कैसे एक सादे नाश्ते ने द्वीप की अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी
फरवरी 1974 की एक सुबह, सात अधिकारी और इंजीनियर ताइपे की एक साधारण दुकान में बैठे और उन्होंने सोया दूध तथा तली हुई आटे की रोटियां साझा कीं। बिल NT$400 से भी कम आया। मेज से उठने से पहले ही वे NT$400 मिलियन की ऐसी योजना पर सहमत हो चुके थे, जो ताइवान की अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने वाली थी। वे इंटीग्रेटेड सर्किट तकनीक का आयात करेंगे, इंजीनियरों की अग्रिम टोली को प्रशिक्षित करेंगे और एक प्रदर्शन कारखाना बनाएंगे। आज RCA परियोजना के नाम से याद की जाने वाली इस पहल ने विनिर्माण आधार की नींव रखी, जो आगे चलकर यूनाइटेड माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन और फिर ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के रूप में विकसित हुआ। पचास साल बाद, ताइवान में बनी चिपें दुनिया भर में स्मार्टफोन, डेटा केंद्रों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों को शक्ति देती हैं।
विषय-सूची
- कैसे एक सादे नाश्ते ने द्वीप की अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी
- संकट, विकल्प और चिपों पर बड़ा दांव
- मेज पर कौन-कौन था?
- खाके से सिलिकॉन तक
- CMOS और सात माइक्रोमीटर क्यों?
- ITRI, ERSO और औद्योगिक समूह का असर
- मॉरिस चांग ने फाउंड्री मॉडल को कैसे बनाया सफल
- तकनीक का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, चोरी नहीं
- भूराजनीति और व्यापार के नए नियम
- इस शुरुआत की कहानी से आज भी क्या सीख मिलती है
- जानने योग्य बातें
ताइवान के सामने कठिन विकल्प था। 1973 के तेल संकट ने उसके निर्यात-आधारित मॉडल पर दबाव डाला और लागत बढ़ा दी। कूटनीतिक झटकों ने द्वीप को विश्व राजनीति में अलग-थलग कर दिया था। प्रधानमंत्री च्यांग चिंग-कुओ ने अपने सहयोगियों को ऐसी तकनीक खोजने का काम सौंपा, जो ताइवान की विकास क्षमता बढ़ा सके। उस दिन मेज पर पान वेन-युआन भी थे, जो चीनी मूल के अमेरिकी इंजीनियर थे और अमेरिका में RCA लैबोरेटरीज़ में काम का नेतृत्व करते थे। उन्होंने श्रम-प्रधान असेंबली से इंटीग्रेटेड सर्किट की ओर महत्वाकांक्षी बदलाव का तर्क रखा। अर्थव्यवस्था मंत्री सुन युन-सुआन ने उनका समर्थन किया और कार्यकारी युआन के महासचिव फेई हुआ ने विचार को आगे बढ़ाया। योजना में कॉम्प्लिमेंटरी मेटल ऑक्साइड सेमीकंडक्टर तकनीक पर ध्यान देना, विदेश में एक समूह को प्रशिक्षित करना और प्रक्रिया के हर चरण को, सिर्फ पैकेजिंग को नहीं, ताइवान में लाना शामिल था।
संकट, विकल्प और चिपों पर बड़ा दांव
यह फैसला महज औद्योगिक उन्नयन से कहीं बढ़कर था। यह घोषणा थी कि ताइवान विज्ञान और इंजीनियरिंग के सहारे मूल्य शृंखला में ऊपर चढ़ेगा। सरकार ने परियोजना की निगरानी के लिए अपने इलेक्ट्रॉनिक्स रिसर्च एंड सर्विस ऑर्गनाइज़ेशन के माध्यम से इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट को नियुक्त किया। तकनीक के चुनाव में दिशा देने और कार्यक्रम को बाजार की जरूरतों के अनुरूप रखने के लिए विदेशों के विशेषज्ञों की टेक्नोलॉजी एडवाइजरी काउंसिल गठित की गई। समूह ने उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स को लक्ष्य बनाया, जहां ताइवान के निर्माता जल्दी बिक्री कर सकते थे, और कम बिजली खपत तथा विश्वसनीयता के कारण CMOS चुना। लक्ष्य स्पष्ट था: विनिर्माण की पूरी क्षमता हासिल करना, उसे सीखना, बेहतर बनाना और नई कंपनियों के माध्यम से उसका प्रसार करना।
मेज पर कौन-कौन था?
- सुन युन-सुआन, अर्थव्यवस्था मंत्री
- काओ यू-शू, परिवहन और संचार महानिदेशक
- वांग चाओ-चेन, ITRI अध्यक्ष
- कांग पाओ-हुआंग, दूरसंचार प्रयोगशालाओं के निदेशक
- फेई हुआ, कार्यकारी युआन के महासचिव
- फांग सिएन-ची, दूरसंचार महानिदेशक
- पान वेन-युआन, RCA लैबोरेटरीज़ के निदेशक
योजना लिखने के लिए पान ने ग्रैंड होटल में खुद को दस दिन तक बंद रखा। अगस्त 1974 में इसे मंजूरी मिल गई। आलोचकों ने चेताया कि चिपों के लिए बहुत अधिक पूंजी चाहिए और उनकी तकनीक बेहद जटिल है। इसके बावजूद सुन ने योजना को आगे बढ़ाया। दो साल बाद RCA के साथ हुए एक अनुबंध से तकनीक हस्तांतरण संभव हुआ और 1976 में उन्नीस इंजीनियर प्रशिक्षण के लिए अमेरिका रवाना हुए। वे शिनचू लौटे और एक ऐसा प्रदर्शन कारखाना बनाया, जिसका उद्देश्य सिर्फ उत्पाद भेजना नहीं, बल्कि सिखाना था। शीर्ष नेतृत्व का संदेश लगातार एक ही रहा: यह राष्ट्रीय परियोजना है और लक्ष्य तकनीक में महारत हासिल करना है।
खाके से सिलिकॉन तक
29 अक्टूबर 1977 को ताइवान ने अपना पहला इंटीग्रेटेड सर्किट प्रदर्शन संयंत्र खोला। इसमें सात माइक्रोमीटर प्रक्रिया से तीन इंच की सिलिकॉन वेफर बनाई जाती थीं और लक्ष्य डिजिटल घड़ियों तथा उपभोक्ता उपकरणों के लिए चिप बनाना था। यह संयंत्र कक्षा भी था और उत्पादन लाइन भी। शुरुआती अड़चनें अक्सर आईं, लेकिन छह महीने के भीतर टीम ने उत्पादन-प्राप्ति दर बढ़ाकर करीब 70 प्रतिशत कर दी, जो RCA की मूल उत्पादन लाइन से बेहतर थी। यह आंकड़ा अहम था। ऊंची उत्पादन-प्राप्ति दर का मतलब है हर वेफर से अधिक अच्छी चिपें, कम लागत और मुनाफे की राह। इंजीनियरों ने न सिर्फ उपकरण चलाना सीखा, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों में उन्हें बेहतर बनाना भी सीखा। यह द्वीप की विनिर्माण संस्कृति की आधारशिला बना।
CMOS और सात माइक्रोमीटर क्यों?
CMOS का पूरा नाम कॉम्प्लिमेंटरी मेटल ऑक्साइड सेमीकंडक्टर है। यह ट्रांजिस्टर के ऐसे जोड़े बनाने की तकनीक है, जो निष्क्रिय अवस्था में बहुत कम बिजली खर्च करते हैं। 1970 के दशक में इस गुण के कारण CMOS छोटी बैटरियों से चलने वाली घड़ियों और कैलकुलेटरों के लिए एकदम उपयुक्त था। सात माइक्रोमीटर प्रक्रिया का मतलब है चिप पर छापी जाने वाली संरचनाओं का आकार। उस समय सात माइक्रोमीटर उन्नत तकनीक थी और इसमें महारत हासिल करना कठिन था। आज की सबसे उन्नत चिपें नैनोमीटर में मापी जाती हैं, जो इससे हजारों गुना छोटे हैं। लेकिन उत्पादन-प्राप्ति दर बढ़ाने वाले तरीके और अनुशासन आज भी उतने ही अहम हैं: स्वच्छ कक्ष, सटीक लिथोग्राफी, स्थिर रसायन और कड़ा प्रक्रिया नियंत्रण।
प्रदर्शन कारखाने ने द्वीप की पहली इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों के लिए चिपें बनाईं। निर्यात तेजी से बढ़ा। ताइवान जल्द ही इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया, जो इस बात का प्रमाण था कि नई तकनीक वास्तविक बाजारों की जरूरत पूरी कर सकती है। उतना ही महत्वपूर्ण यह था कि इंजीनियरों के एक समूह ने अपने हाथों से आधुनिक वेफर उत्पादन लाइन बनाई, उसकी खामियां दूर कीं और उसे बेहतर बनाया। अब यह प्रतिभा फैलने वाली थी।
ITRI, ERSO और औद्योगिक समूह का असर
1979 में सरकार ने विश्वविद्यालयों और ITRI परिसर के पास शोध समूहों, स्टार्टअप और आपूर्तिकर्ताओं को एक जगह जुटाने के लिए शिनचू साइंस पार्क बनाया। पार्क में तैयार जमीन, कारोबार शुरू करने की सरल प्रक्रिया, साझा सुविधाएं और ऐसा समुदाय था, जहां विचारों का आदान-प्रदान होता और समस्याएं तेजी से सुलझाई जाती थीं। यहां प्रदर्शन उत्पादन लाइन में प्रशिक्षित इंजीनियर टीमें बना सकते थे, पूंजी जुटा सकते थे और उपकरणों तथा मार्गदर्शकों तक सीधी पहुंच के साथ कंपनियां शुरू कर सकते थे। यह पार्क विदेशों से लौटने वाले लोगों और भरोसेमंद साझेदार तलाशने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया।
1980 में ITRI से यूनाइटेड माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन अलग होकर बनी, जो द्वीप की पहली वाणिज्यिक चिप कंपनी थी। शुरुआत में इसे राज्य और स्थानीय बैंकों से पूंजी मिली, फिर निजी निवेशकों के लिए खोल दिया गया। प्रदर्शन संयंत्र के पूर्व कर्मचारी आगे चलकर डिजाइन, परीक्षण और पैकेजिंग के क्षेत्र में नई कंपनियां स्थापित करने या उनसे जुड़ने लगे। विनबॉन्ड और ASE जैसी कंपनियों ने इस पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार किया, ताकि ताइवान सिर्फ वेफर न बनाए। वह तैयार उत्पादों को डिजाइन करे, उनकी जांच करे, उन्हें असेंबल करे और भेजे भी। यह सघन नेटवर्क किसी एक बड़ी कंपनी जितना ही अहम साबित हुआ।
मॉरिस चांग ने फाउंड्री मॉडल को कैसे बनाया सफल
शुरुआती सफलता के बावजूद अगली छलांग के लिए नए कारोबारी मॉडल की जरूरत थी। 1980 के दशक के मध्य में ITRI ने अधिक जटिल चिपों की तैयारी के लिए वेरी लार्ज स्केल इंटीग्रेशन परियोजना शुरू की। इसके नए प्रमुख मॉरिस चांग ने उद्योग में दशकों के अनुभव से एक स्पष्ट निष्कर्ष निकाला: कई डिजाइन कंपनियां विनिर्माण का काम ऐसे साझेदार को देना चाहती थीं, जो इसके अलावा कुछ और न करता हो। उन्होंने शुद्ध फाउंड्री मॉडल का प्रस्ताव रखा: ऐसा कारखाना जो अपनी चिपों का डिजाइन न करे, बल्कि डिजाइन रखने वाले किसी भी ग्राहक के लिए चिपें बनाए।
1987 में फिलिप्स के करीब 27.5 प्रतिशत निवेश और सरकार की निर्णायक हिस्सेदारी के साथ TSMC ने शिनचू में अपना काम शुरू किया। फाउंड्री मॉडल ने डिजाइनरों को अपना कारखाना रखने की लागत से मुक्त किया और उन्हें ऐसा साझेदार दिया, जो किसी तकनीक के पक्ष में नहीं था। इससे TSMC कई ग्राहकों के ऑर्डर जोड़कर बड़े पैमाने पर उत्पादन भी कर सकी। इस पैमाने ने ज्यादातर एकीकृत उपकरण निर्माताओं की तुलना में प्रक्रिया का तेज विकास, लागत पर कड़ा नियंत्रण और बेहतर विश्वसनीयता संभव की। इससे एक ऐसा चक्र बना: अधिक ग्राहकों से उत्पादन की मात्रा बढ़ी, उससे प्रक्रिया को तेजी से बेहतर बनाने के लिए धन मिला और इससे और ग्राहक आकर्षित हुए।
2020 के दशक की शुरुआत तक TSMC दुनिया की अधिकांश अनुबंध-आधारित चिपें और स्मार्टफोन, ग्राफिक्स कार्ड तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता सर्वरों में इस्तेमाल होने वाले अधिकतर उन्नत प्रोसेसर बना रही थी। वह तीन नैनोमीटर की चिपों का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रही थी और दो नैनोमीटर तकनीक की तैयारी में थी। चरम पराबैंगनी लिथोग्राफी उपकरण बनाने वाली कंपनी समेत महत्वपूर्ण उपकरण आपूर्तिकर्ताओं के साथ उसके घनिष्ठ संबंध रणनीतिक बढ़त बन गए। दूसरों के लिए चिपें बनाना, इसी एक काम पर फाउंड्री का ध्यान, पूरे उद्योग को बदल गया।
तकनीक का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, चोरी नहीं
ताइवान की चिप कहानी औपचारिक तकनीक हस्तांतरण अनुबंधों, प्रशिक्षण और विदेश में सीखी बातों को घरेलू कारखानों से जोड़ने वाले इंजीनियरों के प्रयास पर बनी। यह तकनीक हथियाने की नहीं, सहयोग की कहानी है। RCA के साथ हुआ अनुबंध बिक्री का था, कोई रहस्य नहीं। टेक्नोलॉजी एडवाइजरी काउंसिल ने दिशा तय करने के लिए विदेशों में बसे विशेषज्ञों की जानकारी का सहारा लिया। द्वीप ने प्रदर्शन उत्पादन लाइन के जरिए क्षमता विकसित की, फिर नई कंपनियों और विदेशी साझेदारों का स्वागत करने वाले साइंस पार्क के माध्यम से उसका विस्तार किया। यह कहानी मूल रूप से अंतरराष्ट्रीय है: डिजाइन कैलिफोर्निया से आए, उपकरण यूरोप से और विनिर्माण का अनुशासन शिनचू में निखरा।
आज की दो बहसें दिखाती हैं कि इस शुरुआत की अहमियत अब भी कायम है। पहली यह कि क्या उन्नत विनिर्माण को दूसरी जगह तेजी से फिर से खड़ा किया जा सकता है। दूसरी यह कि क्या ताइवान उस रणनीतिक महत्व को छोड़ देगा, जिसे कुछ लोग सिलिकॉन कवच कहते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि द्वीप के औद्योगिक समूह की नकल करने में समय, पैसा और कई विशेषज्ञताओं में प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होगी।
ताइवान के प्रौद्योगिकी उद्योगों के इतिहास का अध्ययन करने वाली सहायक प्रोफेसर होंगहोंग टिन ने अमेरिका में चिप विनिर्माण दोबारा खड़ा करने की मूल आर्थिक चुनौती बताई है।
अमेरिका में बड़े पैमाने पर चिप बनाना जाहिर तौर पर ज्यादा महंगा होगा, इसलिए उन्हें शायद भारी सब्सिडी की जरूरत पड़ेगी।
प्रौद्योगिकी रणनीति का अध्ययन कर चुके नीति विश्लेषक जोनास परेलो-प्लेसनर ने उन्नत उत्पादन क्षमता देश में बनाए रखने के ताइपे के संकल्प को इन शब्दों में बताया।
ताइपे किसी भी तरह अपना सिलिकॉन कवच नहीं छोड़ेगा।
भूराजनीति और व्यापार के नए नियम
वैश्विक नीतिगत कदमों ने ताइवान को एक बार फिर चिप संबंधी बहसों के केंद्र में ला दिया है। 2025 में अमेरिकी टैरिफ के नए दौर से निर्यातकों के लिए अनिश्चितता बढ़ गई। ताइवान को सेमीकंडक्टर पर अस्थायी राहत मिली, लेकिन कंपनियों पर कुछ उत्पादन दूसरी जगह ले जाने और बिक्री नियंत्रण कड़े करने का दबाव बना रहा। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव से पहले ही आपूर्ति शृंखलाओं और निवेश की दिशा बदल चुकी थी, और कंपनियां असेंबली के कुछ अंतिम चरण मुख्यभूमि चीन से बाहर ले जा रही थीं। दोनों पक्षों को माल बेचने वाली ताइवान की कंपनियों को मजबूती, लागत और बाजार तक पहुंच के बीच संतुलन बनाना पड़ा।
इसके बाद चीन ने स्पष्ट किया कि वह सीमा शुल्क के लिए चिप का मूल स्थान कैसे तय करेगा। नए तरीके में मूल स्थान उस जगह के आधार पर तय होता है, जहां वेफर का विनिर्माण हुआ हो, चाहे चिप का डिजाइन या पैकेजिंग कहीं और हुई हो। चीनी अधिकारी ताइपे को घरेलू क्षेत्र मानते हैं, इसलिए ताइवान में बनी चिपों पर चीन के कई अमेरिकी उत्पादों पर लगाए जाने वाले दंडात्मक टैरिफ लागू नहीं होते। इस नियम से अमेरिका में चिप बनाने वाली कंपनियों को नुकसान और ताइवान तथा मुख्यभूमि चीन की फाउंड्री को फायदा होता है। यह भी दिखाता है कि मूल स्थान से जुड़े नियम ऑर्डर का रुख कुछ खास कारखानों की ओर मोड़ सकते हैं।
राजनीतिक हलचल के बीच भी सीमा पार परियोजनाएं जारी हैं। TSMC एरिज़ोना में अपना विनिर्माण परिसर विकसित कर रही है। 2025 में Nvidia ने वहां अपनी ब्लैकवेल पीढ़ी के लिए बनी अमेरिका की पहली वेफर का अनावरण किया। इस वेफर को अब भी उन्नत पैकेजिंग की जरूरत है, जो एक जटिल चरण है। TSMC इसे ताइवान में बड़े पैमाने पर चिप ऑन वेफर ऑन सब्सट्रेट जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके करती है। अमेरिका की एक आउटसोर्स्ड असेंबली और टेस्ट कंपनी के साथ पैकेजिंग साझेदारी की प्रक्रिया चल रही है और दशक के मध्य में इसके संचालन शुरू होने की उम्मीद है। यह दो चरणों वाली व्यवस्था, अमेरिका में वेफर निर्माण और ताइवान में उन्नत पैकेजिंग, दिखाती है कि कोई एक कारखाना बड़ी उत्पादन शृंखला का सिर्फ एक हिस्सा होता है।
इस शुरुआत की कहानी से आज भी क्या सीख मिलती है
नाश्ते के दौरान हुई बैठक इसलिए कारगर रही, क्योंकि उसने स्पष्ट राष्ट्रीय लक्ष्य को ठोस कदमों से जोड़ा। नेताओं ने एक खास तकनीक चुनी, विशेषज्ञता विकसित करने के लिए प्रदर्शन उत्पादन लाइन तैयार की और ऐसा पार्क बनाया, जिसने प्रतिभा, आपूर्तिकर्ताओं और पूंजी को आकर्षित किया। उन्होंने सबसे कठिन समस्याएं इंजीनियरों को सौंपीं और नई कंपनियों को विचार बाजार तक ले जाने दिया। शुरुआत में मिली सरकारी सहायता हमेशा के लिए नहीं रही। निजी निवेशकों का भरोसा बढ़ने पर सार्वजनिक हिस्सेदारी घटाई गई और उद्योग के परिपक्व होने के साथ शोध पर उसका अपना खर्च बढ़ा।
आज की चुनौतियां अब भी बड़ी हैं। उन्नत चिप निर्माण में बहुत बिजली और पानी लगता है और इसके लिए दुर्लभ कौशल चाहिए। फिर भी 1970 के दशक में ताइवान को आगे बढ़ाने वाले वही तत्व आज भी मायने रखते हैं: धैर्य के साथ निवेश, सघन औद्योगिक क्षेत्र और निर्माण करके सीखने वाले इंजीनियर। उस साधारण नाश्ते की विरासत पुरानी यादें भर नहीं है। यह संकट को नई तरह की समृद्धि में बदलने का खाका है।
जानने योग्य बातें
- 1974 में ताइपे में नाश्ते की बैठक के बाद सात नेताओं ने NT$400 मिलियन के इंटीग्रेटेड सर्किट कार्यक्रम को वित्तपोषित करने पर सहमति जताई।
- सरकार ने RCA से तकनीक हस्तांतरण और उन्नीस इंजीनियरों की पहली टोली को अमेरिका में प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी ITRI और उसकी ERSO इकाई को सौंपी।
- ताइवान की पहली IC प्रदर्शन फैक्टरी 29 अक्टूबर 1977 को खुली, छह महीने के भीतर उत्पादन-प्राप्ति दर करीब 70 प्रतिशत तक पहुंची और उसने RCA की मूल उत्पादन लाइन से बेहतर प्रदर्शन किया।
- शुरुआती उत्पादों में घड़ियों की चिपें शामिल थीं, जिन्होंने ताइवान को इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक बनाने में मदद की।
- शिनचू साइंस पार्क 1979 में खुला और 1980 में UMC, ITRI से अलग होकर बनी। इससे डिजाइन, परीक्षण और पैकेजिंग का व्यापक औद्योगिक समूह विकसित हुआ।
- मॉरिस चांग ने सरकार और फिलिप्स के समर्थन से 1987 में TSMC की स्थापना की और शुद्ध फाउंड्री मॉडल शुरू किया, जो फैबलेस चिप डिजाइनरों को सेवाएं देता है।
- 2020 के दशक की शुरुआत तक TSMC वैश्विक फाउंड्री बाजार में अग्रणी थी और तीन नैनोमीटर पर दुनिया के अधिकतर उन्नत प्रोसेसर बना रही थी, जबकि दो नैनोमीटर तकनीक विकासाधीन थी।
- नए व्यापार नियमों और टैरिफ से लागत बढ़ी और आपूर्ति शृंखलाओं का मार्ग बदला, जबकि चीन की सीमा शुल्क नीति ताइवान में बनी चिपों को फायदा पहुंचाती है।
- TSMC का अमेरिका में विस्तार जारी है। एरिज़ोना में वेफर बन रही हैं, जबकि उन्नत पैकेजिंग अब भी मुख्य रूप से ताइवान में केंद्रित है।
- ताइवान की सफलता प्रतिभा, मजबूत औद्योगिक पार्क व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विनिर्माण उत्कृष्टता में निरंतर पुनर्निवेश पर टिकी है।






