अकेला प्रतिनिधि
जनवरी के आखिर में जब टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स बाय सब्जेक्ट 2026 जारी हुई, तो दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले लोकतंत्र के लिए उसमें चिंताजनक आकलन था। कंप्यूटर विज्ञान, इंजीनियरिंग, व्यवसाय, कानून, मनोविज्ञान और मानविकी समेत 11 विषय क्षेत्रों में एशियाई संस्थानों का वैश्विक शीर्ष 100 में दबदबा रहा। फिर भी भारत केवल एक बार सूची में दिखाई दिया। बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान कंप्यूटर विज्ञान में 96वें स्थान पर रहा और इस प्रतिष्ठित सूची में देश का अकेला प्रतिनिधि बना। सूची में मुख्यभूमि चीन के 120 से अधिक, हांगकांग के 70 से अधिक, जापान के लगभग 40, दक्षिण कोरिया के 35 और सिंगापुर के 30 संस्थान शामिल थे।
विषय-सूची
यह रुझान किसी एक रैंकिंग प्रणाली तक सीमित नहीं है। शंघाई रैंकिंग के नाम से जानी जाने वाली एकेडमिक रैंकिंग ऑफ वर्ल्ड यूनिवर्सिटीज़ 2025 में भारत वैश्विक शीर्ष 500 से पूरी तरह बाहर रहा। हार्वर्ड विश्वविद्यालय लगातार 23वें साल पहले स्थान पर रहा, जबकि चीन के 101 संस्थानों ने इस प्रतिष्ठित समूह में जगह बनाई। ईरान जैसे छोटे देशों को भी सूची में स्थान मिला। विशाल आबादी और सराही गई तकनीकी प्रतिभा के बावजूद भारत का कोई संस्थान इसमें शामिल नहीं था।
ऐतिहासिक संदर्भ देखें तो यह अंतर और स्पष्ट हो जाता है। 2011 में ही क्यूएस एशियन यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स में शीर्ष श्रेणी में चीन के 40 संस्थान थे, जबकि भारत के केवल 11; भारत का सर्वोच्च स्थान पाने वाला संस्थान 36वें नंबर पर था। पंद्रह साल बाद यह अंतर कम होने के बजाय बढ़ गया है, जबकि राजनीतिक बयानबाजी में भारत को "विश्वगुरु" बनाने की आकांक्षा पर जोर बढ़ा है। यह असमानता इस धारणा को चुनौती देती है कि भारत के जनसांख्यिकीय लाभ और अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा स्वाभाविक रूप से वैश्विक शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा में तब्दील हो जाएंगे, खासकर उन एशियाई पड़ोसियों की तुलना में जिन्होंने विकास से जुड़ी ऐसी ही बाधाओं को पार किया है।
बदलता क्षेत्र
पिछले दो दशकों में एशियाई विश्वविद्यालयों का उभार वैश्विक उच्च शिक्षा के सबसे अहम बदलावों में से एक है। टीएचई सब्जेक्ट रैंकिंग्स 2026 में चीन के सात संस्थान अलग-अलग विषयों में वैश्विक शीर्ष 10 में रहे। पेकिंग विश्वविद्यालय पहली बार कंप्यूटर विज्ञान में शीर्ष 10 में पहुंचा, जबकि सिंघुआ विश्वविद्यालय ने भौतिक विज्ञान में इस प्रतिष्ठित श्रेणी में जगह बनाई। इंजीनियरिंग में 30 से अधिक एशियाई विश्वविद्यालय दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में शामिल हैं, जिनमें अधिकांश चीन के हैं। सिंगापुर का नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर और नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी अपने छोटे शहर-राज्य के बावजूद सदियों पुराने पश्चिमी संस्थानों को लगातार टक्कर देते हैं।
यह दबदबा तकनीकी विषयों तक सीमित नहीं है। व्यवसाय और अर्थशास्त्र में चीन के दो विश्वविद्यालय वैश्विक शीर्ष 10 में रहे। शिक्षा अध्ययन, कानून और सामाजिक विज्ञान में हांगकांग और मुख्यभूमि चीन के संस्थानों ने इसी तरह की मजबूती दिखाई। आंकड़े व्यापक उत्कृष्टता की ओर इशारा करते हैं, जो इस पुरानी धारणा को चुनौती देती है कि एशियाई विश्वविद्यालय केवल विज्ञान के कुछ सीमित क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। जापान और दक्षिण कोरिया ने कई विषयों में गहराई और स्थिरता दिखाई, जबकि सिंगापुर अपने छोटे भौगोलिक आकार की तुलना में उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन करता रहा। यह बदलाव वैश्विक ज्ञान सृजन की दिशा में बुनियादी परिवर्तन है, जिसके आने वाले दशकों में नवाचार, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक प्रभाव पर असर होंगे।
रैंकिंग क्या मापती है
भारत की स्थिति समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि ये रैंकिंग वास्तव में किन चीजों का आकलन करती हैं। टाइम्स हायर एजुकेशन के आकलन में 18 प्रदर्शन संकेतक हैं, जिन्हें शिक्षण, शोध, ज्ञान हस्तांतरण और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के आधार पर समूहित किया गया है। एकेडमिक रैंकिंग ऑफ वर्ल्ड यूनिवर्सिटीज़ में शोध प्रकाशनों, नोबेल पुरस्कारों, फील्ड्स मेडल, अत्यधिक उद्धृत शोधकर्ताओं और प्रमुख वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है। ये पद्धतियां नामांकन संख्या या स्नातकों की तादाद के बजाय लगातार उच्च प्रभाव वाले शोध और वैश्विक सहयोग को पुरस्कृत करती हैं।
इन खास मापदंडों पर भारत का प्रदर्शन अन्य क्षेत्रों की उपलब्धियों से बिल्कुल उलट है। क्यूएस एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स 2026 में भारतीय संस्थान प्रति संकाय सदस्य प्रकाशित शोध पत्रों के मामले में महाद्वीप में सबसे आगे हैं; इस मापदंड पर शीर्ष 30 में भारत के 16 संस्थान हैं। पीएचडीधारी कर्मचारियों के अनुपात में भी भारत आगे है और एशिया के शीर्ष 100 में उसके 39 विश्वविद्यालय हैं। इससे संकेत मिलता है कि समस्या जरूरी नहीं कि शोधकर्ताओं की व्यक्तिगत गुणवत्ता या उत्पादकता में हो, बल्कि संस्थानों के आकार, वित्तपोषण के संकेंद्रण और शोध की मात्रा को वैश्विक पहचान तथा प्रभाव में बदलने की क्षमता में है।
एशिया की सफलता की रणनीति
रैंकिंग में ऊपर पहुंचे देशों में कुछ समान विशेषताएं हैं, जो उन्हें भारत के तरीके से अलग करती हैं। चीन चुनिंदा संस्थानों पर संसाधन केंद्रित करता है और सीमित बजट को सैकड़ों परिसरों में बांटने के बजाय सिंघुआ, पेकिंग विश्वविद्यालय, झेजियांग और फुदान में लगातार निवेश करता है। सिंगापुर भी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर और नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के साथ ऐसी ही रणनीति अपनाता है। यह केंद्रित निवेश ऐसे शोध तंत्र तैयार करता है जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।
संकाय भर्ती की नीतियों में भी बड़ा अंतर है। शीर्ष एशियाई विश्वविद्यालयों में विविध शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले प्रोफेसर हैं, जिन्होंने अग्रणी वैश्विक संस्थानों से डॉक्टरेट की है; यहां संयुक्त अंतरराष्ट्रीय नियुक्तियां और सीमापार सहज आवाजाही भी आम है। इससे शोध कार्यक्रम वैश्विक नेटवर्क से जुड़े रहते हैं। इसके उलट, भारतीय विश्वविद्यालयों में वेतन की कठोर सीमाएं, धीमी भर्ती प्रक्रिया, वीजा संबंधी अड़चनें और भारी प्रशासनिक नियंत्रण अंतरराष्ट्रीय भर्ती में बाधा बनते हैं।
उद्योगों के साथ जुड़ाव भी एक और लाभ देता है। दक्षिण कोरिया के केएआईएसटी और पोस्टेक, सिंगापुर के एनटीयू तथा चीन के सिंघुआ जैसे संस्थानों की कंपनियों के साथ गहरी साझेदारियां हैं। कंपनियां शोध प्रयोगशालाओं को वित्त देती हैं, संकाय पदों के लिए स्थायी निधि देती हैं और पेटेंट विकास में मदद करती हैं। इन संबंधों से अकादमिक शोध को व्यावसायिक अनुप्रयोगों और नवाचार में बदला जाता है। भारतीय उद्योगों से जुड़ाव अक्सर सतही रहता है और अतिथि व्याख्यानों तथा समझौता ज्ञापनों तक सीमित होता है, जिन पर आगे बहुत कम काम होता है।
भारत की संरचनात्मक चुनौतियां
भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली ने केंद्रित उत्कृष्टता के बजाय पहुंच और विस्तार को प्राथमिकता दी है। अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में शामिल विश्वविद्यालयों की कुल संख्या के मामले में देश अब दुनिया में दूसरे स्थान पर है; उससे आगे केवल अमेरिका है। यह व्यापकता गहराई की कमी को छिपाती है। चीन के 100 से अधिक विश्वविद्यालय एआरडब्ल्यूयू के शीर्ष 500 में हैं, जबकि भारत का एक भी नहीं। टीएचई वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स 2026 की समग्र सूची के शीर्ष 100 में कोई भारतीय संस्थान नहीं है। देश में भारतीय विज्ञान संस्थान 201-250 के समूह में सबसे आगे है।
इस व्यवस्था में प्रतिभा पलायन की समस्या भी है, जिसे एशियाई प्रतिस्पर्धियों ने पलटने का तरीका सीख लिया है। चीन और सिंगापुर विदेशों में काम कर रहे विद्वानों को सक्रिय रूप से भर्ती करते हैं और ऐसे आकर्षक संस्थान बनाते हैं कि वे घर लौट आएं। इसके उलट, भारत अपनी शैक्षणिक प्रतिभा का बड़ा हिस्सा विदेश भेजता है। भारतीय छात्र वैश्विक ओलंपियाड जीतते हैं, विदेशों में शोध दलों का नेतृत्व करते हैं और सिलिकॉन वैली में छाए रहते हैं, लेकिन देश के उनके संस्थानों में यह उत्कृष्टता शायद ही दिखाई देती है।
एशियाई शिक्षा प्रणालियों में प्रतिष्ठा शोध से तय होती है। भारत में इसे अक्सर वैकल्पिक माना जाता है।
नौकरशाही की बाधाएं इन समस्याओं को और बढ़ाती हैं। एशियाई सरकारें रैंकिंग को निदान के औजार की तरह देखती हैं; प्रदर्शन गिरने पर वे वित्तपोषण का रुख बदलती हैं और नेतृत्व में बदलाव करती हैं। भारत अक्सर रैंकिंग को पक्षपाती बताकर खारिज कर देता है या बुनियादी कमियों को दूर किए बिना चुनिंदा उपलब्धियों का जश्न मनाता है। राजनीतिक हस्तक्षेप की भी आलोचना हुई है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि विश्वविद्यालयों में नेतृत्व की नियुक्तियों में अकादमिक उत्कृष्टता के बजाय वैचारिक निकटता को प्राथमिकता दी गई है।
प्रगति की झलक
कुल मिलाकर तस्वीर निराशाजनक होने के बावजूद, कुछ खास मापदंडों में सुधार दिखता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का शोध प्रकाशनों पर असर पड़ा प्रतीत होता है और प्रति संकाय सदस्य प्रकाशनों की संख्या में भारत की बढ़त में इसका योगदान है। चंडीगढ़ विश्वविद्यालय हाल ही में एशिया में शीर्ष रैंक पाने वाला निजी भारतीय संस्थान बना और 109वें स्थान पर पहुंचा। पंजाब विश्वविद्यालय ने उद्धरण प्रभाव, अंतरराष्ट्रीय शोध नेटवर्क और संकाय की योग्यता के मामले में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की। आईआईटी हैदराबाद और आईआईटी गांधीनगर समेत कुछ नए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की क्षेत्रीय रैंकिंग में स्थिति बेहतर हुई।
भारतीय विज्ञान संस्थान का वैश्विक शीर्ष 100 में होना दिखाता है कि भारतीय संदर्भ में सफलता संभव है। इसकी मजबूत शोध संस्कृति, स्थिर वित्तपोषण व्यवस्था, व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सार्थक संस्थागत स्वायत्तता ऐसा खाका पेश करते हैं जिसे अन्य संस्थान अपना सकते हैं। हालांकि, कोई एक विश्वविद्यालय अकेले किसी देश की शैक्षणिक प्रतिष्ठा बनाए नहीं रख सकता। भारत के विशाल उच्च शिक्षा क्षेत्र में इस मॉडल को दोहराना अब भी सबसे बड़ी चुनौती है।
निष्कर्ष
- टाइम्स हायर एजुकेशन सब्जेक्ट रैंकिंग्स 2026 में सभी विषयों के वैश्विक शीर्ष 100 में केवल एक भारतीय संस्थान रहा: कंप्यूटर विज्ञान में 96वें स्थान पर आईआईएससी बेंगलुरु।
- मुख्यभूमि चीन ने विभिन्न विषयों में शीर्ष 100 में 120 से अधिक स्थान हासिल किए, जबकि हांगकांग, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर के कुल मिलाकर 150 से अधिक अतिरिक्त संस्थान सूची में आए।
- एकेडमिक रैंकिंग ऑफ वर्ल्ड यूनिवर्सिटीज़ 2025 में भारत शीर्ष 500 से पूरी तरह बाहर रहा, जबकि इस प्रतिष्ठित समूह में चीन के 101 और अमेरिका के 111 विश्वविद्यालय शामिल थे।
- शोध की मात्रा से जुड़े मानकों, जैसे प्रति संकाय सदस्य प्रकाशित शोध पत्रों और पीएचडीधारी कर्मचारियों के अनुपात में, भारत एशिया में आगे है; लेकिन रैंकिंग में पुरस्कृत होने वाला संस्थागत संकेंद्रण और वैश्विक सहयोग नेटवर्क उसके पास नहीं है।
- एशियाई प्रतिस्पर्धी केंद्रित वित्तपोषण, अंतरराष्ट्रीय संकाय भर्ती, उद्योगों के साथ गहरी साझेदारियों और विश्वविद्यालयों को केवल डिग्री देने वाले संस्थानों के बजाय राष्ट्रीय रणनीतिक बुनियादी ढांचे के रूप में देखकर सफल होते हैं।
- भारत में उच्च शिक्षा के विस्तार में गहराई के बजाय आकार को प्राथमिकता दी गई है। इसका नतीजा यह है कि रैंकिंग में व्यापक उपस्थिति तो है, लेकिन उन शीर्ष श्रेणियों में भारत नदारद है जहां वैश्विक प्रभाव तय होता है।






