शहरी खनन क्रांति आकार ले रही है
नोएडा, भारत -- भारत के व्यस्त इलेक्ट्रॉनिक्स बाजारों और औद्योगिक गलियारों की सतह के नीचे एक छिपा हुआ संसाधन है, जिसे सरकार अब रणनीतिक सोना मानती है। देश में हर साल लगभग 1.75 मिलियन टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा और 60,000 टन इस्तेमाल की जा चुकी लिथियम-आयन बैटरियां पैदा होती हैं। अधिकारियों के अनुसार, यह एक ऐसी अप्रयुक्त शहरी खदान है जिसमें लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और दुर्लभ मृदा तत्व मौजूद हैं, जो हरित ऊर्जा की ओर बदलाव के लिए जरूरी हैं।
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सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंत्रिमंडलीय समिति ने 15 अरब रुपये (166 मिलियन डॉलर) की महत्वपूर्ण खनिज पुनर्चक्रण प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी। इसका उद्देश्य इस कचरे को घरेलू आपूर्ति शृंखला की रीढ़ में बदलना है। यह पहल व्यापक राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन का अहम हिस्सा है, जिसका कुल बजटीय आवंटन 163 अरब रुपये है। यह भारत के हालिया खनन इतिहास में औद्योगिक नीति के सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक है।
यह योजना भारत की संसाधन सुरक्षा में एक खास कमी को दूर करने पर केंद्रित है। देश में दुनिया के तीसरे सबसे बड़े दुर्लभ मृदा भंडार हैं और हाल ही में जम्मू-कश्मीर में 5.9 मिलियन टन लिथियम का पता चला है, फिर भी प्रसंस्कृत महत्वपूर्ण खनिजों के लिए भारत लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है। पुनर्चक्रण कार्यक्रम का लक्ष्य सालाना 270,000 टन की पुनर्चक्रण क्षमता विकसित करना है, जिससे हर वर्ष 40,000 टन महत्वपूर्ण खनिजों का उत्पादन हो सके। इससे घरेलू मांग का 10 प्रतिशत तक पूरा हो सकता है और करीब 70,000 प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकते हैं।
आयात पर निर्भरता से मुक्ति
भूराजनीतिक तनावों के कारण वैश्विक व्यापार में बदलाव के बीच महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की कमजोरी गंभीर चिंता बन गई है। देश लिथियम, कोबाल्ट और निकेल की अपनी 100 प्रतिशत जरूरत तथा तांबे की 93 प्रतिशत जरूरत आयात से पूरी करता है। प्रसंस्करण क्षेत्र पर चीन का दबदबा है। वह वैश्विक कोबाल्ट शोधन का लगभग 73 प्रतिशत और लिथियम प्रसंस्करण का 59 प्रतिशत नियंत्रित करता है। इससे बीजिंग को इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों और सौर ढांचे के लिए जरूरी आपूर्ति पर खासा प्रभाव मिलता है।
हाल की आपूर्ति बाधाओं ने इन जोखिमों को उजागर किया है। इंडोनेशिया के निकेल निर्यात प्रतिबंधों और चीन की दुर्लभ मृदा के निर्यात पर समय-समय पर लगाई गई पाबंदियों से पता चला है कि महत्वपूर्ण सामग्रियों का प्रवाह कितनी तेजी से बाधित हो सकता है। 2070 तक शुद्ध-शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लक्ष्य रखने वाले और 2025 में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री दोगुनी होकर 200,000 इकाई होने का अनुमान लगाने वाले देश के लिए खनिज आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करना आर्थिक विकल्प से आगे बढ़कर रणनीतिक जरूरत बन गया है।
पुनर्चक्रण योजना की परियोजना प्रबंधन एजेंसी जवाहरलाल नेहरू एल्युमिनियम रिसर्च डेवलपमेंट एंड डिजाइन सेंटर (JNARDDC) के निदेशक अनुपम अग्निहोत्री ने कहा, "अगर भारत सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाएं चाहता है, तो उसे घरेलू पुनर्चक्रण और पुनर्प्राप्ति क्षमता विकसित करने के लिए अभी कदम उठाने होंगे।"
आपूर्ति सुरक्षा के अलावा, पारंपरिक खनन की तुलना में पुनर्चक्रण के स्पष्ट लाभ हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं के तहत 2050 तक पुनर्चक्रण से तांबे और कोबाल्ट के लिए नए खनन की जरूरत 40 प्रतिशत और लिथियम व निकेल के लिए 25 प्रतिशत तक घट सकती है। यह प्रक्रिया नई खदानों से अयस्क निकालने की तुलना में 2 से 10 गुना अधिक ऊर्जा-कुशल है। इससे भारत के कार्बन उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य को मदद मिलती है और घरेलू विनिर्माताओं की उत्पादन लागत भी कम होती है।
प्रोत्साहन व्यवस्था कैसे काम करती है
वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक चलने वाले छह वर्षीय कार्यक्रम में दोहरी सब्सिडी व्यवस्था है, जिसका मकसद स्थापित औद्योगिक कंपनियों और उभरते स्टार्टअप, दोनों को आकर्षित करना है। प्रतिभागियों को संयंत्र, मशीनरी, उपकरण और संबंधित उपयोगिताओं में निवेश पर 20 प्रतिशत पूंजीगत व्यय सब्सिडी मिल सकती है, बशर्ते वे तय समयसीमा में उत्पादन शुरू करें। समयसीमा के बाद सब्सिडी की दरें घट जाएंगी, ताकि क्षमता समय पर विकसित हो।
पूंजीगत प्रोत्साहनों के साथ परिचालन व्यय सहायता भी दी जाएगी, जो आधार वर्ष के मानकों से अधिक अतिरिक्त बिक्री के आधार पर मिलेगी। पात्र कंपनियों को संचालन के दूसरे वर्ष में परिचालन सब्सिडी का 40 प्रतिशत मिलेगा। बिक्री के निर्धारित लक्ष्य हासिल करने पर बाकी 60 प्रतिशत पांचवें वर्ष में दिया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ निष्क्रिय क्षमता खड़ी करने के बजाय लगातार उत्पादन को प्रोत्साहित करना है।
व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने प्रोत्साहन की अधिकतम सीमा तय की है और कुल आवंटन का एक तिहाई हिस्सा छोटे उद्यमों और नए प्रतिभागियों के लिए रखा है। बड़े पुनर्चक्रकों को कुल 500 मिलियन रुपये (50 करोड़) तक मिल सकते हैं, जिसमें परिचालन व्यय सहायता की सीमा 100 मिलियन रुपये (10 करोड़) है। छोटे प्रतिभागियों को कुल 250 मिलियन रुपये (25 करोड़) तक मिल सकते हैं, जिसमें 50 मिलियन रुपये (5 करोड़) की परिचालन सहायता शामिल है। मंत्रालय ने प्रोत्साहन को केवल वास्तविक खनिज निष्कर्षण करने वाली कंपनियों तक सीमित रखा है। इसमें उन इकाइयों को शामिल नहीं किया गया है जो शोधन पूरा किए बिना केवल "ब्लैक मास" (मूल्यवान धातुओं वाला एक मध्यवर्ती पाउडर) बनाती हैं।
उद्योग अमल की तैयारी में जुटा
योजना के तेजी से शुरू होने पर उद्योग जगत ने पहले ही उल्लेखनीय प्रतिक्रिया दी है। 2 अक्टूबर 2025 को आवेदन शुरू होने के कुछ ही हफ्तों के भीतर 70 से अधिक पुनर्चक्रण कंपनियों ने सरकारी पोर्टल पर पंजीकरण कराया। पात्रता ढांचे के तहत 10 से अधिक कंपनियों को मान्यता मिली। यह शुरुआती उत्साह भारत की मौजूदा पुनर्चक्रण व्यवस्था से बिल्कुल अलग है, जहां केवल 10 से 12 कंपनियां पूरी एंड-टू-एंड R4 पुनर्चक्रण प्रणाली चलाती हैं। ये प्रणाली बैटरी के कबाड़ को सीधे उपयोगी धातुओं में बदल सकती हैं।
JNARDDC ने 21 नवंबर 2025 को हितधारकों की एक परामर्श कार्यशाला आयोजित की, जिसमें स्टार्टअप, प्रौद्योगिकी प्रदाताओं और स्थापित औद्योगिक पुनर्चक्रकों सहित लगभग 30 संभावित लाभार्थी शामिल हुए। एजेंसी ने आवेदकों को पंजीकरण, दस्तावेजीकरण और प्रोत्साहन वितरण की प्रक्रिया में मार्गदर्शन देने के लिए लगातार उपलब्ध रहने वाला हेल्पडेस्क बनाया है। इससे परिचालन दक्षता के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता जाहिर होती है।
योजना के विकास में योगदान देने वाले इंडिया एनर्जी स्टोरेज अलायंस (IESA) के अध्यक्ष देबमाल्य सेन ने कहा, "मंत्रिमंडल का यह परिवर्तनकारी कदम मजबूत चक्रीय अर्थव्यवस्था बनाने, संसाधन सुरक्षा सुनिश्चित करने और पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकियों में नवाचार को बढ़ावा देने की दूरदर्शी प्रतिबद्धता दर्शाता है।"
इसके साथ लागू किए गए व्यापारिक उपायों से नीतिगत ढांचा और मजबूत हुआ है। फरवरी 2025 के केंद्रीय बजट में लिथियम-आयन बैटरी के कबाड़ और सीसा, जस्ता तथा कोबाल्ट पाउडर जैसे महत्वपूर्ण पदार्थों के कचरे पर सीमा शुल्क हटा दिया गया। आयात शुल्क हटने से भारतीय पुनर्चक्रकों को अंतरराष्ट्रीय कच्चे माल के बाजारों तक पहुंच मिलती है और कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ती है। इस बीच, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व ढांचे के तहत घरेलू संग्रह प्रणालियां विकसित हो रही हैं। यह ढांचा इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी निर्माताओं को अपने उत्पादों के उपयोग की अवधि पूरी होने के बाद उनके संग्रह और पुनर्चक्रण का खर्च उठाने के लिए बाध्य करता है।
प्रौद्योगिकी और औपचारिक आपूर्ति शृंखला
फिलहाल भारत का ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक कचरा अनौपचारिक संग्रह नेटवर्क से गुजरता है। ये नेटवर्क केवल अधिक मात्रा में मौजूद तांबा, एल्युमिनियम और सोने जैसी धातुएं निकालते हैं, जबकि दुर्लभ मृदा तत्वों वाले पुर्जे फेंक दिए जाते हैं। नई प्रोत्साहन योजना का उद्देश्य तोड़ने, कुचलने और टुकड़े करने वाली इकाइयों को संगठित पुनर्चक्रण शृंखलाओं से जोड़कर इस व्यवस्था को औपचारिक बनाना है, ताकि अंतिम निष्कर्षण तक महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षित रहें।
स्वदेशी अनुसंधान से खनिज पुनर्प्राप्ति की तकनीकी क्षमता काफी आगे बढ़ी है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की प्रयोगशालाओं ने धातु पुनर्प्राप्ति और शुद्धीकरण के लिए विशिष्ट जल-धातुकर्म प्रक्रियाएं विकसित की हैं। ये अधिक ऊर्जा खपत वाली पायरोमेटलर्जी का विकल्प हैं। पानी पर आधारित ये रासायनिक निष्कर्षण विधियां इस्तेमाल की जा चुकी बैटरियों और इलेक्ट्रॉनिक कचरे में मौजूद जटिल पदार्थों के प्रसंस्करण के लिए खास तौर पर उपयुक्त हैं।
यह योजना खास तौर पर "ब्लैक मास" (कुचली और कतरकर बनाई गई बैटरी सामग्री, जिसमें लिथियम, कोबाल्ट और निकेल होते हैं) को सीमित घरेलू प्रसंस्करण क्षमता के कारण विदेशी शोधनकर्ताओं को निर्यात करने की मौजूदा प्रथा को बदलने पर केंद्रित है। मध्यवर्ती प्रसंस्करण के बजाय खनिजों का पूरा निष्कर्षण करने के लिए प्रोत्साहन देकर सरकार घरेलू स्तर पर मूल्य बनाए रखने और उच्च शुद्धता वाली धातुओं की पुनर्प्राप्ति में तकनीकी विशेषज्ञता विकसित करने की उम्मीद कर रही है।
मध्य प्रदेश स्थित इलेक्ट्रिक दोपहिया निर्माता इनिग्मा ऑटोमोबाइल के संस्थापक अनमोल बोहरे ने कहा, "महत्वपूर्ण खनिजों के पुनर्चक्रण से हमारे उत्पादों की लागत घटेगी। यह अहम कदम चक्रीय अर्थव्यवस्था बनाएगा, रोजगार पैदा करेगा और ईवी उद्योग की स्थिरता सुनिश्चित करेगा।"
अंतरराष्ट्रीय गठबंधन और क्वाड का संदर्भ
चीन के खनिज प्रसंस्करण पर निर्भरता घटाने के व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के अनुरूप भारत घरेलू पुनर्चक्रण को बढ़ावा दे रहा है। जुलाई 2025 में ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका से जुड़े क्वाड (चतुर्भुज सुरक्षा संवाद) ने महत्वपूर्ण खनिज पहल शुरू की। इसमें इलेक्ट्रॉनिक कचरे से खनिजों की पुनर्प्राप्ति और पुनर्प्रसंस्करण को साझा रणनीति के रूप में स्पष्ट प्राथमिकता दी गई। इस साझेदारी का मानना है कि पुनर्चक्रण आपूर्ति शृंखला में बाधाओं के खिलाफ रणनीतिक सुरक्षा देता है और साथ ही चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को कायम रखता है।
संभावित सहयोग में क्वाड का हर सदस्य अपनी अलग क्षमता ला सकता है। ऑस्ट्रेलिया के पास खनिजों के विशाल भंडार हैं, लेकिन पुनर्चक्रण ढांचा सीमित है। 2010 में चीन के दुर्लभ मृदा निर्यात प्रतिबंध के बाद जापान ने द्वितीयक पुनर्प्राप्ति तकनीकों में महारत हासिल की, हालांकि वह अब भी चीन में होने वाले प्रसंस्करण पर निर्भर है। अमेरिका के पास उन्नत शोध संस्थान हैं, लेकिन घरेलू पुनर्चक्रण क्षमता नहीं है। भारत के पास तेजी से बढ़ता विशाल कचरा प्रवाह और तेजी से विकसित होती तकनीकी क्षमता है, हालांकि उसे अपने अनौपचारिक ई-कचरा क्षेत्र की चुनौतियों से निपटना होगा।
नीति विश्लेषक प्रगति पर नजर रखने के लिए "क्वाड पुनर्चक्रण सूचकांक" बनाने, सदस्य देशों में कचरे के वर्गीकरण के मानक तय करने और सार्वजनिक धन, हरित बॉन्ड तथा निजी निवेश को मिलाकर वित्तपोषण मॉडल तैयार करने की सिफारिश करते हैं। यह पहल दिखाती है कि पुनर्चक्रण पर्यावरणीय नियमों के पालन से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता बन गया है।
बजट 2026 और दीर्घकालिक दृष्टि
पुनर्चक्रण योजना भारत के बजट 2026-27 में प्रस्तुत व्यापक संसाधन सुरक्षा ढांचे का हिस्सा है। बजट में खनिज-समृद्ध ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में दुर्लभ मृदा गलियारों की घोषणा की गई। इन तटीय क्षेत्रों में मोनाजाइट रेत है, जिसमें अनुमानित 7.23 मिलियन टन दुर्लभ मृदा ऑक्साइड मौजूद हैं। हालांकि थोरियम की मौजूदगी और परमाणु ऊर्जा संबंधी नियंत्रणों समेत नियामक जटिलताओं के कारण यहां खनन ऐतिहासिक रूप से धीमी गति से आगे बढ़ा है।
नई खदानों और शोधन इकाइयों को चालू होने में एक दशक से अधिक लग सकता है, जबकि पुनर्चक्रण से क्षमता तुरंत बढ़ सकती है। द तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के शोध के अनुसार, अगले दशक में केवल पुनर्चक्रण से ही भारत की मूल दुर्लभ मृदा मांग का 35 प्रतिशत से अधिक पूरा हो सकता है, खासकर जब इलेक्ट्रिक वाहनों की मोटरें और पवन टर्बाइन उपयोग की अवधि पूरी करेंगी। एक इलेक्ट्रिक कार में 1.5 किलोग्राम तक स्थायी दुर्लभ मृदा चुंबक होते हैं, जबकि आधुनिक पवन टर्बाइनों में प्रति मेगावाट क्षमता के लिए लगभग 600 किलोग्राम सामग्री लगती है।
इसके आर्थिक तर्क आपूर्ति सुरक्षा से आगे तक जाते हैं। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि पुनर्चक्रण से पूंजी का देश से बाहर जाना रुकता है और घरेलू ईवी निर्माताओं की विनिर्माण लागत घटती है। सतत विकास के एक विशेषज्ञ ने कहा कि देश में खनिजों का पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग करने से विदेशी मुद्रा में अरबों की बचत होती है, जिसे कार्बन उत्सर्जन घटाने के प्रयासों में लगाया जा सकता है। इससे अंततः भारतीय उपभोक्ताओं के लिए इलेक्ट्रिक वाहन अधिक किफायती होंगे।
इस क्षेत्र पर नजर रखने वाले सतत विकास विशेषज्ञ शुभम ठाकुर ने कहा, "दुनियाभर में जारी टैरिफ युद्ध के बीच घरेलू अर्थव्यवस्था और उत्पादन को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है। अगर हम अपनी ईवी क्रांति और हरित बदलाव को तेज करना चाहते हैं, तो भारत में खनिजों का पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।"
मुख्य बातें
- भारत सरकार ने सितंबर 2025 में 15 अरब रुपये (166 मिलियन डॉलर) की महत्वपूर्ण खनिज पुनर्चक्रण प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी। यह वित्त वर्ष 2030-31 तक चलेगी।
- कार्यक्रम का लक्ष्य सालाना 270,000 टन पुनर्चक्रण क्षमता विकसित करना है, जिससे लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और दुर्लभ मृदा समेत 40,000 टन महत्वपूर्ण खनिजों का उत्पादन होगा।
- इस योजना के लिए 70 से अधिक पुनर्चक्रण कंपनियां पंजीकरण करा चुकी हैं। इसमें 20 प्रतिशत पूंजीगत व्यय सब्सिडी और प्रदर्शन से जुड़ी परिचालन प्रोत्साहन राशि दी जाती है।
- भारत फिलहाल लिथियम, कोबाल्ट और निकेल का 100 प्रतिशत आयात करता है। नई पहल का लक्ष्य शहरी खनन के जरिए आयात पर निर्भरता 10 प्रतिशत घटाना है।
- यह योजना व्यापक राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन को समर्थन देती है और संयुक्त पुनर्चक्रण पहलों के जरिए चीन के खनिज प्रसंस्करण पर निर्भरता घटाने की क्वाड की अंतरराष्ट्रीय रणनीति से मेल खाती है।






