शोकाकुल जनसैलाब से भर गईं ढाका की सड़कें
कल ढाका थम-सा गया, जब लाखों लोग बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री और दक्षिण एशियाई राजनीति की दिग्गज हस्ती खालिदा ज़िया को अंतिम विदाई देने जुटे। उत्तर में अगरगांव से दक्षिण में शाहबाग तक, शोकाकुल लोग हर मुख्य सड़क और गली में उमड़ पड़े और राजधानी शोक के सागर में बदल गई। इस अभूतपूर्व जनसैलाब ने उस देश पर ज़िया के गहरे प्रभाव को दिखाया, जिसका उन्होंने दशकों तक नेतृत्व किया था।
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लोग हर मुमकिन साधन से पहुंचे। कुछ बस, ट्रक, ट्रेन, निजी कार या मोटरसाइकिल से आए। अन्य लोग अंतिम संस्कार की झलक पाने के लिए घंटों पैदल चले। अंतिम संस्कार की नमाज़ शुरू होने तक भीड़ मानिक मिया एवेन्यू से जुड़ी गलियों में फैल गई थी और सोभानबाग तथा फार्मगेट तक पहुंच गई थी। शोकाकुल लोगों की कतारें शाहबाग तक कई किलोमीटर दूर तक फैली थीं। यहां तक कि ऊंचे एक्सप्रेसवे और आसपास की इमारतों की छतें भी उस नेता की आखिरी झलक पाने आए लोगों से भरी थीं, जिसे वे अपना मानते थे।
बुज़ुर्ग नागरिक महिलाओं और युवाओं के साथ खड़े थे। कई लोग धूप में घंटों इंतज़ार करते हुए साफ तौर पर भावुक नज़र आए। यह जमावड़ा केवल राजनीतिक समर्थकों तक सीमित नहीं था। जीवन के हर क्षेत्र से लोग, यहां तक कि वे भी जिन्होंने उन्हें कभी वोट नहीं दिया था, उस महिला को सम्मान देने आए जिसने अपना पूरा जीवन लोकतंत्र के लिए समर्पित किया था। राज्य के अधिकारियों ने बंदूकों की सलामी, पुष्पचक्र और गार्ड ऑफ ऑनर की व्यवस्था की, लेकिन सच्ची विदाई उन लोगों ने दी जो कई किलोमीटर दूर खड़े थे और प्रार्थना में अपने हाथ आसमान की ओर उठाए हुए थे।
"वह केवल एक पार्टी की नेता नहीं थीं, बल्कि राजनीतिक पृष्ठभूमि से परे आम लोगों की नेता थीं," असद गेट के पास खड़े एक शोकाकुल व्यक्ति ने कहा।
बड़ी भीड़ को संभालने और आवाजाही सुचारु रखने के लिए सरकार ने सैनिकों समेत करीब 10,000 सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया। आसपास की सड़कों पर यातायात पूरी तरह ठप हो गया। अधिकारियों ने लोगों से शांत रहने और निर्देशों का पालन करने की अपील की, ताकि देश के पूर्व नेता को विदाई देते समय अव्यवस्था न फैले।
लोकतंत्र की प्रतीक को राजकीय सम्मान
अंतिम संस्कार की रस्में सुबह 7:00 बजे बांग्लादेश की संसद भवन, जातीय संसद भवन के साउथ प्लाज़ा में शुरू हुईं। बीएनपी के नेता और कार्यकर्ता सुबह-सुबह से ही ढाका और अन्य जिलों से पहुंचने लगे। उनके साथ आम नागरिक भी शामिल हुए, जिन्होंने अंतिम संस्कार की खबर सुनी थी और राष्ट्रीय शोक के इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बनना चाहते थे।
स्थल और आसपास के इलाकों में माइक्रोफोन लगाए गए थे। सुबह भर पवित्र कुरान का पाठ होता रहा। लोग शव के पहुंचने का धैर्यपूर्वक इंतज़ार कर रहे थे और माहौल गंभीर होने के साथ भावनाओं से भरा था। सुबह करीब 11:46 बजे जब झंडे से ढकी शववाहक गाड़ी आखिरकार खालिदा ज़िया को लेकर साउथ प्लाज़ा पहुंची, तो प्रार्थनाओं और श्रद्धांजलियों के शुरू होने से पहले भीड़ पर सन्नाटा छा गया।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस अंतिम संस्कार की नमाज़ में शामिल हुए। मुख्य न्यायाधीश ज़ुबायर रहमान चौधरी भी मौजूद थे। उनके साथ बीएनपी के महासचिव मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के अमीर डॉ. शफीकुर रहमान, तीनों सैन्य सेवाओं के प्रमुख और नेशनल सिटिजन पार्टी के संयोजक नाहिद इस्लाम भी थे। राजनीतिक विचारधाराओं की विविधता से आए अधिकारियों की मौजूदगी ने उस एकता को रेखांकित किया जो इस पल ने विभाजित देश में पैदा की थी।
बैतुल मुकर्रम राष्ट्रीय मस्जिद के खतीब मुफ्ती अब्दुल मलिक ने नमाज़-ए-जनाज़ा की अगुवाई की। इस्लामी अंतिम प्रार्थना में हज़ारों लोगों ने राजनीतिक नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दुआ की और सत्ता के गलियारों तथा ढाका की सड़कों के बीच की दूरी मिट गई। दोपहर 3:05 बजे प्रार्थनाएं समाप्त होने के बाद जुलूस अंतिम विश्रामस्थल की ओर रवाना हुआ।
दिन भर देशभर में झंडे आधे झुके रहे। अंतरिम सरकार ने तीन दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की थी और तीन बार प्रधानमंत्री रहीं ज़िया की विरासत के सम्मान में बुधवार को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया था। बैंक, कारखाने और सरकारी कार्यालय बंद रहे, जबकि विश्वविद्यालयों ने शैक्षणिक गतिविधियां स्थगित कर दीं। सम्मानस्वरूप ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने राजधानी में आतिशबाज़ी, लालटेन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर भी रोक लगा दी।
विदेशी गणमान्य व्यक्तियों ने दी श्रद्धांजलि
अंतिम संस्कार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी ध्यान रहा। 32 देशों के विदेशी दूत और प्रतिनिधि समारोह में शामिल हुए। भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहुंचे। पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के स्पीकर सरदार अयाज़ सादिक और भूटान के विदेश मंत्री ल्योनपो डी.एन. धुंग्येल भी मौजूद थे। नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की और श्रीलंका, मालदीव, चीन तथा रूस के प्रतिनिधियों ने भी अपने प्रतिनिधिमंडल भेजे।
जयशंकर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शोक संदेश ज़िया के बेटे तारिक रहमान को सौंपा। अपने संदेश में मोदी ने उम्मीद जताई कि ज़िया की सोच और विरासत भारत-बांग्लादेश साझेदारी का मार्गदर्शन करती रहेगी। इस कूटनीतिक मौजूदगी ने ज़िया के निधन के क्षेत्रीय महत्व और दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में उनकी भूमिका को उजागर किया।
मां को बेटे की अंतिम विदाई
अंतिम संस्कार का सबसे मार्मिक पल तब आया, जब नमाज़ शुरू होने से ठीक पहले बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान ने भीड़ को संबोधित किया। उन्होंने किसी राजनेता या पार्टी नेता की तरह नहीं, बल्कि मां को विदाई देते शोकाकुल बेटे की तरह बात की। उन्होंने राजनीति की कोई बात नहीं की, बांग्लादेश की कहानी में खालिदा की भूमिका का ज़िक्र नहीं किया और न ही जेल तथा नज़रबंदी के वर्षों में उनके साथ हुए अन्याय की बात की।
"मैं दिवंगत खालिदा ज़िया का सबसे बड़ा बेटा तारिक रहमान हूं," उन्होंने कहा। उन्होंने राजनीतिक पहचान को एक ओर रख दिया, जबकि भीड़ पहले से ही उन्हें आगामी राष्ट्रीय चुनाव लड़ रही सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के प्रमुख के रूप में जानती थी।
उन्होंने बस मां की ओर से लोगों से माफ़ी मांगी और ऐसा करके उन लाखों लोगों के दिल छू लिए जो यह सब देख रहे थे। उस पल की सच्ची मानवीय संवेदना ने राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़ दिया और सार्वजनिक शोक के पीछे छिपे निजी दुख को सामने ला दिया। उसी दिन पहले ज़िया का पार्थिव शरीर तारिक के गुलशन एवेन्यू स्थित आवास, हाउस 196 ले जाया गया था। जिस घर में वह आखिरी बार आईं, वह भी मृत्यु के बाद ही। 25 दिसंबर को उनकी बांग्लादेश वापसी के समय मां अस्पताल में गंभीर रूप से बीमार थीं और फिर कभी उठ नहीं सकीं। वहां शोकाकुल तारिक अकेले कुर्सी पर बैठकर अपनी मां के लिए पवित्र कुरान की आयतें पढ़ते रहे।
तारिक 17 साल तक लंदन में स्वनिर्वासन में रहे और पिछले ही हफ्ते बांग्लादेश लौटे। उनकी घर वापसी खुशी और दुख का मिला-जुला पल थी, क्योंकि वह तभी पहुंचे जब उनकी मां इतनी बीमार थीं कि उन्हें ठीक से पहचान भी नहीं पा रही थीं। सार्वजनिक अंतिम संस्कार से पहले परिवार के घर के भावुक दृश्यों ने राष्ट्रीय शोक के पीछे छिपी निजी त्रासदी को दिखाया।
नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद तारिक अपनी मां का पार्थिव शरीर लेने के लिए उनकी कब्र में उतरे। नज़रें झुकाए उन्होंने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और धीरे से मां पर डाल दी। परिवार और पार्टी के सदस्यों ने उनकी कब्र पर कब्र के आकार का झंडा फैलाया। गार्ड ऑफ ऑनर ने हवा में तीन बार सलामी दी और बिगुल पर लास्ट पोस्ट बजाई गई, यह संकेत देते हुए कि खालिदा का कर्तव्य पूरा हो चुका है और अब वह शांति से विश्राम कर सकती हैं।
गृहिणी से प्रधानमंत्री तक
खालिदा ज़िया का राजनीतिक सफर किसी नाटकीय उपन्यास जैसा है। उनका जन्म 1945 में उस इलाके में हुआ था जो तब ब्रिटिश भारत का हिस्सा था। उन्होंने विभाजन और 1971 में बांग्लादेश के जन्म का दौर देखा। राजनीति में उनका प्रवेश महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि त्रासदी के कारण हुआ। उनके पति ज़ियाउर रहमान सैन्य अधिकारी थे और स्वतंत्रता के बाद के उथल-पुथल भरे वर्षों में बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने। 1981 में सैन्य तख्तापलट के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। उस समय खालिदा केवल 36 वर्ष की थीं।
दो छोटे बेटों के साथ अचानक विधवा हुईं खालिदा को ऐसी भूमिका में धकेल दिया गया जिसे उन्होंने कभी नहीं चाहा था। वह बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष बनीं, जिसकी स्थापना उनके पति ने की थी। उनका राजनीतिक उत्थान तेज़ी से हुआ। 1990 में उन्होंने बांग्लादेश के संस्थापक पिता की बेटी और अपनी कट्टर प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना के साथ मिलकर लोकप्रिय विद्रोह का नेतृत्व किया, जिसने सैन्य शासक जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद को सत्ता से हटा दिया। इस जन आंदोलन ने वर्षों के सत्तावादी शासन के बाद बांग्लादेश में लोकतंत्र बहाल किया।
1991 में संसदीय लोकतंत्र की शुरुआत के बाद भारी जीत के साथ खालिदा ज़िया पहली बार प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने 1996 तक पद संभाला और फिर 2001 से 2006 तक सत्ता में लौटीं। 17 करोड़ आबादी वाले दक्षिण एशियाई देश की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने बाधाएं तोड़ीं और राजनीति में आने के लिए महिलाओं की पीढ़ियों को प्रेरित किया। उनके शांत स्वभाव और अडिग संकल्प ने विरोधियों से भी सम्मान अर्जित किया।
खालिदा ज़िया प्रेरणा रही हैं," दो बच्चों की मां शरमीना सिराज ने कहा। "महिलाओं की शिक्षा बेहतर बनाने के लिए पूर्व नेता ने जो वजीफे शुरू किए, उनसे हमारी लड़कियों के जीवन पर बड़ा असर पड़ा।
सत्ता में रहते हुए खालिदा ने बांग्लादेश की राष्ट्रपति प्रणाली को संसदीय प्रणाली में बदला और अधिकार प्रधानमंत्री के हाथों में सौंपे। उन्होंने विदेशी निवेश पर लगी पाबंदियां ढीली कीं और प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त तथा अनिवार्य बनाया। निवेश समर्थक और खुले बाज़ार की नीतियां अपनाकर उनकी सरकार ने कारोबारी समुदाय का भरोसा बनाए रखा। इन आर्थिक सुधारों ने बाद के दशकों में बांग्लादेश की उल्लेखनीय वृद्धि की नींव रखी।
टकराती बेगमों की कहानी
पिछले तीन दशकों से बांग्लादेश की राजनीति खालिदा ज़िया और शेख हसीना के बीच तीखी प्रतिद्वंद्विता से परिभाषित रही है। "टकराती बेगमों" के नाम से मशहूर इन दोनों महिलाओं की पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहीं। "बेगम" प्रतिष्ठित विवाहित महिलाओं के लिए इस्तेमाल होने वाला उर्दू सम्मानसूचक शब्द है और उनकी निजी दुश्मनी राजनीतिक किंवदंती बन गई।
दोनों ने गहरा नुकसान झेला था। हसीना के पिता, बांग्लादेश के संस्थापक पिता शेख मुजीबुर रहमान की 1975 में तख्तापलट के दौरान उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों के साथ हत्या कर दी गई थी। खालिदा के पति की 1981 में हत्या हुई। सैन्य तानाशाही के खिलाफ संघर्ष में इन साझा त्रासदियों ने शुरू में दोनों को करीब ला दिया, लेकिन लोकतंत्र बहाल होते ही उनका गठबंधन टूट गया।
इसके बाद दशकों तक कड़वा राजनीतिक संघर्ष चलता रहा। सत्ता से बाहर होने पर उन्होंने चुनावों का बहिष्कार किया और सरकार में रहते हुए एक-दूसरे पर वोटों में धांधली का आरोप लगाया। उनकी प्रतिद्वंद्विता ने कई बार बांग्लादेश की संस्थाओं को ठप कर दिया। सरकारी कर्मचारियों, पुलिस और न्यायपालिका पर पक्ष लेने का दबाव बनाया गया। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने दोनों नेताओं के शासन में लोकतंत्र के कमजोर पड़ने पर अक्सर चिंता जताई।
फिर भी उनके बीच अनिच्छुक सम्मान का भाव था। वर्षों के निजी हमलों और राजनीतिक दांव-पेच के बावजूद, दोनों महिलाएं बांग्लादेश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्ध रहीं, भले ही उसका अमल अपूर्ण रहा हो। राष्ट्रीय राजनीति पर उनका वर्चस्व ऐसा था कि तीन दशकों तक कोई अन्य राजनीतिक हस्ती एक व्यवहार्य राष्ट्रीय विकल्प के रूप में उभर नहीं सकी। अगस्त 2024 में हसीना को सत्ता से हटाने वाले हालिया जनविद्रोह ने नई संभावनाएं खोलीं, लेकिन टकराती बेगमों की छाया अब भी बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य पर बनी हुई थी।
संघर्ष और कारावास के वर्ष
खालिदा ज़िया के आखिरी सालों में उस उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष छाया रहा, जिसे उन्होंने राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया था। 2006 में सत्ता गंवाने के बाद अगले 18 वर्षों का अधिकांश समय उन्होंने जेल या नज़रबंदी में बिताया। 2018 में उन्हें दो अलग-अलग भ्रष्टाचार मामलों में 17 साल जेल की सज़ा सुनाई गई। इन मामलों में सत्ता के दुरुपयोग और उनके दिवंगत पति के नाम पर बने एक धर्मार्थ संगठन की रकम के गबन के आरोप थे।
उनकी पार्टी का कहना था कि विपक्ष को कमजोर करने और चुनावों से पहले उन्हें राजनीति से बाहर करने के लिए ये आरोप गढ़े गए थे। हसीना सरकार का कहना था कि मामले अदालतों के अधिकार क्षेत्र में हैं और उसने उनमें दखल नहीं दिया। इस अवधि में बांग्लादेश की न्यायपालिका के राजनीतिकरण पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई।
जेल में रहते हुए भी खालिदा ने अपने सिद्धांतों से समझौता करने या देश छोड़ने से इनकार किया। उनके परिवार ने इलाज के लिए विदेश जाने की अनुमति कम-से-कम 18 बार मांगी, लेकिन हर बार अनुरोध खारिज कर दिया गया। आलोचकों ने हसीना पर प्रतिशोधी होने का आरोप लगाया, जबकि समर्थकों का कहना था कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए। अगस्त 2024 के विद्रोह में हसीना को सत्ता से हटाए जाने तक यह गतिरोध जारी रहा।
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस को अंतरिम नेता के रूप में सत्ता में लाने वाली जनक्रांति के बाद आखिरकार खालिदा को विदेश जाने की अनुमति मिली। वह जनवरी 2025 में लंदन गईं और मई में बांग्लादेश लौटीं। जनवरी 2025 में एक नाटकीय कानूनी घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के आखिरी मामले में उन्हें बरी कर दिया, जिससे फरवरी 2026 के लिए निर्धारित आम चुनाव लड़ने का रास्ता साफ हो गया।
खराब स्वास्थ्य और बढ़ती उम्र के बावजूद ज़िया संसद की तीन सीटों से चुनाव लड़ने की इच्छुक थीं। बीएनपी ने इस महीने की शुरुआत में जारी अपनी उम्मीदवार सूची में उनका नाम शामिल किया था। अस्पताल के बिस्तर से भी चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने का उनका संकल्प लोकतांत्रिक राजनीति के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता दिखाता था।
देश का शोक और भविष्य के सवाल
खालिदा ज़िया के अंतिम संस्कार में उमड़ी विशाल भीड़ ने अनुभवी राजनीतिक पर्यवेक्षकों को भी चौंका दिया। सैकड़ों हज़ार लोग शामिल हुए, जिनमें ऐसे लोग भी थे जिन्होंने कभी उनकी बीएनपी को वोट नहीं दिया था। सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी 70 वर्षीय मिन्हाज उद्दीन भी पहुंचे, हालांकि उन्होंने कभी राजनीतिक रूप से उनका समर्थन नहीं किया था।
"मैं अपने पोते के साथ यहां एक अनुभवी नेता को विदाई देने आया हूं, जिनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा," कंटीले तारों की बैरिकेडिंग के पीछे से देखते हुए उद्दीन ने कहा।
खालिदा ज़िया के प्रति विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों का यह सम्मान दिखाता है कि उनकी विरासत चुनावी उपलब्धियों से कहीं आगे जाती है। उन्हें सत्तावाद के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। वह ऐसी महिला थीं जिन्होंने बार-बार गिरफ्तारी, चिकित्सा देखभाल से वंचित किए जाने और समर्थकों के मुताबिक लगातार उत्पीड़न का सामना किया। निजी और राजनीतिक झटकों के बीच उनका धैर्य आलोचकों को भी प्रभावित करता था।
उनके साथ काम कर चुके लोग उन्हें ऐसी नेता के रूप में याद करते हैं जो बड़े फैसले लेते समय गहराई से सवाल पूछती थीं। अर्थशास्त्री डॉ. देबप्रिय भट्टाचार्य ने कहा कि उन्होंने "ऐसी राजनीतिक नेता के रूप में गहरी छाप छोड़ी, जो विचारों की कद्र करती थीं और सोच-समझकर फैसले लेने को महत्व देती थीं।" यह बौद्धिक जिज्ञासा दक्षिण एशिया के कई राजनेताओं की लोकलुभावन शैली से अलग थी।
खालिदा के निधन के बाद बांग्लादेश की राजनीति के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उनके बेटे, 60 वर्षीय तारिक रहमान, अब बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और फरवरी के चुनावों में पार्टी का नेतृत्व करने की उम्मीद है। निर्वासन से उनकी वापसी और मां के अंतिम संस्कार में उनकी मौजूदगी से लगता है कि वह उनकी छोड़ी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाना चाहते हैं। आगामी चुनावों में बीएनपी को सबसे मजबूत दावेदारों में गिना जा रहा है। अगर पार्टी बहुमत हासिल करती है, तो तारिक के देश का नया नेता बनने की उम्मीद है।
हालांकि, तारिक की अपनी राजनीतिक मुश्किलें हैं। उन पर भ्रष्टाचार और मां के कार्यकाल में समानांतर सरकार चलाने के आरोप लगे थे। निर्वासन के वर्षों के दौरान वह जमीनी राजनीति से दूर रहे। यह देखना बाकी है कि क्या वह अपनी मां जैसा सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव हासिल कर पाएंगे। उनके अंतिम संस्कार में उमड़ी विशाल भीड़ एक निजी श्रद्धांजलि के साथ-साथ राजनीतिक संदेश भी थी। उस भावना को उनके बेटे के लिए चुनावी समर्थन में बदलना चुनौतीपूर्ण होगा।
आखिरी मिलन
शेर-ए-बांग्ला नगर के ज़िया उद्यान में हुई दफन की रस्म ने दिन भर की कार्यवाही को पूर्णता दी। खालिदा ज़िया को उनके पति ज़ियाउर रहमान के बगल में दफनाया गया, जो शहीद राष्ट्रपति और बीएनपी के संस्थापक थे। दफन की रस्म शाम करीब 4:30 बजे हुई। यह उस सफर का समापन था जो 44 साल पहले शुरू हुआ था, जब उनके पति की हत्या ने उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी थी।
खालिदा 36 वर्ष की उम्र में विधवा हुईं और अप्रत्याशित रूप से बांग्लादेश की राजनीति के केंद्र में आ गईं। कल मृत्यु में दोनों का आखिरकार मिलन हुआ और प्रेम, बिछोह तथा असाधारण राजनीतिक बदलाव की कहानी को पूर्ण विराम मिला। संसद भवन के बाहर स्थित एक पार्क में बनी यह कब्र उनके समर्थकों के लिए तीर्थस्थल और देश के इतिहास में उनकी जगह का स्मारक बनेगी।
दफन की रस्म पूरी होने पर गार्ड ऑफ ऑनर ने हवा में तीन बार सलामी दी। बिगुल पर लास्ट पोस्ट बजाई गई, यह संकेत देते हुए कि खालिदा का कर्तव्य पूरा हो चुका है। नज़रें झुकाए तारिक ने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और धीरे से मां पर डाल दी। परिवार और पार्टी के सदस्यों ने उनकी कब्र पर कब्र के आकार का झंडा फैलाया। यह गहरे अंतिमपन का पल था, जिसने बांग्लादेश की राजनीति के एक युग का अंत दर्ज किया।
भीड़ छंटने लगी और ढाका पर सूरज ढलने लगा, तब बांग्लादेश अपनी पहली महिला प्रधानमंत्री की विरासत पर विचार करने के लिए रह गया। उनका जीवन बांग्लादेश के स्वतंत्र अस्तित्व की पूरी अवधि में फैला था, 1971 के खूनी मुक्ति संग्राम से लेकर 21वीं सदी के लोकतांत्रिक संघर्षों तक। वह अपने देश के उथल-पुथल भरे इतिहास की उपज भी थीं और उसके राजनीतिक विकास को दिशा देने वाली शख्सियत भी।
अंतरिम नेता मुहम्मद यूनुस ने कहा कि बांग्लादेश ने "एक महान संरक्षक खो दिया है" और देश के जनभाव को बयान किया। सरकार द्वारा घोषित तीन दिन के शोक ने देश को इस बड़ी क्षति से उबरने के लिए समय दिया। झंडे आधे झुके रहे और लोग श्रद्धांजलि देने के लिए कब्र पर आते रहे।
फरवरी 2026 के चुनाव अब उस महिला की गैरमौजूदगी में होंगे, जिसका तीन दशकों तक बांग्लादेश की राजनीति पर वर्चस्व रहा। नए नेता उभरेंगे, नए गठबंधन बनेंगे और नई दिशाएं चुनी जाएंगी। लेकिन बांग्लादेश की लोकतांत्रिक यात्रा पर खालिदा ज़िया का प्रभाव बना रहेगा। उनका अंतिम संस्कार केवल एक व्यक्ति को विदाई नहीं था, बल्कि देश की नियति को आकार देने में उनकी निर्णायक भूमिका की स्वीकृति भी था।
मुख्य बातें
- बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया का लंबी बीमारी के बाद 80 वर्ष की उम्र में निधन हुआ
- ढाका में उनके राजकीय अंतिम संस्कार में लाखों लोग शामिल हुए और अगरगांव से शाहबाग तक सड़कें भर गईं
- उन्होंने तीन बार प्रधानमंत्री पद संभाला और पहली बार 1991 में पदभार ग्रहण किया
- उनके पार्थिव शरीर को 1981 में मारे गए उनके पति ज़ियाउर रहमान के बगल में दफनाया गया
- राजनीति से प्रेरित बताकर भ्रष्टाचार के आरोपों के मामलों में उन्होंने वर्षों जेल में बिताए
- उनके बेटे तारिक रहमान अब बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं
- 32 देशों के गणमान्य व्यक्ति अंतिम संस्कार में शामिल हुए
- बांग्लादेश ने तीन दिन का राष्ट्रीय शोक और एक सार्वजनिक अवकाश घोषित किया
- फरवरी 2026 के आगामी चुनावों में बीएनपी को सबसे मजबूत दावेदारों में माना जा रहा है






