इंडोनेशिया का सैन्य विस्तार: राष्ट्रपति प्रबोवो के तहत एक नया दौर
दुनिया के तीसरे सबसे बड़े लोकतंत्र और दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश इंडोनेशिया में राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के नेतृत्व में सेना का व्यापक रूपांतरण हो रहा है। पदभार संभालने के बाद से ही प्रबोवो—जो विवादित अतीत वाले पूर्व विशेष बल कमांडर हैं—ने सुहार्तो के अधिनायकवादी दौर के बाद सेना के सबसे बड़े विस्तार और पुनर्गठन की शुरुआत की है। राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के लिए इसे जरूरी बताते हुए उठाए गए इस साहसिक कदम ने लोकतंत्र, नागरिक-सैन्य संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता पर इसके असर को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है।
विषय-सूची
- इंडोनेशिया का सैन्य विस्तार: राष्ट्रपति प्रबोवो के तहत एक नया दौर
- इंडोनेशिया अपनी सेना का विस्तार क्यों कर रहा है?
- युद्धक्षेत्र से धान के खेतों तक: सेना की नई नागरिक भूमिकाएं
- कानूनी बदलाव: क्या लौट रहा है ‘द्वीफुंगसी’?
- समर्थकों के तर्क: सुरक्षा, दक्षता और राष्ट्रीय एकता
- आलोचकों की चिंताएं: लोकतांत्रिक क्षरण और अक्षमता
- इतिहास की गूंज: सुहार्तो की न्यू ऑर्डर व्यवस्था की छाया
- क्षेत्रीय और भू-राजनीतिक असर
- पापुआ और मानवाधिकार: तनाव का केंद्र
- इंडोनेशिया के लोकतंत्र का आगे क्या होगा?
- संक्षेप में
इस विवाद के केंद्र में विस्तार का अभूतपूर्व पैमाना और दायरा है। प्रबोवो प्रशासन ने सेना की 100 से अधिक नई बटालियनें बनाई हैं और अगले पांच वर्षों में 500 और बटालियनें बनाने की योजना है। इसके साथ ही विशेष बलों और मरीन की नई इकाइयां भी बनाई जा रही हैं। सेना की भूमिका कृषि और दवा निर्माण से लेकर सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों तक, नागरिक जीवन के कई क्षेत्रों में बढ़ रही है। आलोचकों का कहना है कि इन बदलावों से सेना का पुराना दोहरी भूमिका वाला सिद्धांत (द्वीफुंगसी) फिर लौट सकता है, नागरिक और सैन्य क्षेत्रों के बीच की रेखा धुंधली हो सकती है और लंबे संघर्ष के बाद हासिल किए गए लोकतांत्रिक सुधार कमजोर पड़ सकते हैं।
इंडोनेशिया अपनी सेना का विस्तार क्यों कर रहा है?
राष्ट्रपति प्रबोवो ने बार-बार मजबूत सेना की जरूरत पर जोर देते हुए कहा है कि “कोई भी देश सेना के बिना स्वतंत्र नहीं हो सकता।” दक्षिण चीन सागर से लेकर यूरोप तक बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों वाली दुनिया में वे इस विस्तार को इंडोनेशिया के विशाल द्वीपसमूह की रक्षा, बाहरी खतरों को रोकने और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए जरूरी बताते हैं।
पश्चिम जावा में आयोजित एक भव्य समारोह में प्रबोवो ने सेना की दर्जनों नई इकाइयों का उद्घाटन किया। इनमें छह नए क्षेत्रीय सेना कमान, 14 नौसैनिक कमान और वायुसेना के तीन कमान शामिल हैं। उन्होंने कहा, “दुनिया अनिश्चितताओं से भरी है और भले ही हमें युद्ध पसंद न हो, लेकिन हर जगह युद्ध हो रहे हैं।” वर्ष 2025 का रक्षा बजट बढ़कर करीब 15 अरब डॉलर हो गया है, जो पिछले वर्ष से 37–50% अधिक है। इस बजट से नई इकाइयों के साथ तुर्की के KAAN लड़ाकू विमानों और बैलिस्टिक मिसाइलों जैसे आधुनिक हथियारों की खरीद भी की जाएगी।
समर्थकों का कहना है कि यह विस्तार बहुत पहले हो जाना चाहिए था। इंडोनेशिया की सेना, जिसे TNI के नाम से जाना जाता है, आधुनिकीकरण और तत्परता के मामले में लंबे समय से क्षेत्रीय देशों से पीछे रही है। नई संरचना का मकसद जावा से बाहर सैन्य मौजूदगी फैलाना और हजारों द्वीपों में तेजी से कार्रवाई की क्षमता बढ़ाना है। समर्थक यह भी कहते हैं कि सेना आपदा राहत और विकास कार्यों में मदद कर सकती है, खासकर उन दूरदराज के इलाकों में जहां नागरिक बुनियादी ढांचा कमजोर है।
युद्धक्षेत्र से धान के खेतों तक: सेना की नई नागरिक भूमिकाएं
प्रबोवो की योजना का शायद सबसे विवादास्पद पहलू नागरिक मामलों में सेना की बढ़ती भागीदारी है। नई बटालियनों को रक्षा के साथ-साथ कृषि, पशुपालन और खाद्य सुरक्षा में मदद की जिम्मेदारी दी गई है। सरकार का दावा है कि इन इकाइयों को युद्धक प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा और उनका मकसद खाद्य उत्पादन तथा ग्रामीण विकास को बढ़ावा देना है।
एक उल्लेखनीय कदम के तहत सेना को सार्वजनिक वितरण के लिए दवाएं बनाने की अनुमति भी दी गई है। रक्षा मंत्री और खाद्य एवं औषधि एजेंसी के बीच हुए समझौते के तहत सेना, नौसेना और वायुसेना की प्रयोगशालाएं—जो पहले सिर्फ सैनिकों को दवाएं देती थीं—अब आम जनता के लिए दवाएं बनाना शुरू करेंगी। इसका मकसद लागत घटाना और अवैध दवाओं की आपूर्ति पर अंकुश लगाना है। बड़े पैमाने पर उत्पादन जल्द शुरू होने वाला है। दवाएं प्रबोवो द्वारा शुरू की गईं राज्य-समर्थित 80,000 सहकारी समितियों के जरिए वितरित की जाएंगी।
इसके अलावा, सेना मुफ्त स्कूल भोजन कार्यक्रम चलाने, पापुआ जैसे संघर्षग्रस्त इलाकों में अस्पताल बनाने और समयसीमा पूरी कर चुके पाम तेल बागानों की जमीन के पुनरुद्धार में भी शामिल है। इन पहलों को जनकल्याण बेहतर करने और अक्षम नागरिक नौकरशाही को दरकिनार करने के प्रयासों के रूप में पेश किया जा रहा है।
कानूनी बदलाव: क्या लौट रहा है ‘द्वीफुंगसी’?
सेना की विस्तारित भूमिका के केंद्र में इंडोनेशिया के सशस्त्र बल कानून में विवादित संशोधन है, जिसे संसद ने मार्च 2025 में पारित किया। नया कानून सक्रिय सैन्यकर्मियों को अधिक नागरिक पदों पर नियुक्त होने की अनुमति देता है। ऐसी सरकारी एजेंसियों की संख्या 10 से बढ़ाकर 14 कर दी गई है, जिनमें अटॉर्नी जनरल का कार्यालय, राज्य सचिवालय और आतंकवाद-रोधी एजेंसी शामिल हैं। यह अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र भी बढ़ाता है।
इस कानूनी बदलाव से नागरिक समाज संगठनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और लोकतंत्र समर्थकों में चिंता बढ़ गई है। उन्हें सुहार्तो का दौर याद आता है, जब सेना के दोहरी भूमिका वाले सिद्धांत ने उसे तीन दशक से अधिक समय तक राजनीति, कारोबार और रोजमर्रा की जिंदगी पर हावी होने का मौका दिया। 1998 में सुहार्तो के पतन के बाद सेना को पेशेवर बनाने, उसकी भूमिका बाहरी रक्षा तक सीमित करने और नागरिक सर्वोच्चता सुनिश्चित करने के लिए सुधार किए गए थे। आलोचकों का कहना है कि नया कानून इन उपलब्धियों को पलटने का जोखिम पैदा करता है।
ह्यूमन राइट्स वॉच के वरिष्ठ इंडोनेशिया शोधकर्ता आंद्रियास हार्सोनो ने कहा, “राष्ट्रपति प्रबोवो नागरिक मामलों में इंडोनेशियाई सेना की भूमिका बहाल करने पर आमादा दिखते हैं। इन मामलों में लंबे समय से बड़े पैमाने पर दुर्व्यवहार और दंड से बच निकलने की घटनाएं देखी गई हैं। सरकार जिस जल्दबाजी में इन संशोधनों को अपना रही है, उससे मानवाधिकारों और जवाबदेही के प्रति उसकी घोषित प्रतिबद्धता कमजोर होती है।”
जकार्ता और दूसरे शहरों में छात्रों तथा लोकतंत्र समर्थक समूहों ने प्रदर्शन किए हैं, हालांकि अब तक ये छोटे रहे हैं और इन्हें जल्द ही तितर-बितर कर दिया गया। अधिकार समूहों का कहना है कि नागरिक शासन में सेना की भूमिका बढ़ने से सत्ता का दुरुपयोग, मानवाधिकारों का उल्लंघन और राजनीतिक जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
समर्थकों के तर्क: सुरक्षा, दक्षता और राष्ट्रीय एकता
सरकार और उसके समर्थक लोकतांत्रिक गिरावट के आरोपों को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि इंडोनेशिया की विशिष्ट चुनौतियों से निपटने के लिए सेना की विस्तारित भूमिका जरूरी है। देश का विशाल और विविधतापूर्ण द्वीपसमूह प्राकृतिक आपदाओं, अलगाववाद और सीमा-पार खतरों के प्रति संवेदनशील है। रक्षा मंत्री स्जाफ्री स्जामसुद्दीन ने कहा है कि साइबर खतरों और आतंकवाद सहित संघर्ष के नए रूपों के अनुरूप ढलने के लिए ये संशोधन जरूरी हैं।
अधिकारी यह भी दावा करते हैं कि दवा और कृषि क्षेत्रों में सेना की भागीदारी से लागत घटेगी, दक्षता बढ़ेगी और भ्रष्ट बिचौलियों को हटाने में मदद मिलेगी। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि सेना नागरिक मामलों में दखल नहीं दे सकती और वह केवल देश के क्षेत्र की रक्षा तथा विकास में सहयोग के लिए अपनी क्षमता बढ़ा रही है।
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि सेना की बढ़ती भागीदारी का रुझान प्रबोवो के पूर्ववर्ती जोको विडोडो के कार्यकाल में ही शुरू हो गया था और प्रबोवो केवल पहले से चल रही नीति को तेज कर रहे हैं। वे आपदा प्रबंधन और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में सेना की भूमिका को उसके सकारात्मक योगदान के उदाहरण के रूप में पेश करते हैं।
आलोचकों की चिंताएं: लोकतांत्रिक क्षरण और अक्षमता
सरकार के आश्वासनों के बावजूद कई जानकार अब भी गहरी चिंता जता रहे हैं। मानवाधिकार समूहों, लोकतंत्र समर्थकों और कुछ सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि इस विस्तार से राजनीति, नीति-निर्माण और अर्थव्यवस्था पर सेना का प्रभाव स्थायी हो सकता है—अक्सर ऐसे क्षेत्रों में भी, जहां उसके पास विशेषज्ञता नहीं है।
आलोचकों का तर्क है कि सैन्यकर्मियों को कई छोटी इकाइयों और नागरिक भूमिकाओं में बांटने से समग्र युद्धक तत्परता और पेशेवर क्षमता कमजोर होगी। वे सेना द्वारा चलाए जा रहे खेतों और दवा कारोबार की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हैं और अतीत की विफलताओं तथा अक्षमता का हवाला देते हैं। कुछ लोगों को आशंका है कि नागरिक जीवन में सेना की बढ़ती मौजूदगी असहमति को दबा सकती है, नागरिक संस्थाओं को कमजोर कर सकती है और दंड से बचने की संस्कृति पैदा कर सकती है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडोनेशिया के कार्यकारी निदेशक उस्मान हमीद ने कहा, “यह इस बात का लक्षण है कि सरकार अधिनायकवाद की ओर बढ़ गई है।”
वित्तीय चिंताएं भी बढ़ रही हैं। बड़े पैमाने पर पुनर्गठन और विस्तार से रक्षा खर्च बढ़ा है, जिससे इसकी स्थिरता और अन्य मदों पर खर्च के अवसर गंवाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय कमान और सामाजिक कार्यक्रमों का विस्तार करने के बजाय इंडोनेशिया को आधुनिक युद्ध तकनीक और बाहरी रक्षा में अधिक निवेश करना चाहिए।
इतिहास की गूंज: सुहार्तो की न्यू ऑर्डर व्यवस्था की छाया
कई इंडोनेशियाई लोगों को मौजूदा घटनाक्रम सुहार्तो के न्यू ऑर्डर शासन (1966–1998) की याद दिलाता है, जब राजनीति, कारोबार और रोजमर्रा की जिंदगी में सेना की मौजूदगी हर जगह थी। द्वीफुंगसी सिद्धांत ने सुरक्षा और नागरिक मामलों में सेना की दोहरी भूमिका को जायज ठहराया था, जिससे उसे असहमति दबाने और संकट के समय व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार मिला।
सुहार्तो के पतन के बाद इंडोनेशिया सुधारों की राह पर चला और उसने ऐसी सेना बनाने की कोशिश की जो बाहरी रक्षा पर केंद्रित हो, राजनीतिक रूप से तटस्थ रहे और नागरिक सत्ता के प्रति जवाबदेह हो। 2004 के सैन्य कानून ने सक्रिय अधिकारियों को नागरिक पदों पर रहने से रोका और सशस्त्र बलों को पेशेवर बनाने का लक्ष्य रखा। आलोचकों का कहना है कि हालिया संशोधनों और विस्तार से इन सुधारों के उलटने और शासन में सेना की मौजूदगी सामान्य होने का जोखिम है।
वर्तमान सैन्य प्रमुख जनरल आगुस सुबियांतो का कहना है कि पुराना कानून अब अप्रासंगिक हो चुका है और सेना को नई चुनौतियों के अनुरूप ढलना होगा। हालांकि, अधिकार समूहों और लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं को अतीत के दुर्व्यवहार और दंड से बचने की प्रवृत्ति लौटने का डर है।
क्षेत्रीय और भू-राजनीतिक असर
इंडोनेशिया का सैन्य विस्तार निर्वात में नहीं हो रहा है। यह देश बड़ी भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताओं के केंद्र में स्थित है। दक्षिण चीन सागर विवाद, चीन की बढ़ती आक्रामकता और वैश्विक अस्थिरता उसकी सुरक्षा संबंधी सोच को आकार दे रहे हैं। प्रबोवो सरकार का कहना है कि बाहरी खतरों को रोकने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए मजबूत सेना जरूरी है।
हालांकि, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि इस विस्तार से सुरक्षा दुविधा पैदा हो सकती है। ऐसी स्थिति में इंडोनेशिया के रक्षात्मक कदमों को पड़ोसी देश आक्रामक मान सकते हैं, जिससे दक्षिण-पूर्व एशिया का नाजुक संतुलन बिगड़ सकता है। आधुनिक तकनीकों का समावेश और जावा-केंद्रित तैनाती से दूर, विभिन्न क्षेत्रों में सेना को फैलाने की योजना दांव पर लगे रणनीतिक हितों को रेखांकित करती है।
द जकार्ता पोस्ट के एक संपादकीय में चेतावनी दी गई, “विस्तार से सुरक्षा दुविधा पैदा होने का जोखिम है, जहां रक्षात्मक कदमों को गलत ढंग से आक्रामक समझा जा सकता है और दक्षिण-पूर्व एशिया का नाजुक संतुलन बिगड़ सकता है।”
क्षेत्रीय तनाव से बचने के लिए विशेषज्ञ इंडोनेशिया को रक्षा कूटनीति, विश्वास-निर्माण के उपाय और गैर-उकसावे वाले प्रोटोकॉल अपनाने की सलाह देते हैं, ताकि पड़ोसी देशों को आश्वस्त किया जा सके और सद्भाव बनाए रखा जा सके।
पापुआ और मानवाधिकार: तनाव का केंद्र
सेना के विस्तार के सबसे संवेदनशील पहलुओं में से एक लंबे समय से चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन वाले अशांत क्षेत्र पापुआ में विशेष बलों की नई इकाइयों की तैनाती है। इंडोनेशियाई बलों पर पापुआ में मानवाधिकारों के उल्लंघन और कठोर तरीकों के इस्तेमाल के आरोप लगते रहे हैं, जिससे स्थानीय नाराजगी और अंतरराष्ट्रीय आलोचना बढ़ी है।
सरकार का कहना है कि व्यवस्था बनाए रखने और मानवीय सहायता देने के लिए नई इकाइयां जरूरी हैं। हालांकि, अधिकार समूहों को डर है कि सेना की बढ़ी हुई मौजूदगी तनाव बढ़ाएगी और अधिक दुर्व्यवहार का कारण बनेगी। संघर्षग्रस्त इलाकों में अस्पताल बनाने और दवाएं बांटने में सेना की भागीदारी को कुछ लोग जनता का समर्थन हासिल करने की कोशिश मानते हैं, जबकि कुछ इसे नियंत्रण मजबूत करने का तरीका समझते हैं।
इंडोनेशिया के लोकतंत्र का आगे क्या होगा?
राष्ट्रपति प्रबोवो के नेतृत्व में इंडोनेशिया का सैन्य विस्तार देश के लोकतंत्र और नागरिक-सैन्य संबंधों के लिए निर्णायक मोड़ है। सरकार की महत्वाकांक्षी योजना सशस्त्र बलों को नए सिरे से आकार दे रही है, समाज में उनकी भूमिका बढ़ा रही है और नागरिक तथा सैन्य क्षेत्रों के बीच की सीमाओं की परीक्षा ले रही है।
समर्थक इन बदलावों को उथल-पुथल भरी दुनिया में राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और संकटों से उबरने की क्षमता के लिए जरूरी मानते हैं। आलोचक लोकतांत्रिक क्षरण, अक्षमता और सैन्य वर्चस्व के दौर में लौटने के जोखिम की चेतावनी देते हैं। नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि इंडोनेशिया सुरक्षा की जरूरत और लोकतांत्रिक मानदंडों, नागरिक निगरानी तथा मानवाधिकारों की रक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाता है।
संक्षेप में
- राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो सुहार्तो के दौर के बाद इंडोनेशिया के सबसे बड़े सैन्य विस्तार का नेतृत्व कर रहे हैं। इसके तहत सैकड़ों नई इकाइयां बनाई जा रही हैं और रक्षा बजट में 50% तक की वृद्धि की गई है।
- कृषि, दवा निर्माण, सामाजिक कल्याण और भूमि प्रबंधन सहित नागरिक क्षेत्रों में सेना की भूमिका बढ़ रही है। इससे लोकतांत्रिक गिरावट और अक्षमता को लेकर चिंताएं उठी हैं।
- एक विवादित नया कानून सक्रिय सैन्यकर्मियों को अधिक नागरिक पदों पर नियुक्त होने की अनुमति देता है, जिससे अधिनायकवादी अतीत के सेना के दोहरी भूमिका वाले सिद्धांत (द्वीफुंगसी) की वापसी का डर बढ़ा है।
- समर्थकों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और विकास के लिए यह विस्तार जरूरी है, जबकि आलोचक मानवाधिकारों के उल्लंघन, राजनीतिक दंडमुक्ति और सेना के कमजोर होते पेशेवर स्वरूप की चेतावनी देते हैं।
- पापुआ में विशेष बलों की नई इकाइयों की तैनाती और सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा शिक्षा में सेना की भागीदारी, रक्षा और नागरिक जीवन के बीच धुंधली होती सीमाओं को उजागर करती है।
- जानकार चेतावनी देते हैं कि 1998 के बाद के इंडोनेशिया के सुधार खतरे में हैं। देश का भविष्य नागरिक सर्वोच्चता, लोकतांत्रिक जवाबदेही और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने पर निर्भर करेगा।






