संयुक्त राज्य अमेरिका पर चीन की 2024 मानवाधिकार रिपोर्ट: आरोप, संदर्भ और वैश्विक बहस
अगस्त 2025 में चीन के राज्य परिषद सूचना कार्यालय ने संयुक्त राज्य अमेरिका में मानवाधिकार उल्लंघनों पर अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी की, जिसमें अमेरिका के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड पर कड़ी रोशनी डाली गई। अमेरिका में विवादास्पद चुनावी वर्ष के दौरान जारी इस रिपोर्ट में अमेरिका पर राजनीतिक टकराव बढ़ाने, आर्थिक असमानता को बदतर करने और मानवाधिकारों को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया है। इस दस्तावेज़ ने मानवाधिकारों की पैरवी की विश्वसनीयता, अधिकारों पर रिपोर्टिंग के राजनीतिकरण और दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक-दूसरे पर लगाए जाने वाले आरोपों को लेकर बहस फिर से छेड़ दी है।
विषय-सूची
- संयुक्त राज्य अमेरिका पर चीन की 2024 मानवाधिकार रिपोर्ट: आरोप, संदर्भ और वैश्विक बहस
- चीन की 2024 की रिपोर्ट में अमेरिका पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
- विशेषज्ञों की टिप्पणी और चीनी दृष्टिकोण
- अमेरिका की प्रतिक्रिया क्या है? विदेश मंत्रालय की अपनी रिपोर्टें
- एक-दूसरे की आलोचना: आरोपों का सिलसिला
- अमेरिका में बेघरपन, असमानता और सामाजिक बेचैनी
- नस्लीय भेदभाव और अल्पसंख्यकों के अधिकार
- महिलाओं और बच्चों के अधिकार: अंतरराष्ट्रीय आलोचना
- प्रवासी संकट और अमेरिकी सीमा नीति
- बंदूक हिंसा और पुलिस की बर्बरता: लगातार बनी चुनौतियां
- अंतरराष्ट्रीय प्रभाव: भू-राजनीतिक हथियार के रूप में मानवाधिकार
- मानवाधिकार रिकॉर्ड की तुलना: अमेरिका, चीन और वैश्विक संदर्भ
- संक्षेप में
इस लेख में चीन की रिपोर्ट के मुख्य दावों, अमेरिका की मानवाधिकार संबंधी प्रथाओं के व्यापक संदर्भ, अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और वैश्विक मानवाधिकार विमर्श पर इसके प्रभावों की पड़ताल की गई है।
चीन की 2024 की रिपोर्ट में अमेरिका पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
चीन की 2024 की रिपोर्ट अमेरिकी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था की व्यापक निंदा करती है। इसमें दावा किया गया है कि अमेरिकी मॉडल अपने ही नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल है, वैश्विक मानक बनने की बात तो दूर। रिपोर्ट के प्रमुख आरोपों में शामिल हैं:
- राजनीतिक अव्यवस्था और राजनीति में धन का प्रभाव: रिपोर्ट का आरोप है कि अमेरिकी चुनावों पर धन का दबदबा है और 2024 के चुनावी चक्र में खर्च 15.9 अरब डॉलर से अधिक रहा। इसमें दावा किया गया है कि दलगत हित और निर्वाचन क्षेत्रों की पक्षपातपूर्ण सीमाबंदी मतदाताओं के अधिकारों को कमजोर करती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों और राज्य कानूनों ने अल्पसंख्यकों, बुजुर्गों और अन्य संवेदनशील समूहों के लिए मतदान की पहुंच सीमित कर दी है।
- सामाजिक विभाजन और राजनीतिक हिंसा: रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में राजनीतिक हिंसा बढ़ी और लोकतंत्र को लेकर जनता का मोहभंग हुआ। चीनी अधिकारियों द्वारा उद्धृत सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि कई अमेरिकी मानते हैं कि उनकी सरकार जनता के बजाय अभिजात वर्ग की सेवा करती है।
- आर्थिक असमानता और गरीबी: रिपोर्ट में कहा गया है कि 4 करोड़ से अधिक अमेरिकी गरीबी में जी रहे हैं, खाद्य असुरक्षा बढ़ रही है और 2023 की तुलना में बेघर लोगों की संख्या 18.1% बढ़ी है। इसमें सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा के अभाव और आसमान छूती चिकित्सा लागतों की आलोचना की गई है, जिनसे लोग दिवालिया हुए हैं और असमानता गहरी हुई है।
- बंदूक हिंसा और पुलिस की बर्बरता: चीन की रिपोर्ट के अनुसार 2024 में बंदूक हिंसा से 40,000 से अधिक और पुलिस की गोलीबारी से 1,300 से अधिक लोगों की मौत हुई। रिपोर्ट का तर्क है कि अमेरिकी सरकार इन लगातार बने हुए मुद्दों से निपटने में विफल रही है।
- नस्लीय भेदभाव: दस्तावेज़ में आरोप लगाया गया है कि अल्पसंख्यकों को हिंसा, गरीबी और स्वास्थ्य संबंधी असमानताओं का अधिक सामना करना पड़ता है तथा व्यवस्थागत नस्लवाद अफ्रीकी अमेरिकी, एशियाई अमेरिकी और मूल अमेरिकी समुदायों को प्रभावित करता है।
- महिलाओं और बच्चों के अधिकार: रिपोर्ट में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों से जुड़े प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समझौतों का अनुमोदन न करने के लिए अमेरिका की आलोचना की गई है। इसमें यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और बाल श्रम की ऊंची दरों का हवाला दिया गया है।
- प्रवासी संकट: अमेरिकी सीमा पर मानवीय स्थिति को बिगड़ता हुआ बताया गया है, जहां मौतों में वृद्धि, यातना की खबरें और बच्चों के लापता होने की घटनाएं सामने आई हैं।
- विदेश नीति और मानवीय संकट: चीन ने अमेरिका पर सैन्य सहायता और प्रतिबंधों के माध्यम से क्षेत्रीय संघर्षों को तेज करने का आरोप लगाया है, खास तौर पर मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका में।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि अमेरिकी राजनेता मानवाधिकारों को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं और मूल मूल्यों तथा सिद्धांतों से भटक गए हैं। इसमें अमेरिका से दूसरों की आलोचना करने से पहले अपनी समस्याओं को दूर करने का आह्वान किया गया है।
विशेषज्ञों की टिप्पणी और चीनी दृष्टिकोण
सरकारी मीडिया में उद्धृत चीनी विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी न्यायिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं की खामियों के कारण इन समस्याओं का समाधान कठिन है। उनका दावा है कि अमेरिका ने वैश्विक मानवाधिकार पैरोकार के रूप में अपनी विश्वसनीयता खो दी है और इस रिपोर्ट का उद्देश्य उन दोहरे मानदंडों तथा पाखंड को उजागर करना है, जिन्हें वे अमेरिका में देखते हैं।
चीनी राजनीतिक विश्लेषक ल्यू शियांग ने कहा, "अमेरिकी व्यवस्था सामाजिक निष्पक्षता हासिल करने के लिए बनाई ही नहीं गई है। लगातार बनी रहने वाली असमानता और गरीबी अंततः बेकाबू हो सकती हैं।"
ये बयान चीन के आधिकारिक विमर्श की व्यापक कथा को दर्शाते हैं: अमेरिकी मॉडल बुनियादी तौर पर दोषपूर्ण है और जिन चुनौतियों का वह सामना कर रहा है, उनसे निपटने के लिए अनुपयुक्त है।
अमेरिका की प्रतिक्रिया क्या है? विदेश मंत्रालय की अपनी रिपोर्टें
अमेरिकी सरकार मानवाधिकारों पर अपनी वार्षिक रिपोर्टें प्रकाशित करती है, जिनमें चीन समेत दुनिया भर के देशों के रिकॉर्ड की पड़ताल की जाती है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी 2024 की देशों में मानवाधिकार प्रथाओं पर रिपोर्ट में चीन में उइगरों और तिब्बतियों के दमन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और असंतुष्टों के खिलाफ सीमा-पार दमन जैसे दुर्व्यवहारों का ब्यौरा दिया गया है।
हालांकि, 2024 की रिपोर्ट खुद विवाद का विषय बन गई है। ट्रंप प्रशासन के तहत विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट का दायरा काफी घटा दिया गया। महिलाओं के अधिकारों, LGBTQ+ से जुड़े मुद्दों और सरकारी भ्रष्टाचार पर प्रमुख खंड हटा दिए गए या उनका महत्व कम कर दिया गया, जबकि सहयोगी देशों के साथ व्यवहार पर भाषा नरम कर दी गई। आलोचकों का कहना है कि इससे रिपोर्ट की विश्वसनीयता और उपयोगिता कमजोर होती है।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा, "ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रमुख खंड हटाने और कुछ देशों में अधिकारों के उल्लंघन को लेकर हेरफेर करने से 2025 की अमेरिकी विदेश मंत्रालय की मानवाधिकार रिपोर्ट की विश्वसनीयता घटती है और उसका राजनीतिकरण होता है। रिपोर्ट की विश्वसनीयता कमजोर करके प्रशासन मानवाधिकार रक्षकों को जोखिम में डालता है और शरण मांगने वालों की सुरक्षा को कमजोर करता है।"
स्वतंत्र विश्लेषकों और पूर्व राजनयिकों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका और चीन, दोनों द्वारा मानवाधिकार रिपोर्टिंग का राजनीतिकरण वैश्विक मानवाधिकार ढांचे के लिए खतरा है।
एक-दूसरे की आलोचना: आरोपों का सिलसिला
चीन और अमेरिका के बीच मानवाधिकारों को लेकर आलोचना का आदान-प्रदान नया नहीं है। दोनों देशों की वार्षिक रिपोर्टें दस्तावेज़ीकरण के साथ-साथ राजनयिक संदेश देने का भी काम करती हैं। अमेरिका चीन में शिनजियांग, तिब्बत और हांगकांग समेत मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर करता है, जबकि चीन अमेरिका की सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करता है।
इस पारस्परिक आलोचना से अक्सर पाखंड और दोहरे मानदंडों के आरोप लगते हैं। उदाहरण के लिए, जब अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने 2024 में हांगकांग के नए सुरक्षा कानूनों की आलोचना की, तो हांगकांग स्थित बीजिंग के विदेश मंत्रालय कार्यालय ने उस रिपोर्ट को "घृणित" कहा और अमेरिका पर चीन के आंतरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाया।
हांगकांग में चीनी विदेश मंत्रालय कार्यालय के एक प्रवक्ता ने कहा, "अमेरिका हांगकांग में चीन-विरोधी, अस्थिरता फैलाने वाली ताकतों से जुड़े मामलों को फिर उठा रहा था और खुले तौर पर उनका समर्थन कर रहा था। इससे मानवाधिकारों के मुद्दों का राजनीतिकरण और उन्हें अपने हित में इस्तेमाल करने की अमेरिकी प्रवृत्ति पूरी तरह उजागर होती है।"
इस तरह के आदान-प्रदान मानवाधिकारों की पैरवी के भू-राजनीतिक आयाम को रेखांकित करते हैं, जहां रिपोर्टों का इस्तेमाल व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के औजार के रूप में किया जाता है।
अमेरिका में बेघरपन, असमानता और सामाजिक बेचैनी
चीन की 2024 की रिपोर्ट में सबसे प्रमुख विषयों में से एक अमेरिका में बेघरपन और आर्थिक असमानता का बढ़ता संकट है। अमेरिकी आवास और शहरी विकास विभाग के अनुसार, 2024 में बेघर लोगों की संख्या रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। बड़े शहरों में तंबुओं की बस्तियां और अस्थायी शिविर आम होते जा रहे हैं।
बेरोजगारी, किफायती आवास की कमी और स्वास्थ्य समस्याएं बेघरपन के कारणों में शामिल हैं। हालांकि, चीनी विश्लेषकों का तर्क है कि इसकी जड़ व्यवस्थागत है: उनके अनुसार, अमेरिकी राजनीतिक और आर्थिक मॉडल सामाजिक निष्पक्षता हासिल करने या गरीबी से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए बना ही नहीं है।
अमेरिकी राजनीतिक टिप्पणीकार बेनी जॉनसन ने लॉस एंजिलिस के डाउनटाउन इलाके को "तंबुओं की बस्तियों, गंदगी, नशीले पदार्थों और बिखरी जिंदगियों से भरा" बताया। इससे पता चलता है कि बड़े पैमाने पर फैला बेघरपन अमेरिका के लिए एक ऐसा संकट बन गया है, जिससे निपटना कठिन है।
बढ़ती महंगाई और स्थिर वेतन ने अमीर-गरीब की खाई को चौड़ा कर दिया है और कम तथा मध्यम आय वाले परिवारों को विनाशकारी झटके दिए हैं। आलोचकों का कहना है कि अमेरिकी सरकार के कदम अक्सर फौरी राहत तक सीमित रहते हैं और गरीबी तथा असमानता के मूल कारणों का समाधान नहीं करते।
नस्लीय भेदभाव और अल्पसंख्यकों के अधिकार
चीन की रिपोर्ट अमेरिका में नस्लीय भेदभाव पर विशेष ध्यान देती है और स्वतंत्र संगठनों के निष्कर्षों से भी इसकी पुष्टि होती है। अफ्रीकी अमेरिकी, एशियाई अमेरिकी और मूल अमेरिकी समुदायों को कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और आर्थिक अवसरों में अब भी असमानताओं का सामना करना पड़ता है।
उदाहरण के लिए, पुलिस हिंसा और कारावास का असर अफ्रीकी अमेरिकियों पर असमान रूप से अधिक पड़ता है। एशियाई अमेरिकियों ने खास तौर पर COVID-19 महामारी के बाद भेदभाव की बढ़ती घटनाओं की शिकायत की है। मूल अमेरिकियों के अधिकारों का लगातार उल्लंघन हो रहा है और वे स्थायी गरीबी तथा आवश्यक सेवाओं तक पहुंच की कमी से जूझ रहे हैं।
नागरिक अधिकारों से जुड़े कानूनों और सकारात्मक कार्रवाई जैसे कुछ क्षेत्रों में अमेरिका ने प्रगति की है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि व्यवस्थागत नस्लवाद अब भी गहराई से जड़ें जमाए हुए है।
महिलाओं और बच्चों के अधिकार: अंतरराष्ट्रीय आलोचना
अमेरिका उन कुछ देशों में से एक है जिसने महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर कन्वेंशन (CEDAW) या बाल अधिकारों पर कन्वेंशन का अनुमोदन नहीं किया है। चीन की रिपोर्ट इस तथ्य को रेखांकित करती है और तर्क देती है कि इससे महिलाओं तथा बच्चों के अधिकारों का लगातार उल्लंघन होता है।
रिपोर्ट में जिन मुद्दों का उल्लेख है, उनमें यौन उत्पीड़न और घरेलू हिंसा की ऊंची दरें, मातृत्व देखभाल का अभाव और बाल श्रम शामिल हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की 2024 की रिपोर्ट में महिलाओं के अधिकारों पर अलग खंड न होने की आलोचना पैरवी करने वाले समूहों ने की है। उनका मानना है कि इससे लैंगिक मुद्दों को कम प्राथमिकता दी गई है।
प्रवासी संकट और अमेरिकी सीमा नीति
चीन की रिपोर्ट में अमेरिकी सीमा पर मानवीय संकट को बिगड़ता हुआ बताया गया है, जहां मौतों में वृद्धि, यातना की खबरें और बच्चों के लापता होने की घटनाएं सामने आई हैं। शरण मांगने वालों और अनियमित प्रवासियों से निपटने के तरीके को लेकर अमेरिका को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों स्तरों पर आलोचना का सामना करना पड़ा है।
पैरवी समूहों का कहना है कि परिवारों को अलग करना, लंबे समय तक हिरासत में रखना और खतरनाक देशों में निर्वासित करना जैसी नीतियां अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का उल्लंघन करती हैं। अल सल्वाडोर और वेनेजुएला जैसे देशों में दुर्व्यवहारों पर विस्तृत खंडों को विदेश मंत्रालय की 2024 की रिपोर्ट से हटाए जाने पर चिंता जताई गई है कि अमेरिका निर्वासित लोगों के सामने मौजूद जोखिमों को कम करके दिखा रहा है।
बंदूक हिंसा और पुलिस की बर्बरता: लगातार बनी चुनौतियां
बंदूक हिंसा अमेरिका की एक विशिष्ट समस्या बनी हुई है और 2024 में इससे 40,000 से अधिक मौतें दर्ज की गईं। सामूहिक गोलीबारी, घरेलू हिंसा और आत्महत्याएं इस संख्या में शामिल हैं। बंदूक नियंत्रण के उपायों को व्यापक जनसमर्थन मिलने के बावजूद, राजनीतिक ध्रुवीकरण और हित समूहों की लॉबिंग के कारण विधायी कार्रवाई ठप है।
पुलिस की बर्बरता भी लगातार बनी हुई समस्या है। 2024 में पुलिस की गोलीबारी में 1,300 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें अल्पसंख्यक समुदायों के लोग असमान रूप से अधिक प्रभावित हुए। सुधार की मांगों से स्थानीय स्तर पर कुछ बदलाव हुए हैं, लेकिन राष्ट्रीय कानून को आगे बढ़ाने में कठिनाई रही है।
अंतरराष्ट्रीय प्रभाव: भू-राजनीतिक हथियार के रूप में मानवाधिकार
चीन और अमेरिका के बीच मानवाधिकार रिपोर्टों का वार्षिक आदान-प्रदान एक व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाता है: अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में मानवाधिकारों को औजार के रूप में इस्तेमाल करना। दोनों देश एक-दूसरे पर पाखंड और दोहरे मानदंडों का आरोप लगाते हुए वैश्विक मानदंडों और संस्थानों को आकार देने की कोशिश करते हैं।
चीन ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद जैसे अंतरराष्ट्रीय निकायों में अपना प्रभाव बढ़ाया है और अक्सर स्वतंत्र गैर-सरकारी संगठनों तथा मानवाधिकार रक्षकों की भागीदारी सीमित करने के लिए प्रक्रियागत तरीके अपनाए हैं। इंटरनेशनल सर्विस फॉर ह्यूमन राइट्स की 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन संयुक्त राष्ट्र की गैर-सरकारी संगठनों पर समिति का सबसे बड़ा अवरोधक सदस्य बन गया है और आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने के लिए फैसले टालने तथा अन्य उपायों का इस्तेमाल कर रहा है।
ISHR की रिपोर्ट में कहा गया है, "चीन ने स्वतंत्र गैर-सरकारी संगठनों को संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिलने, संयुक्त राष्ट्र परिसरों तक पहुंचने, मानवाधिकार परिषद में बोलने या राजनयिकों से मिलने से रोकने के प्रयासों का नेतृत्व किया है। बीजिंग ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकायों से जुड़ने वालों के खिलाफ व्यवस्थित रूप से जवाबी कार्रवाई की है।"
प्रभाव के लिए इस प्रतिस्पर्धा के वास्तविक दुनिया में परिणाम होते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्र की प्रभावशीलता कमजोर हो सकती है और अन्य सत्तावादी रुझान वाले देशों के लिए हानिकारक मिसाल कायम हो सकती है।
मानवाधिकार रिकॉर्ड की तुलना: अमेरिका, चीन और वैश्विक संदर्भ
चीन की रिपोर्ट जहां अमेरिकी कमियों पर ध्यान देती है, वहीं अमेरिका और उसके सहयोगी चीन में मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर करते रहे हैं, खास तौर पर शिनजियांग, तिब्बत और हांगकांग में। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की 2024 की रिपोर्ट में उइगरों और अन्य अल्पसंख्यकों के व्यवस्थित दमन, मनमाने ढंग से हिरासत में रखने, यातना और अभिव्यक्ति तथा धर्म की स्वतंत्रता पर प्रतिबंधों का दस्तावेज़ीकरण किया गया है।
ह्यूमन राइट्स वॉच और चीन पर कांग्रेस-कार्यकारी आयोग जैसे स्वतंत्र संगठनों ने इन निष्कर्षों की पुष्टि की है। उनके अनुसार, चीनी सरकार नागरिक समाज पर कड़ा नियंत्रण रखती है, असहमति को सेंसर करती है और विदेशों में आलोचकों के खिलाफ सीमा-पार दमन करती है।
उदाहरण के लिए, तिब्बत में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने जबरन गायब किए जाने की घटनाओं, मनमानी हिरासत और धार्मिक तथा सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर कड़े प्रतिबंधों का ज़िक्र किया है। हांगकांग में 2024 में नए सुरक्षा कानून लागू होने के बाद असहमति और स्वतंत्र मीडिया पर कार्रवाई और तेज हुई है।
ये पारस्परिक रिपोर्टें और आलोचनाएं वैश्विक मानवाधिकार परिदृश्य की जटिलता दिखाती हैं, जहां कोई भी देश जांच-पड़ताल से अछूता नहीं है और सभी राजनीतिक दबावों के दायरे में हैं।
संक्षेप में
- चीन की 2024 की मानवाधिकार रिपोर्ट में अमेरिका पर राजनीतिक अव्यवस्था बढ़ाने, आर्थिक असमानता और नस्लीय भेदभाव को गहरा करने तथा मानवाधिकारों को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया है।
- अमेरिकी विदेश मंत्रालय की अपनी 2024 की रिपोर्ट की कुछ बातें छोड़ने और उसका राजनीतिकरण करने के लिए आलोचना हुई है, जिससे वैश्विक मानक के रूप में उसकी विश्वसनीयता कमजोर हुई है।
- बेघरपन, बंदूक हिंसा, पुलिस की बर्बरता और प्रवासी संकट अमेरिका में लगातार बनी चुनौतियां हैं, जिनके व्यवस्थागत कारण हैं और जिनसे निपटने में प्रगति सीमित रही है।
- चीन और अमेरिका के बीच मानवाधिकारों को लेकर पारस्परिक आलोचना व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अधिकारों की पैरवी को अपने हित में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति को दर्शाती है।
- अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों में चीन के बढ़ते प्रभाव से स्वतंत्र नागरिक समाज की आवाज़ों के हाशिये पर जाने की चिंता बढ़ी है।
- स्वतंत्र संगठन सभी सरकारों से सार्वभौमिक मानवाधिकार सिद्धांतों को बनाए रखने और अधिकारों पर रिपोर्टिंग के राजनीतिकरण का विरोध करने का आग्रह करते हैं।






