प्रतिबंधों के दबाव से भारतीय तेल शोधन क्षेत्र को नई रणनीति पर विचार करना पड़ा
रूस के सबसे बड़े तेल उत्पादकों पर अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों से उन व्यापार मार्गों में बाधा आई है, जिनके जरिए करीब तीन साल तक सस्ता कच्चा तेल पहुंचता रहा। इससे भारतीय तेल शोधन क्षेत्र अब अधिक लागत वाले दौर में प्रवेश कर रहा है। रूसी तेल को खासा सस्ता बनाने वाली छूट घट गई है, बैंकों और बीमा कंपनियों ने अनुपालन जांच कड़ी कर दी है और प्रतिबंधित आपूर्तिकर्ताओं से जुड़े कार्गो के लेनदेन में जोखिम बढ़ गया है। भारतीय रिफाइनरियों को अब कच्चे तेल के मिश्रण में बदलाव करना, वैकल्पिक किस्मों के लिए अधिक भुगतान करना और लचीलापन घटने के कारण प्रसंस्करण योजनाओं में कटौती करनी पड़ रही है।
विषय-सूची
- प्रतिबंधों के दबाव से भारतीय तेल शोधन क्षेत्र को नई रणनीति पर विचार करना पड़ा
- रूसी तेल पर छूट क्यों घट रही है
- नए नियमों में क्या बदला है और कब तक
- भारतीय रिफाइनरियां आपूर्ति का ढांचा कैसे बदल रही हैं
- रिलायंस इंडस्ट्रीज
- इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन
- सरकारी रिफाइनरियां और एमआरपीएल
- नायरा एनर्जी
- प्रसंस्करण दरें, मार्जिन और उपभोक्ताओं पर असर
- भुगतान, जहाजरानी और छाया बेड़ा
- चीन, कीमतें और वैश्विक असर
- रूसी तेल की जगह क्या ले सकता है
- नई दिल्ली में नीतिगत गणना
- निष्कर्ष
भारत अपने यहां प्रसंस्कृत होने वाले कच्चे तेल का करीब 86 प्रतिशत आयात करता है। 2022 के मध्य से रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया और अक्सर कुल आयात का लगभग एक तिहाई हिस्सा उपलब्ध कराता रहा। चरम पर रूस से प्रतिदिन 17 लाख बैरल से अधिक तेल आता था। इसका बड़ा हिस्सा रोसनेफ्ट और लुकोइल की बिक्री से जुड़ा था, जिस पर मध्य पूर्व के मानकों के मुकाबले प्रति बैरल 8 से 12 डॉलर की छूट मिलती थी और बिचौलियों के जरिए भुगतान करना आसान था। यह अवसर तेजी से खत्म हो रहा है, क्योंकि अब प्रतिबंधों का निशाना सिर्फ उत्पादक नहीं, बल्कि वे जहाजरानी, बीमा और व्यापार नेटवर्क भी हैं, जिनसे बड़े पैमाने पर तेल एशिया पहुंचता था।
रूसी तेल पर छूट क्यों घट रही है
नए कदमों ने उन व्यवस्थाओं को प्रभावित किया है, जिनसे रूसी तेल भारत पहुंचता था। जहाजरानी कंपनियों और समुद्री बीमा कंपनियों को दंड का सामना करना पड़ रहा है, व्यापारी प्रतिबंधों की चपेट में आने से बच रहे हैं और भुगतान निपटाने में बैंक पहले से कहीं अधिक सतर्क हो गए हैं। नतीजतन, कई रूसी किस्मों पर मिलने वाली छूट डिलीवरी के आधार पर घट गई है या खत्म हो गई है, जबकि जोखिम प्रीमियम बढ़ा है। व्यापारियों और रिफाइनरी अधिकारियों के अनुसार, कुछ वैकल्पिक कार्गो के लिए भारत की आयात लागत दुबई से जुड़े औसत भाव से करीब 5 डॉलर प्रति बैरल अधिक है। इस वित्त वर्ष में भारत के कच्चे तेल के आयात में रूस की हिस्सेदारी घटकर लगभग 34 प्रतिशत रह गई है, जो पिछले दो वर्षों में करीब 36 प्रतिशत थी।
गैर-पश्चिमी बिचौलियों के जरिए बड़े आयात को सहारा देने वाले भुगतान मार्ग अब कम भरोसेमंद हैं। अनुपालन टीमें यह जांच रही हैं कि लदान के दस्तावेजों में रोसनेफ्ट या लुकोइल का कोई उल्लेख तो नहीं है। प्रतिबंधित कंपनियों से जुड़ी संस्थाओं के जरिए बुक किए गए कई कार्गो रद्द कर दिए गए हैं। नतीजतन, खरीद व्यवस्था नए सिरे से बनाई जा रही है। रिफाइनरियां अधिक स्थिर आपूर्ति पाने के लिए मध्य पूर्व, पश्चिम अफ्रीका, ब्राजील और अमेरिका की ओर रुख कर रही हैं, भले ही इसकी लागत अधिक हो।
नए नियमों में क्या बदला है और कब तक
वॉशिंगटन के प्रतिबंध सीधे रोसनेफ्ट और लुकोइल को निशाना बनाते हैं। कंपनियों से कहा गया है कि वे 21 नवंबर तक इन उत्पादकों के साथ लेनदेन बंद कर दें और वित्तीय संस्थाओं से इस समयसीमा का पालन कराने की अपेक्षा है। इन प्रतिबंधों का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बैंक ऐसे कार्गो का भुगतान करते हैं या नहीं, जिनका संबंध प्रतिबंधित कंपनियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दिखता हो। घोषणा के बाद तेल की कीमतें उछल गईं। कारोबारियों ने कम उपलब्धता और अधिक मालभाड़े की आशंका को कीमतों में शामिल करते हुए ब्रेंट कच्चे तेल के भाव में कई प्रतिशत की तेजी दर्ज की।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि लक्ष्य रूस के युद्ध प्रयासों के लिए धन का प्रवाह रोकना है, साथ ही बाजार में इतना तेल बनाए रखना है कि कीमतों में तेज उछाल न आए। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने संदेश साफ तौर पर रखा।
इन प्रतिबंधों का मकसद क्रेमलिन की युद्ध मशीन के लिए धन का प्रवाह रोकना और सहयोगी देशों को इसमें शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करना है।
भारत ने रूसी तेल पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया है। सरकार का सार्वजनिक रुख अब भी यही है कि खरीद के फैसले ऊर्जा सुरक्षा, वहनीयता और 1.4 अरब लोगों की जरूरतें पूरी करने के आधार पर होते हैं। रिफाइनरियां इसी दायरे में बदलाव कर रही हैं: जहां प्रतिबंधों का जोखिम सबसे ज्यादा है, वहां अपनी निर्भरता घटा रही हैं और ऐसे रूसी कार्गो के लिए नियमों के अनुरूप रास्ते तलाश रही हैं, जो कानूनी और बैंकिंग शर्तें पूरी करते हों।
भारतीय रिफाइनरियां आपूर्ति का ढांचा कैसे बदल रही हैं
उद्योग की प्रतिक्रिया निविदाओं और व्यापार प्रवाह में साफ दिख रही है। प्रसंस्करण कंपनियां कार्गो के स्रोतों में विविधता लाने, खाड़ी क्षेत्र के पारंपरिक साझेदारों से अधिक दीर्घकालीन आपूर्ति सुरक्षित करने और अतिरिक्त बैरल के लिए अटलांटिक बेसिन का रुख करने में तेजी दिखा रही हैं। कुछ रूसी तेल ऐसे विक्रेताओं के जरिए अब भी आ सकते हैं जिन पर प्रतिबंध नहीं है, लेकिन रिफाइनरियां हाल के महीनों के मुकाबले काफी कम आपूर्ति की तैयारी कर रही हैं।
रिलायंस इंडस्ट्रीज
भारत की सबसे बड़ी निजी रिफाइनरी 2022 से रूसी कच्चे तेल की सबसे बड़ी खरीदार रही है। नए उपायों के बाद अधिकारियों को उम्मीद है कि रोसनेफ्ट और लुकोइल से जुड़े तेल का प्रवाह न्यूनतम रह जाएगा। रिलायंस ने विकल्प तलाशने के लिए हाजिर बाजार में सक्रियता बढ़ाई है और मध्य पूर्व, अमेरिका तथा ब्राजील से कार्गो खरीदे हैं। हाल की खरीद में कतर का अल शहीन, इराक का बसरा मीडियम, अबू धाबी का मुरबान और अपर जाकुम, साथ ही अमेरिका के वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट और मार्स जैसे तेल शामिल हैं। कंपनी ने संकेत दिया है कि वह प्रतिबंधों का पालन करेगी और मौजूदा आपूर्तिकर्ताओं के साथ संबंध बनाए रखेगी, जहां लेनदेन कानूनन वैध हैं।
इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन
आईओसी ने प्रतिबंधित उत्पादकों के प्रति अपने जोखिम की समीक्षा के दौरान शुरुआत में रूस के साथ नए अनुबंध रोक दिए थे। बाद में उसने नियमों के अनुरूप सीमित खरीद फिर शुरू की और गैर-प्रतिबंधित विक्रेताओं से दिसंबर में पहुंचने वाले पांच कार्गो खरीदे। इनमें कुछ ईएसपीओ कच्चा तेल भी शामिल है, जिसकी कीमत दुबई के भाव के लगभग बराबर बताई गई। इसकी वजह चीन की सरकारी रिफाइनरियों की खरीद रोकने के बाद वहां से मांग का कमजोर होना है। आईओसी ने 2026 की पहली तिमाही के लिए अमेरिका महाद्वीप से 2.4 करोड़ बैरल तक तेल खरीदने की संभावनाएं तलाशने के लिए निविदा भी जारी की है। इसके अलावा, उसने अंगोला और नाइजीरिया समेत पश्चिम अफ्रीका से अतिरिक्त तेल खरीदा है, ताकि व्यावहारिक कीमतों पर अपने कच्चे तेल के मिश्रण को संतुलित रख सके।
सरकारी रिफाइनरियां और एमआरपीएल
मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स ने खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति की ओर रुख किया है। उसने हाल में निविदा के जरिए अबू धाबी का 20 लाख बैरल मुरबान खरीदकर रूसी तेल की जगह लेने की व्यवस्था की। रिफाइनरी आने वाले महीनों में हाजिर बाजार से खरीद और दीर्घकालीन आपूर्तिकर्ताओं पर अधिक निर्भर रहने की योजना बना रही है। भारत पेट्रोलियम और एचपीसीएल मित्तल एनर्जी ने रूसी तेल पर निर्भरता घटाई है और अमेरिका तथा खाड़ी क्षेत्र से खरीद बढ़ाई है। यह जोखिम घटाने और आपूर्ति में विविधता लाने की व्यापक सरकारी क्षेत्र की रणनीति के अनुरूप है।
नायरा एनर्जी
नायरा के शेयरधारिता ढांचे में रोसनेफ्ट का प्रभाव है, इसलिए उसके सामने कड़ी पाबंदियां हैं। कम समय में रूसी तेल का विकल्प ढूंढने के उसके विकल्प सीमित हैं। वैकल्पिक स्रोतों से स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित होने तक रिफाइनरी को अपना प्रसंस्करण घटाना या कच्चे तेल की गुणवत्ता में बदलाव करना पड़ सकता है।
पूरे क्षेत्र के अधिकारी रूसी तेल की आपूर्ति तत्काल बंद होने के बजाय उसमें तेज गिरावट की उम्मीद कर रहे हैं। कुछ बैरल ऐसे बिचौलियों के जरिए भारत पहुंच सकते हैं जो प्रतिबंधों के दायरे से बाहर हैं, लेकिन लदान के दस्तावेजों में सूचीबद्ध उत्पादकों से सीधा संबंध दिखने पर बैंक संभवतः उन कार्गो का भुगतान रोक देंगे।
प्रसंस्करण दरें, मार्जिन और उपभोक्ताओं पर असर
सितंबर तक भारत में कच्चे तेल का कुल प्रसंस्करण करीब 19 महीनों के सबसे निचले स्तर पर आ गया। सार्वजनिक रूप से रिफाइनरियों ने निर्धारित रखरखाव को इसकी वजह बताया, लेकिन प्रबंधक मानते हैं कि सस्ते रूसी मिश्रित तेल की उपलब्धता में लचीलापन घटने से योजनाएं अधिक सख्ती से बनानी पड़ रही हैं। जब छूट अधिक थी, तब प्रसंस्करण कंपनियां ज्यादा उत्पादन कर सकती थीं, भंडार जमा कर सकती थीं और बेहतर मार्जिन के लिए परिष्कृत उत्पादों के निर्यात का समय तय कर सकती थीं। अब छूट घटने और मालभाड़ा बढ़ने से हर कार्गो का फैसला अधिक जोखिम भरा और कम गुंजाइश वाला हो गया है।
फिलहाल पेट्रोल पंपों पर खुदरा कीमतें नहीं बदली हैं। हालांकि, कच्चे तेल के भाव चढ़ने या रुपये के कमजोर होने पर विपणन मार्जिन पर दबाव पड़ता है। तेल विपणन कंपनियां कुछ समय तक बढ़ी हुई इनपुट लागत का बोझ उठा सकती हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है। अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और विकल्प के रूप में खरीदे गए बैरल महंगे रहते हैं, तो खुदरा कीमतों में चुनिंदा बढ़ोतरी या अस्थायी राजकोषीय सहायता जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। बाजार रणनीतिकारों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी से आयात बिल बढ़ सकता है और महंगाई का जोखिम गहरा सकता है, जिससे मौद्रिक नीति और राजकोषीय गणना जटिल होगी।
भुगतान, जहाजरानी और छाया बेड़ा
प्रतिबंधों का जोखिम अब तेल कुओं से हटकर तेल ढोने वाले दस्तावेजों तक पहुंच गया है। बैंक हर कार्गो के स्रोत की साफ जानकारी मांग रहे हैं। अगर लदान के दस्तावेज में कहीं भी रोसनेफ्ट या लुकोइल का नाम हो, तो वित्त विभाग साख पत्र मंजूर करने से हिचकते हैं। कुछ व्यापारी गैर-प्रतिबंधित संस्थाओं के जरिए कई चरणों में हस्तांतरण की संभावनाएं तलाश रहे हैं, लेकिन इससे कारोबारी साझेदारों और उनके बैंकरों के लिए कानूनी और प्रतिष्ठा संबंधी जोखिम बढ़ जाता है। कार्गो नियमों के अनुरूप होने पर भी भुगतान मंजूरी में देरी से लागत और अनिश्चितता बढ़ती है।
समुद्र में हाल के प्रतिबंधों के तहत 180 से अधिक जहाजों को सूचीबद्ध किया गया है। इनमें से कई रूस का तेल एशिया पहुंचाते रहे हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि नए निशाने पर आए जहाजों में से करीब 95 प्रतिशत ने पिछले साल रूस से निकला तेल ढोया था। इनमें भारत को पहुंचाए गए प्रतिदिन लगभग 4.5 लाख बैरल भी शामिल हैं। स्वीकार्य टैंकरों की संख्या घटने से मालभाड़ा बढ़ रहा है और यात्रा की योजना बनाना अधिक जटिल हो गया है। जहाजों का झंडा बदलना या उनका स्वामित्व बदलना आगे चलकर वैकल्पिक रास्ते दे सकता है, लेकिन इन कदमों में समय लगता है। हर अतिरिक्त हस्तांतरण या चार्टर प्रीमियम से विक्रेता को मिलने वाली शुद्ध कीमत घटती है और खरीदार की पहुंच लागत बढ़ती है।
चीन, कीमतें और वैश्विक असर
रूसी कच्चे तेल के दो सबसे बड़े बाजार चीन और भारत हैं। चीन आम तौर पर पाइपलाइन और जहाजों के जरिए पूर्वी साइबेरिया-पैसिफिक महासागर का तेल लेता है, जबकि भारत मुख्य रूप से टैंकरों से यूराल्स खरीदता है। अमेरिका की हाल की कार्रवाई के बाद चीन की बड़ी सरकारी कंपनियों ने प्रतिबंधित रूसी उत्पादकों से जुड़े तेल की डिलीवरी रोक दी है और अनुपालन टीमें अपने जोखिम की समीक्षा कर रही हैं। चीन की छोटी स्वतंत्र प्रसंस्करण कंपनियां खरीद जारी रख सकती हैं, लेकिन कम मात्रा में और अधिक सावधानी से। भारतीय रिफाइनरियों ने प्रतिबंधित कंपनियों से जुड़े सीधे सौदों को काफी हद तक रोक दिया है और जांच रही हैं कि गैर-प्रतिबंधित विक्रेताओं का तेल बैंकिंग जांच से गुजर सकता है या नहीं।
इस वापसी से मध्य पूर्व और अटलांटिक बेसिन की किस्मों के बाजार में पहले ही कमी आ गई है। चीन और भारत की मांग के इन स्रोतों की ओर लौटने से मुरबान, बसरा मीडियम, अपर जाकुम और पश्चिम अफ्रीका के चुनिंदा कच्चे तेल पर हाजिर प्रीमियम बढ़ा है। प्रतिबंधों की घोषणा के बाद ब्रेंट कच्चा तेल हाल के औसत भाव से ऊपर चला गया। कारोबारियों को उम्मीद है कि नए प्रतिबंधों के तहत खरीदार और विक्रेता संभावनाएं परखेंगे, इसलिए कीमतों में उतार-चढ़ाव लगातार बना रहेगा। दक्षिण और पूर्वी एशिया तक पहुंचने वाली कीमतों को बढ़ाने वाला एक और कारक मालभाड़ा है।
रूसी तेल की जगह क्या ले सकता है
रूसी यूराल्स का कोई एक विकल्प नहीं है। यह मध्यम सल्फर वाला कच्चा तेल है, जो भारत की जटिल रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त है। इसके सबसे करीब की किस्में खाड़ी क्षेत्र में मिलती हैं। इराक का बसरा मीडियम और अबू धाबी का अपर जाकुम समान उत्पाद और सल्फर स्तर देते हैं, जबकि सऊदी अरब की आपूर्ति मिश्रण के भारी हिस्से की जरूरत पूरी कर सकती है। जहां जरूरत हो, वहां पेट्रोल और नैफ्था का संतुलित उत्पादन बनाए रखने के लिए मुरबान और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई जैसी हल्की किस्मों को मिलाया जा सकता है। ब्राजील के बुज़ियोस और तुपी भी विकल्प हैं, हालांकि दक्षिण अटलांटिक से उनकी आपूर्ति का समय और मालभाड़ा सावधानी से तय करना होगा।
अमेरिका से तेल की आपूर्ति पहले ही बढ़ रही है। अक्टूबर में भारत को अमेरिकी कच्चे तेल की आपूर्ति करीब 5.75 लाख बैरल प्रतिदिन रही, जो 2022 के बाद सबसे अधिक है। निविदाओं से संकेत मिलता है कि इसमें और बढ़ोतरी होगी। इंडियन ऑयल ने 2026 की शुरुआत के लिए विकल्प बढ़ाने के मकसद से अमेरिका महाद्वीप से 2.4 करोड़ बैरल तक तेल मांगा है। अंगोला और नाइजीरिया से पश्चिम अफ्रीकी तेल भी आपूर्ति की कमी पूरी कर रहा है, हालांकि अटलांटिक बेसिन के तेल की चीन में बढ़ती मांग से भारत के लिए मार्जिन बचाने वाली कीमत पर खरीद की गुंजाइश सीमित होती है।
रिफाइनरियों का कहना है कि अगर वैकल्पिक आपूर्ति स्थिर हो जाती है, तो रूसी तेल की जगह लेने से भारत का सालाना आयात बिल 2 प्रतिशत से कम बढ़ सकता है। फिर भी, मौजूदा पहुंच लागत उस दौर से अधिक है जब छूट बड़ी थी। कीमतों के उतार-चढ़ाव को संभालने के उपायों में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का अधिक सक्रिय उपयोग, घरेलू उत्पादन में अतिरिक्त बढ़ोतरी और स्थानीय मांग तथा अंतरराष्ट्रीय रिफाइनिंग मार्जिन के बीच संतुलन बनाते हुए परिष्कृत उत्पादों के निर्यात का समय तय करना शामिल है। प्राथमिकता यह है कि वित्तीय या अनुपालन संबंधी दबाव पैदा किए बिना रिफाइनरियों को पर्याप्त आपूर्ति मिलती रहे।
नई दिल्ली में नीतिगत गणना
अधिकारियों ने संकेत दिया है कि खरीद के फैसले वहनीय कीमतों पर ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने और बैंकिंग तथा जहाजरानी में व्यवधान से बचने के आधार पर लिए जाते हैं। भारत ने एकतरफा प्रतिबंधों का समर्थन नहीं किया है, लेकिन रिफाइनरियां आम तौर पर अमेरिकी उपायों का उल्लंघन करने से बचती हैं, क्योंकि द्वितीयक प्रतिबंध वित्त और बीमा तक पहुंच रोक सकते हैं। व्यापार पर बातचीत समेत वॉशिंगटन के साथ कूटनीतिक संपर्क जारी है। भारतीय सामानों पर हाल के अमेरिकी शुल्कों से तनाव बढ़ा है, लेकिन दोनों पक्ष वाणिज्यिक संबंधों को स्थिर करने के रास्ते तलाश रहे हैं, जबकि भारत ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला रहा है।
देश के भीतर, कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहने पर नीति-निर्माताओं के पास कुछ विकल्प हैं। वे खुदरा कीमतों में सीमित बढ़ोतरी की अनुमति दे सकते हैं, उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए ईंधन करों में बदलाव कर सकते हैं या महंगाई की स्थिति के अनुसार कमजोर वर्गों को लक्षित सहायता दे सकते हैं। इनमें से कोई भी कदम लागत से मुक्त नहीं है। इसी वजह से मौजूदा रणनीति में कच्चे तेल के मिश्रण में लचीलापन और कड़े अनुपालन पर जोर है। इसका उद्देश्य विकास की गति बनाए रखना, महंगाई को नियंत्रण में रखना और रूसी तेल पर भारी निर्भरता से दूर जाते समय वैश्विक वित्त तक पहुंच बरकरार रखना है।
निष्कर्ष
- रोसनेफ्ट और लुकोइल पर अमेरिकी प्रतिबंध भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल की खरीद घटाने और कच्चे तेल के मिश्रण में बदलाव के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
- भारत के कच्चे तेल के आयात में रूस की हिस्सेदारी पिछले वर्षों के करीब 36 प्रतिशत से घटकर लगभग 34 प्रतिशत रह गई है।
- रूसी कच्चे तेल पर छूट घट गई है, जबकि बैंकों और बीमा कंपनियों की जांच बढ़ने से लेनदेन का जोखिम बढ़ा है।
- कंपनियों को प्रतिबंधित रूसी उत्पादकों के साथ लेनदेन बंद करने के लिए 21 नवंबर की समयसीमा दी गई है।
- अक्टूबर में भारत को अमेरिकी तेल की आपूर्ति बढ़कर करीब 5.75 लाख बैरल प्रतिदिन हो गई, जो 2022 के बाद सबसे अधिक है।
- इंडियन ऑयल ने नियमों के अनुरूप रूसी तेल की खरीद रोकने के बाद फिर शुरू की है और 2026 की शुरुआत के लिए अमेरिका महाद्वीप से 2.4 करोड़ बैरल तक तेल तलाश रही है।
- एमआरपीएल ने अबू धाबी का मुरबान खरीदा है, जबकि अन्य सरकारी रिफाइनरियों ने रूसी तेल पर निर्भरता घटाकर खाड़ी क्षेत्र और अमेरिका से खरीद बढ़ाई है।
- सितंबर में भारतीय रिफाइनरियों का प्रसंस्करण करीब 19 महीनों के सबसे निचले स्तर पर रहा। इसकी वजह रखरखाव और कच्चे तेल के विकल्पों में घटता लचीलापन है।
- 180 से अधिक जहाजों पर प्रतिबंधों से टैंकरों की उपलब्धता घट गई है और एशिया तक मालभाड़ा बढ़ा है।
- अगर वैकल्पिक आपूर्ति स्थिर हो जाए, तो रूसी तेल की जगह लेने से सालाना आयात बिल 2 प्रतिशत से कम बढ़ सकता है।
- फिलहाल खुदरा ईंधन कीमतें अपरिवर्तित हैं, लेकिन कम मार्जिन के चलते कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहने पर आगे बदलाव की आशंका बढ़ गई है।






