अमामी ओशिमा के पास जापान के ईईज़ेड में चीनी सर्वेक्षण पोत पर जापान का विरोध, सीमा विवाद फिर तेज

पढ़ने में 12 मिनट
The Japan Times on X:

अमामी ओशिमा के पास चीनी सर्वेक्षण पोत को लेकर फिर बढ़ा तनाव

जापान तटरक्षक बल ने बताया कि कागोशिमा प्रीफेक्चर के अमामी ओशिमा के पश्चिम में जापान के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के भीतर सर्वेक्षण करने के संदेह में एक चीनी समुद्री अनुसंधान पोत देखा गया। इसके बाद जापान ने चीन के समक्ष औपचारिक विरोध दर्ज कराया। गश्ती दलों के अनुसार, इस सप्ताह कई दिनों तक सुबह-सुबह पोत को पाइप जैसी या तार जैसी कोई वस्तु पानी में उतारते देखा गया। चेतावनियों के बावजूद उसने अपना काम जारी रखा। टोक्यो का कहना है कि ऐसे अनुसंधान के लिए तटीय देश की पहले से अनुमति लेना जरूरी है और यह गतिविधि रोकनी होगी।

विषय-सूची
  1. अमामी ओशिमा के पास चीनी सर्वेक्षण पोत को लेकर फिर बढ़ा तनाव
  2. पोत कहां देखा गया और ईईज़ेड में क्या दांव पर है
  3. पूर्वी चीन सागर में जापान और चीन सीमा कैसे तय करते हैं
  4. चीनी सर्वेक्षण पोत समुद्र में क्या कर रहा हो सकता था
  5. समुद्र में कानून, व्यवहार और कार्रवाई की सीमाएं
  6. बार-बार होने वाली घटनाएं और व्यापक रणनीतिक परिदृश्य
  7. विज्ञान से परे भी क्यों अहम है समुद्री मानचित्रण
  8. संकट प्रबंधन और संचार माध्यम
  9. आगे क्या होगा
  10. मुख्य बातें

अधिकारियों के अनुसार, शियांग यांग होंग 22 नाम के इस पोत को पहली बार रविवार को अमामी ओशिमा से लगभग 380 से 400 किलोमीटर पश्चिम में देखा गया। तटरक्षक बल ने बताया कि उसने रेडियो संदेश भेजकर सर्वेक्षण रोकने की मांग की। रविवार को करीब तीन घंटे बाद पोत पश्चिम की ओर चला गया, लेकिन मंगलवार को आसपास के पानी में लौट आया। बुधवार को सुबह 7 बजे से पहले वह फिर वहां पहुंचा और निकटवर्ती उन इलाकों में इसी तरह के उपकरण तैनात करता दिखा जिन्हें जापान अपने ईईज़ेड में शामिल करता है।

मुख्य कैबिनेट सचिव हयाशी योशिमासा ने पत्रकारों से कहा कि जापान ने राजनयिक माध्यमों से कड़ा विरोध दर्ज कराया है और दृढ़ता तथा शांति के साथ जवाब देना जारी रखेगा। उन्होंने दोहराया कि इस क्षेत्र में अनुमति के बिना समुद्री अनुसंधान अस्वीकार्य है।

"हमारी सहमति के बिना जापान के ईईज़ेड में समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान स्वीकार्य नहीं है। ये गतिविधियां बेहद खेदजनक हैं और इन्हें तुरंत रोकना होगा," हयाशी ने कहा।

रिपोर्ट लिखे जाने तक बीजिंग ने इस घटना पर कोई विशिष्ट सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की थी। पूर्वी चीन सागर के इस हिस्से में जापान द्वारा मध्यरेखा को समुद्री सीमा मानने के लंबे समय से चीन विरोध करता आया है और उसका कहना है कि कोई सहमत सीमा मौजूद नहीं है। इस रुख के चलते उन इलाकों में सर्वेक्षण या गश्ती पोतों से जुड़ी घटनाएं बार-बार होती हैं जहां दोनों देशों के दावे एक-दूसरे से टकराते हैं।

विज्ञापन

पोत कहां देखा गया और ईईज़ेड में क्या दांव पर है

पोत को अमामी ओशिमा के पश्चिम के पानी में देखा गया। यह जापान के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक प्रमुख द्वीप है। यह इलाका पूर्वी चीन सागर में आता है, जो चीन, जापान और दक्षिण कोरिया से घिरा एक अपेक्षाकृत संकरा समुद्री क्षेत्र है। कई जगहों पर यह सागर 400 समुद्री मील से कम चौड़ा है, इसलिए पड़ोसी देशों के दावों वाले समुद्री क्षेत्रों की बाहरी सीमाएं एक-दूसरे से टकरा सकती हैं। यह टकराव तनाव का एक प्रमुख स्रोत है।

विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र तटीय देश को अपने तट से 200 समुद्री मील तक जलस्तंभ और समुद्र तल के प्राकृतिक संसाधनों की खोज, दोहन, संरक्षण और प्रबंधन के लिए संप्रभु अधिकार देता है। यह अधिकार समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (यूएनसीएलओएस) के अनुरूप होता है। इस क्षेत्र में समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण संरक्षण पर भी तटीय देश का अधिकार क्षेत्र होता है। दूसरे देशों के जहाजों को ईईज़ेड में नौवहन की स्वतंत्रता रहती है, लेकिन वहां समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान करने के लिए उनसे तटीय देश की अनुमति मांगने और उसे हासिल करने की अपेक्षा की जाती है। जापान के विरोध का मूल आधार यही नियम है।

विज्ञापन

पूर्वी चीन सागर में जापान और चीन सीमा कैसे तय करते हैं

जापान अपना दावा मध्यरेखा के सिद्धांत पर आधारित करता है, जिसके अनुसार दोनों तटों के बीच की आधी दूरी पर सीमा खींची जाती है। चीन का तर्क है कि उसके महाद्वीपीय मग्नतट का प्राकृतिक विस्तार पूर्व की ओर अधिक दूर तक जाता है और समुद्री सीमा भूगर्भीय संरचना के अनुरूप तय होनी चाहिए। दोनों पक्ष अलग-अलग कानूनी दृष्टिकोण अपनाते हैं, इसलिए पूर्वी चीन सागर में सीमा पर कभी सहमति नहीं बन पाई है।

जापानी मीडिया और अधिकारियों का कहना है कि चीनी पोत टोक्यो द्वारा ईईज़ेड की व्यावहारिक सीमा मानी जाने वाली रेखा के पास या उसके पूर्व में काम कर रहा था। चीन इस रेखा को स्वीकार नहीं करता। नतीजतन, अनुसंधान या गश्त की गतिविधियां चेतावनियों और राजनयिक विरोध का कारण बनती रहती हैं, जबकि दोनों पक्ष किसी साझा मानचित्र को मान्यता नहीं देते।

स्थलीय भू-आकृतियों की स्थिति को लेकर मतभेद भी विवाद को बढ़ाते हैं, क्योंकि द्वीप, चट्टानें या प्रवाल भित्तियां देशों के दावों वाले समुद्री क्षेत्रों को बदल सकती हैं। मई 2025 में ओकिनोतोरीशिमा के पास हुई एक अलग घटना के बाद चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने उस भू-आकृति पर बीजिंग का पक्ष रखा था। उन्होंने कहा था कि उससे ईईज़ेड या महाद्वीपीय मग्नतट का दावा नहीं किया जा सकता।

"ओकिनोतोरि एक प्रवाल भित्ति है, द्वीप नहीं। इसलिए यूएनसीएलओएस के तहत उसे विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र या महाद्वीपीय मग्नतट का अधिकार नहीं है," माओ ने उस समय कहा था।

टोक्यो इस व्याख्या को खारिज करता है और ओकिनोतोरीशिमा को द्वीप मानता है। यह असहमति दिखाती है कि कानूनी परिभाषाएं किस तरह रणनीतिक मुद्दे बन जाती हैं, क्योंकि किसी भू-आकृति का वर्गीकरण समुद्र में प्रत्येक देश के विशेष अधिकारों के दावे का दायरा बढ़ा या घटा सकता है।

विज्ञापन

चीनी सर्वेक्षण पोत समुद्र में क्या कर रहा हो सकता था

शियांग यांग होंग बेड़े के चीनी अनुसंधान पोत समुद्री अवलोकन और अध्ययन के लिए संचालित किए जाते हैं। जापानी अधिकारियों ने शियांग यांग होंग 22 से लटकते दिखे उपकरण को पाइप जैसी या तार जैसी वस्तु बताया। सर्वेक्षण पोत आमतौर पर तार वाली चरखियों से चालकता, तापमान और गहराई मापने वाले सेंसर, ध्वनिक ट्रांसड्यूसर, तलछट नमूना लेने वाले उपकरण या समुद्र तल के नीचे की संरचना जांचने वाले प्रोफाइलर पानी में उतारते हैं। वे समुद्र तल का मानचित्र बनाने या पानी के गुण मापने के लिए खींचे जाने वाले सोनार एरे भी तैनात कर सकते हैं।

इन गतिविधियों से अकादमिक विज्ञान, संसाधनों की खोज और नौवहन सुरक्षा को मदद मिल सकती है। लेकिन इनका दोहरे उपयोग वाला पहलू भी हो सकता है। समुद्र तल के मानचित्र और ध्वनिक आंकड़े पनडुब्बियों के मार्ग तय करने, समुद्र के नीचे केबल बिछाने के गलियारे की योजना बनाने और समुद्र तल पर सेंसर लगाने में उपयोगी होते हैं। यही दोहरे उपयोग की संभावना एक वजह है कि तटीय देश अपने ईईज़ेड में अनुसंधान के लिए अनुमति पर जोर देते हैं और संवेदनशील जलक्षेत्रों के आसपास सर्वेक्षण गतिविधियों पर कड़ी नजर रखते हैं।

समुद्र में कानून, व्यवहार और कार्रवाई की सीमाएं

यूएनसीएलओएस आवागमन और अनुसंधान में अंतर करता है। ईईज़ेड से होकर गुजरने के लिए अनुमति की जरूरत नहीं होती, लेकिन वहां समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान तटीय देश की सहमति पर निर्भर करता है। विशेषज्ञों के बीच इस बात पर बहस है कि कुछ जल सर्वेक्षण या सैन्य समुद्री सर्वेक्षण ऐसे अनुसंधान के दायरे में आते हैं जिनके लिए अनुमति जरूरी है या उन्हें खुले समुद्र में नौवहन की स्वतंत्रता के तहत देखा जाना चाहिए। अलग-अलग देश अलग व्याख्याएं अपनाते हैं। जापान अपने ईईज़ेड में अनुसंधान के लिए अनुमति जरूरी मानता है और आंकड़े जुटाने के उद्देश्य से किए जाने पर उपकरण तैनात करने तथा नमूने लेने जैसी गतिविधियों को अनुसंधान मानता है। चीन अपने दावे वाले ईईज़ेड में विदेशी अनुसंधान पोतों के संचालन को लेकर सख्त रुख अपनाता है, फिर भी वह अन्य कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए पड़ोसी देशों के दावे वाले क्षेत्रों में सर्वेक्षण कर चुका है। यह असंगति पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ाती है।

तटीय देश को भले लगे कि उसके ईईज़ेड अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, समुद्र में उसके पास कार्रवाई के सीमित विकल्प होते हैं। ईईज़ेड का पानी क्षेत्रीय समुद्र जैसा नहीं होता। विदेशी जहाजों को वहां से गुजरने से नहीं रोका जा सकता। जापान गतिविधि का दस्तावेजीकरण कर सकता है, रेडियो से चेतावनी दे सकता है, काम रोकने की मांग कर सकता है और राजनयिक विरोध दर्ज करा सकता है। वह गश्त बढ़ा सकता है और ऐसी घटनाओं को सार्वजनिक कर दोबारा होने से रोकने की कोशिश कर सकता है। बल प्रयोग में जोखिम है और क्षेत्रीय समुद्र के बाहर अंतरराष्ट्रीय तथा घरेलू कानून की सीमा से आगे जाने पर यह गैरकानूनी हो सकता है। इसीलिए ऐसी कई घटनाएं गिरफ्तारी के बजाय चेतावनी, निगरानी और राजनयिक बातचीत के साथ खत्म होती हैं।

विज्ञापन

बार-बार होने वाली घटनाएं और व्यापक रणनीतिक परिदृश्य

जापान के दावे वाले ईईज़ेड में और उसके आसपास सर्वेक्षण पोतों का दिखना क्षेत्रीय समुद्री गतिविधियों का नियमित हिस्सा बन गया है। अमामी ओशिमा के पास की ताजा घटनाएं जापान के दावे वाले ईईज़ेड के अन्य हिस्सों, जिनमें ओकिनोतोरीशिमा के आसपास का पानी भी शामिल है, में चीनी अनुसंधान पोतों के संचालन की पिछली खबरों के बाद हुई हैं। पूर्वी चीन सागर के उन गैस क्षेत्रों के पास भी यही सिलसिला दिखता है जो प्रतिस्पर्धी दावों वाली सीमाओं के करीब हैं।

पूर्वी चीन सागर में पहले से ही तनाव के कई संवेदनशील बिंदु हैं। सेनकाकू द्वीपों का प्रशासन जापान करता है और चीन उन्हें दियाओयू कहकर अपना दावा करता है। ये द्वीप तटरक्षक गश्त और हवाई गतिविधियों का केंद्र बने हुए हैं। इससे उत्तर में महाद्वीपीय मग्नतट के किनारे और चुनशियाओ गैस क्षेत्र जैसे संसाधनों की निकटता को लेकर चीन और जापान के दावों ने समय-समय पर विरोध को जन्म दिया है। सर्वेक्षण या ड्रिलिंग का हर नया कदम इसी नजरिए से देखा जाता है और दूसरे पक्ष की तत्काल प्रतिक्रिया हो सकती है।

विज्ञान से परे भी क्यों अहम है समुद्री मानचित्रण

समुद्री अनुसंधान से जलवायु विज्ञान, मत्स्य प्रबंधन और आपदा तैयारी को लाभ मिलता है। लेकिन यही आंकड़े नौसेनाओं और ऊर्जा योजनाकारों के भी काम आते हैं। समुद्र तल के सटीक चार्ट, ध्वनिक प्रोफाइल और धाराओं के माप से पनडुब्बियों के मार्ग और कम शोर वाले संचालन क्षेत्रों की जानकारी मिलती है। ये आंकड़े फाइबर ऑप्टिक केबल बिछाने की जगह तय करने और पाइपलाइन की रूपरेखा बनाने में भी मदद करते हैं। समुद्री प्रतिस्पर्धा के तीव्र दौर में तटीय देश उन जलक्षेत्रों में अनुसंधान को लेकर सतर्क रुख अपनाते हैं जहां उनके संसाधन अधिकार और सुरक्षा हित जुड़े हैं।

जापान का विरोध इस चिंता को रेखांकित करता है कि उसके ईईज़ेड में बिना अनुमति किए गए सर्वेक्षण से रणनीतिक महत्व वाले आंकड़े हासिल हो सकते हैं। सर्वेक्षण को वैज्ञानिक काम बताया जाए, तब भी उससे मिली जानकारी का इस्तेमाल नागरिक और सैन्य, दोनों उद्देश्यों के लिए हो सकता है। समुद्र विज्ञान में यह आम बात है। इसी वजह से देश अनुसंधान के लिए पहुंच पर बातचीत करते हैं और कई मामलों में लाभ साझा करने तथा विश्वास बढ़ाने के लिए संयुक्त परियोजनाएं चलाते हैं।

संकट प्रबंधन और संचार माध्यम

अचानक टकराव रोकने के लिए टोक्यो और बीजिंग ने कुछ व्यवस्थाएं बनाई हैं। दोनों सरकारों ने गलत आकलन का जोखिम घटाने के लिए समुद्री और हवाई संचार तंत्र शुरू किया है। हाल में सीधी रक्षा हॉटलाइन भी चालू हुई है। इन माध्यमों का उद्देश्य इरादे स्पष्ट करना, नौवहन संबंधी चेतावनियां साझा करना और सामरिक स्तर पर होने वाली गतिविधियों को व्यापक टकराव में बदलने से रोकना है।

संचार से कानूनी मतभेद दूर नहीं होते, लेकिन जोखिम कम होता है। हॉटलाइन का नियमित इस्तेमाल, अनुसंधान योजनाओं की समय पर सूचना और गश्त के अनुमानित तौर-तरीकों से जहाजों को एक-दूसरे से पर्याप्त दूरी बनाए रखने में मदद मिल सकती है। ऐसे छोटे कदम इस संभावना को घटाते हैं कि समुद्र में दी गई चेतावनी टक्कर या खतरनाक रूप से पास आने की घटना में बदल जाए, जिससे पहले से कठिन कूटनीतिक स्थिति और पेचीदा हो सकती है।

विज्ञापन

आगे क्या होगा

जापान ने विरोध दर्ज करा दिया है। उसका कहना है कि तटरक्षक बल इलाके की निगरानी जारी रखेगा और चीनी पोत से उसके दावे वाले ईईज़ेड में काम रोकने का आग्रह करेगा। दोनों सरकारों के बीच कार्यकारी स्तर की बातचीत स्थापित राजनयिक माध्यमों से जारी रहने की संभावना है। टोक्यो इस बात पर जोर देता रहेगा कि उसके ईईज़ेड में अनुसंधान के लिए पहले से अनुमति जरूरी है और भविष्य में राजनयिक विरोध के समर्थन में सबूत जुटाने के लिए गतिविधियों का रिकॉर्ड रखेगा।

उम्मीद है कि बीजिंग अपने इस रुख पर कायम रहेगा कि जहां जापान मध्यरेखा का इस्तेमाल करता है वहां कोई सीमा नहीं है और उसके जहाज उन जलक्षेत्रों में कानूनी रूप से काम कर सकते हैं। समुद्री सीमा पर सहमति न होने तक दोनों पक्षों के रुख टकराते रहेंगे। व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं। देश अनुसंधान अभियानों के लिए पहले से सूचना देने की व्यवस्था बढ़ा सकते हैं, परस्पर दावों वाले क्षेत्रों में संयुक्त वैज्ञानिक अभियान पर सहमत हो सकते हैं या संवेदनशील समय के दौरान कुछ इलाकों में प्रवेश पर अस्थायी रोक लगा सकते हैं। इन उपायों से सीमाएं तय नहीं होंगी, लेकिन तनाव की घटनाएं कम और कम तीव्र हो सकती हैं।

मुख्य बातें

  • अमामी ओशिमा के पश्चिम में जापान के दावे वाले ईईज़ेड में चीनी सर्वेक्षण पोत शियांग यांग होंग 22 को उपकरण पानी में उतारते देखे जाने के बाद जापान ने चीन के समक्ष विरोध दर्ज कराया।
  • जापानी गश्ती दलों ने रविवार, मंगलवार और बुधवार को द्वीप से लगभग 380 से 400 किलोमीटर पश्चिम में करीब एक ही इलाके में पोत को देखा।
  • मुख्य कैबिनेट सचिव हयाशी योशिमासा ने कहा कि जापान के ईईज़ेड में बिना सहमति समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान अस्वीकार्य है और काम तुरंत रोकने की मांग की।
  • चीन पूर्वी चीन सागर की सीमा तय करने के जापान के मध्यरेखा वाले तरीके को खारिज करता है और कहता है कि इस इलाके में समुद्री सीमा पर कोई सहमति नहीं है।
  • यूएनसीएलओएस के तहत तटीय देशों को अपने ईईज़ेड में संसाधनों पर अधिकार और समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान पर क्षेत्राधिकार मिलता है, जबकि विदेशी जहाजों को नौवहन की स्वतंत्रता रहती है।
  • ओकिनोतोरीशिमा जैसी भू-आकृतियों की स्थिति पर विवाद और सेनकाकू द्वीपों तथा आसपास के गैस क्षेत्रों से जुड़े व्यापक तनाव स्थिति को और पेचीदा बनाते हैं।
  • समुद्र में जोखिम संभालने के लिए दोनों पक्षों के पास संचार माध्यम हैं, लेकिन सीमा तय नहीं होने तक सर्वेक्षण और गश्त से जुड़ी घटनाएं दोहराए जाने की आशंका है।
यह लेख शेयर करें

आपको यह भी पसंद आ सकता है