चीन की स्वच्छ हवा से वैश्विक तापवृद्धि तेज़

पढ़ने में 14 मिनट
shanghai, waitan, china, city, nightview, modern, architecture, shanghai, shanghai, shanghai, sha...

चीन की स्वच्छ हवा की मुहिम और तापवृद्धि का विरोधाभास

चीन ने अपनी वायु गुणवत्ता में ऐसी गति और बड़े पैमाने पर सुधार किया है, जिसकी ऐतिहासिक मिसालें कम हैं। करीब एक दशक में अधिकारियों ने बिजलीघरों, उद्योगों और वाहनों से होने वाले सल्फर प्रदूषण पर काबू पाया और उस कालिख तथा सल्फेट धुंध में नाटकीय कमी की, जिसने कभी शहरों का दम घोंट रखा था। इससे स्वास्थ्य को बड़ा लाभ हुआ है: श्वसन और हृदय संबंधी बीमारियां कम हुई हैं और जीवन प्रत्याशा बढ़ी है। हालांकि, जनस्वास्थ्य की इस कामयाबी के साथ जलवायु का एक पेच भी जुड़ गया है। सूरज की रोशनी परावर्तित करने और बादलों को अधिक चमकीला बनाने वाले कणों को हटाकर चीन ने उस शीतलनकारी परदे को भी हटा दिया, जो ग्रीनहाउस गैसों से हो रही तापवृद्धि के एक हिस्से को छिपा रहा था। शोध के बढ़ते दायरे के अनुसार, इसका नतीजा हाल के वर्षों में वैश्विक तापवृद्धि की रफ्तार तेज़ होना है।

विषय-सूची
  1. चीन की स्वच्छ हवा की मुहिम और तापवृद्धि का विरोधाभास
  2. 2013 के बाद चीन में क्या बदला?
  3. एरोसोल कैसे ठंडक पहुंचाते हैं और उन्हें हटाने से छिपी गर्मी क्यों सामने आती है
  4. तापवृद्धि की तेज़ रफ्तार पर ताज़ा अध्ययन क्या बताते हैं
  5. स्वच्छ आसमान से जुड़ा प्रशांत महासागर का गर्म क्षेत्र
  6. जहाजरानी के नियम और एरोसोल में अन्य कटौतियां बदल रही हैं बादल
  7. बचाई गई जानें और दोषारोपण की राजनीति
  8. जलवायु नीति के लिए अब इसका क्या अर्थ है
  9. यह तेज़ी कितने समय तक रह सकती है?
  10. एक नज़र में

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि प्राकृतिक उतार-चढ़ाव का हिसाब लगाने के बाद, 1970 के दशक से तापवृद्धि की गति करीब 0.18 C प्रति दशक से बढ़कर 2010 के बाद करीब 0.24 C प्रति दशक हो गई। कई मॉडलिंग अध्ययनों में इस तेज़ी के प्रमुख कारणों में चीन की अगुआई में पूर्वी एशिया में सल्फेट की भारी कमी को शामिल किया गया है। एक अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण के मुताबिक, पूर्वी एशिया में प्रदूषण नियंत्रण से वैश्विक तापमान में करीब 0.07 C की बढ़ोतरी हुई, जबकि एक अन्य आकलन हाल के वर्षों में तापवृद्धि की गति में आई तेज़ी का अधिकांश हिस्सा चीन में एरोसोल की कमी को मानता है। इन निष्कर्षों के तरीके और दायरे अलग-अलग हैं और कुछ नतीजों की अब भी सहकर्मी समीक्षा चल रही है, लेकिन मुख्य संदेश दशकों से स्थापित जलवायु भौतिकी के अनुरूप है। एरोसोल हवा में मौजूद रहने तक ठंडक पहुंचाते हैं। उन्हें तेज़ी से हटाने पर कुछ समय के लिए ग्रह अधिक तेज़ी से गर्म होता है, क्योंकि ग्रीनहाउस गैसों का अंतर्निहित प्रभाव अधिक स्पष्ट हो जाता है।

यह स्वच्छ हवा के उपायों से पैदा हुई तापवृद्धि नहीं है। यह वह तापवृद्धि है जो पहले से जलवायु तंत्र में मौजूद थी और अब सामने आई है। सल्फर डाइऑक्साइड और महीन कणों पर चीन के नियंत्रण ने जानें बचाईं और रोजमर्रा की जिंदगी बेहतर की। इससे सामने आई जलवायु चुनौती याद दिलाती है कि दीर्घकालिक तापवृद्धि सीमित करने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन में कटौती को वायु गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ तेज़ करना होगा।

2013 के बाद चीन में क्या बदला?

2013 के स्मॉग संकट के बाद बीजिंग और दूसरे शहरों पर कार्रवाई करने का जनदबाव बढ़ा। चीन ने व्यापक स्वच्छ-वायु कार्यक्रम शुरू किया। कोयला बिजलीघरों में फ्लू गैस से सल्फर हटाने के उपकरण लगाए गए, उद्योगों ने स्वच्छ प्रक्रियाएं अपनाईं और शहरों ने वाहन उत्सर्जन तथा ईंधन की गुणवत्ता के नियम सख्त किए। छोटे और प्रदूषणकारी बॉयलरों को हटाने और उन्नत करने के अभियान चलाए गए। कुछ क्षेत्रों में बिजलीघरों ने कम सल्फर वाले कोयले या प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल शुरू किया और अधिकारियों ने निगरानी तथा नियमों के पालन को मजबूत किया।

इन कदमों से सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन में भारी कमी आई। अनुमानों के मुताबिक, पिछले दशक में इसमें करीब 70 से 75 प्रतिशत की गिरावट आई है: 2010 के शुरुआती वर्षों में 20 मिलियन टन से अधिक के स्तर से घटकर हाल के वर्षों में कुछ मिलियन टन रह गया। शहरी धुंध के प्रमुख घटक सल्फेट में यह गिरावट उपग्रहों के अवलोकनों और जमीन पर लगे निगरानी उपकरणों में दिखाई देती है। जनस्वास्थ्य को इससे बड़ा लाभ हुआ है। पहले के शोधों के मुताबिक, चीन में स्वच्छ हवा से अब हर साल लाखों नहीं, बल्कि सैकड़ों हजारों लोगों की अकाल मृत्यु टलने में मदद मिलती है, खासकर बुजुर्गों और हृदय तथा फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोगों की।

चीन में वायु गुणवत्ता के इस बदलाव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। बीजिंग, शंघाई और कई प्रांतीय राजधानियों के निवासियों को आसमान के रंग और क्षितिज की स्पष्टता में आया फर्क साफ दिखता है। पर्यावरणीय लाभ वास्तविक और अहम हैं।

एरोसोल कैसे ठंडक पहुंचाते हैं और उन्हें हटाने से छिपी गर्मी क्यों सामने आती है

एरोसोल हवा में तैरते बेहद छोटे कण होते हैं। इनमें से कुछ प्राकृतिक हैं, जैसे समुद्री नमक और धूल। कई मानवीय गतिविधियों से पैदा होते हैं, जिनमें कोयला और तेल जलाने पर निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड से बनने वाले सल्फेट भी शामिल हैं। ये जलवायु को दो मुख्य तरीकों से प्रभावित करते हैं। पहला, एरोसोल कण सूरज की रोशनी को बिखेरते और वापस अंतरिक्ष में परावर्तित करते हैं, जिससे सतह तक पहुंचने वाली ऊर्जा घटती है। दूसरा, वे बादलों में बदलाव करते हैं। बादल की बूंदें बनने के लिए बीज कण का काम करके एरोसोल ऐसे बादल बना सकते हैं जिनमें अधिक संख्या में छोटी बूंदें हों और जो अधिक चमकीले हों तथा लंबे समय तक टिकें। चमकीले बादल ज्यादा सूरज की रोशनी परावर्तित करते हैं और इस तरह नीचे की सतह को ठंडा करते हैं।

एरोसोल से मिलने वाली ठंडक वास्तविक है, लेकिन अस्थायी। ये कण आमतौर पर कुछ दिनों से लेकर एक सप्ताह में वायुमंडल से नीचे गिर जाते हैं। उनकी छाया का असर बनाए रखने के लिए लगातार नए कणों का बनना जरूरी है। ग्रीनहाउस गैसें अलग तरह से व्यवहार करती हैं। कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में सदियों तक रह सकती है। मीथेन करीब एक दशक तक रहती है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) के आकलन के मुताबिक, एरोसोल ने मानव गतिविधियों से हो रही तापवृद्धि के एक बड़े हिस्से को ढक रखा है। जब देश स्वास्थ्य कारणों से वायु प्रदूषण कम करते हैं, तो यह परदा हटता है और ग्रीनहाउस गैसों का पूरा असर थर्मामीटर के माप में दिखने लगता है।

विज्ञापन

तापवृद्धि की तेज़ रफ्तार पर ताज़ा अध्ययन क्या बताते हैं

हाल के तापमान रुझानों पर पूर्वी एशिया में एरोसोल की कमी का असर अलग से समझने के लिए कई शोध दलों ने उन्नत जलवायु मॉडल इस्तेमाल किए हैं। आठ पृथ्वी-प्रणाली मॉडलों के नतीजों को मिलाकर किए गए एक सिमुलेशन के मुताबिक, पूर्वी एशिया में सल्फेट उत्सर्जन में करीब 75 प्रतिशत की कटौती से वैश्विक औसत तापमान में लगभग 0.07 C की बढ़ोतरी हुई होगी। इसी अध्ययन में तापवृद्धि का ऐसा पैटर्न दिखता है जो पूर्वी एशिया और उससे नीचे की ओर आने वाली हवाओं वाले क्षेत्रों में सबसे मजबूत है और उत्तरी प्रशांत से होते हुए आर्कटिक तक फैला है। एक अन्य विश्लेषण का अनुमान है कि करीब 2010 से तापवृद्धि की गति तेज़ होने में चीन में एरोसोल की कमी की बड़ी भूमिका है; इसका असर करीब 0.05 C प्रति दशक के बराबर है। उस आकलन की सहकर्मी समीक्षा अभी बाकी है, जबकि बहु-मॉडल अध्ययन वैज्ञानिक समीक्षा से गुजर चुका है।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक जोर देकर कहते हैं कि स्वच्छ हवा के उपायों ने उस तापवृद्धि को सामने ला दिया है जिसे ग्रीनहाउस गैसें पहले से बढ़ा रही थीं। एरोसोल में कमी का पैमाना और उत्सर्जन का स्थान, दोनों अहम हैं। चीन की हवा तेजी से प्रशांत महासागर के ऊपर पहुंचती है, जिससे शीतलन का असर या उसकी कमी बड़े क्षेत्र में फैलती है। इससे किसी क्षेत्र के उत्सर्जन में बदलाव का वैश्विक प्रभाव बढ़ जाता है।

एक विश्लेषण का नेतृत्व करने वाले, CICERO सेंटर फॉर इंटरनेशनल क्लाइमेट रिसर्च के वरिष्ठ वैज्ञानिक ब्योर्न सैमसेट ने कहा कि इस असर को पूरे ग्रह के पैमाने पर मापा जा सकता है।

जब हमने आंकड़ों को देखना शुरू किया, तो पता चला कि यह असर निश्चित रूप से बड़े पैमाने का है, छोटा नहीं।

बहु-मॉडल अध्ययन की सह-लेखक और रीडिंग विश्वविद्यालय की वायुमंडलीय वैज्ञानिक लॉरा विलकॉक्स ने रेखांकित किया कि तेज़ तापवृद्धि का यह दौर स्थायी रूप से जलवायु की संवेदनशीलता में उछाल नहीं, बल्कि हवा के स्वच्छ होने के प्रति प्रतिक्रिया को दर्शाता है।

इस परदे के हटने के दौरान हम तापवृद्धि की रफ्तार तेज़ होते देखेंगे।

कई शोध दलों को उम्मीद है कि पूर्वी एशिया में एरोसोल का स्तर स्थिर होने के साथ तापवृद्धि की गति ग्रीनहाउस गैसों से प्रेरित दीर्घकालिक रुझान के करीब पहुंच जाएगी। इसका समय और सटीक पैमाना इस बात पर निर्भर करता है कि दूसरे क्षेत्रों और उद्योगों में उत्सर्जन कितनी तेज़ी से घटता है और गर्म होती दुनिया में बादलों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है।

स्वच्छ आसमान से जुड़ा प्रशांत महासागर का गर्म क्षेत्र

2013 से उत्तर-पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में भारी उछाल आया। यह घटना ‘द ब्लॉब’ के नाम से जानी गई। विशाल क्षेत्र में तापमान 4 C तक बढ़ गया। इन घटनाओं से मछलियों के भंडार को नुकसान पहुंचा, समुद्री पक्षियों को भोजन नहीं मिला, हानिकारक शैवाल प्रस्फुटन हुए और समुद्री स्तनधारियों के व्यवहार में बदलाव आया। दीर्घकालिक वैश्विक तापवृद्धि और एल नीनो जैसे प्राकृतिक चक्रों की भूमिका थी, लेकिन वे इस घटना की तीव्रता और लंबे समय तक बने रहने की पूरी व्याख्या नहीं कर सके।

ओशन यूनिवर्सिटी ऑफ चाइना के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए एक नए विश्लेषण में प्रशांत महासागर के इस गर्म होने के एक हिस्से को पूर्वी एशिया में वायु प्रदूषण की भारी कमी से जोड़ा गया है। चीन के ऊपर एरोसोल से मिलने वाली ठंडक घटने के कारण नीचे की ओर हवा गर्म हुई और दबाव के पैटर्न बदल गए। अलेउतियन लो मजबूत हुआ, उत्तर-पूर्वी प्रशांत के कुछ हिस्सों में हवा की रफ्तार घटी और समुद्र से हवा में कम गर्मी गई। इससे सतह पर अत्यधिक गर्मी के लिए अनुकूल हालात बने। हाल के वर्षों के उपग्रह आंकड़े उत्तरी प्रशांत में उल्लेखनीय गर्मी का रुझान दिखाते हैं, जो एरोसोल में कमी के संकेतों से मेल खाता है। दूसरे कारणों की भी भूमिका रही, लेकिन अब यह प्रक्रिया इस पहेली का एक अहम हिस्सा लगती है।

विज्ञापन

जहाजरानी के नियम और एरोसोल में अन्य कटौतियां बदल रही हैं बादल

2020 में अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन ने जहाजों के ईंधन में सल्फर की मात्रा पर सख्त सीमा तय की, जिससे खुले समुद्र के ऊपर एरोसोल प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत घटा। दशकों तक जहाजों के मार्गों पर बादलों की चमकीली लकीरें बनती थीं, जो सूरज की रोशनी परावर्तित करके समुद्र की सतह को ठंडा करती थीं। स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल के साथ बादलों की ये संरचनाएं धुंधली पड़ गईं और उनके नीचे के महासागर अधिक तेज़ी से गर्म हुए। वैज्ञानिकों ने उत्तर अटलांटिक में हाल की रिकॉर्ड समुद्री लू के एक हिस्से को जहाजों से निकलने वाले एरोसोल में कमी से जोड़ा है। अनुमानों के मुताबिक, जहाजरानी के नियमों ने इस लू की तीव्रता में उल्लेखनीय योगदान दिया, जबकि बाकी असर ग्रीनहाउस गैसों से होने वाली तापवृद्धि, प्राकृतिक उतार-चढ़ाव और अन्य कारकों से जुड़ा था।

शोधकर्ता यह भी जांच रहे हैं कि क्या पुराने मॉडलों ने एरोसोल की सांद्रता में बदलाव के प्रति बादलों की संवेदनशीलता को कम आंका था। साथ ही, वैश्विक तापमान बढ़ने से कुछ बादल कम परावर्तक हो सकते हैं। दोनों तरह के साक्ष्य ऐसे जलवायु तंत्र की ओर इशारा करते हैं जिसमें एरोसोल में बदलाव से किसी क्षेत्र पर बड़ा असर पड़ सकता है, भले ही वैश्विक औसत में बदलाव डिग्री के कुछ दशमांश में मापा जाए।

बचाई गई जानें और दोषारोपण की राजनीति

चीन की स्वच्छ-वायु नीतियों ने जानें बचाई हैं, अस्पताल में भर्ती होने के मामले घटाए हैं और करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी बेहतर की है। इन नीतियों का स्पष्ट उद्देश्य जनस्वास्थ्य था और इनका लाभ तुरंत मिला। तापवृद्धि की हालिया तेज़ी को स्वच्छ-वायु उपायों को धीमा करने या पलटने की वजह बताना असल मुद्दे से भटकना है। वायु प्रदूषण को सूरज की सुरक्षा देने वाली छतरी की तरह इस्तेमाल करने का मतलब मानव स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाना होगा।

चीनी विद्वानों और टिप्पणीकारों ने ऐसे विमर्शों का विरोध किया है जो जलवायु समस्या के लिए केवल चीन की प्रदूषण नियंत्रण मुहिम को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि अमेरिका और यूरोप ने भी इसी तरह के स्वास्थ्य कारणों से दशकों पहले सल्फेट उत्सर्जन घटाया था। पूर्वी एशिया में कटौती का पैमाना और गति अलग है और जलवायु ने उस पर प्रतिक्रिया दी है। इससे दीर्घकालिक तापवृद्धि का मूल कारण नहीं बदलता: ग्रीनहाउस गैसों का जमा होना। स्वच्छ हवा ने बस उस कारण को अधिक स्पष्ट कर दिया है।

विज्ञापन

जलवायु नीति के लिए अब इसका क्या अर्थ है

निकट अवधि का सबक सीधा है। देशों को स्वास्थ्य की रक्षा के लिए वायु प्रदूषण कम करना जारी रखना चाहिए और साथ ही ग्रीनहाउस गैसों में कटौती भी तेज़ करनी चाहिए। कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन में तेज़ कटौती के बिना, एरोसोल से मिलने वाली ठंडक का खत्म होना अधिक तापमान और चरम गर्मी के रूप में दिखेगा। मीथेन में कटौती निकट अवधि की तापवृद्धि कम करने का व्यावहारिक तरीका है, क्योंकि यह शक्तिशाली है और वायुमंडल में कम समय तक रहती है। गैस ढांचे में रिसाव का पता लगाने और उसे ठीक करने के कार्यक्रम, तेल कुओं और कोयला खदानों से मीथेन को पकड़ना तथा नियमित रूप से गैस जलाने पर रोक, जल्दी नतीजे दे सकते हैं।

कार्बन डाइऑक्साइड में गहरी कटौती अब भी जरूरी है। इसके लिए स्वच्छ बिजली को तेजी से बढ़ाना, कोयले से दूर जाना, बिजली ग्रिड का विस्तार, दक्षता में सुधार और परिवहन, हीटिंग तथा उद्योग के कुछ हिस्सों का विद्युतीकरण करना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा, भंडारण और शून्य-उत्सर्जन ईंधन को तेजी से अपनाने वाली नीतियां आकस्मिक सुरक्षा कवच के रूप में एरोसोल पर निर्भरता घटाती हैं।

अनुकूलन भी मायने रखता है। एरोसोल में बदलाव से आंशिक रूप से जुड़ी समुद्री लू मत्स्य संसाधनों और तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों पर दबाव डालेगी। बेहतर समुद्री निगरानी, पूर्व चेतावनियां और लचीला मत्स्य प्रबंधन नुकसान घटा सकते हैं। गर्मी से निपटने की योजनाएं, शहरों को ठंडा रखने की रणनीतियां और जलवायु झटकों के प्रति मजबूत बुनियादी ढांचा, जमीन पर चरम गर्मी के दौरान जानें बचा सकते हैं।

यह तेज़ी कितने समय तक रह सकती है?

एरोसोल वायुमंडल से जल्दी बाहर हो जाते हैं। इसलिए उन्हें हटाने का असर ग्रीनहाउस गैसों के मुकाबले कम समय के पैमाने पर दिखता है। पूर्वी एशिया में उत्सर्जन का स्तर कम होकर स्थिर होने के साथ, तापवृद्धि को मिलने वाली अतिरिक्त तेजी कम होनी चाहिए और इसकी दर दीर्घकालिक ग्रीनहाउस गैस रुझान की ओर लौटनी चाहिए। फिर भी अनिश्चितताएं हैं। 2020 के जहाजरानी नियम महासागरों के ऊपर बादलों को प्रभावित करते रहेंगे और दूसरे क्षेत्र भी अपनी स्वच्छ-वायु मुहिम शुरू कर रहे हैं। प्राकृतिक चक्र इस रुझान में उतार-चढ़ाव जोड़ेंगे।

सैमसेट को उम्मीद है कि चीन में एरोसोल की आगे की कटौतियों का असर कम होगा, क्योंकि सबसे बड़ी कटौतियां पहले ही हो चुकी हैं।

चीन में हटाने के लिए अब बहुत ज्यादा वायु प्रदूषण बचा ही नहीं है।

अध्ययनों का व्यापक संदेश एक जैसा है। स्वच्छ हवा के पक्ष में स्वास्थ्य संबंधी तर्क अब भी मजबूत हैं। एरोसोल का परदा पतला हो जाने के बाद ग्रीनहाउस गैसों में गहरी और तेज़ कटौती का जलवायु संबंधी तर्क पहले से कहीं अधिक जरूरी है, कम नहीं।

विज्ञापन

एक नज़र में

  • 2010 के शुरुआती वर्षों से चीन में सल्फर डाइऑक्साइड और कणों का उत्सर्जन करीब 70 से 75 प्रतिशत घटा है, जिससे हवा की गुणवत्ता सुधरी और जानें बचीं।
  • एरोसोल सूरज की रोशनी परावर्तित करके और बादलों को अधिक चमकीला बनाकर ग्रह को ठंडा करते हैं, लेकिन उन्हें हटाने से ग्रीनहाउस गैसों के कारण हो रही तापवृद्धि सामने आती है।
  • मॉडलिंग अध्ययनों में पूर्वी एशिया में एरोसोल कटौती को वैश्विक तापवृद्धि में अतिरिक्त 0.07 C और करीब 2010 से तापवृद्धि की गति बढ़ने से जोड़ा गया है।
  • स्वच्छ हवा से जुड़ी तापवृद्धि पूर्वी एशिया और उत्तरी प्रशांत में सबसे अधिक है और संभवतः इसने समुद्री लू में योगदान दिया है।
  • 2020 के जहाजरानी सल्फर नियमों से समुद्र के ऊपर एरोसोल घटे, जिससे हाल की समुद्री लू के दौरान उत्तर अटलांटिक की तापवृद्धि में संभवतः इजाफा हुआ।
  • एरोसोल में कमी से तापवृद्धि की रफ्तार में आया उछाल संभवतः अस्थायी है, क्योंकि एरोसोल वायुमंडल में कम समय तक रहते हैं।
  • दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण अब भी ग्रीनहाउस गैसें हैं, इसलिए कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन में गहरी कटौती जरूरी है।
  • स्वास्थ्य की रक्षा के लिए स्वच्छ हवा की नीतियां जारी रहनी चाहिए और निकट अवधि की गर्मी सीमित करने के लिए इनके साथ तेज़ी से कार्बन उत्सर्जन घटाना तथा मीथेन पर लक्षित नियंत्रण जरूरी है।
यह लेख शेयर करें

आपको यह भी पसंद आ सकता है