दक्षिण कोरिया में प्रवासी श्रमिकों के साथ कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार: गहराता संकट
तेज़ आर्थिक विकास और तकनीकी नवाचार के लिए सराहा जाने वाला दक्षिण कोरिया अपने श्रमबल के भीतर बढ़ते संकट का सामना कर रहा है: प्रवासी श्रमिकों के साथ कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार और उत्पीड़न। हाल के सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि विदेशी श्रमिकों को निशाना बनाकर कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार की दर्ज शिकायतें 2020 के बाद से तीन गुना से अधिक हो गई हैं। इनकी संख्या 2020 में 65 से बढ़कर 2024 में 225 हो गई। मई 2025 तक 112 नई शिकायतें दर्ज हो चुकी थीं, जिससे संकेत मिलता है कि इस साल दर्ज मामलों की संख्या अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच सकती है। हालांकि, अधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों और विशेषज्ञों का कहना है कि ये आंकड़े समस्या की केवल ऊपरी तस्वीर दिखाते हैं। शिकायतें दर्ज न कराने और न्याय तक पहुंच में व्यवस्थागत बाधाओं के कारण दुर्व्यवहार का वास्तविक पैमाना कहीं बड़ा होने की आशंका है।
विषय-सूची
- दक्षिण कोरिया में प्रवासी श्रमिकों के साथ कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार: गहराता संकट
- प्रवासी श्रमिक असुरक्षित क्यों हैं?
- चौंकाने वाली घटना से मुद्दे पर ध्यान गया
- सरकार की प्रतिक्रिया और कार्रवाई
- कानूनी ढांचे को समझना: कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार-रोधी कानून
- आंकड़े: संकट के पीछे की संख्या
- व्यक्तिगत कहानियां: कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार की मानवीय कीमत
- शिकायत दर्ज कराने और न्याय पाने में बाधाएं
- सुधार की मांग: रोजगार अनुमति प्रणाली में व्यापक बदलाव
- व्यापक संदर्भ: दक्षिण कोरिया में भेदभाव और मानवाधिकार
- विशेषज्ञों और अधिकारियों के विचार
- संक्षेप में
प्रवासी श्रमिक असुरक्षित क्यों हैं?
प्रवासी श्रमिक दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम हैं। वे विनिर्माण, कृषि और निर्माण जैसे उद्योगों में श्रमिकों की कमी पूरी करते हैं। उनमें से ज्यादातर दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और अन्य देशों से आते हैं। वे अक्सर ऐसे काम करते हैं जो शारीरिक रूप से कठिन, कम वेतन वाले होते हैं और जिन्हें स्थानीय श्रमिक नहीं करना चाहते। अपने योगदान के बावजूद, उनमें से कई को भेदभाव, खराब कामकाजी परिस्थितियों और सीमित कानूनी सुरक्षा का सामना करना पड़ता है।
उनकी असुरक्षा बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में दक्षिण कोरिया की रोजगार अनुमति प्रणाली (ईपीएस) की संरचना शामिल है। यह प्रणाली प्रवासी श्रमिकों को एक ही नियोक्ता से बांध देती है और नौकरी बदलने की उनकी क्षमता को गंभीर रूप से सीमित करती है, यहां तक कि दुर्व्यवहार, वेतन न मिलने या असुरक्षित परिस्थितियों के मामलों में भी। नियोक्ता की सहमति के बिना, श्रमिकों के पास नौकरी बदलने के कानूनी आधार सीमित होते हैं। इससे वे फंस जाते हैं और अक्सर जवाबी कार्रवाई या देश से निर्वासन के डर से चुप रहते हैं।
चौंकाने वाली घटना से मुद्दे पर ध्यान गया
2025 की शुरुआत में प्रवासी श्रमिकों के साथ कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार के मुद्दे पर देश और दुनिया का ध्यान फिर गया। तब एक वीडियो सामने आया, जिसमें नाजू की ईंट भट्ठी में काम करने वाले श्रीलंकाई श्रमिक को प्लास्टिक रैप से ईंटों के ढेर से बांधकर फोर्कलिफ्ट से उठाते दिखाया गया। तेजी से वायरल हुए इस वीडियो में श्रमिक हवा में उठाए जाने के दौरान हिलने-डुलने में असमर्थ था और उसके सहकर्मी उसका मजाक उड़ा रहे थे। कारखाने के प्रमुख ने इसे मजाक बताया, लेकिन कार्यकर्ताओं और अधिकारियों ने इस कृत्य को मानवाधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन करार दिया।
नवंबर 2024 में ई-9 वीजा पर दक्षिण कोरिया पहुंचे पीड़ित ने बाद में बताया कि इस घटना से उसे अब भी गहरा आघात है। एक साक्षात्कार में उसने कहा:
फोर्कलिफ्ट से बांधे जाने और सहकर्मियों द्वारा मजाक उड़ाए जाने के सदमे से मुझे अब भी सिरदर्द होता है। मुझे इतनी बेइज्जती महसूस हुई कि मैं इस बारे में सोचना भी नहीं चाहता।
मानवाधिकार समूहों और श्रमिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस मामले में पीड़ित का साथ दिया। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जवाबदेही तय करने की मांग की। राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने सार्वजनिक रूप से इस घटना की निंदा करते हुए इसे "अस्वीकार्य हिंसा" बताया और प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कड़ी कार्रवाई का वादा किया।
सरकार की प्रतिक्रिया और कार्रवाई
जनता के आक्रोश के जवाब में, रोजगार और श्रम मंत्रालय ने ईंट भट्ठी की आपात जांच शुरू की और विदेशी श्रमिकों के खिलाफ कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार और हिंसा रोकने के लिए देशव्यापी 100-दिवसीय अभियान की घोषणा की। राष्ट्रपति ली ने ऐसे "बर्बर मानवाधिकार उल्लंघनों" के लिए कड़ी सजा की जरूरत पर जोर दिया और प्रवासियों के श्रम अधिकारों की सुरक्षा की व्यापक समीक्षा का आह्वान किया।
इन उपायों के बावजूद, कार्यकर्ताओं का कहना है कि नियमों को लागू करने में अब भी असंगति है और कानूनी ढांचे की कमियों तथा पीड़ितों के सामने न आने की झिझक के कारण कई मामलों में दोषियों को सजा नहीं मिलती।
कानूनी ढांचे को समझना: कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार-रोधी कानून
दक्षिण कोरिया का कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार-रोधी कानून 2019 में उत्पीड़न और कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार से निपटने के लिए लागू किया गया था। यह कानून उत्पीड़न को अधिकार का ऐसा दुरुपयोग बताता है जिससे शारीरिक या मानसिक नुकसान हो या कामकाजी माहौल खराब हो। नियोक्ताओं के लिए शिकायतों की जांच करना, पीड़ितों की सुरक्षा करना और सुधारात्मक कदम उठाना जरूरी है। अगर ये दायित्व पूरे कर दिए जाते हैं, तो मामलों को आधिकारिक तौर पर "कोई उल्लंघन नहीं" के रूप में दर्ज किया जा सकता है और बिना दंड के बंद किया जा सकता है।
हालांकि, इस कानून की महत्वपूर्ण सीमाएं हैं। यह पांच से कम कर्मचारियों वाले कार्यस्थलों या विशेष रोजगार व्यवस्थाओं में काम करने वालों पर लागू नहीं होता। इन श्रेणियों में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक शामिल हैं। श्रमिक अधिकार समूहों के अनुसार, दक्षिण कोरिया में लगभग 70 प्रतिशत प्रवासी श्रमिक 30 से कम लोगों वाले कार्यस्थलों में काम करते हैं, और इनमें से कई जगहों पर पांच से भी कम कर्मचारी हैं। इससे कई प्रवासी कानून के दायरे से बाहर रह जाते हैं और दुर्व्यवहार के प्रति असुरक्षित बने रहते हैं।
आंकड़े: संकट के पीछे की संख्या
2020 से मई 2025 के बीच रोजगार और श्रम मंत्रालय ने प्रवासी श्रमिकों से जुड़ी उत्पीड़न की 820 से अधिक शिकायतें दर्ज कीं। इनमें से:
- केवल कुछ दर्जन मामलों में सुधारात्मक आदेश जारी हुए
- 10 से कुछ अधिक मामलों में जुर्माना लगाया गया
- इससे थोड़े अधिक मामलों को आपराधिक कार्रवाई के लिए भेजा गया
- लगभग 400 मामले वापस ले लिए गए या "कोई उल्लंघन नहीं" के निष्कर्ष के साथ बंद कर दिए गए
- कई सौ मामले "अन्य" श्रेणियों में रखे गए। इनमें आम तौर पर ऐसे छोटे कार्यस्थल शामिल हैं जो कानून के दायरे में नहीं आते, या ऐसी नौकरियां जिन्हें सामान्य सुरक्षा हासिल नहीं है
सांसदों और अधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों ने चेतावनी दी है कि व्यवस्था में उत्पीड़न का वास्तविक पैमाना दर्ज नहीं हो पाता, क्योंकि कई मामलों का निपटारा कार्यस्थल के भीतर ही हो जाता है या उनकी शिकायत कभी दर्ज नहीं होती। पीड़ितों को अक्सर बोलने पर जवाबी कार्रवाई, आमदनी छिनने या निर्वासन का डर रहता है।
व्यक्तिगत कहानियां: कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार की मानवीय कीमत
आंकड़ों के पीछे ऐसे वास्तविक लोग हैं जो अपमान, सदमे और कभी-कभी त्रासदी झेल रहे हैं। नाजू में काम करने वाला श्रीलंकाई श्रमिक अकेला नहीं है। इस साल की शुरुआत में एक अन्य मामले में, दक्षिण जिओला प्रांत के योंगम में एक सूअर फार्म पर लंबे समय तक दुर्व्यवहार झेलने के बाद एक युवा नेपाली श्रमिक अपने छात्रावास में मृत पाया गया। खबरों के अनुसार, इसी फार्म से कम से कम 28 अन्य प्रवासी श्रमिक भी ऐसे ही दुर्व्यवहार का हवाला देकर भाग गए। ये कहानियां दिखाती हैं कि कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार असुरक्षित श्रमिकों पर कितना गहरा मानसिक और शारीरिक असर डाल सकता है।
नागरिक समाज के गठबंधन ‘समानता के लिए प्रवासी श्रमिक एकजुटता’ के प्रतिनिधि जंग योंग-सॉप ने बताया:
दुर्व्यवहार के बाद जब प्रवासी श्रमिक नौकरी बदलने की मांग करते हैं, तो कुछ नियोक्ता उन्हें काम देने से इनकार कर जवाबी कार्रवाई करते हैं। इससे उन्हें वेतन नहीं मिलता और अक्सर उनके साथ और भी बुरा बर्ताव होता है।
ईपीएस की पाबंदियों के कारण ऐसी जवाबी कार्रवाई संभव हो पाती है। यह प्रणाली श्रमिकों को उनके नियोक्ताओं से बांधती है और कहीं और बेहतर परिस्थितियों की तलाश करने की उनकी क्षमता सीमित करती है।
शिकायत दर्ज कराने और न्याय पाने में बाधाएं
कई प्रवासी श्रमिक छोटे व्यवसायों में काम करते हैं, जो अक्सर खराब कामकाजी परिस्थितियों वाले ग्रामीण इलाकों में होते हैं। कई वजहों से दुर्व्यवहार की शिकायत करना मुश्किल होता है:
- भाषा की बाधाएं और कानूनी अधिकारों की जानकारी का अभाव
- जवाबी कार्रवाई, नौकरी छिनने या निर्वासन का डर
- अलग-थलग पड़ना और सहयोगी नेटवर्क का अभाव
- कानून की कमियां, जिनके कारण छोटे कार्यस्थलों को सुरक्षा नहीं मिलती
शिकायत दर्ज होने पर भी अक्सर उसका नतीजा संतोषजनक नहीं होता। कई मामले बिना किसी दंड के बंद हो जाते हैं। कुछ मामलों को "कोई उल्लंघन नहीं" बताकर खारिज कर दिया जाता है, अगर नियोक्ता आंतरिक जांच कर ले, चाहे पीड़ित का जो भी अनुभव रहा हो।
सुधार की मांग: रोजगार अनुमति प्रणाली में व्यापक बदलाव
आलोचकों का कहना है कि समस्या की जड़ खुद रोजगार अनुमति प्रणाली में है। श्रमिकों को एक ही नियोक्ता से बांधकर ईपीएस ऐसा शक्ति असंतुलन पैदा करती है जिससे दुर्व्यवहार को बढ़ावा मिलता है और पीड़ितों के बोलने की संभावना घटती है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य मानवाधिकार संगठनों ने लंबे समय से इस प्रणाली में व्यापक बदलाव की मांग की है। उनका कहना है कि इससे नियोक्ताओं को जरूरत से ज्यादा नियंत्रण मिलता है और प्रवासी श्रमिकों के बुनियादी अधिकार छिन जाते हैं।
बढ़ते दबाव के जवाब में, दक्षिण कोरियाई सरकार ने सुधारों का वादा किया है। इनमें शामिल हैं:
- ई-9 रोजगार वीजा प्रणाली में बदलाव, ताकि प्रवासी श्रमिकों को नौकरी बदलने और अपने प्रवास की अवधि बढ़ाने की अधिक स्वतंत्रता मिले
- प्रवास की अवधि को तीन-तीन साल के चरणों में बढ़ाना
- केवल वेतन न मिलने या शारीरिक दुर्व्यवहार के मामलों तक सीमित न रखते हुए, व्यापक परिस्थितियों में नौकरी बदलने की अनुमति देना
- कार्यस्थलों पर निरीक्षण और निगरानी बढ़ाना, खासकर ग्रामीण इलाकों और छोटे व्यवसायों में
श्रम मंत्री किम योंग-हून ने विदेशी श्रमिकों के अधिकारों की गारंटी और समानतापूर्ण कामकाजी माहौल सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर दिया है। हालांकि, अधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों ने आगाह किया है कि प्रस्तावित सुधारों पर अभी शुरुआती चर्चा ही हुई है और मूल समस्याओं से निपटने के लिए व्यवस्थागत बदलाव जरूरी हैं।
व्यापक संदर्भ: दक्षिण कोरिया में भेदभाव और मानवाधिकार
प्रवासी श्रमिकों की बदहाली दक्षिण कोरिया में भेदभाव और मानवाधिकार संबंधी चुनौतियों के व्यापक पैटर्न का हिस्सा है। अमेरिकी विदेश विभाग की 2022 की मानवाधिकार रिपोर्ट के अनुसार, नस्ली और जातीय अल्पसंख्यकों, प्रवासियों के बच्चों और दिव्यांग लोगों को रोजगार समेत जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कानून श्रमिकों को संघ बनाने और हड़ताल करने के अधिकार समेत कई अधिकार देता है, लेकिन खासकर विदेशी श्रमिकों के मामले में पाबंदियां बनी हुई हैं। जबरन श्रम पर प्रतिबंध है, फिर भी कुछ क्षेत्रों में शोषण जारी है और व्यावसायिक सुरक्षा व स्वास्थ्य के मानक हमेशा प्रभावी ढंग से लागू नहीं होते।
दक्षिण कोरिया के तेज आर्थिक विकास में प्रवासी श्रमिकों के श्रम का भी योगदान रहा है, लेकिन सामाजिक रवैये और कानूनी सुरक्षा हमेशा इसके साथ कदमताल नहीं कर पाए। कार्यकर्ता कोरियाई समाज से विदेशी श्रमिकों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल छोड़ने और उन्हें समुदाय के ऐसे अभिन्न सदस्यों के रूप में स्वीकार करने का आग्रह करते हैं, जो गरिमा और सम्मान के हकदार हैं।
विशेषज्ञों और अधिकारियों के विचार
विशेषज्ञ और अधिकारी इस बात से सहमत हैं कि असुरक्षित श्रमिकों की रक्षा के लिए समय रहते व्यवस्थित कदम उठाने की जरूरत है। इसमें न केवल कानूनी सुधार, बल्कि जन-जागरूकता, सहायता सेवाएं और मौजूदा कानूनों को अधिक मजबूती से लागू करना भी शामिल है। राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने पिछले दशकों में विदेशों में काम करने वाले कोरियाई श्रमिकों के अनुभवों से इसकी तुलना की है। उन्होंने जोर दिया कि प्रवासी श्रमिकों के बुनियादी मानवाधिकारों की रक्षा राष्ट्रीय गरिमा का मामला है।
"कठिन परिस्थितियों में फंसे लोगों के प्रति हमारा रवैया समाज की गरिमा दिखाता है। संबंधित मंत्रालय मानवाधिकार उल्लंघनों और श्रम शोषण पर सक्रिय रूप से कार्रवाई करेंगे।" — राष्ट्रपति ली जे म्युंग
मानवाधिकार समूह दुर्व्यवहार के मामलों में हस्तक्षेप करने और पीड़ितों को सहायता देने का अधिकार रखने वाली सार्वजनिक एजेंसी बनाने की मांग कर रहे हैं। वे शिकायतों से निपटने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही की भी मांग करते हैं।
संक्षेप में
- दक्षिण कोरिया में प्रवासी श्रमिकों के साथ कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार और उत्पीड़न की दर्ज शिकायतें 2020 के बाद से तीन गुना से अधिक हो गई हैं, लेकिन शिकायतें दर्ज न होने के कारण वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक होने की आशंका है।
- ईंट भट्ठी में श्रीलंकाई श्रमिक के साथ दुर्व्यवहार जैसी चर्चित घटनाओं से देशभर में आक्रोश फैला और सरकार ने जांच तथा कार्रवाई शुरू की।
- कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार-रोधी कानून के तहत कानूनी सुरक्षा कई प्रवासी श्रमिकों को नहीं मिलती, खासकर छोटे व्यवसायों या विशेष रोजगार व्यवस्थाओं में काम करने वालों को।
- रोजगार अनुमति प्रणाली श्रमिकों को एक ही नियोक्ता से बांधती है। इससे शक्ति असंतुलन पैदा होता है, दुर्व्यवहार को बढ़ावा मिलता है और शिकायत दर्ज कराने से हतोत्साहन होता है।
- सरकार ने प्रवासी श्रमिकों को नौकरी बदलने और अपने प्रवास की अवधि बढ़ाने की अधिक स्वतंत्रता देने वाले सुधारों का वादा किया है, लेकिन अधिकार समूहों का कहना है कि व्यवस्थागत बदलाव जरूरी हैं।
- विशेषज्ञ और कार्यकर्ता कानूनों को अधिक मजबूती से लागू करने, जन-जागरूकता बढ़ाने और प्रवासी श्रमिकों को गरिमा व अधिकारों के हकदार समाज के महत्वपूर्ण सदस्यों के रूप में पहचानने की मांग कर रहे हैं।






