कंबोडिया में घोटाला केंद्रों पर कार्रवाई से मानवीय संकट, तस्करी के हजारों पीड़ित अब भी फंसे

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कंबोडिया में घोटाला केंद्रों पर कार्रवाई से मानवीय संकट, तस्करी के हजारों पीड़ित अब भी फंसे

टूटे हुए तंत्र की मानवीय कीमत

मध्य अफ्रीका के एरिक अपने देश में जारी संघर्ष से भागकर आए थे। कंबोडिया के कुख्यात साइबर घोटाला केंद्रों में से एक से बच निकलने के बाद उन्होंने अपनी आपबीती कुछ यूं बयान की:

विषय-सूची
  1. टूटे हुए तंत्र की मानवीय कीमत
  2. सड़कों पर उमड़ा पलायन
  3. घोटाला कारखानों के भीतर
  4. एक्सएक्सएल कार्रवाई: असली बदलाव या राजनीतिक दिखावा?
  5. तंत्रगत नाकामी से पीड़ित असुरक्षित
  6. दोबारा तस्करी का लगातार खतरा
  7. मुख्य बिंदु

मैं युद्ध से भाग रहा था, और फिर एक और युद्ध में पहुंच गया।

कंबोडिया में फंसे हजारों विदेशी नागरिक अब इसी भयावह हकीकत का सामना कर रहे हैं। एरिक का सफर तब शुरू हुआ, जब उन्हें प्रशासनिक काम के लिए हर महीने 2,000 डॉलर वेतन का वादा करने वाला ईमेल मिला। हिंसा से बचते हुए महीनों तक बेहद अभाव में रहने के बाद यह प्रस्ताव उन्हें उम्मीद की किरण लगा। पिछले साल के अंत में नोम पेन्ह पहुंचने पर, किसी कार्यालय के बजाय भर्ती करने वाले लोग उन्हें सीधे थाई सीमा के पास एक किलेबंद परिसर में ले गए।

उस परिसर में प्रबंधकों ने एरिक को ऑनलाइन धोखाधड़ी के काम में लगा दिया। इन गिरोहों का निशाना दुनिया भर के लोग थे, जिन्हें प्रेम संबंधों के नाम पर ठगी और फर्जी निवेश योजनाओं में फंसाया जाता था। जब एरिक ने एक संभावित शिकार को चेताने की कोशिश की कि उसके साथ धोखाधड़ी हो रही है, तो परिसर के सरगनाओं को इसका पता चल गया और उन्होंने उन्हें बुरी तरह पीटा। बाद में उन्होंने बताया, "उन्होंने मुझे इस हद तक पीटा कि मुझे लगा, शायद मैं मर जाऊंगा।" अगले कुछ हफ्तों में उन्होंने दूसरे कामगारों पर गंभीर अत्याचार और लोगों के रहस्यमय ढंग से गायब होने की घटनाएं देखीं। उनका एक सहकर्मी आत्महत्या की आशंका में खिड़की से कूद गया और फिर कभी दिखाई नहीं दिया।

एरिक को भागने का पहला मौका थाईलैंड और कंबोडिया के बीच साझा सीमा को लेकर हुई सैन्य झड़पों के दौरान अचानक मिला। अफरातफरी के बीच वह भाग निकले, लेकिन तस्करों ने जल्द ही उन्हें फिर पकड़ लिया और दूसरे परिसर में ले गए। वहां एक और महीने कैद रहने के बाद, जनवरी के मध्य में वह आखिरकार दोबारा भाग निकले। आज एरिक कंबोडिया में बिना पासपोर्ट, पैसे या परिवार के संपर्कों के फंसे हैं। वह लगातार डर में जीते हुए ऐसे किसी भी देश में नई जिंदगी शुरू करने का सपना देखते हैं, जहां उन्हें जगह मिल सके। उन्हें यह भी नहीं पता कि उनके घरवाले युद्ध में बच पाए या नहीं।

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सड़कों पर उमड़ा पलायन

एरिक उन हजारों तस्करी पीड़ितों में से एक हैं, जिन्हें कंबोडिया के आकर्षक साइबर घोटाला उद्योग पर सरकार की अचानक कार्रवाई के बाद शहरों की सड़कों पर बेसहारा छोड़ दिया गया है। देश भर के परिसरों से कामगारों की सामूहिक रिहाई ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसे एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मानवीय आपदा बताया है। नोम पेन्ह, सिहानुकविल, कम्पोत और सिएम रीप में एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और यूरोप के लोग सूटकेस खींचते हुए सड़कों पर भटक रहे हैं या सार्वजनिक पार्कों में सो रहे हैं। वे भारी दबाव झेल रहे दूतावासों से मदद की गुहार लगा रहे हैं।

यह संकट तब भड़का, जब कंबोडियाई अधिकारियों ने चीनी उद्योगपति चेन झी को गिरफ्तार किया। अमेरिकी न्याय विभाग ने उन्हें विशाल साइबर धोखाधड़ी साम्राज्य का सरगना बताया था। प्रिंस ग्रुप समूह के संस्थापक चेन को जनवरी की शुरुआत में चीन प्रत्यर्पित कर दिया गया, जिससे घोटाला उद्योग में दहशत फैल गई। नौ दिन बाद चीन ने चेन से जुड़े भगोड़ों को आत्मसमर्पण करने पर रियायत देने की पेशकश की। इसके बाद परिसरों के संचालकों ने तस्करी के जरिए लाए गए कामगारों को छिपाने के आरोप में पकड़े जाने से बचने के लिए अचानक अपने दरवाजे खोल दिए और बड़ी संख्या में लोगों को छोड़ दिया।

विस्थापन का पैमाना चौंकाने वाला है। इंडोनेशियाई दूतावास ने बताया कि जनवरी के मध्य से महीने के अंत तक 3,400 से अधिक नागरिकों ने कांसुलर सहायता मांगी और रोजाना 200 से ज्यादा लोग पहुंच रहे थे। युगांडा और घाना के अधिकारियों ने बताया कि उनके लगभग 300-300 नागरिक वहां फंसे हैं, जबकि केन्या ने मदद की जरूरत वाले 200 से अधिक नागरिकों की सूचना दी। इनमें से कई लोगों के पास पासपोर्ट, वैध वीजा या बुनियादी जरूरतों के लिए पैसे नहीं हैं। चीन और इंडोनेशिया ने अपने नागरिकों के लिए अस्थायी आवास की व्यवस्था पर बातचीत की, लेकिन कंबोडिया में राजनयिक प्रतिनिधित्व न रखने वाले अफ्रीकी देशों के पीड़ितों को संसाधनों की कमी का हवाला देकर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने लौटा दिया। अब उनमें से कई फुटपाथों पर सोते हैं या बिना दस्तावेज वाले लोगों को जगह देने वाले सस्ते गेस्टहाउसों में भीड़ लगाते हैं। वे आव्रजन नियमों का उल्लंघन करने वालों की तलाश में पुलिस की जांच के बीच डर में जी रहे हैं।

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घोटाला कारखानों के भीतर

इन पीड़ितों की बेबसी समझने के लिए कंबोडिया के घोटाला परिसरों की औद्योगिक पैमाने की भयावहता को समझना जरूरी है। ये परिसर, जिन्हें अक्सर सिहानुकविल जैसे शहरों और थाईलैंड के पास सीमावर्ती कस्बों में पुराने कैसीनो और होटलों से बनाया गया है, जेल जैसे श्रम शिविरों की तरह काम करते हैं। यहां आपराधिक गिरोह तस्करी के जरिए लाए गए कामगारों से जटिल ऑनलाइन धोखाधड़ी करवाते हैं। प्रेम संबंधों के नाम पर ठगी, फर्जी क्रिप्टोकरेंसी निवेश और 'पिग बुचरिंग' योजनाओं के जरिए इन कार्रवाइयों से सालाना 12 अरब से 19 अरब डॉलर तक की कमाई होती है। इन योजनाओं में पीड़ितों से महीनों दोस्ती गांठने के बाद उन्हें आर्थिक रूप से लूटा जाता है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल के शोधकर्ताओं ने 50 से अधिक परिसरों में गुलामी जैसी स्थितियों का दस्तावेजीकरण किया। कामगार आम तौर पर सोशल मीडिया पर ऊंचे वेतन और स्विमिंग पूल समेत आलीशान सुविधाओं का वादा करने वाले विज्ञापनों का जवाब देकर वहां पहुंचते हैं। परिसर में दाखिल होने के बाद उन्हें कांटेदार तारों की बाड़, बिजली के डंडे और बंदूकें लिए सशस्त्र सुरक्षाकर्मी तथा हर गतिविधि पर नजर रखने वाले निगरानी कैमरे मिलते हैं। पीड़ित बताते हैं कि उन्हें एक परिसर से दूसरे परिसर में बेचा जाता है या कहा जाता है कि उन्हें श्रम करके अपना कर्ज चुकाना होगा। जो लोग ठगी के तय लक्ष्य पूरे नहीं कर पाते या अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करते हैं, उन्हें यातना देने के लिए बने अंधेरे कमरों में ले जाया जाता है।

हाल के हफ्तों में भागे 35 पीड़ितों से जुटाई गई गवाही में वीभत्स अत्याचारों का खुलासा हुआ है। कई महिलाओं ने परिसर के प्रबंधकों द्वारा बलात्कार किए जाने की बात कही; उनमें से कम से कम दो यौन हिंसा के कारण गर्भवती हो गईं। अन्य पीड़ितों ने बताया कि उन्होंने एक व्यक्ति की उंगली काटे जाते और भागने की कोशिश कर रहे दूसरे व्यक्ति का गला काटे जाते देखा। धातु की छड़ों और बिजली के झटके देने वाले डंडों से पिटाई आम थी। व्यवस्थित रूप से इलाज से वंचित किए जाने के कारण ऐसी मौतें हुईं जिन्हें रोका जा सकता था। डेलिलाह नाम की एक पीड़ित ने एमनेस्टी इंटरनेशनल को बताया कि उनके परिसर में इतनी मौतें हुईं कि कामगारों ने शवों को स्वदेश भेजने में मदद के लिए पैसे इकट्ठा किए, लेकिन प्रबंधकों ने बीमार लोगों को इलाज देने से इनकार कर दिया। उन्होंने बताया, "हमें जबरन बाहर निकलना पड़ा क्योंकि एक आदमी बीमार है और वह मरना नहीं चाहता।" उन्होंने कहा कि भागते समय सुरक्षाकर्मियों ने हवा में गोलियां चलाईं।

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एक्सएक्सएल कार्रवाई: असली बदलाव या राजनीतिक दिखावा?

कंबोडियाई अधिकारियों ने अपनी कार्रवाई को अतीत से निर्णायक दूरी बनाने वाला कदम बताया है। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता टच सोखाक ने "एक्सएक्सएल" अभियान की घोषणा करते हुए अप्रैल तक कंबोडिया की धरती से ऑनलाइन घोटालों का पूरी तरह सफाया करने की समयसीमा तय की। अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने देश भर में 190 ठिकानों पर लगभग 200 घोटाला केंद्र बंद किए, संगठित अपराध से जुड़े 173 वरिष्ठ लोगों को गिरफ्तार किया और हाल के हफ्तों में 11,000 से अधिक विदेशी कामगारों को निर्वासित किया। सरकार ने सिहानुकविल के एक खाली परिसर में मीडिया को दुर्लभ रूप से प्रवेश दिया। वहां कंप्यूटर हटाकर कमरे खाली कर दिए गए थे, लेकिन बाकी ढांचा काफी हद तक जस का तस था।

हालांकि, विश्लेषकों और मानवाधिकार संगठनों को संदेह है कि ये छापे वास्तविक नीतिगत बदलाव का संकेत हैं या अंतरराष्ट्रीय दबाव के जवाब में की गई सोची-समझी कार्रवाई। अमेरिका और ब्रिटेन ने हाल ही में दक्षिण-पूर्व एशिया के साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क पर अब तक के अपने सबसे बड़े प्रतिबंध लगाए। उन्होंने चेन झी के प्रिंस ग्रुप को निशाना बनाया और 15 अरब डॉलर मूल्य के बिटकॉइन जब्त करने की कार्रवाई शुरू की, जो अमेरिकी न्याय विभाग के इतिहास में इस तरह की सबसे बड़ी कार्रवाई है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय ने पूरे क्षेत्र के नेटवर्क पर प्रतिबंधों की घोषणा की, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया में क्रिप्टोकरेंसी धोखाधड़ी से निपटने के लिए डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया में नया स्कैम सेंटर स्ट्राइक फोर्स बनाया गया।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एशिया सेंटर में अतिथि फेलो और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क के शोधकर्ता जैकब सिम्स का तर्क है कि मौजूदा कार्रवाई सबसे ताकतवर अभिजात वर्ग को निशाना बनाने से बच रही है। सिम्स ने कहा, "इनमें से किसी भी छापे में बड़े, चर्चित घोटाला परिसरों को निशाना न बनाया जाना ही असल बात है। यह बेहद सुनियोजित अभियान है, जिसका उद्देश्य निर्णायक कार्रवाई का आभास पैदा करना और साथ ही उद्योग के मूल ढांचे तथा इसमें शामिल अभिजात वर्ग के हितों को बचाए रखना है।" सिम्स ने उद्योग में कथित मिलीभगत के आरोप में प्रधानमंत्री हुन मानेत के चचेरे भाई हुन तो समेत 28 सरकारी अधिकारियों और कारोबारियों के खिलाफ अभियोग और प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है। खबरों के मुताबिक पोइपेट और कोह कोंग के परिसर अब भी चल रहे हैं, जबकि मैदानी पर्यवेक्षकों का कहना है कि छापों के दौरान पोइपेट में असामान्य रूप से शांति बनी रही। छापेमारी वाले परिसरों के भौतिक ढांचे की सुरक्षा अब भी की जा रही है और उन्हें फिर से चालू किया जा सकता है। इससे संकेत मिलता है कि दबाव कम पड़ने पर उद्योग तेजी से दोबारा शुरू हो सकता है।

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तंत्रगत नाकामी से पीड़ित असुरक्षित

कार्रवाई की खबरें सुर्खियां बन रही हैं, लेकिन मानवीय मदद का तंत्र चरमरा गया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि कंबोडियाई अधिकारी तस्करी के पीड़ितों की पहचान करने या उन्हें संरक्षण देने में नाकाम हो रहे हैं। इसके बजाय वे भागे हुए कामगारों को आव्रजन नियमों का उल्लंघन करने वाला मानते हैं, जिन पर जुर्माना लगाया जा सकता है और जिन्हें हिरासत में लिया जा सकता है। दस्तावेजों की जांच के लिए पुलिस नियमित रूप से होटलों और घरों का निरीक्षण करती है, जिससे पीड़ित गिरफ्तारी के डर में जीते हैं। खबरों के मुताबिक, संवेदनशील प्रवासियों की मदद का दायित्व रखने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन ने बचावकर्मियों, जिनमें आधुनिक गुलामी की शोधकर्ता लिंग ली भी शामिल हैं, की बार-बार की अपीलों के बावजूद पीड़ितों के समूहों को सहायता देने से इनकार कर दिया है। ली ने सवाल किया, "अगर पीड़ितों की रक्षा करना जिन संस्थानों के दायित्व में है, वे तस्करी के पीड़ितों को सुरक्षा, आपात सहायता या सुरक्षित ठिकाना तक नहीं दे सकते, तो जमीन पर उनकी भूमिका क्या है?"

कई देशों के दूतावास मदद की मांगों की भारी संख्या से जूझ रहे हैं। इंडोनेशिया और चीन ने अपने नागरिकों के लिए अस्थायी आवास की व्यवस्था कर ली, लेकिन दूसरे देशों के पास मदद के लिए पर्याप्त राजनयिक क्षमता नहीं है। केन्या ने वीजा अवधि से अधिक ठहरने के जुर्माने में छूट हासिल की, लेकिन पीड़ितों को अब भी घर लौटने की उड़ानों के लिए पैसे जुटाने हैं। जिन देशों के कंबोडिया में दूतावास नहीं हैं, वहां के पीड़ितों का कहना है कि उन्हें नौकरशाही की अड़चनों में फंसाया जा रहा है और सहायता संगठन संसाधनों की कमी का हवाला देकर उन्हें लौटा रहे हैं। गैर-सरकारी संगठनों के कामकाज के लिए मिलने वाली धनराशि में व्यापक कटौती के बाद यह स्थिति बनी है।

तस्करी-विरोधी कंबोडिया की राष्ट्रीय समिति की स्थायी उपाध्यक्ष चाउ बुन एंग ने सरकार के तरीके का बचाव करते हुए कहा कि जांच की प्रक्रियाएं मौजूद हैं, लेकिन तस्करी के मामलों की विस्तृत जांच को प्राथमिकता देने से हिरासत केंद्रों पर दबाव बढ़ेगा। उन्होंने नागरिकों को स्वदेश भेजने के लिए उनके मूल देशों से साझा जिम्मेदारी निभाने की अपील की। हालांकि, मानवाधिकार समूह लिकाडो के उपनिदेशक आम सैम आथ ने कहा कि कार्रवाई उसके मानवीय परिणामों से निपटने की पर्याप्त तैयारी के बिना शुरू की गई। इससे हजारों लोग अफरातफरी में इमारतों के बीच भटकते रह गए और पीड़ितों तथा अपराधियों के बीच उचित जांच के जरिए फर्क नहीं किया गया।

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दोबारा तस्करी का लगातार खतरा

फंसे हुए पीड़ितों के लिए खतरा बेघर होने और भूख से कहीं आगे तक फैला है। उद्योग पर नजर रखने वालों का कहना है कि घोटाला गिरोह फंसे विदेशी नागरिकों में से ही कामगारों की भर्ती कर रहे हैं और उनकी मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। टेलीग्राम और अन्य मंचों पर ऐसे लोगों को निशाना बनाकर नौकरी के विज्ञापन फैलाए जा रहे हैं, जिनके पास घर लौटने की उड़ान के पैसे नहीं हैं। इनमें जल्दी हवाई किराया कमाने के कथित अवसरों का वादा किया जाता है। ये प्रस्ताव उन सदमे से गुजरे लोगों को फिर से गुलामी में धकेलने का सीधा रास्ता हैं, जो पहले ही यातना और जबरन श्रम झेल चुके हैं।

भौगोलिक निगरानी से पता चलता है कि कुछ परिसर खाली हो गए हैं, लेकिन सीमावर्ती इलाकों में घोटाले का काम जारी है। अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध के खिलाफ वैश्विक पहल के मुताबिक, आपराधिक गिरोह छोटे समूहों में बंटकर, रात में ठिकाने बदलकर और कुछ समय के लिए काम रोककर कार्रवाई से बचने के तरीके अपना रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के बाहर अफ्रीका, दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और प्रशांत द्वीपों में भी ऐसे ही परिसर चलाने वाले गिरोह पाए गए हैं। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि कंबोडिया में कम से कम 100,000 लोग घोटाला अभियानों में फंसे हुए हैं और म्यांमार में कम से कम 120,000 अन्य लोग फंसे हैं। इस क्षेत्र का यह उद्योग सालाना लगभग 64 अरब डॉलर कमाता है।

एरिक जैसे पीड़ितों के लिए मानसिक आघात शारीरिक खतरे को और बढ़ा देता है। कई लोगों ने हत्याएं, आत्महत्याएं और व्यवस्थित यातना देखी है। स्वदेश वापसी का इंतजार करते समय उन्हें तत्काल मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सुरक्षित आश्रय की जरूरत है। इसके बजाय, उन्हें फिर से उन्हीं परिसरों में तस्करी किए जाने का खतरा है जहां से वे अभी भागे हैं, या ऐसी सड़कों पर रात बितानी पड़ती है जहां पुलिस बिना दस्तावेज वाले विदेशियों की तलाश करती है। आपातकालीन दस्तावेज, हवाई टिकट के लिए धन और अस्थायी सुरक्षित आवास मुहैया कराने के वास्ते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित हस्तक्षेप के बिना, उन आपराधिक नेटवर्कों का पलड़ा भारी रहेगा जो इंसानी पीड़ा से मुनाफा कमाते हैं।

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मुख्य बिंदु

  • कंबोडिया के घोटाला परिसरों से भागे तस्करी के हजारों पीड़ित सरकारी कार्रवाई के बाद पासपोर्ट, पैसे और मानवीय सहायता के बिना सड़कों पर फंसे हैं।
  • इस संकट की शुरुआत चीनी उद्योगपति चेन झी की गिरफ्तारी और प्रत्यर्पण से हुई, जिन पर अरबों डॉलर का साइबर धोखाधड़ी साम्राज्य चलाने का आरोप है। इसके बाद घबराए परिसर संचालकों ने बड़ी संख्या में कामगारों को छोड़ दिया।
  • इंडोनेशिया, युगांडा, घाना, केन्या और चीन समेत 66 से अधिक देशों के पीड़ित सार्वजनिक पार्कों में सो रहे हैं और दूतावासों के बाहर भीड़ लगा रहे हैं। कंबोडियाई अधिकारी उन्हें तस्करी के पीड़ितों के बजाय आव्रजन नियमों का उल्लंघन करने वाला मान रहे हैं।
  • हाल में भागे लोगों की गवाही के मुताबिक परिसरों में व्यवस्थित यातना, बलात्कार, हत्या और गुलामी जैसी स्थितियां थीं। कुछ पीड़ितों ने यौन हिंसा के कारण गर्भवती होने और इलाज से वंचित किए जाने के कारण लोगों को मरते देखने की बात कही।
  • विश्लेषकों ने "एक्सएक्सएल" कार्रवाई की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि राजनीतिक अभिजात वर्ग से जुड़े बड़े परिसर अब भी अछूते हैं, जबकि छोटे केंद्रों पर छापे पड़ रहे हैं। इससे संदेह है कि यह अभियान उद्योग को खत्म करने की वास्तविक कोशिश के बजाय दिखावा हो सकता है।
  • अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन और कई दूतावास पर्याप्त आपात सहायता देने में नाकाम रहे हैं। इस बीच घोटाला गिरोह फंसी आबादी से सक्रिय रूप से भर्ती कर रहे हैं, जिससे पीड़ितों को दोबारा तस्करी का खतरा है।
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