीय समुदाय में सबका ध्यान खींचा। उसकी मां भी किमोनो पहनकर आईं, जो उस रिश्ते की पूरी स्वीकृति का संकेत था जिसे रोकने के लिए वह कभी संघर्ष कर चुकी थीं।

कॉक्स के माता-पिता ने अपनी नई बहू का गर्मजोशी से स्वागत किया, हालांकि उनके प्यार भरे अंदाज़ में एक चेतावनी भी छिपी थी। शादी के दिन उन्होंने अपने बेटे को अलग ले जाकर मज़ाकिया, लेकिन गंभीर अंदाज़ में कहा:

अगर तुमने यह रिश्ता बिगाड़ा, तो घर लौटने की ज़रूरत नहीं!

उनकी बात ने उस सच्चाई को स्वीकार किया जिसे वहां मौजूद हर कोई देख सकता था: हितोमी ने सिर्फ़ केरी का नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार का दिल जीत लिया था। यह चेतावनी एक आशीर्वाद भी थी और ज़िम्मेदारी भी। यह उस अनमोल रिश्ते की अहमियत को जताती थी जिसे बचाने के लिए उन्होंने संघर्ष किया था।

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चालीस साल का साथ और आख़िरी विदाई

दोनों ने जापान में साथ अपना जीवन बसाया, दो बेटों की परवरिश की और शादी, माता-पिता बनने तथा उम्र बढ़ने की स्वाभाविक चुनौतियों में एक-दूसरे का साथ दिया। उनकी साझेदारी चार दशक चली। इस दौरान जापान आर्थिक महाशक्ति बना, फिर ठहराव के दौर से गुज़रा और आधुनिक युग में दाख़िल हुआ। कॉक्स का कहना है कि इन तमाम बदलावों के बीच उसकी नज़र कभी हितोमी से नहीं हटी। हर कमरे में, हर उम्र में, उसे वही वहां मौजूद सबसे ख़ूबसूरत महिला लगती थी।

कॉक्स ने जब अपनी कहानी लोगों के साथ साझा की, उससे साढ़े तीन साल पहले हितोमी का निधन हो चुका था। उनके जीवन की कहानी सुनाते हुए वह इस बात के लिए आभार जताता है कि जबरन हुई जुदाई और ख़ामोशी के सालों बाद वे फिर एक-दूसरे को पा सके। दोनों हमेशा मानते थे कि क़िस्मत ने उस नौका पर उनकी मुलाकात तय की थी। संयोग से हुई वह यात्रा उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल गई। अगर उनके हाथ में होता, तो वे कई साल पहले शादी कर लेते और लंबी जुदाई का दर्द नहीं झेलना पड़ता। फिर भी भाषा की बाधाओं, माता-पिता के विरोध, पेशेवर उलझनों और भौगोलिक दूरी के बीच उनके रिश्ते का टिके रहना इस बात का सबूत है कि उनका जुड़ाव आम हालात से परे था।

मुख्य बातें

  • केरी कॉक्स की हितोमी से जनवरी 1983 में जापान से कोरिया जा रही नौका पर मुलाकात हुई। उसने यात्रा का खर्च जुटाने के लिए सामान खरीदने-बेचने की सलाह दी।
  • दोनों को भाषा की बाधा, हितोमी की मां के विरोध और पांच साल की जुदाई जैसी बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इस दौरान हितोमी पेशेवर गायिका बन गई।
  • 1983 से 1988 के बीच हितोमी की मां ने उनके प्रेम-पत्र जला दिए और फ़ोन कॉल रोक दिए। हितोमी के रिकॉर्ड लेबल के मैनेजर ने भी संपर्क होने नहीं दिया।
  • सालों की जुदाई के बाद 1988 में टोक्यो के शिनागावा स्टेशन पर दोनों फिर मिले और ख़ामोशी के बावजूद उनका रिश्ता दोबारा जुड़ गया।
  • पहली मुलाकात के सात साल बाद, 1990 में दोनों ने न्यूज़ीलैंड के थेम्स में शादी की। हितोमी ने सफ़ेद जोड़ा और पारंपरिक किमोनो, दोनों पहने।
  • जापान में दोनों ने शादी के चालीस साल साथ बिताए और दो बेटों की परवरिश की। कहानी प्रकाशित होने से साढ़े तीन साल पहले हितोमी का निधन हो गया।
  • कॉक्स अपनी कामयाबी का श्रेय क़िस्मत को देता है। उसका कहना है कि हालात साथ देते तो वे पहले ही शादी कर लेते।
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