पुरातत्वविदों को उज्बेकिस्तान के ऊंचे इलाकों में लौह-उत्पादन वाले शहर मार्समांडा के अवशेष मिलने की संभावना

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पुरातत्वविदों को उज्बेकिस्तान के ऊंचे इलाकों में लौह-उत्पादन वाले शहर मार्समांडा के अवशेष मिलने की संभावना

ऊंचे पहाड़ों का महानगर सिल्क रोड से जुड़ी धारणाओं को चुनौती देता है

पूर्वी उज्बेकिस्तान की पर्वत शृंखलाओं में काम कर रहे पुरातत्वविदों का कहना है कि तुगुनबुलाक नाम से स्थानीय तौर पर जाना जाने वाला विशाल बसा हुआ क्षेत्र संभवतः लंबे समय से खोया हुआ मार्समांडा शहर है। यह लोहा बनाने का केंद्र था, जहां से पूरे एशिया के बाजारों को आपूर्ति होती थी। यह स्थल समुद्र तल से करीब 7,000 फीट की ऊंचाई पर घास के मैदानों वाले ऊंचे पठारी इलाके में स्थित है और छठी से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच का है। करीब 300 एकड़ में फैला यह स्थल कुछ जगहों पर मजबूत दीवारों और बुर्जों से घिरा है। इससे पता चलता है कि यह एक औद्योगिक शहर रहा होगा, जबकि कभी इस जगह को बड़े शहरी जीवन के लिए बहुत दूरदराज माना जाता था।

विषय-सूची
  1. ऊंचे पहाड़ों का महानगर सिल्क रोड से जुड़ी धारणाओं को चुनौती देता है
  2. पठार पर पुरातत्वविदों को क्या मिला
  3. बड़े पैमाने पर लौह उद्योग के साक्ष्य
  4. लिडार ने अदृश्य शहर को कैसे उजागर किया
  5. दो पहाड़ी केंद्र, जिनमें एक मैदानी इलाकों के कई शहरों से बड़ा
  6. क्या तुगुनबुलाक मध्यकालीन इतिहासों का मार्समांडा है
  7. घुमंतू समुदायों और सिल्क रोड को नए सिरे से समझना
  8. शक्ति और रोजमर्रा के जीवन के लिए लोहे का क्या अर्थ था
  9. ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास शहर का पतन क्यों हुआ
  10. मध्य एशिया के अन्य स्थलों से तुलना
  11. आगे क्या होगा
  12. मुख्य बातें

खुदाई और सर्वेक्षण में औद्योगिक भट्टियां, लोहे के स्लैग की मोटी परतें और लौह अयस्क से भरपूर चट्टानें मिली हैं। दल ने चार अलग-अलग क्षेत्रों में गलियारे, सीढ़ीदार मंच, रक्षात्मक बुर्ज और कई मंजिला इमारतों के आधार भी दर्ज किए। मध्यकालीन भूगोलवेत्ताओं ने मार्समांडा को पहाड़ों में बसा एक ठंडा शहर बताया था, जहां नदियां जम जाती थीं और नियमित मेलों में व्यापारी लोहे की चीजों और हथियारों का कारोबार करने आते थे। तुगुनबुलाक के पुरातात्विक साक्ष्य इन विवरणों से इतनी बारीकी से मेल खाते हैं कि कई शोधकर्ता हैरान हैं।

इस काम का नेतृत्व सेंट लुइस स्थित वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के पुरातत्वविद माइकल फ्राचेत्ती कर रहे हैं। उनके साथ उज्बेकिस्तान के राष्ट्रीय पुरातत्व केंद्र के फरहाद मकसुदोव और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के संज्योत मेहेंदले भी हैं। लिडार से लैस ड्रोन की मदद से दल ने इतनी बड़ी बस्ती का उच्च-रिजॉल्यूशन नक्शा बनाया, जो सदियों से घास के मैदानों और कटाव के नीचे सबकी नजरों के सामने छिपी रही थी। 2022 से शुरू हुई खुदाई में सर्वेक्षण के नतीजों की जमीनी जांच की जा रही है और दीवारों के भीतर के दैनिक जीवन के साक्ष्य सामने लाए जा रहे हैं।

पठार पर पुरातत्वविदों को क्या मिला

तुगुनबुलाक का दिखाई देने वाला फैलाव एक चौड़ी ढलान पर है, जो नीचे अल्पाइन चरागाहों की ओर उतरती है। दीवारों के भीतर पुरातत्वविदों ने संकरे रास्ते, चौड़े खुले मैदान और सीढ़ीदार मकानों के मंचों की कतारें दर्ज कीं। सबसे ऊंचे स्थान पर एक केंद्रीय दुर्ग है, जिसके चारों ओर परकोटे और निगरानी बुर्ज हैं, जो प्रवेश को नियंत्रित करते थे। शहर की बनावट सोच-समझकर की गई योजना और बड़े पैमाने पर निर्माण व्यवस्थित करने में सक्षम सत्ता का संकेत देती है।

खुदाई के शुरुआती दौर में मिली वस्तुओं में लोहे के तीरों के फल, चाकू, औजार और सिक्के शामिल हैं। एक असाधारण कब्र में घुड़सवार योद्धा के अवशेष मिले, जिसे उसके घोड़े और कब्र में रखी वस्तुओं के साथ दफनाया गया था। यह दफन संस्कार प्रारंभिक मध्यकालीन युग में पूरे स्तेपी क्षेत्र में प्रचलित तुर्की परंपराओं से मेल खाता है। मिट्टी के बर्तनों की शैलियां और निजी उपयोग की वस्तुएं तुर्की पशुपालकों और बसे हुए समुदायों के बीच संपर्क की ओर इशारा करती हैं। इनमें सोग्दीय सांस्कृतिक जड़ों वाले व्यापारी भी शामिल थे। पुरातात्विक सामग्री एक मिश्रित समाज की तस्वीर पेश करती है, जहां किसान, पशुपालक, खनिक और धातुकर्मी साथ-साथ रहते थे।

बड़े पैमाने पर लौह उद्योग के साक्ष्य

शहर में हर जगह खुदाई करने वालों को धातु के कामकाज के निशान मिले। अयस्क गलाने और लोहे को आकार देने वाली भट्टियां स्लैग के ढेरों के पास हैं। स्लैग अयस्क से धातु निकालने के बाद बचा कांच जैसा उप-उत्पाद होता है। लौह अयस्क से भरपूर पत्थरों के टुकड़े इस उद्योग की कार्यप्रणाली के साक्ष्य देते हैं। मुख्य बुर्ज के भीतर और कार्यशालाओं में मिले औद्योगिक मलबे की अधिकता बताती है कि तुगुनबुलाक सिल्क रोड के कारवां से जुड़े क्षेत्रीय बाजारों के लिए हथियार, औजार और धातु की फिटिंग बनाता था।

इस दौर में लोहा बनाने के लिए ब्लूमरी भट्टियों का इस्तेमाल होता था। मजदूर अयस्क को लकड़ी के कोयले के साथ गर्म करते थे, ताकि ऑक्सीजन अशुद्धियों से जुड़ सके। ये अशुद्धियां स्लैग के रूप में बहकर निकल जाती थीं और पीछे स्पंजी लोहे का पिंड बचता था, जिसे ब्लूम कहते हैं। फिर लोहार स्लैग हटाने और पत्तियां, कीलें तथा फिटिंग बनाने के लिए ब्लूम को पीटते और दोबारा गर्म करते थे। लकड़ी का कोयला इस काम का जरूरी ईंधन था। इसे बनाने के लिए लकड़ी की लगातार आपूर्ति चाहिए थी। इसका मतलब है कि तुगुनबुलाक के आसपास के जंगल एक अहम संसाधन थे, जिन पर उत्पादन चरम पर होने के दौरान भारी दबाव पड़ा होगा।

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लिडार ने अदृश्य शहर को कैसे उजागर किया

लिडार, यानी लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग, दूरी मापने और जमीन की सतह का सटीक त्रिआयामी मॉडल बनाने के लिए तेजी से लेजर पल्स भेजता है। जब ड्रोन किसी स्थल के ऊपर लिडार स्कैन करते हैं, तो सॉफ्टवेयर वनस्पति को हटाकर जमीन के उन मामूली उभारों और धंसावों को दिखा सकता है, जो दबे हुए दीवारों, सड़कों और इमारतों के निशान होते हैं। तुगुनबुलाक में इस तकनीक ने घास से ढकी लहरदार ढलान को डिजिटल रूप में शहर के विस्तृत नक्शे में बदल दिया। स्कैन में किलेबंदी, आंतरिक सड़कें और आपस में जुड़ी सीढ़ीदार संरचनाओं का जाल सामने आया, जिसकी बाद में मैदानी दलों ने स्थल पर जांच की।

लिडार के नक्शों में अलग-अलग कार्यों वाले चार शहरी क्षेत्र दिखते हैं। बीच में एक दुर्ग या गढ़ है, जहां से गलियारे आवाजाही को फाटकों और खुले मैदानों की ओर ले जाते हैं। इन मुख्य रक्षात्मक संरचनाओं के आसपास सीढ़ीदार सैकड़ों ढांचे हैं, जो संभवतः घरों, कार्यशालाओं और भंडारण स्थलों का मिश्रण थे। कटाव और पशुओं की चराई से ये रूपरेखाएं लंबे समय से धुंधली पड़ गई थीं। लेजर सर्वेक्षण ने इस छिपाव को भेदकर पुरातत्वविदों को लक्षित खुदाई के लिए एक खाका दिया।

दो पहाड़ी केंद्र, जिनमें एक मैदानी इलाकों के कई शहरों से बड़ा

इस पहाड़ी पट्टी पर तुगुनबुलाक अकेला नहीं है। कुछ ही मील दूर दल ने ताशबुलाक का नक्शा बनाया, जो करीब 30 एकड़ में फैला छोटा लेकिन सुव्यवस्थित शहर था। दोनों बस्तियां 7,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर हैं और लगभग छठी से ग्यारहवीं शताब्दी तक आबाद रहीं। उस दौरान कारवां मध्य एशिया और मध्य पूर्व में माल ले जाते थे। संभव है कि इन दोनों केंद्रों के बीच श्रम, संसाधन और ऊंचे दर्रों से गुजरने वाले रास्ते साझा होते रहे हों।

तुलनात्मक विश्लेषण से पता चलता है कि तुगुनबुलाक अपनी ऊंचाई के लिहाज से कितना असामान्य है। पूरे मध्य एशिया में इतने ऊंचे स्थान पर बहुत कम शहर इसके आकार तक पहुंचे। ऐतिहासिक संदर्भ के अनुसार यह क्षेत्र तुर्की शक्तियों के अधीन था, जिनकी जगह बाद में काराखानियों ने ली। सोग्दीय मूल के व्यापारी संभवतः इन ऊंचे इलाकों से होकर गुजरते थे, जबकि स्थानीय समुदाय चरागाहों, खदानों और उन भट्टियों का प्रबंधन करते थे, जो अयस्क को व्यापार योग्य वस्तुओं में बदलती थीं।

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क्या तुगुनबुलाक मध्यकालीन इतिहासों का मार्समांडा है

मध्यकालीन अरबी और फारसी लेखकों ने मार्समांडा नाम के एक पहाड़ी शहर का वर्णन किया है, जहां सर्दियों में नदियां जम जाती थीं और हर महीने लगने वाले मेलों में लोहे की वस्तुएं और हथियार बिकते थे। ये संकेत तुगुनबुलाक के स्थान और वहां मिली सामग्री से मेल खाते हैं: ठंडी, ऊंची जगह से लेकर लौह-आधारित अर्थव्यवस्था के स्पष्ट साक्ष्य तक। अगर यह पहचान सही साबित होती है, तो मार्समांडा सिल्क रोड के व्यापार से जुड़े सबसे बड़े ज्ञात पहाड़ी शहरों में से एक होगा।

यह तर्क दमदार है, लेकिन अभी निर्णायक नहीं। आने वाले खुदाई सत्रों में प्रशासनिक क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा, जहां से अभिलेख या मुहरें मिल सकती हैं। सिक्कों के भंडारों से तारीखें अधिक सटीक रूप से तय हो सकती हैं, जबकि औद्योगिक इलाकों से उत्पादन के पैमाने का पता चल सकता है। मैदानी प्रयोगशालाएं स्लैग की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करेंगी, ताकि अयस्क के स्रोतों का पता लगाया जा सके और यह समझा जा सके कि धातु कार्यशालाओं से होकर तैयार वस्तुओं तक कैसे पहुंचती थी।

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घुमंतू समुदायों और सिल्क रोड को नए सिरे से समझना

शुरुआती शोध में समरकंद, बुखारा और काशगर जैसे बड़े मैदानी शहरों की भूमिका पर जोर दिया गया और पर्वत शृंखलाओं को ऐसी बाधा माना गया, जिन्हें पार करने के लिए कारवां जल्दी करते थे। उज्बेकिस्तान के ऊंचे इलाकों में नया शोध एक अलग तस्वीर पेश करता है। पहाड़ी समुदाय व्यापार के हाशिये पर नहीं थे। वे जरूरी सामग्री बनाते, रणनीतिक दर्रों की रक्षा करते और पशुपालकों, खनिकों तथा व्यापारियों को एक मजबूत क्षेत्रीय नेटवर्क में जोड़ते थे।

तुगुनबुलाक की सामग्री ऐसे पशुपालकों की ओर इशारा करती है जो शिल्पकार भी थे। पशुपालक ढलानों पर तेजी से आ-जा सकते थे, बोझा ढोने वाले पशुओं को हांक सकते थे और मौसमी चरागाहों का इस्तेमाल कर सकते थे। इस मामले में वे अयस्क भी निकालते, लकड़ी का कोयला बनाते और खनिकों तथा लोहारों के रूप में काम करते थे। जहां आर्थिक कामयाबी आवाजाही और स्थानीय संसाधनों पर निर्भर हो, वहां कौशलों का यह मेल समझ में आता है। इससे घुमंतू और बसे हुए समुदायों के बीच की कोई भी सरल सीमा भी धुंधली पड़ जाती है।

शक्ति और रोजमर्रा के जीवन के लिए लोहे का क्या अर्थ था

मध्यकालीन मध्य एशिया में लोहे के औजार और हथियार जीवन के केंद्र में थे। तीरों के फल, भाले की नोकें और तलवारें सेनाओं के काम आती थीं। घोड़ों के लगाम के हिस्से, रकाब और नालें घुड़सवारों तथा कारवां के लिए थीं। कुल्हाड़ियां, कीलें, हल के फाल और हंसिए खेती तथा निर्माण में काम आते थे। इतनी बड़ी मात्रा में इन चीजों का उत्पादन करने वाले शहर के पास कई दिशाओं और संस्कृतियों के खरीदार आते होंगे।

ये सामग्री पुरातात्विक रूप से विशिष्ट निशान छोड़ती हैं। भट्टियों के आसपास स्लैग के ढेर बनते हैं। लोहार के काम से बने लोहे के बेहद छोटे टुकड़े, जिन्हें हैमर स्केल कहते हैं, कार्यशाला के फर्श पर जमा हो सकते हैं। तुगुनबुलाक में स्लैग के बड़े भंडार, हथियारों के हिस्सों और औजारों के साथ मिलकर इस दावे को मजबूत करते हैं कि शहर की धातु-आधारित अर्थव्यवस्था पहाड़ी घाटियों से बहुत दूर तक फैली थी।

ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास शहर का पतन क्यों हुआ

रेडियोकार्बन नतीजे और खुदाई में मिली परतों का अध्ययन बताते हैं कि तुगुनबुलाक और पास के ताशबुलाक, दोनों में गतिविधियां ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में घटने लगीं। शोधकर्ता इसके पीछे एक-दूसरे से जुडे़ कई दबावों की संभावना जताते हैं। बड़ी मात्रा में लकड़ी का कोयला बनाने से शहर के आसपास के जंगल घट सकते थे और ईंधन जुटाने के लिए भट्टियों से अधिक दूर जाना पड़ सकता था। फसल उगाने का छोटा मौसम या अधिक कठोर सर्दियां चरागाहों और आवाजाही पर असर डालतीं। राजनीतिक बिखराव से कारवां और खरीदार दूसरे रास्तों पर जा सकते थे। नए प्रतिस्पर्धियों ने भी लोहे की वस्तुओं के बाजार में सेंध लगाई होगी।

ये ऐसी परिकल्पनाएं हैं, जिनकी जांच पुरातत्वविद व्यापक क्षेत्र में पर्यावरण के नमूने जुटाकर, लकड़ी का अध्ययन करके और बस्तियों का सर्वेक्षण करके करेंगे। कारण जो भी रहा हो, इस पहाड़ी उद्योग का पतन दिखाता है कि ऊंचे इलाकों की अर्थव्यवस्थाएं जलवायु, राजनीति और संसाधनों के उपयोग में बदलाव के प्रति कितनी संवेदनशील हो सकती हैं।

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मध्य एशिया के अन्य स्थलों से तुलना

किर्गिस्तान की इस्सिक-कुल झील में हाल के शोध से एक उपयोगी तुलना सामने आती है। वहां पानी के भीतर किए गए सर्वेक्षणों में तट से कुछ दूरी पर डूबा हुआ मध्यकालीन व्यापारिक केंद्र दर्ज किया गया है। खुदाई में पकी ईंटों की इमारतें, एक बड़ी चक्की का पत्थर, लकड़ी की बल्लियां और मक्का की ओर मुंह करके दफनाए गए लोगों वाला मुस्लिम कब्रिस्तान मिला। शोधकर्ताओं के अनुसार पंद्रहवीं शताब्दी में आए शक्तिशाली भूकंप ने बस्ती को तबाह कर दिया और झील का जलस्तर बढ़ने के साथ शहर डूब गया। यह खोज पहाड़ी सिल्क रोड केंद्र का एक अलग रूप दिखाती है: ऐसा शहर जो पठार पर नहीं, बल्कि झील के किनारे फला-फूला।

दोनों उदाहरण दिखाते हैं कि सिल्क रोड असल में कितना विविध था। पहाड़ी रास्तों पर मेलों के लिए खुले मैदान, लोहा और मिट्टी के बर्तन बनाने की कार्यशालाएं, धार्मिक केंद्र और कारवां के पड़ाव मौजूद थे। कुछ शहर पर्यावरणीय झटकों से उजड़ गए, तो कुछ राजनीतिक बदलाव या संसाधनों की कमी से। कई शहर जमीन से देखने पर मुश्किल से नजर आते हैं, लेकिन लिडार स्कैन और पानी के भीतर सर्वेक्षणों में उनके निशान साफ दिखाई देते हैं।

आगे क्या होगा

तुगुनबुलाक की टीम प्रशासनिक जिलों, शिल्पकारों के इलाकों और रिहायशी बस्तियों में खुदाई का विस्तार करने की योजना बना रही है। ब्लूम, स्लैग और तैयार वस्तुओं के विस्तृत धातुकर्म अध्ययन से स्पष्ट होगा कि शिल्पकार इस्पात बनाते थे या मुख्यतः कम कार्बन वाला लोहा, और वे पत्तियों का उपचार तथा उनकी अंतिम घिसाई कैसे करते थे। भू-पुरातात्विक नमूनों के जरिए प्राचीन परिदृश्य का पुनर्निर्माण किया जाएगा। इसमें उन जंगलों से लेकर, जिन्हें लकड़ी का कोयला बनाने के लिए काटा गया, उन खदानों तक का अध्ययन शामिल होगा, जहां से भट्टियों के लिए अयस्क आता था।

क्षेत्रीय सर्वेक्षण में उज्बेकिस्तान के ऊंचे इलाकों की अन्य बस्तियों की तलाश की जाएगी। अगर कारवां के रास्तों से जुड़े और शहर सामने आते हैं, तो यह पहाड़ी पट्टी अलग-अलग चौकियों के बजाय एक सतत शहरी क्षेत्र के रूप में उभरेगी। उज्बेक संस्थानों के साथ प्रशिक्षण और सहयोग अहम रहेगा। साथ ही दीवारों, बुर्जों और सीढ़ीदार संरचनाओं का सावधानीपूर्वक संरक्षण भी जरूरी होगा, जो अब मौसम के प्रभावों के सामने हैं।

मुख्य बातें

  • पुरातत्वविदों ने उज्बेकिस्तान के पहाड़ों में तुगुनबुलाक के 300 एकड़ में फैले शहर का नक्शा बनाया। यह छठी से ग्यारहवीं शताब्दी तक आबाद था।
  • औद्योगिक भट्टियों, लोहे के स्लैग और लौह अयस्क से भरपूर चट्टानों से पूरे स्थल पर बड़े पैमाने पर धातु का काम होने के संकेत मिलते हैं।
  • ड्रोन लिडार से चार शहरी क्षेत्र, किलेबंदी, गलियारे और सीढ़ीदार सैकड़ों संरचनाएं सामने आईं।
  • खोजों में लोहे के हथियार और औजार, सिक्के तथा घोड़े के साथ दफन तुर्की योद्धा की कब्र शामिल है।
  • शोधकर्ताओं का मानना है कि तुगुनबुलाक संभवतः वही मार्समांडा है, जिसे मध्यकालीन ग्रंथों में लोहे और नियमित व्यापार मेलों के लिए मशहूर ठंडे पहाड़ी शहर के रूप में वर्णित किया गया है।
  • संभवतः तुगुनबुलाक मध्य एशिया के सिल्क रोड बाजारों में हथियार, औजार और फिटिंग की आपूर्ति करता था।
  • ग्यारहवीं शताब्दी की शुरुआत में गतिविधियां घटने लगीं। इसके संभावित कारणों में पर्यावरणीय दबाव, राजनीतिक बदलाव या नई प्रतिस्पर्धा शामिल हैं।
  • किर्गिस्तान की इस्सिक-कुल झील में डूबा मध्यकालीन व्यापारिक केंद्र, पहाड़ी सिल्क रोड के शहरी जीवन और उसके अलग-अलग अंजामों की क्षेत्रीय तुलना पेश करता है।
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