युवाओं का वोट बिहार के बेहद अहम मुकाबले की दिशा तय करेगा
भारत की सबसे युवा आबादी वाले राज्यों में शामिल बिहार निर्णायक चुनाव में प्रवेश कर चुका है, जहां पहली बार वोट देने वालों और युवा मतदाताओं की आवाज का महत्व असाधारण है। तमाम दल नौकरियों, कौशल केंद्रों और बेहतर शिक्षा के वादों के साथ Gen Z को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। राज्य के 7.42 करोड़ मतदाताओं में लगभग एक चौथाई इस वर्ग में आते हैं, और रोजगार अभियान का सबसे अहम मुद्दा बन गया है। बिहार के कई युवा घर के पास ऐसी नौकरी चाहते हैं, जिसमें इतनी आमदनी हो कि उन्हें दूरदराज के शहरों में पलायन न करना पड़े। वे पहले भी बड़े-बड़े वादे सुन चुके हैं और दलों को उनकी महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ उनकी विश्वसनीयता के आधार पर भी परख रहे हैं।
विषय-सूची
- युवाओं का वोट बिहार के बेहद अहम मुकाबले की दिशा तय करेगा
- बातचीत में नौकरियां सबसे अहम क्यों हैं
- युवा वोट के पीछे के आंकड़े
- नौकरियों को लेकर दलों के वादे
- कई युवा मतदाता अब भी संदेह क्यों करते हैं
- जाति, महिलाएं और जमीनी स्तर के नए संकेत
- पलायन और बिहार में नौकरियों की चुनौती
- डिजिटल प्रचार, मतदान अभियान और युवाओं को लुभाने की अनोखी कोशिश
- पहले और दूसरे चरण में नजर रखने लायक सीटें
- राघोपुर, तेजस्वी यादव की परीक्षा
- तारापुर, सम्राट चौधरी की वापसी की कोशिश
- महुआ, तेज प्रताप यादव की अकेले दम पर कोशिश
- अलीनगर और लखीसराय, नए चेहरे और पुरानी निष्ठाएं
- आरा और मोकामा, चुनावी विमर्श को आकार देने वाले मुकाबले
- क्या बिहार नौकरी के लक्ष्य पूरे कर सकता है
- जानने योग्य बातें
चुनाव दो चरणों में 6 नवंबर और 11 नवंबर को हो रहा है, जबकि मतगणना 14 नवंबर को होगी। भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड समेत उसके सहयोगियों के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता बरकरार रखना चाहता है। राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के इर्द-गिर्द बने विपक्षी महागठबंधन की कोशिश बेरोजगारी और भर्तियों में ठहराव को लेकर नाराजगी को बदलाव के पक्ष में वोटों में बदलने की है। प्रशांत किशोर की जन सुराज जैसी नई पार्टियां जाति-केंद्रित राजनीति को खारिज करते हुए और नौकरियों तथा शिक्षा पर खास ध्यान देने का वादा कर युवा मतदाताओं को लुभा रही हैं।
बातचीत में नौकरियां सबसे अहम क्यों हैं
युवा मतदाता सबसे पहले आजीविका की बात करते हैं, और इसकी ठोस वजहें हैं। बिहार अब भी भारत के सबसे गरीब राज्यों में है और दूसरे राज्यों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों का एक बड़ा स्रोत है। आधिकारिक आंकड़ों में कुछ संकेतकों में सुधार दिखता है, लेकिन स्थिर और अच्छी तनख्वाह वाली स्थानीय नौकरियों की कमी को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। हाल के वर्षों में कौशल केंद्रों और उद्यमिता योजनाओं का विस्तार हुआ है, लेकिन वे मांग के पैमाने को पूरा नहीं कर पाए हैं। कई परिवार अब भी दूसरे राज्यों से भेजी गई कमाई पर निर्भर हैं, जहां बिहार के लोग निर्माण, सेवा और मौसमी कारोबारों में काम करते हैं। इन रुझानों के चलते रोजगार का मुद्दा महज चुनावी चर्चा से बढ़कर है। घर पर ही अपना भविष्य बनाने की चाह रखने वाली पीढ़ी के लिए यह जीवनरेखा जैसा है।
राजनीति की ताजा यादें भी अहम हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में रैलियों और बहसों में नौकरी के वादे छाए हुए थे। उसके बाद से राज्य में भर्ती परीक्षाओं को लेकर बार-बार विवाद हुए हैं। परीक्षाएं रद्द होने, पेपर लीक और देरी से कई आवेदक नाराज और अनिश्चित महसूस कर रहे हैं। युवाओं का कहना है कि वे समय पर, निष्पक्ष और पेपर लीक से सुरक्षित भर्ती चाहते हैं। वे जानना चाहते हैं कि कितने पद खाली हैं, परीक्षाएं कब होंगी और मेरिट सूची कितने समय तक मान्य रहेगी। ये प्रक्रियागत मुद्दे तकनीकी लग सकते हैं, लेकिन लाखों युवाओं के लिए अवसरों की असलियत इन्हीं से तय होती है। वे सरकारी नौकरी को मध्यमवर्गीय जीवन तक पहुंचने का सबसे भरोसेमंद रास्ता मानते हैं।
युवा वोट के पीछे के आंकड़े
बिहार में कुल मतदाता करीब 7.43 करोड़ हैं। निर्वाचन आयोग की मतदाता सूचियों के अनुसार 20 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में 1.63 करोड़ मतदाता हैं, जबकि 18 से 19 वर्ष की उम्र के करीब 14.01 लाख मतदाता पहली बार वोट देंगे। 18 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में कुल संख्या करीब 1.77 करोड़ है, जो सभी मतदाताओं का लगभग एक चौथाई है। व्यापक जनसांख्यिकीय अनुमानों के मुताबिक, आबादी के लगभग 58 प्रतिशत लोग 25 वर्ष से कम उम्र के हैं। यह स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई डिजिटल रूप से दक्ष पीढ़ी है, जो भर्ती और शिक्षा में कथित अन्याय या प्रशासनिक चूक पर तुरंत प्रतिक्रिया देती है।
पिछले चुनावी चक्र के जनमत सर्वेक्षणों में कई मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंताओं के रूप में बेरोजगारी और उद्योगों की कमी सामने आई थी। आज कॉलेज परिसरों और कोचिंग केंद्रों में होने वाली बातचीत में भी यही भावना सुनाई देती है। युवा व्यावहारिक हैं। वे पेपर लीक और नतीजों में देरी देखते हैं, फिर वादों की व्यापकता को उन पर अमल की रफ्तार से तौलते हैं। कड़े मुकाबले वाली सीटों पर उनका वोट जीत-हार के अंतर को काफी प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि NDA और विपक्ष, दोनों युवा नाराजगी को या तो बेहतर अमल के साथ निरंतरता के वोट में या तेज अमल के साथ बदलाव के वोट में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
नौकरियों को लेकर दलों के वादे
सत्तारूढ़ गठबंधन ने नौकरियों और कौशल को अपने चुनावी प्रचार के केंद्र में रखा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और JD(U) के नेताओं ने कौशल केंद्रों के नेटवर्क के साथ पांच साल में 1 करोड़ नौकरियों का लक्ष्य रखा है। NDA ने 12वीं कक्षा पास करके उच्च शिक्षा हासिल करने वाले विद्यार्थियों के लिए ब्याज-मुक्त ऋण, बेरोजगार स्नातकों के लिए 1,000 रुपये का बेरोजगारी भत्ता और सभी राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रारंभिक परीक्षा के लिए एक समान 100 रुपये शुल्क तथा मुख्य परीक्षा के लिए कोई शुल्क न होने जैसे उपायों को प्रमुखता दी है। संदेश यह है कि भर्ती को निष्पक्ष और उस तक पहुंच को सस्ता बनाते हुए राज्य प्रशिक्षण और नियुक्तियों का विस्तार करता रहेगा।
विपक्ष का प्रमुख चेहरा, राजद नेता तेजस्वी प्रसाद यादव, रोजगार के मुद्दे को व्यक्तिगत वादे में बदल चुके हैं। उन्होंने गठबंधन के सत्ता में आने पर हर परिवार में कम से कम एक सरकारी नौकरी देने का वादा किया है और इसे तेजी से पूरा करने की समयसीमा की बात कही है। उन्होंने हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज और एक इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित करने तथा पॉलिटेक्निक और पैरामेडिकल संस्थानों का विस्तार करने की बात भी कही है। युवाओं से जुड़े अन्य प्रस्तावों में युवा आयोग, स्थानीय निवासी नीति, पेपर लीक के खिलाफ कार्रवाई और बिना शुल्क के परीक्षा फॉर्म शामिल हैं। उनकी रैलियों में आमदनी के साथ गरिमा पर भी जोर दिया गया है। वे लोगों से कहते हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा या काम के लिए युवाओं को घर छोड़ने की नौबत नहीं आनी चाहिए।
हाल की एक रैली में राजद नेता ने राष्ट्रीय मुद्दों से तुलना करते हुए नौकरियों को चर्चा के केंद्र में रखा। आजीविका पर ध्यान देने वाले नेता के रूप में अपना परिचय देते हुए उन्होंने मुकाबले को बयानबाजी की होड़ के बजाय रोजगार के मामले में विश्वसनीयता की परीक्षा बताया।
तेजस्वी प्रसाद यादव ने कहा: "प्रधानमंत्री हथियारों की बात करते हैं, मैं रोजगार की बात करता हूं। मुझे मौका दीजिए और मैं सुनिश्चित करूंगा कि लोगों को शिक्षा, इलाज या नौकरी के लिए बिहार छोड़कर न जाना पड़े।"
राजनीतिक रणनीतिकार से प्रचारक बने प्रशांत किशोर जन सुराज के साथ दोनों गठबंधनों को चुनौती दे रहे हैं। उनके मंच ने एक साल के भीतर पर्याप्त नौकरियां पैदा करके पलायन रोकने और स्कूली शिक्षा तथा शासन व्यवस्था में व्यापक बदलाव का वादा किया है। कई युवा मतदाताओं को इस संदेश की स्पष्टता पसंद है। दूसरे पूछते हैं कि इतना तेजी से बदलाव कैसे लागू होगा और उसके लिए धन कहां से आएगा। पदयात्राओं और छात्रों से संपर्क के जरिए जन सुराज ने राज्यव्यापी नेटवर्क बनाया है, लेकिन उसके पास अब भी पुराने दलों की स्थापित चुनावी मशीनरी नहीं है। इसके बावजूद उसने हर स्थानीय बातचीत में नौकरियों और शिक्षा को जगह दिलाई है, जो अपने आप में उसके प्रभाव का संकेत है।
कई युवा मतदाता अब भी संदेह क्यों करते हैं
बिहार में Gen Z के एक बड़े हिस्से के लिए सबसे बड़ी बाधा भरोसे की है। वे पहले भी बड़े-बड़े आंकड़े सुन चुके हैं। पिछले पांच वर्षों में परीक्षाएं रद्द होने, पेपर लीक और भर्ती में लंबी देरी ने नाराजगी बढ़ाई है। पटना के महेंद्रू जैसे कोचिंग इलाकों में शिक्षक, क्लर्क, कांस्टेबल और जूनियर इंजीनियर की सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे स्नातकों की भीड़ रहती है। उम्मीदवार महीनों की तैयारी के बाद अचानक परीक्षा रद्द होने और फिर दोबारा परीक्षा देने का खर्च उठाने की बात बताते हैं। कई लोगों का कहना है कि अगर भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी, नियमित और पेपर लीक से सुरक्षित हो तो वे नौकरी की धीमी वृद्धि भी स्वीकार कर लेंगे।
युवा राजनीति पर नजर रखने वाले विश्लेषकों को नाराजगी के साथ धैर्य भी दिखाई देता है। उनका कहना है कि अगर नाराज उम्मीदवारों का छोटा-सा हिस्सा भी किसी दल को सजा देने का फैसला करे तो युवा वोट सीटों का रुख बदल सकता है। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि जाति, क्षेत्र और पेशे के आधार पर नाराजगी बंटी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे युवा वर्ग ताकतवर तो बनता है, लेकिन उसे एकजुट करना मुश्किल होता है।
बिहार के सामाजिक परिदृश्य का अध्ययन करने वाले राजनीतिक विशेषज्ञ डीएम दिवाकर का मानना है कि यह चुनाव परखेगा कि नौकरी की चिंताएं पहचान की सीमाओं के पार कितनी गहराई तक असर डालती हैं।
डीएम दिवाकर ने कहा: "Gen Z अपने करियर की संभावनाओं से निराश है और विधानसभा चुनाव में उसकी भूमिका निर्णायक हो सकती है।"
एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज के समाज वैज्ञानिक बीएन प्रसाद को बड़े पैमाने पर तत्काल विद्रोह का खतरा नहीं दिखता, लेकिन उनका मानना है कि युवाओं की नाराजगी मतदान और दलों के जीत के अंतर को प्रभावित करेगी।
बीएन प्रसाद ने कहा: "युवाओं में निराशा है और इसका मतदान पर असर पड़ना तय है। सवाल यह है कि यह असर कितना बड़ा होगा।"
जिलों में युवाओं की मांग एक जैसी है। छात्र ऐसी तारीखें चाहते हैं जिन पर भरोसा किया जा सके, ऐसे परीक्षा केंद्र जहां वे पहुंच सकें और ऐसे नतीजे जिन पर वे विश्वास कर सकें। कई लोगों का कहना है कि नए कारखाने या सेवा पार्क भले ही धीरे आएं, लेकिन सरकारी भर्ती का तय कार्यक्रम उनकी चिंता कम करेगा और उन्हें योजना बनाने का मौका देगा। कुछ लोगों ने सरकारी नौकरी की उम्मीद छोड़ दी है और निजी क्षेत्र में बिक्री तथा डिलीवरी का काम तलाश रहे हैं, अक्सर राज्य से बाहर, क्योंकि इन नौकरियों में घर पर मिलने वाली दिहाड़ी से ज्यादा कमाई होती है।
जाति, महिलाएं और जमीनी स्तर के नए संकेत
बिहार की राजनीति में जाति अब भी सबसे शक्तिशाली कारकों में से एक है। स्थानीय बढ़त मजबूत करने के लिए दल अब भी प्रभावशाली समुदायों से उम्मीदवार चुनते हैं। कई समर्थक नीतियों के एजेंडे की परवाह किए बिना इन सामाजिक समीकरणों के अनुसार वोट देते हैं। फिर भी, छात्रावासों और कोचिंग केंद्रों में बातचीत का रुख आकांक्षाओं, खासकर नौकरियों और शिक्षा की ओर बदल रहा है। कुछ युवा मतदाताओं का कहना है कि वे ऐसे किसी भी उम्मीदवार का समर्थन करेंगे जो भर्ती की समयसीमा ठीक कर सके और स्कूली शिक्षा बेहतर बना सके, भले ही इसके लिए पारंपरिक समीकरणों से हटकर वोट देना पड़े।
महिला मतदाता एक बार फिर सत्तारूढ़ गठबंधन का अहम आधार हैं। स्कूली छात्राओं के लिए चर्चित साइकिल योजना और पढ़ाई जारी रखने के लिए नकद सहायता समेत महिला साक्षरता और आवागमन की योजनाओं ने पिछले दशक में लड़कियों की शिक्षा को प्रमुखता दिलाई। अब दोनों गठबंधन कारोबार शुरू करने की इच्छुक महिलाओं के लिए अनुदान का वादा कर रहे हैं और आर्थिक सशक्तीकरण को वोटों में बदलने की उम्मीद कर रहे हैं। युवा महिलाएं यह भी कहती हैं कि उनके लिए सुरक्षा, परीक्षा की निष्पक्षता और पढ़ाई की गुणवत्ता अहम है। इन चिंताओं का असर सभी दलों पर पड़ता है और इससे गठबंधन अपनी शिक्षा योजनाओं को और मजबूत कर सकते हैं।
ये परस्पर विरोधी रुझान बंटे हुए युवा वोट की ओर इशारा करते हैं। पहली बार वोट देने वाले कई युवा अब भी परिवार के बुजुर्गों या जाति के आधार पर संगठित स्थानीय नेताओं की बात सुनते हैं। दूसरे युवाओं पर नौकरियों, स्कूलों की गुणवत्ता और सरकारी दस्तावेजों तथा सेवाओं को हासिल करने में आसानी का ज्यादा असर पड़ता है। पहचान और आकांक्षाओं का यह मेल बिहार को एक अनिश्चित और प्रतिस्पर्धी चुनावी मैदान बनाता है।
पलायन और बिहार में नौकरियों की चुनौती
संरचनात्मक तस्वीर के संदर्भ में नौकरी के वादों का आकर्षण और साफ हो जाता है। 2022 से 2023 के दौरान बिहार का प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद करीब 38,278 रुपये था, जो राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम है। लगभग 56 प्रतिशत आबादी कृषि में काम करती है, जबकि राज्य के कुल उत्पादन में इस क्षेत्र का योगदान सिर्फ करीब 18 से 19 प्रतिशत है। सिर्फ छह प्रतिशत कामगार विनिर्माण क्षेत्र में हैं। सेवा क्षेत्र में करीब एक तिहाई लोग काम करते हैं, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या की नौकरियां अनौपचारिक और कम वेतन वाली हैं। कस्बों और छोटे शहरों में युवाओं की बेरोजगारी अधिक है; हाल के आंकड़ों में शहरी युवा बेरोजगारी दर करीब 10.8 प्रतिशत रही। साक्षरता में सुधार हो रहा है, लेकिन करीब 61.8 प्रतिशत पर यह अब भी राष्ट्रीय औसत से कम है और लैंगिक अंतर भी बड़ा है।
ये बुनियादी स्थितियां बताती हैं कि बिहार से इतनी बड़ी संख्या में लोग दूसरे राज्यों में पलायन क्यों करते हैं। पश्चिम और दक्षिण में निर्माण क्षेत्र की तेजी उन युवाओं को नियमित आमदनी देती है, जिन्हें घर पर मौसमी खेती का काम मिल सकता था। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने वाली महिलाओं को आसपास शुरुआती स्तर की नौकरियां कम ही मिलती हैं। परिवारों का खर्च बाहर से भेजी गई रकम से चलता है, जो घरेलू खपत को स्थिर करती है, लेकिन स्थानीय नौकरियों की कमी भी दिखाती है। जब दल लाखों नई नौकरियों का वादा करते हैं, तो छात्र पूछते हैं कि ये नौकरियां कैसे पैदा होंगी, किन क्षेत्रों में भर्ती होगी और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पुलिस में खाली पद राज्य कितनी जल्दी भर सकेगा।
इस लक्ष्य का पैमाना एक चुनौती है। पांच साल में 1 करोड़ नौकरियों का लक्ष्य हर साल करीब 20 लाख या हर महीने लगभग 1,66,000 नौकरियों के बराबर है। इनमें से कुछ नौकरियां सार्वजनिक क्षेत्र में नियमित भर्ती और विस्तार से मिल सकती हैं, खासकर स्कूलों, क्लीनिकों और पुलिस इकाइयों में। कुछ रोजगार सड़क, पुल, सिंचाई और आवास समेत बुनियादी ढांचे के कामों में तेजी लाकर पैदा किए जा सकते हैं, जहां अर्ध-कुशल कामगारों की जरूरत होती है। बाकी रोजगार निजी उद्यमों पर निर्भर हैं। इसके लिए भरोसेमंद बिजली, सुविधाओं से लैस औद्योगिक जमीन, तेजी से मंजूरी और कारखानों तथा सेवा क्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप स्थानीय प्रशिक्षण जरूरी हैं। भर्ती प्रक्रिया को सुधारना भी जरूरी है, ताकि परीक्षाएं विवाद का कारण न बनें। उम्मीदवारों को चयन और नियुक्ति करने वाली व्यवस्था पर भरोसा न हो तो बेहतरीन वादों पर भी अमल करना मुश्किल होगा।
डिजिटल प्रचार, मतदान अभियान और युवाओं को लुभाने की अनोखी कोशिश
रैलियों में अब भी भीड़ जुटती है, लेकिन कई युवा मतदाताओं के लिए यह डिजिटल माध्यमों पर केंद्रित चुनाव बन चुका है। छात्रों और पहली बार वोट देने वालों तक पहुंचने की कोशिश में Instagram, YouTube और X अहम हैं। विपक्ष की युवाओं पर केंद्रित यात्राओं में कई जिलों में लोगों की उल्लेखनीय भागीदारी रही है। भाजपा प्रधानमंत्री के युवा उद्यमियों और छात्रों के साथ संवाद को प्रमुखता देती है, जबकि NDA शिक्षा और परीक्षा की तैयारी का खर्च घटाने वाली योजनाओं का प्रचार करता है। दोनों पक्ष छोटे वीडियो, छात्र मिलन कार्यक्रमों और कंटेंट क्रिएटरों के साथ साझेदारी में निवेश कर रहे हैं, जो स्मार्टफोन के दौर की भाषा में बात करते हैं।
पहला चरण नजदीक आने पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने Gen Z से बड़ी संख्या में मतदान करने और मतदान प्रक्रिया के प्रति सतर्क रहने की अपील करते हुए एक वीडियो जारी किया। उन्होंने चुनाव को युवाओं की जिम्मेदारी की परीक्षा बताया और पहली बार वोट देने वालों से अपने मत को संविधान की रक्षा का माध्यम मानने को कहा।
राहुल गांधी ने कहा: "बिहार का भविष्य आपके हाथों में है। वोट चोरी की किसी भी कोशिश को हराइए और अपने वोट तथा अपने भविष्य की रक्षा कीजिए।"
उनकी टिप्पणी पर सरकार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने गांधी पर चुनाव प्रणाली के बारे में लोगों को गुमराह करने वाले दावों के जरिए युवाओं को भड़काने की कोशिश करने का आरोप लगाया। निर्वाचन आयोग ने बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोपों को खारिज किया है। इस विवाद से पता चलता है कि दल युवा मतदान को कितना अहम मानते हैं और ऐसे समय में चुनाव प्रबंधन को लेकर कितनी संवेदनशीलता है, जब हर सीट मायने रखती है।
पहले और दूसरे चरण में नजर रखने लायक सीटें
पहले चरण में 6 नवंबर को 18 जिलों की 121 सीटों पर मतदान हुआ। दूसरे चरण में 11 नवंबर को बाकी सीटों का फैसला होगा। कई मुकाबलों में ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपने भाषणों में युवाओं और नौकरियों को केंद्र में रखा है। इन सीटों का दोनों गठबंधनों और नए दलों के लिए रणनीतिक महत्व के साथ-साथ प्रतीकात्मक महत्व भी है।
राघोपुर, तेजस्वी यादव की परीक्षा
राघोपुर यादव परिवार का गढ़ बना हुआ है। विपक्ष के मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में राज्यव्यापी जनादेश मांगते हुए तेजस्वी यादव यहां अपनी सीट बचाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने मतदाताओं से कहा है कि वे नौकरियों और स्कूली शिक्षा को लेकर उनकी तत्परता के आधार पर उन्हें परखें। भाजपा ने यहां मजबूत प्रतिद्वंद्वी उतारा है और उनके वादों की व्यवहार्यता पर सवाल उठाए हैं। जन सुराज का उम्मीदवार तीसरा विकल्प पेश करता है और स्वच्छ शासन तथा स्थानीय नौकरियों के संदेश के जरिए युवाओं को लुभा रहा है।
तारापुर, सम्राट चौधरी की वापसी की कोशिश
उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तारापुर से चुनाव लड़ने लौटे हैं। यहां सामाजिक समीकरण जटिल हैं और कोई एक समुदाय हावी नहीं हो सकता। उपचुनाव में करीबी हार के बाद राजद को यहां संभावना दिख रही है। इस सीट पर समर्थक लगभग एक ही सांस में नौकरियों, बढ़ती लागत और स्थिरता की बात करते हैं। यह राज्य के कई हिस्सों में आकांक्षा और सावधानी के मेल को दिखाता है।
महुआ, तेज प्रताप यादव की अकेले दम पर कोशिश
अपना दल बनाने के बाद राजद के बैनर के बिना चुनाव लड़ रहे तेज प्रताप यादव महुआ सीट फिर से जीतने की कोशिश कर रहे हैं। यह मुकाबला परखेगा कि क्या व्यक्तिगत लोकप्रियता पार्टी की चुनावी मशीनरी को मात दे सकती है। महुआ के युवा अक्सर कॉलेजों की गुणवत्ता और बेहतर सार्वजनिक सेवाओं की बात करते हैं। नौकरियां अहम हैं, लेकिन उम्मीदवारों से यह भी पूछा जा रहा है कि वे रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने वाली बुनियादी सेवाएं कैसे बेहतर बनाएंगे।
अलीनगर और लखीसराय, नए चेहरे और पुरानी निष्ठाएं
अलीनगर में लोकगायिका मैथिली ठाकुर भाजपा का युवा चेहरा हैं। उनकी मौजूदगी में सांस्कृतिक गौरव और राजनीति का मेल दिखता है। मतदाता नएपन और प्रशासनिक अनुभव के बीच चुनाव कर रहे हैं। लखीसराय में भाजपा नेता विजय कुमार सिन्हा छठी बार जीतने की कोशिश में हैं। वह निरंतरता और अनुभव का हवाला देते हैं। उनके प्रतिद्वंद्वियों का कहना है कि लंबे कार्यकाल का नतीजा नौकरियों और सुरक्षा के मोर्चे पर तेज प्रगति होना चाहिए। दोनों सीटें बताएंगी कि युवा अनुभव को कितना महत्व देते हैं और नए चेहरे को कितना।
आरा और मोकामा, चुनावी विमर्श को आकार देने वाले मुकाबले
आरा में अक्सर खेमों के बीच अदला-बदली होती है और इस बार भी विकास तथा कानून-व्यवस्था के संकेतक के रूप में इस सीट पर नजर रहेगी। दबंगों की राजनीति से लंबे समय से प्रभावित रहे मोकामा में चुनाव प्रचार के दौरान जन सुराज के एक कार्यकर्ता की हत्या के बाद कड़ी निगरानी है। यहां उम्मीदवारों को नौकरियों के साथ कानून के राज पर भी बात करनी पड़ रही है। इस चुनावी चक्र में कई ग्रामीण सीटों पर ये दोनों मुद्दे साथ-साथ सामने आए हैं।
क्या बिहार नौकरी के लक्ष्य पूरे कर सकता है
मतदाता चमत्कार नहीं मांग रहे हैं। वे ऐसी योजना चाहते हैं जिसकी प्रगति पर नजर रखी जा सके। निकट भविष्य में तीन उपाय सबसे अहम होंगे। पहला, शिक्षा, स्वास्थ्य और पुलिस में मंजूर खाली पदों को तय परीक्षा कार्यक्रम और पेपर लीक रोकने के पुख्ता उपायों के जरिए भरना। दूसरा, कौशल प्रशिक्षण को उन नौकरियों से जोड़ना जो वास्तव में जिलों में आने वाली हैं, न कि सिर्फ सैद्धांतिक पाठ्यक्रमों से। इसके लिए जिला स्तर पर श्रम बाजार का आकलन और विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, निर्माण तथा खुदरा कारोबार के स्थानीय नियोक्ताओं के साथ साझेदारी जरूरी है। तीसरा, छोटे कारोबारों के लिए विस्तार आसान बनाना। तेजी से मंजूरी, किफायती औद्योगिक शेड, भरोसेमंद बिजली और कार्यशील पूंजी के लिए ऋण सूक्ष्म उद्यमों को स्थिर रोजगार देने वाले कारोबारों में बदल सकते हैं।
इन मोर्चों पर प्रगति से हर समस्या हल नहीं होगी, लेकिन भरोसा बढ़ेगा। इससे बड़ी परियोजनाओं के लिए समय भी मिलेगा। नए औद्योगिक पार्क, माल ढुलाई गलियारों के पास लॉजिस्टिक्स केंद्र और कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण में निवेश आने वाले कई वर्षों में गैर-कृषि रोजगार बढ़ा सकते हैं। विरासत स्थलों के मार्गों और पर्यावरण गलियारों से जुड़ा पर्यटन, अगर सड़कें, स्वच्छता और सुरक्षा साथ-साथ बेहतर हों, तो स्थानीय रोजगार पैदा कर सकता है। इनमें से कोई भी क्षेत्र सिर्फ नारों से नहीं बढ़ता। इनके लिए प्रशासनिक अमल, नियमित निगरानी और परियोजनाओं की पारदर्शी सूची जरूरी है, जिसे नागरिक देख सकें।
जानने योग्य बातें
- बिहार के 7.42 करोड़ मतदाताओं में Gen Z की हिस्सेदारी करीब एक चौथाई है और उनकी सबसे बड़ी चिंता नौकरियां हैं।
- मतदान 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में हो रहा है, जबकि मतगणना 14 नवंबर को होगी।
- NDA के नेता रोजगार सृजन, कौशल, छात्रों के लिए ऋण और परीक्षा शुल्क में राहत का वादा कर रहे हैं; JD(U) ने 1 करोड़ नौकरियों का लक्ष्य रखा है।
- राजद के तेजस्वी यादव हर परिवार में एक सरकारी नौकरी देने और हर जिले में और कॉलेज खोलने का वादा कर रहे हैं।
- जन सुराज तेजी से नौकरियां पैदा करके पलायन रोकने और शासन व्यवस्था में सुधार के वादे से युवाओं को लुभा रहा है।
- भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने और देरी से बड़े-बड़े वादों पर युवाओं का संदेह बढ़ा है।
- कृषि पर अधिक निर्भरता, विनिर्माण क्षेत्र की छोटी हिस्सेदारी और लैंगिक अंतर के साथ कम साक्षरता जैसी संरचनात्मक बाधाएं कायम हैं।
- शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं के कारण महिलाएं सत्तारूढ़ गठबंधन का अहम मतदाता वर्ग बनी हुई हैं; दोनों खेमे महिला उद्यमियों के लिए अनुदान का वादा कर रहे हैं।
- युवा वोट जुटाने के लिए दल छोटे वीडियो और छात्र मिलन कार्यक्रमों के जरिए जोरदार डिजिटल प्रचार कर रहे हैं।
- राघोपुर, तारापुर, महुआ, अलीनगर, लखीसराय, आरा और मोकामा जैसी सीटों पर करीबी मुकाबले अंतिम नतीजे को आकार देंगे।






