दक्षिण चीन सागर में नियमों और संकल्प की परीक्षा
स्कारबरो शोल, सेकंड थॉमस शोल और अन्य विवादित समुद्री भू-आकृतियों के पास टकरावों ने दक्षिण चीन सागर को समुद्री व्यवस्था की दो बिल्कुल अलग अवधारणाओं की लगातार परीक्षा बना दिया है। चीन नौ-डैश रेखा के भीतर विदेशी सैन्य उड़ानों और गश्त को संप्रभुता का उल्लंघन बताता है। फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा तथा जापान जैसे साझेदारों का कहना है कि ये अभियान समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) के तहत नौवहन और ऊपर से उड़ान भरने के अधिकारों के दायरे में आते हैं। नतीजतन, तटरक्षक बलों, नौसेनाओं और समुद्री मिलिशिया के बीच अक्सर आमना-सामना होता है, जिससे टक्कर, चोट या इससे भी गंभीर घटनाओं का जोखिम बढ़ता है।
विषय-सूची
- दक्षिण चीन सागर में नियमों और संकल्प की परीक्षा
- संहिता वास्तव में क्या सुलझा सकती है
- कारगर संहिता में शामिल किए जा सकने वाले उपाय
- बातचीत बार-बार क्यों अटकती है
- तनाव के केंद्र और कार्रवाई-जवाबी कार्रवाई का चक्र
- आसियान की एकता और 2026 का लक्ष्य
- विवाद जारी रहते हुए समुद्र में जोखिम का प्रबंधन
- रोजमर्रा के काम में चालक दल किन उपायों पर भरोसा करते हैं
- दावों और आचरण को आकार देने वाली कानूनी बुनियाद
- अभी तनाव कैसे घटाएं
- मुख्य बातें
हाल के महीनों में तनावपूर्ण घटनाओं की एक शृंखला देखने को मिली। सेकंड थॉमस शोल पर फंसे BRP Sierra Madre तक फिलीपींस की रसद पहुंचाने की कोशिशों के दौरान टक्कर मारने, रास्ता रोकने और पानी की तेज बौछारें छोड़ने जैसी कार्रवाइयां हुईं। मनीला ने बताया कि जून 2024 के टकराव के दौरान चीनी कर्मियों ने धारदार औजारों का इस्तेमाल किया और जबरन उपकरण जब्त किए। स्कारबरो शोल पर फिलीपीनी गश्ती दलों को पानी की तेज धारों और लगातार पीछा करती नौकाओं का सामना करना पड़ा। चीन ने सबीना शोल के आसपास जहाजों की तादाद भी बढ़ाई और नए समुद्री नियमों की घोषणा की, जिनसे उसके तटरक्षक बल को विदेशी चालक दलों को लंबे समय तक हिरासत में रखने का अधिकार मिलता है। वियतनाम ने अपने कब्जे वाली समुद्री भू-आकृतियों पर निर्माण कार्य तेज किया, जिसमें एक नई हवाई पट्टी भी शामिल है, ताकि अपनी स्थिति मजबूत कर सके। हर कदम पर जवाबी कार्रवाई होती है और हर जवाबी कार्रवाई को दूसरा पक्ष शत्रुतापूर्ण मंशा का सबूत मानता है।
इस पृष्ठभूमि में चीन और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच लंबे समय से चर्चा में रही आचार संहिता (COC) को सुरक्षा-कवच के रूप में पेश किया जा रहा है। वार्ताकारों को उम्मीद है कि COC निकट टकरावों को नियंत्रित घटनाओं में बदल सकती है। लेकिन मूल समस्या प्रक्रियाओं से कहीं गहरी है। बीजिंग कई चट्टानों, शोल और जलक्षेत्रों को विवादित समुद्री क्षेत्र नहीं, बल्कि संप्रभु भूभाग मानता है। फिलीपींस और अन्य देश UNCLOS तथा 2016 के मध्यस्थता फैसले का हवाला देकर कहते हैं कि संबंधित क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा उनके विशेष आर्थिक क्षेत्रों (EEZs) और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में आता है। कानूनी तर्कों के बीच यही अंतर बताता है कि विवाद बार-बार क्यों उभरता है और केवल एक दस्तावेज समुद्र में नियमों को लेकर चल रही खींचतान क्यों नहीं सुलझा सकता।
संहिता वास्तव में क्या सुलझा सकती है
दो दशक की बातचीत का निचोड़ एक बुनियादी विचार है। COC का उद्देश्य संघर्ष का प्रबंधन करना है, यह तय करना नहीं कि किस द्वीप का मालिक कौन है या समुद्री सीमाएं कहां खींची जाएं। इससे संप्रभुता के दावे नहीं बदलेंगे। यह UNCLOS को फिर से नहीं लिखेगी। अगर यह कारगर रही, तो खतरनाक घटनाओं की आशंका घटेगी और संकट के दौरान देशों के बीच बातचीत जारी रखने में मदद मिलेगी।
कारगर संहिता में शामिल किए जा सकने वाले उपाय
एक विश्वसनीय COC पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को ऐसे व्यावहारिक कदम उठाने की प्रतिबद्धता दिला सकती है, जिनसे आमना-सामना अधिक सुरक्षित और अनुमानित हो। इनमें अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नौवहन और ऊपर से उड़ान भरने की स्वतंत्रता बनाए रखना, संयम बरतना, निर्जन समुद्री भू-आकृतियों पर कब्जा करने या निर्माण करने से बचना, नौसैनिक और कानून-प्रवर्तन जहाजों के लिए संचार तथा सुरक्षा प्रोटोकॉल बेहतर बनाना और मछुआरों को समुद्र में सुरक्षा मानकों का पालन करने का प्रशिक्षण देना शामिल है। यह संकट-संचार के लिए हॉटलाइन, घटनाओं की संयुक्त जांच के तंत्र, साझा खोज एवं बचाव प्रक्रियाएं और कानून-प्रवर्तन का संयुक्त प्रशिक्षण स्थापित कर सकती है। यह स्पष्ट अनुमति और आंकड़ा-साझाकरण नियमों के साथ समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण संरक्षण में सहयोग का रास्ता भी खोल सकती है। संहिता में इस बात पर असहमति होने पर मध्यस्थता की प्रक्रिया भी तय की जा सकती है कि उसके प्रावधानों की व्याख्या या उन्हें लागू कैसे किया जाए। इनमें से कोई भी उपाय संप्रभुता का विवाद नहीं सुलझाता, लेकिन दुर्घटना को बढ़ते टकराव में बदलने से रोक सकता है।
मजबूत COC को भी नए विवादों से बचने के लिए सावधानी से तैयार करना होगा। समझौते में दावों के अंतिम निपटारे या मौजूदा कानूनी रुख पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ना चाहिए। यह इतना लचीला होना चाहिए कि केवल उन देशों के बीच मत्स्य पालन, तेल और गैस तथा पर्यावरण संरक्षण पर विस्तृत अनुवर्ती बातचीत हो सके, जिनके दावे वास्तव में एक-दूसरे से टकराते हैं। संक्षेप में, इसका ध्यान सुरक्षा और स्थिरता पर होना चाहिए और साथ ही अलग-अलग तकनीकी व्यवस्थाओं के लिए गुंजाइश बनानी चाहिए, जो समुद्र में रोजमर्रा के तनावों से निपटें।
बातचीत बार-बार क्यों अटकती है
1990 के दशक से वार्ता खिंचती रही है, क्योंकि सबसे कठिन सवाल दक्षिण चीन सागर के तनाव के केंद्र में हैं। पहला सवाल भौगोलिक दायरे का है। चीन सीमित दायरे को तरजीह देता है, जिसमें कुछ संवेदनशील क्षेत्र प्रभावी रूप से संहिता से बाहर रहें। फिलीपींस और वियतनाम जैसे दावेदार चाहते हैं कि सभी विवादित समुद्री भू-आकृतियां इसमें शामिल हों, ताकि सबसे अधिक तनाव वाले केंद्र भी इसके दायरे में आएं। दूसरा सवाल कानूनी हैसियत का है। आसियान के कई देश ऐसा कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज चाहते हैं, जिसमें उल्लंघन के स्पष्ट परिणाम हों। चीन राजनीतिक महत्व वाले लचीले दस्तावेज को तरजीह देता है, न कि ऐसी संधि को जिसका इस्तेमाल उसके खिलाफ किया जा सके। तीसरा सवाल प्रवर्तन और विवाद निपटारे का है। कोई भी तंत्र जो असरदार होने लायक मजबूत हो, कम-से-कम एक पक्ष के विरोध का सामना करेगा। चौथा सवाल बाहरी देशों की सेनाओं की भूमिका का है। चीन का तर्क है कि बाहरी देशों की नौसेनाओं को संहिता के दायरे से बाहर रहना चाहिए, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देश बाहरी गश्त, बंदरगाहों पर आगमन और सैन्य अभ्यास को अधिक शक्तिशाली पड़ोसी के मुकाबले संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी मानते हैं।
समुद्र में मिले अनुभवों ने भी भरोसे की कमी को बढ़ाया है। 2002 की पक्षकारों के आचरण संबंधी घोषणा को आगे की राह का पहला कदम माना गया था। उसके बाद से भूमि-पुनरुद्धार, चौकियों का किलेबंदीकरण, खतरनाक तरीके से रोकना और नाकेबंदी जारी रहे। दावेदारों ने अपनी मौजूदगी बढ़ाई है और बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता विवादित समुद्र के और करीब आ गई है। व्यवहार में बदलाव लाए बिना बीतने वाला बातचीत का हर साल इस विश्वास को कमजोर करता है कि समुद्र में कठिन फैसला लेने की घड़ी आने पर नए दस्तावेज का सम्मान किया जाएगा।
तनाव के केंद्र और कार्रवाई-जवाबी कार्रवाई का चक्र
सबसे विस्फोटक तनाव-बिंदु बहुत कम बदले हैं। 2012 के गतिरोध के बाद चीन के कब्जे में आया स्कारबरो शोल फिलीपींस के मुख्य द्वीप के पास है। सेकंड थॉमस शोल BRP Sierra Madre का ठिकाना है, जो एक फंसा हुआ और जंग लगा जहाज है और जिसे मनीला छोटी सैन्य चौकी के रूप में इस्तेमाल करता है। सबीना शोल फिलीपींस के रसद काफिलों और चीनी जहाजों की रोक-टोक का केंद्र बन गया है। 2024 में टकरावों के बाद चीनी जहाजों की संख्या तेजी से बढ़ी और टक्कर मारने तथा बार-बार पानी की बौछारें छोड़ने की घटनाएं हुईं। फिलीपीनी कर्मियों ने चोट लगने और उपकरणों को नुकसान पहुंचने की खबर दी। मनीला ने गश्त बढ़ाकर, बड़े तटरक्षक जहाज तैनात करके और एक नई व्यापक द्वीपसमूह रक्षा अवधारणा अपनाकर जवाब दिया। यह अवधारणा मौजूदगी, अड्डों के उन्नयन, नए सेंसर और साझेदारों के साथ सहयोग को प्राथमिकता देती है।
बाहरी देशों के साथ रक्षा सहयोग भी बढ़ा। अमेरिका ने फिलीपींस के साथ सैन्य अभ्यास बढ़ाए और प्रशिक्षण के लिए Typhon भूमि-आधारित मिसाइल प्रणाली फिलीपीनी क्षेत्र में तैनात की। ऑस्ट्रेलिया और जापान ने फिलीपीनी बलों के साथ संयुक्त समुद्री गश्त और अभ्यास किए। वियतनाम ने कब्जे वाली समुद्री भू-आकृतियों पर निर्माण जारी रखकर अपनी स्थिति मजबूत की। राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्रों और साझेदारियों के तहत वैध इन कदमों से बीजिंग की यह चिंता बढ़ी कि प्रतिद्वंद्वी सेनाएं उसके दावों वाले समुद्री भू-भागों के पास उसके अभियानों को घेरना चाहती हैं।
प्रमुख लोकतांत्रिक देशों ने कहा कि वे दबावपूर्ण व्यवहार को नजरअंदाज नहीं करेंगे। ग्रुप ऑफ सेवन (G7) के नेताओं ने चीन पर ऐसे कदम उठाने का आरोप लगाया, जो समुद्री सुरक्षा को खतरे में डालते हैं। इनमें भूमि-पुनरुद्धार, चौकियों का निर्माण और उनका सैन्य इस्तेमाल शामिल है। उन्होंने कहा कि चीनी बलों ने अन्य दावेदारों और विदेशी जहाजों के खिलाफ दबावपूर्ण और खतरनाक तरीके अपनाए हैं।
G7 ने समुद्री सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गैरकानूनी, उकसावेपूर्ण, दबावपूर्ण और खतरनाक कार्रवाइयों की निंदा की। इनमें भूमि-पुनरुद्धार और सैन्य इस्तेमाल के लिए चौकियों का निर्माण शामिल है।
चीन इन आरोपों को खारिज करता है। वार्ता के एक दौर के बाद विदेश मंत्री वांग यी ने दक्षिण चीन सागर को एशिया का मामला बताया, जिसे बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता या हस्तक्षेप का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए।
एशिया बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा नहीं है।
मनीला के लिए समाधान कूटनीतिक होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी होना चाहिए। राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने 2026 में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन की फिलीपींस की अध्यक्षता को वास्तविक COC हासिल करने की कोशिश से जोड़ा है। उन्होंने कहा है कि फिलीपींस बाध्यकारी नतीजे के लिए प्रयास जारी रखेगा और प्रक्रिया धीमी होने के कारण कोशिशें नहीं छोड़ेगा।
हार मानना कोई विकल्प नहीं है।
आसियान की एकता और 2026 का लक्ष्य
आसियान ने समूह की आम सहमति वाली व्यवस्था को टूटने से बचाते हुए दक्षिण चीन सागर के सवाल को संभालने की कोशिश में दशकों बिताए हैं। अलग-अलग सदस्यों के हित और चीन के साथ उनके रिश्ते अलग हैं। घटनाएं भड़कने पर एकजुट रुख बनाए रखना इससे मुश्किल हो जाता है। समुद्री अधिकारों के मामले में फिलीपींस के पक्ष में 2016 के मध्यस्थता फैसले के बाद आसियान ने सामूहिक रूप से उस फैसले का समर्थन नहीं किया। उसके बयान अक्सर अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान, नौवहन और ऊपर से उड़ान भरने की स्वतंत्रता तथा संयम बरतने की जरूरत पर जोर देते हैं। इस रुख से संवाद खुला रहता है, लेकिन हर राजधानी को समझौते और विरोध का अपना मिला-जुला रास्ता अपनाने की गुंजाइश भी मिलती है।
इस जटिलता के बावजूद, प्रगति के संकेत दिख रहे हैं। वार्ताकारों ने हाल के महीनों में मसौदे का तीसरा वाचन पूरा किया और मलेशिया की मौजूदा अध्यक्षता 2026 में मनीला को कमान सौंपने से पहले प्रक्रिया को स्थिर करने पर केंद्रित है। चीनी अधिकारियों का कहना है कि वे आसियान के साथ COC को अंतिम रूप देने का समर्थन करते हैं। वे इसे दावों पर रियायत देने के बजाय क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता का संकेत बताते हैं।
बीजिंग के साथ विचार-विमर्श के बाद मलेशिया के रक्षा नेतृत्व ने क्षेत्र को चीन का संदेश देते हुए कहा कि वह वार्ता पूरी करने के पक्ष में है।
चीन आचार संहिता बनाने का समर्थन करता है और इसके साकार होने की उम्मीद करता है।
क्या इससे दायरे, कानूनी हैसियत और बाहरी शक्तियों की भूमिका पर समझौते हो पाएंगे, यह अब भी अनिश्चित है। तय समयसीमा प्रगति को गति दे सकती है, लेकिन अपने आप वैचारिक मतभेद दूर नहीं कर सकती।
विवाद जारी रहते हुए समुद्र में जोखिम का प्रबंधन
बाध्यकारी संहिता न होने का मतलब यह नहीं कि नौसेनाओं और तटरक्षक बलों के पास कोई दिशा-निर्देश नहीं हैं। प्रशांत क्षेत्र की समुद्री सेनाएं समुद्र में अनियोजित मुलाकातों के लिए आचार संहिता (CUES) का इस्तेमाल करती हैं। यह 2014 में अपनाई गई सुरक्षा और संचार संबंधी स्वैच्छिक निर्देश-पुस्तिका है। दक्षिण-पूर्व एशियाई नौसेनाएं 2019 के आसियान नौसेना प्रमुखों के समुद्री संपर्क दिशानिर्देशों (GMI) का भी पालन करती हैं, जिनका उद्देश्य गलत आकलन घटाना और सामान्य संपर्कों के दौरान स्थिति को अधिक अनुमानित बनाना है। ये साधन मददगार हैं, लेकिन बाध्यकारी नहीं हैं और कानून-प्रवर्तन से जुड़े टकरावों, आम नागरिकों के रसद पहुंचाने वाले अभियानों या समुद्री मिलिशिया के व्यवहार को संबोधित नहीं करते।
रोजमर्रा के काम में चालक दल किन उपायों पर भरोसा करते हैं
राजधानियों और कमान केंद्रों के बीच हॉटलाइन का तुरंत और अधिकारपूर्वक इस्तेमाल हो, तो तनावपूर्ण हालात को शांत किया जा सकता है। खोज एवं बचाव के साझा अभ्यासों से आपसी परिचय बढ़ता है, जो तूफान या टक्कर की स्थिति में जान बचा सकता है। मानक रेडियो वाक्यांशों और रोकने की कार्रवाई के दौरान गति तथा दूरी के नियमों जैसे संकेत प्रोटोकॉल से अधिकारियों को सुरक्षित फैसले लेने में मदद मिलती है, भले ही आदेश सख्त हों। घटना होने पर निष्पक्ष तथ्य-जांच और घटना के बाद चर्चा से मामला बंद करने, अफवाहें घटाने और अगली मुलाकात के लिए एक तय तरीका बनाने में मदद मिल सकती है। COC ऐसे उपायों को अधिक मजबूती से शामिल कर सकती है, साथ ही उन्हें अद्यतन रखने के लिए स्थायी कार्य-निर्देश और नियमित समीक्षा भी तय कर सकती है।
दावों और आचरण को आकार देने वाली कानूनी बुनियाद
कानूनी संदर्भ समझने से पता चलता है कि दोनों पक्षों के नैरेटिव में इतनी बड़ी खाई क्यों है। UNCLOS समुद्री क्षेत्रों की परिभाषा देता है, जिनमें 12 समुद्री मील का प्रादेशिक समुद्र, 200 समुद्री मील का विशेष आर्थिक क्षेत्र और महाद्वीपीय शेल्फ के अधिकार शामिल हैं। यह यह भी तय करता है कि द्वीप, चट्टान और निम्न-ज्वार पर जल से ऊपर रहने वाली भूमि जैसी अलग-अलग प्रकार की भू-आकृतियों से समुद्री क्षेत्र बनते हैं या नहीं। 2016 में, फिलीपींस द्वारा लाए गए मामले में UNCLOS के तहत गठित न्यायाधिकरण ने चीन की नौ-डैश रेखा का कोई कानूनी आधार नहीं पाया और निष्कर्ष निकाला कि कई समुद्री भू-आकृतियों से EEZ नहीं बन सकते। चीन ने फैसले को खारिज किया, लेकिन इसने समुद्र में आचरण को लेकर कई देशों के आकलन और विवादित क्षेत्रों में अपने अभियानों को तय करने के उनके तरीके को प्रभावित किया है।
कानूनी रुख और व्यवहार हमेशा एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। चीन ने आधार रेखाएं और घरेलू नियम घोषित किए हैं, जिनके बारे में दूसरे देशों का कहना है कि वे UNCLOS के विपरीत हैं। दावेदार कभी-कभी जहाजों और विमानों के जरिए कानून की अपनी व्याख्या लागू करते हैं। इससे प्रबंधन की समस्या कठिन हो जाती है। मजबूत भाषा वाली प्रभावी COC भी ऐसे माहौल में लागू होगी जहां परस्पर विरोधी कानूनी दावे बने हुए हैं और समुद्र में आचरण ही बातचीत के अगले दौर का माहौल तय करता है।
अभी तनाव कैसे घटाएं
सबसे बड़े सवालों पर सहमति न होने के बावजूद, दावेदार सीमित समझौते कर सकते हैं जिनसे लाभ मिले। कई कदम तेजी से जोखिम घटाएंगे, सद्भावना का संकेत देंगे और सहयोग की आदतें बनाएंगे।
पहला, कानून-प्रवर्तन के दौरान आमना-सामना होने पर सुरक्षा प्रोटोकॉल तय करें। एक अलग परिशिष्ट में रोकने की कार्रवाई के दौरान गति-सीमा, न्यूनतम दूरी और तटरक्षक तथा मत्स्य-प्रवर्तन जहाजों के लिए अंग्रेजी और चीनी में रेडियो वाक्यांश तय किए जा सकते हैं। नियमित संयुक्त प्रशिक्षण से चालक दल को दबाव में इन नियमों को लागू करने में मदद मिलेगी।
दूसरा, खोज एवं बचाव सहयोग बढ़ाएं। बचाव संसाधनों का साझा नक्शा और घटना की रिपोर्टिंग का एक समान प्रारूप प्रतिक्रिया समय घटाएगा। वार्षिक अभ्यास दावेदार देशों के बीच बारी-बारी से हो सकते हैं और इनमें घायल कर्मियों तथा क्षतिग्रस्त जहाजों से निपटने की प्रक्रियाएं शामिल की जा सकती हैं, चाहे उनका ध्वज किसी भी देश का हो।
तीसरा, घटनाओं की रोकथाम और समीक्षा का वास्तविक समय वाला तंत्र स्थापित करें। दावेदार देशों के संपर्क अधिकारियों की एक छोटी टीम घटनाओं का रिकॉर्ड रख सकती है, हॉटलाइन के इस्तेमाल में तालमेल कर सकती है और सुधार के सुझाव दे सकती है। उसके निष्कर्ष बाध्यकारी नहीं होंगे, लेकिन घटनाओं के पैटर्न साफ दिखेंगे और उन्हें संबोधित करना आसान होगा।
चौथा, ऐसे पर्यावरण और मत्स्य पालन संबंधी कदमों पर सहमत हों जो दावों को प्रभावित न करें। मौसम के हिसाब से मछली पकड़ने पर रोक, विनाशकारी तरीकों के खिलाफ संयुक्त गश्त और प्रवाल भित्तियों की सेहत की साझा निगरानी, संप्रभुता का जिक्र किए बिना साझा संसाधनों की रक्षा करेगी। कम तनाव वाले क्षेत्रों में मिश्रित चालक दलों के साथ वैज्ञानिक अनुसंधान यात्राएं आंकड़े जुटाने पर केंद्रित हो सकती हैं।
पांचवां, सैन्य अभ्यासों और समुद्री आवागमन के लिए अनुमानित तरीके अपनाएं। बड़े अभ्यासों की पूर्व सूचना, कब्जे वाली समुद्री भू-आकृतियों से पहले से तय दूरी और विमानों की रोशनी तथा रेडियो संदेशों के नियमों से स्थिति अधिक स्पष्ट होगी। ये कदम समुद्र या हवा में वैध गतिविधि को सीमित नहीं करते, लेकिन मंशा समझना आसान बनाते हैं।
इनमें से कोई भी कदम संप्रभुता के विवाद में यह तय नहीं करता कि कौन सही है। लेकिन इनसे यह जरूर दिखता है कि प्रतिद्वंद्वी बहस के बीच भी जिम्मेदारी से काम कर सकते हैं। छोटे कदमों पर प्रगति भरोसा बढ़ा सकती है और भविष्य की COC को कागजी वादे से अधिक बना सकती है।
मुख्य बातें
- चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों के समुद्री व्यवस्था पर परस्पर विरोधी कानूनी विचार हैं। बीजिंग बड़े क्षेत्रों को अपना संप्रभु जलक्षेत्र मानता है, जबकि दूसरे देश UNCLOS के तहत मिले अधिकारों का हवाला देते हैं।
- प्रस्तावित आचार संहिता संघर्ष-प्रबंधन का साधन है, संप्रभुता तय करने या समुद्री सीमाएं फिर से खींचने का तंत्र नहीं।
- असहमति के प्रमुख मुद्दों में संहिता का भौगोलिक दायरा, उसका कानूनी रूप से बाध्यकारी होना, उसे लागू करने का तरीका और बाहरी देशों की सेनाओं की भूमिका शामिल हैं।
- 2024 में स्कारबरो शोल, सेकंड थॉमस शोल और सबीना शोल पर टक्कर मारने, पानी की बौछारें छोड़ने और खतरनाक तरीके से रोकने की घटनाएं हुईं।
- फिलीपींस ने रक्षा की नई अवधारणा अपनाई और साझेदार देशों के साथ सहयोग बढ़ाया, जबकि वियतनाम ने अपने कब्जे वाली समुद्री भू-आकृतियों पर निर्माण तेज किया।
- चीन का कहना है कि वह आसियान के साथ COC को अंतिम रूप देने का समर्थन करता है, लेकिन मूल मुद्दों पर उसका पसंदीदा तरीका आसियान के कई दावेदार देशों से अलग है।
- CUES और आसियान के नौसैनिक दिशानिर्देश आमना-सामना संभालने में मदद करते हैं, लेकिन वे स्वैच्छिक हैं और कानून-प्रवर्तन से जुड़ी कई स्थितियों को शामिल नहीं करते।
- 2016 के न्यायाधिकरण फैसले ने नौ-डैश रेखा को अमान्य ठहराया और कई देशों के आचरण को आकार दिया, जबकि चीन इस फैसले को खारिज करता है।
- साझा हॉटलाइन, खोज एवं बचाव सहयोग, सुरक्षा प्रोटोकॉल और पर्यावरण संबंधी उपाय जैसे व्यावहारिक कदम अभी जोखिम घटा सकते हैं।
- फिलीपीनी अध्यक्षता में 2026 का आसियान लक्ष्य वार्ता को गति दे सकता है, लेकिन केवल समयसीमा से बुनियादी मतभेद दूर नहीं होंगे।






