विलंबता का साया
जापान की राजनीतिक बहस हाल ही में परमाणु हथियार बनाने की लाल रेखा के करीब पहुंच गई है, जिससे पूरे पूर्वी एशिया में तीखी बहस और चिंता शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री साने ताकाइची के कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों के उन बयानों पर पड़ोसी चीन ने तुरंत कड़ी प्रतिक्रिया दी है, जिनमें कहा गया था कि बिगड़ते सुरक्षा माहौल के चलते जापान के पास परमाणु हथियार होने चाहिए। इन बयानों ने जापान की तकनीकी क्षमता पर वैश्विक निगाहें भी फिर से टिका दी हैं। सरकार आधिकारिक तौर पर परमाणु अप्रसार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराती है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि देश के पास पहले से ही ऐसा औद्योगिक और वैज्ञानिक ढांचा है, जिससे वह तीन साल से भी कम समय में परमाणु हथियारों का भंडार बना सकता है।
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इस स्थिति को अक्सर "तहखाने में बम" कहा जाता है। जापान के पास फिलहाल परमाणु हथियार नहीं हैं, लेकिन उसके पास एक उन्नत नागरिक परमाणु कार्यक्रम और प्लूटोनियम का विशाल भंडार है। इससे टोक्यो को परमाणु क्षमता की विलंबता यानी तेजी से हथियार बनाने की क्षमता के सुरक्षा लाभ मिलते हैं, जबकि वास्तविक तैनाती से होने वाले कूटनीतिक नुकसान या संधियों के उल्लंघन से बचा रहता है। चीन, उत्तर कोरिया और रूस से क्षेत्रीय सुरक्षा दबाव बढ़ने के साथ यह सुप्त क्षमता रणनीतिक चिंता का केंद्र बनती जा रही है।
यह विशिष्ट स्थिति दशकों के तकनीकी निवेश का नतीजा है, जो सैन्य महत्वाकांक्षा के बजाय ऊर्जा जरूरतों से प्रेरित था। जापान के पास घरेलू जीवाश्म ईंधन के पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उसे परमाणु ऊर्जा पर काफी निर्भर रहना पड़ा है। विदेशी ईंधन पर निर्भरता घटाने के लिए सरकार ने यूरेनियम संवर्धन और प्लूटोनियम पुनर्प्रसंस्करण समेत एक बंद परमाणु ईंधन चक्र अपनाया। ये वही तकनीकें हैं जिनकी परमाणु हथियारों के लिए विखंडनीय सामग्री बनाने में जरूरत होती है।
हथियार बनाने का तेज रास्ता
चीनी परमाणु विशेषज्ञों ने हाल ही में अनुमान लगाया कि जापान तीन साल से भी कम समय में परमाणु हथियार विकसित कर सकता है। यह समयसीमा अमेरिका के दिवंगत राजनेता हेनरी किसिंजर के पांच साल के अनुमान के करीब है, बल्कि उससे भी कम हो सकती है। यह आकलन जापान के मौजूदा परमाणु ढांचे के विशाल पैमाने पर आधारित है। देश के पास फिलहाल करीब 45 टन प्लूटोनियम है, जो उसके ऊर्जा रिएक्टरों का उपोत्पाद है। इसका बड़ा हिस्सा हथियार-स्तर के बजाय रिएक्टर-स्तर का है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि रिएक्टर-स्तर के प्लूटोनियम का भी परमाणु विस्फोटक उपकरण में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके अलावा, जापान के पास इस सामग्री के प्रसंस्करण की जरूरी तकनीकी दक्षता है। वह रोक्काशो पुनर्प्रसंस्करण संयंत्र चलाता है, जिसे इस्तेमाल किए गए ईंधन से प्लूटोनियम अलग करने के लिए बनाया गया है। देश का उन्नत परमाणु इंजीनियरिंग अनुसंधान का इतिहास भी रहा है। मॉन्टेरी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में पूर्वी एशिया परमाणु अप्रसार कार्यक्रम के निदेशक जेफ्री लुईस ने कहा है कि जापान के पास 1980 के दशक से ही हथियार बनाने की तकनीकी क्षमता रही है।
जापान के पास पहले से ही तकनीकी क्षमता है और यह 1980 के दशक से उसके पास है," देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम से जुड़े जापान सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा। "उन्होंने कहा कि जब जापान के पास पांच से 10 किलोग्राम से अधिक प्लूटोनियम था, जो एक हथियार के लिए जरूरी मात्रा है, तब वह 'पहले ही सीमा पार कर चुका था' और उसके पास परमाणु प्रतिरोधक क्षमता थी।
हथियार पहुंचाने के साधन भी काफी हद तक उपलब्ध हैं। जापान के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने ठोस ईंधन वाले रॉकेट की ऐसी तकनीकें विकसित की हैं, जिन्हें बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए अनुकूलित किया जा सकता है। इसके अलावा, देश लंबी दूरी की "जवाबी हमला" मिसाइलें हासिल कर रहा है, जिनमें अमेरिका से टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें और उन्नत टाइप-12 सतह से जहाज पर मार करने वाली मिसाइलें शामिल हैं। इनका उद्देश्य पारंपरिक इस्तेमाल है, लेकिन ये परमाणु हथियार पहुंचाने के लिए जरूरी एयरोस्पेस दक्षता दर्शाती हैं।
समयसीमा के अनुमान राजनीतिक इच्छाशक्ति और गोपनीयता के आधार पर अलग-अलग हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से चलाया गया कार्यक्रम छह महीने में एक उपकरण तैयार कर सकता है, जबकि अन्य का अनुमान है कि हथियार को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए छोटा करने की जटिलताओं को देखते हुए इसमें एक से तीन साल लगेंगे। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स ने कहा है कि जापान अपने भंडार और औद्योगिक आधार के दम पर एक साल में ही काम करने योग्य परमाणु हथियार बना सकता है।
ऐतिहासिक और संवैधानिक बाधाएं
इस सुप्त क्षमता के बावजूद, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जापान ने सख्त शांतिवादी रुख बनाए रखा है। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमबारी की त्रासदी ने समाज में परमाणु हथियारों के प्रति गहरी वितृष्णा पैदा की। 1967 में अपनाए गए "तीन गैर-परमाणु सिद्धांतों" ने इस भावना को राष्ट्रीय नीति का रूप दिया। इनके मुताबिक, जापान न तो परमाणु हथियार रखेगा, न बनाएगा और न ही उन्हें अपने क्षेत्र में आने देगा। इस प्रतिबद्धता के लिए प्रधानमंत्री ईसाकु सातो को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था।
कानूनी तौर पर, जापानी संविधान का अनुच्छेद 9 युद्ध को संप्रभु अधिकार के रूप में और अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने के साधन के तौर पर बल प्रयोग या उसकी धमकी को त्यागता है। संविधान के पाठ में परमाणु हथियार रखने पर स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है, लेकिन आम तौर पर यह व्याख्या की गई है कि ऐसे हथियार शांतिवादी प्रावधान की भावना के अनुरूप नहीं हैं। इसके अलावा, 1956 का मूल परमाणु ऊर्जा कानून परमाणु अनुसंधान और विकास को शांतिपूर्ण इस्तेमाल तक सख्ती से सीमित करता है।
जापान परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) का भी हस्ताक्षरकर्ता है और उसने 1976 में इसकी पुष्टि की थी। परमाणु हथियार-रहित देश के रूप में वह कानूनी तौर पर परमाणु हथियार विकसित या हासिल नहीं कर सकता। सरकार ने लगातार अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार प्रयासों का समर्थन किया है और अपने परमाणु पदार्थों की निगरानी सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ करीबी सहयोग बनाए रखा है।
हालांकि, आलोचक और विश्लेषक अक्सर टोक्यो की "परमाणु विकल्प बनाए रखने" की रणनीति की ओर इशारा करते हैं। सार्वजनिक रूप से शांतिवादी सिद्धांतों का पालन करते हुए परमाणु हथियार बनाने की तकनीकी क्षमता बरकरार रखकर जापान रणनीतिक अस्पष्टता बनाए रखता है। रूढ़िवादी राजनेताओं ने कभी-कभी विरोधियों को ताकत का संकेत देने या सुरक्षा गठबंधन के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता परखने के लिए परमाणु हथियार बनाने का विचार उठाया है। यह अस्पष्टता चीन और उत्तर कोरिया जैसे पड़ोसियों को असमंजस में रखती है और सीमा पार किए बिना ही प्रभावी रूप से प्रतिरोधक का काम करती है।
क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं और भू-राजनीतिक तनाव
जापानी अधिकारियों की हालिया टिप्पणियों की बीजिंग ने कड़ी निंदा की है। चीनी विदेश मंत्रालय ने इन बयानों को "युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खुली चुनौती" और "क्षेत्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा" बताया। चीन लंबे समय से जापान के प्लूटोनियम भंडार को संदेह की नजर से देखता आया है। उसका तर्क है कि परमाणु हथियार-रहित देश को इतनी बड़ी मात्रा में विखंडनीय सामग्री की जरूरत नहीं हो सकती। चीनी रक्षा श्वेतपत्रों में जापान के प्लूटोनियम भंडार को अक्सर सुरक्षा खतरा बताया गया है।
व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ से यह तनाव और बढ़ जाता है। चीन फिलहाल अपने परमाणु हथियारों के भंडार का तेजी से और बड़े पैमाने पर विस्तार कर रहा है तथा हर साल अनुमानित 100 नए हथियार जोड़ रहा है। वहीं, उत्तर कोरिया बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण और अपनी परमाणु क्षमता को परिष्कृत करना जारी रखे हुए है। परमाणु हथियारों से लैस शक्तियों से घिरे होने की आशंका जापान को अपनी रक्षा नीति पर फिर से विचार करने के लिए प्रबल प्रेरणा देती है।
अमेरिका के कारण क्षेत्रीय सुरक्षा की स्थिति और जटिल हो जाती है। जापान सुरक्षा के लिए "अमेरिकी परमाणु छतरी" पर निर्भर रहा है। इसका मतलब है कि वॉशिंगटन अपने सहयोगियों की रक्षा के लिए अपने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करेगा। इस विस्तारित प्रतिरोधक की विश्वसनीयता जापान के आकलन में अहम है। हालांकि, अमेरिकी विदेश नीति में बदलावों से टोक्यो में चिंता बढ़ी है।
ट्रंप का पहलू
डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर वापसी ने पूर्वी एशिया के रणनीतिक परिदृश्य को काफी बदल दिया है। राष्ट्रपति ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति, जिसमें बहुपक्षीय गठबंधनों पर संदेह और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में लेन-देन वाला रवैया शामिल है, ने सहयोगी देशों को बेचैन कर दिया है। नाटो के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धता पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाने और जापान जैसे करीबी सहयोगियों पर भी शुल्क लगाने से अमेरिकी सुरक्षा गारंटियों की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा हुआ है।
पूर्व उप रक्षा मंत्री रुई मात्सुकावा ने इन चिंताओं को साफ तौर पर व्यक्त किया। लंदन में एक सम्मेलन में उन्होंने कहा कि यूरोप को इस बात का "अहसास हो गया है" कि वह अब सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकता। उन्हें लगा कि यह बात जापान पर भी लागू होती है।
आप अमेरिका की मौजूदगी को निश्चित मानकर नहीं चल सकते," सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रभावशाली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति परिषद की सदस्य मात्सुकावा ने कहा। "ट्रंप इतने अप्रत्याशित हैं, शायद यही उनकी ताकत है, लेकिन मुझे लगता है कि हमें हमेशा योजना बी के बारे में सोचना होगा। योजना बी शायद आत्मनिर्भर होना और फिर परमाणु हथियार हासिल करना है।
अन्य सांसदों और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने भी यही भावना जताई है और वे "अकल्पनीय पर विचार" करने लगे हैं। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि जापानी जनता में गैर-परमाणु सिद्धांतों पर फिर से विचार करने की इच्छा बढ़ रही है। मार्च में हुए एक सर्वेक्षण में 41% लोगों ने इन सिद्धांतों में संशोधन का समर्थन किया, जबकि तीन साल पहले यह आंकड़ा सिर्फ 20% था। युवा पीढ़ियों में भी, जिनमें परमाणु बम से बचे लोगों के वंशज शामिल हैं, राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए परमाणु प्रतिरोध को आवश्यक बुराई मानने का रुझान बढ़ा है।
डोमिनो प्रभाव और वैश्विक निहितार्थ
जापान के परमाणु हथियार हासिल करने की आशंका सिर्फ द्विपक्षीय चिंता नहीं है; इससे क्षेत्र में डोमिनो प्रभाव शुरू होने का खतरा है। उत्तर कोरिया से अस्तित्व का खतरा झेल रहे दक्षिण कोरिया में पहले से ही बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, लेकिन वहां स्वतंत्र रूप से परमाणु हथियार बनाने के लिए जनसमर्थन भी बढ़ा है। सर्वेक्षणों के अनुसार, दक्षिण कोरिया के 75% तक लोग अपना परमाणु बम बनाने के पक्ष में हैं। अगर जापान इस वर्जना को तोड़ता है, तो रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए दक्षिण कोरिया भी संभवतः ऐसा ही करेगा।
प्रसार की ऐसी श्रृंखला द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था को बुनियादी तौर पर कमजोर कर देगी। इससे पूर्वी एशिया में हथियारों की नई दौड़ शुरू हो सकती है और गलत आकलन तथा संघर्ष का जोखिम बढ़ सकता है। अमेरिका ऐतिहासिक रूप से अपने सहयोगियों के बीच परमाणु प्रसार का विरोध करता रहा है। उसे आशंका है कि इससे तनाव बढ़ने की स्थिति पर वॉशिंगटन का नियंत्रण घटेगा और परमाणु युद्ध की संभावना बढ़ेगी। ट्रंप पहले कह चुके हैं कि जापान और दक्षिण कोरिया को परमाणु हथियारों की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन उनका प्रशासन आधिकारिक रूप से ऐसे हथियारों के प्रसार का विरोध करता है।
चीन ने चेतावनी दी है कि जापान या दक्षिण कोरिया के परमाणु हथियार हासिल करने की किसी भी कोशिश का कड़ा जवाब दिया जाएगा। बीजिंग ऐसे घटनाक्रमों को सिर्फ सैन्य खतरे के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्र में उसके प्रभुत्व को चुनौती के रूप में भी देखता है। खास तौर पर परमाणु हथियारों से लैस जापान को ऐतिहासिक वैमनस्य और पुनःसैन्यीकरण के नजरिये से देखा जाएगा।
आंतरिक बाधाएं और आगे की राह
तकनीकी रूप से यह संभव होने और राजनीतिक रुख में बदलाव के बावजूद, जापान के सामने परमाणु हथियार बनाने से पहले बड़ी बाधाएं हैं। नौकरशाही ढांचे में कई "वीटो देने वाले पक्ष" हैं, यानी विभिन्न मंत्रालयों के ऐसे अधिकारी जो किसी गुप्त कार्यक्रम का विरोध कर सकते हैं या उसकी जानकारी लीक कर सकते हैं। फुकुशिमा हादसे के बाद नियामक संस्थाओं की संख्या बढ़ी है, जिससे बिना पता चले गुप्त और तेज कार्यक्रम चलाना मुश्किल हो गया है।
व्यावहारिक रूप से जापान के पास परमाणु परीक्षण के लिए उपयुक्त जगह नहीं है। घनी आबादी वाले द्वीपसमूह के रूप में यहां भूमिगत परीक्षण को छिपाना मुश्किल होगा और इससे देश के भीतर तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया हो सकती है। इसके अलावा, हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ने पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध लगना और परमाणु सहयोग समझौते टूटना लगभग तय है। इससे जापान का नागरिक ऊर्जा क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित होगा, जो आयातित ईंधन और तकनीक पर निर्भर है।
प्रधानमंत्री साने ताकाइची की सरकार को नाजुक संतुलन साधना है। एक ओर उसे शत्रुतापूर्ण परमाणु शक्तियों से घिरी आबादी की जायज सुरक्षा चिंताओं का समाधान करना होगा। दूसरी ओर, उसे उन शांतिवादी आदर्शों को बनाए रखना होगा जिन्होंने आठ दशकों से देश की पहचान तय की है, और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों का भरोसा कायम रखना होगा।
फिलहाल जापान अपनी आधिकारिक गैर-परमाणु नीति पर कायम है। मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरू किहारा ने हाल ही में दोहराया कि देश की परमाणु नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। ध्यान अमेरिका के साथ गठबंधन मजबूत करने और जवाबी हमला करने वाली मिसाइलों की खरीद जैसी पारंपरिक प्रतिरोधक क्षमताएं बढ़ाने पर है। फिर भी, बहस का रुख निर्विवाद रूप से बदल गया है। परमाणु क्षमता की विलंबता को अब सिर्फ प्रतिरोधक के रूप में नहीं, बल्कि विश्व व्यवस्था के लगातार बिखरने पर एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्य बिंदु
- चीनी विशेषज्ञों का अनुमान है कि जापान के पास तीन साल से भी कम समय में परमाणु हथियार बनाने की तकनीकी क्षमता है। इसके पीछे प्लूटोनियम का विशाल भंडार और उन्नत पुनर्प्रसंस्करण तकनीक है।
- जापान "तहखाने में बम" वाली स्थिति बनाए हुए है: तकनीकी रूप से हथियार बनाने में सक्षम, लेकिन आधिकारिक तौर पर तीन गैर-परमाणु सिद्धांतों और एनपीटी का पालन करता है।
- परमाणु हथियार बनाने पर फिर से विचार करने संबंधी जापानी अधिकारियों के हालिया बयानों की चीन ने निंदा की है और इनसे युद्धोत्तर शांतिवादी पहचान के कमजोर पड़ने पर बहस छिड़ गई है।
- अमेरिकी परमाणु छतरी की विश्वसनीयता पर संदेह, खास तौर पर ट्रंप प्रशासन के तहत, जापानी जनमत और राजनीतिक सोच को अधिक स्वतंत्र परमाणु प्रतिरोधक के पक्ष में मोड़ रहा है।
- जापान के परमाणु हथियार बनाने का फैसला दक्षिण कोरिया को भी ऐसा कदम उठाने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिससे पूर्वी एशिया में खतरनाक परमाणु प्रसार की श्रृंखला शुरू हो सकती है।






