रणनीतिक आपूर्ति शृंखला सुरक्षित करने के लिए चीन ने गोबी रेगिस्तान में उगाया सैन्य-ग्रेड रबर

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रणनीतिक आपूर्ति शृंखला सुरक्षित करने के लिए चीन ने गोबी रेगिस्तान में उगाया सैन्य-ग्रेड रबर

बंजर रेगिस्तान से रणनीतिक संसाधन तक

गोबी रेगिस्तान के शुष्क विस्तार में, जहां तापमान झुलसाने वाले दिनों और जमा देने वाली रातों के बीच झूलता रहता है, एक अप्रत्याशित जंगल ने जड़ें जमा ली हैं। 2016 में वैज्ञानिकों के एक जोखिमभरे प्रयोग के रूप में शुरू हुई पहल ने शिनजियांग की 14 हेक्टेयर बंजर भूमि को डुज़ोंग पेड़ों के फलते-फूलते बागान में बदल दिया है, जहां सैन्य उपयोग के लिए उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक रबर तैयार हो रहा है। यह कृत्रिम जंगल महज कृषि संबंधी कौतूहल से कहीं अधिक है। यह दिखाता है कि चीन अपनी आपूर्ति शृंखला की सबसे गंभीर कमजोरियों में से एक से निपटने के साथ-साथ उस भूमि को फिर से उपयोग में ला रहा है जिसे पहले खेती के लिए अनुपयुक्त माना जाता था।

विषय-सूची
  1. बंजर रेगिस्तान से रणनीतिक संसाधन तक
  2. रबर पर निर्भरता की जकड़न तोड़ना
  3. औषधीय चमत्कार का नया उपयोग
  4. रेत में विज्ञान का प्रयोग
  5. औद्योगिक क्षमता का दोहन
  6. रक्षा में उपयोग और रणनीतिक महत्व
  7. मुख्य बातें

यह परियोजना संसाधन सुरक्षा, रक्षा तैयारियों और पर्यावरणीय बदलाव के संगम पर स्थित है। रेगिस्तान को उपजाऊ खेतों में बदलकर चीनी वैज्ञानिक दिखा रहे हैं कि दुर्गम वातावरण भी ऐसे रणनीतिक संसाधन दे सकते हैं, जिन्हें स्थानीय स्तर पर उगाना पहले असंभव माना जाता था। इस सफलता के बाद विस्तार की योजनाएं बनी हैं, जो घरेलू रबर उत्पादन की तस्वीर बदल सकती हैं और चीन को अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों के जोखिम से बचा सकती हैं। गोबी परियोजना अन्य सीमांत भूमि को उत्पादक कृषि क्षेत्रों में बदलने का नमूना पेश करती है।

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रबर पर निर्भरता की जकड़न तोड़ना

चीन प्राकृतिक रबर का दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता और आयातक है। इसकी वजह विशाल वाहन उद्योग और औद्योगिक क्षेत्र की मांग है। पिछले साल घरेलू खपत 70 लाख टन से अधिक रही, लेकिन 85 प्रतिशत से ज्यादा रबर विदेशी आपूर्तिकर्ताओं से आया। इनमें मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशियाई देश शामिल हैं, जहां रबर का पेड़ हेविया ब्रासिलिएंसिस उष्णकटिबंधीय जलवायु में खूब पनपता है। यह निर्भरता दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर रणनीतिक जोखिम पैदा करती है, खासकर तब, जब घरेलू और निर्यात मांग पूरी करने के लिए वाहन उत्पादन लगातार बढ़ रहा है।

प्राकृतिक रबर आधुनिक परिवहन और रक्षा प्रणालियों की रीढ़ है। इसका इस्तेमाल आम वाहनों के टायरों से लेकर उन्नत सैन्य उपकरणों तक में होता है। भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों ने दूर-दराज के बागानों और समुद्री परिवहन मार्गों पर निर्भर रहने के जोखिम उजागर किए हैं। इन आपूर्तियों में कोई भी रुकावट उन विनिर्माण क्षेत्रों को ठप कर सकती है, जहां लाखों लोग काम करते हैं। कोविड-19 महामारी और उसके बाद पैदा हुए वैश्विक लॉजिस्टिक्स संकटों ने दिखाया कि आवश्यक सामग्रियों की कमी कितनी जल्दी औद्योगिक तंत्र में फैल सकती है। घरेलू विकल्प की तलाश में वैज्ञानिकों ने एक प्राचीन देशी प्रजाति पर फिर से विचार किया, जिसे औद्योगिक उपयोग के लिए पहले नजरअंदाज किया गया था।

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औषधीय चमत्कार का नया उपयोग

डुज़ोंग, जिसे वैज्ञानिक रूप से यूकोमिया उल्मॉइड्स कहा जाता है, हजारों सालों से पारंपरिक चीनी चिकित्सा में इस्तेमाल होता आया है। वैद्य इसकी छाल को गुर्दे और जिगर से जुड़ी बीमारियों के उपचार में उपयोगी मानते रहे हैं और हड्डियों व मांसपेशियों को मजबूत करने वाली प्रमुख जड़ी-बूटी के रूप में इसकी सराहना करते हैं। ऐतिहासिक ग्रंथों में दो हजार साल से भी पहले इसके उपयोग का उल्लेख मिलता है। सम्राटों और चिकित्सकों ने इसके पुनर्स्थापनकारी गुणों की प्रशंसा की है। हालांकि, इस पर्णपाती पेड़ में एक कम ज्ञात गुण भी है, जो इसे रणनीतिक रूप से अमूल्य बनाता है: यह उष्णकटिबंधीय रबर के पेड़ों से अलग एक अनूठी जैविक प्रक्रिया के जरिए प्राकृतिक रबर पैदा करता है।

प्राकृतिक रबर का चीन का एकमात्र देशी स्रोत और ब्राजीलियन रबर वृक्ष के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रबर संसाधन होने के नाते, डुज़ोंग ऐसे विशिष्ट गुण देता है जिनकी नकल सिंथेटिक विकल्प नहीं कर सकते। रबर पूरे पौधे में जमा होता है: फलों के छिलकों में 15 से 18 प्रतिशत, छाल में 8 से 10 प्रतिशत और पत्तियों में 2 से 3 प्रतिशत प्राकृतिक रबर होता है। इसके चलते सालभर में कई हिस्सों से फसल ली जा सकती है। पारंपरिक रबर के पेड़ों में इसके उलट छाल से लेटेक्स निकालने के लिए सावधानीपूर्वक चीरा लगाना पड़ता है।

नम जलवायु की जरूरत वाले उष्णकटिबंधीय रबर के पेड़ों से अलग, डुज़ोंग उल्लेखनीय रूप से मजबूत प्रजाति है। मध्य और दक्षिणी चीन, खासकर यांग्त्ज़ी के मैदानों की मूल प्रजाति होने के नाते, यह पेड़ लाखों वर्षों से अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवित रहा है। इसी सहनशीलता ने इसे रेगिस्तानी वातावरण के अनुकूल बनाने के लिए आनुवंशिक आधार दिया। हालांकि, पहले की खेती के प्रयासों में सीमित पैदावार और रबर निकालने की कठिन प्रक्रिया के कारण नतीजे खास नहीं रहे, जिससे व्यावसायिक उपयोग चुनौतीपूर्ण बना रहा।

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रेत में विज्ञान का प्रयोग

डुज़ोंग को औषधीय फसल से रेगिस्तान में पनपने वाली प्रजाति बनाने का काम 2016 में शुरू हुआ। उस साल नॉर्थवेस्ट ए&F यूनिवर्सिटी में वानिकी विभाग के डीन सु यिनछ्वान ने शिनजियांग में गोबी की 14 हेक्टेयर बंजर भूमि पट्टे पर ली। वहां सीमित पानी, तेज सौर विकिरण और तापमान में भारी उतार-चढ़ाव जैसी मुश्किलें थीं, जो कम सहनशील प्रजातियों को नष्ट कर सकती थीं। इस क्षेत्र में पहले किसी ने डुज़ोंग उगाने की कोशिश नहीं की थी। लिहाजा, यह एक जोखिमभरा प्रयोग था, जिसके पूरी तरह नाकाम होने की आशंका थी।

सु और उनकी टीम ने योजनाबद्ध तरीके से काम किया। वे जानते थे कि मौजूदा किस्मों को सीधे यहां लगाने से बात नहीं बनेगी। उन्होंने शान्शी के ल्यूयांग काउंटी में एक विशेष प्रजनन केंद्र बनाया और पूरे चीन से जुटाए गए डुज़ोंग के 50 से अधिक उन्नत आनुवंशिक नमूनों की जांच की। औषधीय गुणों और रबर उत्पादन के संकेतकों पर केंद्रित व्यवस्थित प्रजनन कार्यक्रमों के जरिए उन्होंने शुष्क और रेगिस्तानी परिस्थितियों के अनुकूल किस्में विकसित कीं। चयन में सूखा सहने की क्षमता, ठंड के प्रति सहनशीलता और रबर की सांद्रता को प्राथमिकता दी गई।

2025 तक प्रयोग का भूखंड घने और उत्पादक जंगल में बदल चुका था, जिसकी वृद्धि सभी अनुमानों से अधिक रही। परियोजना की शुरुआत से जुड़े नॉर्थवेस्ट ए&F के प्रोफेसर झू मिंगछ्यांग ने इसी महीने की शुरुआत में घोषणा की कि डुज़ोंग उद्योग तेजी से फल-फूल रहा है। इस सफलता से विस्तार की बड़ी योजनाओं को गति मिली है, जो मूल प्रयोग स्थल से कहीं आगे तक जाती हैं। चीन में फिलहाल करीब 3 लाख हेक्टेयर में डुज़ोंग की खेती होती है। 2030 तक इसे बढ़ाकर 33 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य है। अकेले शिनजियांग में 3 लाख हेक्टेयर और डुज़ोंग बागान लगाने की योजना है, जिससे रेगिस्तानी क्षेत्र में एक नई कृषि अर्थव्यवस्था बन सकती है।

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औद्योगिक क्षमता का दोहन

दशकों तक डुज़ोंग का रबर औद्योगिक संसाधन बनने के बजाय प्रयोगशालाओं तक सीमित रहा। पारंपरिक निष्कर्षण विधियां श्रमसाध्य और अकुशल थीं, जिससे उत्पादन और आर्थिक व्यवहार्यता सीमित रही। किसान औषधि के लिए छाल या चाय के लिए पत्तियां तोड़ सकते थे, लेकिन रबर निकालने के लिए जटिल प्रसंस्करण की जरूरत होती थी, जिसकी लागत उससे मिलने वाले मूल्य से अधिक पड़ती थी। 2016-2030 की राष्ट्रीय डुज़ोंग उद्योग विकास योजना में पूरे पौधे से रबर निकालने को इस फसल को आयातित हेविया रबर के मुकाबले आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए जरूरी बताया गया।

नवंबर में झू ने रबर निकालने की एक ऐसी नई प्रक्रिया की घोषणा की, जिसका विवरण एसीएस सस्टेनेबल केमिस्ट्री एंड इंजीनियरिंग में प्रकाशित हुआ। “रबर प्राथमिकता” विधि में गोंद को शुरुआती तौर पर अलग करने के लिए कम गलनांक वाले पर्यावरण-अनुकूल विलायकों और जैविक उपचार का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद खास चरणों के जरिए रबर को अभूतपूर्व दक्षता से अलग किया जाता है। यह तकनीक खास तौर पर फलों के छिलकों से रबर निकालने की चुनौती पर केंद्रित है, जिनमें इस मूल्यवान बहुलक की मात्रा सबसे अधिक होती है।

यह नवाचार एक साथ कई बाधाओं को दूर करता है। इस प्रक्रिया से ऊर्जा की खपत और विलायकों का इस्तेमाल घटता है, जबकि उपज अधिक और शुद्धता असाधारण रहती है। बड़े पैमाने पर डुज़ोंग रबर का उत्पादन व्यावहारिक और टिकाऊ बनाकर यह तकनीक एक सीमित औषधीय फसल को ऐसे उपयोगी औद्योगिक कच्चे माल में बदलती है, जो सैन्य और असैन्य विनिर्माण की जरूरतें पूरी कर सकता है। यह विधि औषधीय उपयोग के लिए अन्य मूल्यवान यौगिकों को भी सुरक्षित रखती है और बिना अपशिष्ट के उपयोग का मॉडल बनाती है।

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रक्षा में उपयोग और रणनीतिक महत्व

डुज़ोंग रबर का सैन्य महत्व आयातित सामग्री के साधारण विकल्प से कहीं अधिक है। किसी मिश्रण में सिर्फ 3 से 5 प्रतिशत डुज़ोंग रबर मिलाने से उच्च प्रदर्शन वाले, पंचर-रोधी टायरों की टिकाऊ क्षमता और घिसाव प्रतिरोध बढ़ जाता है। कठिन भूभाग में चलने वाले सैन्य वाहनों के लिए यह गुण जरूरी है, जहां टायर खराब होने से मिशन प्रभावित हो सकता है या कर्मियों की जान खतरे में पड़ सकती है। यह सामग्री अत्यधिक तापमान में भी लचीलापन बनाए रखती है और रेगिस्तान की गर्मी तथा आर्कटिक की ठंड, दोनों में भरोसेमंद प्रदर्शन करती है।

टायरों के अलावा, डुज़ोंग रबर उन्नत विद्युतचुंबकीय परिरक्षण मिश्रित सामग्रियों में भी इस्तेमाल होता है। आधुनिक सैन्य उपकरणों को इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और विद्युतचुंबकीय पल्स के खतरों से सुरक्षा चाहिए। डुज़ोंग रबर की अनूठी आणविक संरचना बेहद कठिन परिस्थितियों में लचीलापन और टिकाऊपन बनाए रखते हुए प्रभावी परिरक्षण देती है। संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों को व्यवधान या नुकसान से बचाने के लिए विमानों, नौसैनिक पोतों और जमीनी वाहनों, सभी में ऐसी सामग्रियों की जरूरत होती है।

ये उपयोग चीन के रक्षा आधुनिकीकरण के व्यापक प्रयासों के अनुरूप हैं। भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ, महत्वपूर्ण सामग्रियों की घरेलू आपूर्ति शृंखला सुनिश्चित करने से प्रतिबंधों या आपूर्ति में व्यवधानों का जोखिम घटता है। गोबी रेगिस्तान के बागान अंतरराष्ट्रीय रबर बाजारों के उतार-चढ़ाव से बचाव का उपाय हैं और साथ ही विशिष्ट रक्षा उपयोगों के लिए बेहतर प्रदर्शन वाली सामग्री उपलब्ध कराते हैं। यह परियोजना कृषि नवाचार और राष्ट्रीय सुरक्षा की योजना को एक साथ लाती है।

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मुख्य बातें

  • चीन ने गोबी रेगिस्तान की 14 हेक्टेयर बंजर भूमि को डुज़ोंग रबर के उत्पादक जंगल में बदला है। 2030 तक देशभर में इसे 33 लाख हेक्टेयर तक फैलाने की योजना है
  • यह परियोजना आयातित प्राकृतिक रबर पर चीन की गंभीर निर्भरता को दूर करने का प्रयास है। देश की सालाना 70 लाख टन खपत में फिलहाल 85 प्रतिशत से अधिक रबर आयात से आता है
  • पारंपरिक चीनी चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाला डुज़ोंग (यूकोमिया उल्मॉइड्स) ऐसा रबर देता है, जिसके सैन्य उपयोग बेहतर प्रदर्शन वाले टायरों और विद्युतचुंबकीय परिरक्षण में शामिल हैं
  • नॉर्थवेस्ट ए&F यूनिवर्सिटी की अगुवाई में वैज्ञानिकों ने 50 से अधिक आनुवंशिक नमूनों की व्यवस्थित प्रजनन प्रक्रिया से रेगिस्तान के अनुकूल किस्में विकसित कीं और पर्यावरण-अनुकूल “रबर प्राथमिकता” निष्कर्षण विधि बनाई
  • इस सफलता से पूरे पौधे का उपयोग संभव होता है: फलों के छिलकों में 15-18 प्रतिशत, छाल में 8-10 प्रतिशत और पत्तियों में 2-3 प्रतिशत रबर होता है
  • शिनजियांग रबर उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र बनने की राह पर है। वहां डुज़ोंग की खेती के लिए 3 लाख हेक्टेयर निर्धारित किए गए हैं
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