तेरेंगानू की नई सख्ती: शुक्रवार की नमाज़ छोड़ने पर जेल
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ने वाले एक कदम के तहत, मलेशिया के तेरेंगानू राज्य ने घोषणा की है कि वह उस शरिया कानून को पूरी तरह लागू करेगा, जिसके तहत बिना वैध कारण शुक्रवार की नमाज़ छोड़ने वाले मुस्लिम पुरुषों को जेल हो सकती है। इस कानून के तहत दोषियों को दो साल तक की कैद, 3,000 रिंगिट (करीब 710 अमेरिकी डॉलर) तक का जुर्माना या दोनों सजाएं हो सकती हैं। राज्य के अधिकारी इसे इस्लामी मूल्यों की रक्षा के लिए जरूरी कदम बता रहे हैं। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह मलेशिया के शासन और समाज में धार्मिक रूढ़िवाद की ओर व्यापक झुकाव का संकेत है।
विषय-सूची
- तेरेंगानू की नई सख्ती: शुक्रवार की नमाज़ छोड़ने पर जेल
- कानून में क्या कहा गया है?
- इस्लाम में शुक्रवार की नमाज़ क्यों अहम है
- कानून कैसे लागू किया जाता है?
- शुक्रवार की नमाज़ के लिए संस्थागत समर्थन
- मलेशिया के अन्य राज्यों से तुलना
- व्यापक संदर्भ: मलेशिया में शरिया कानून और रूढ़िवाद
- सार्वजनिक कोड़े और अन्य सजाएं
- जन प्रतिक्रिया और बहस
- अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
- मलेशिया के भविष्य पर असर
- संक्षेप में
तेरेंगानू की कार्यकारी परिषद के सदस्य और सूचना, उपदेश तथा शरिया सशक्तीकरण के प्रभारी मुहम्मद खलील अब्दुल हादी ने यह घोषणा की। इससे राज्य में धार्मिक कानूनों के अमल में उल्लेखनीय सख्ती आई है। पहले लगातार तीन शुक्रवार की नमाज़ छोड़ने वालों पर ही कार्रवाई होती थी। अब बिना उचित कारण एक बार भी गैरहाज़िर रहने पर मुकदमा चल सकता है।
कानून में क्या कहा गया है?
यह कानून शरिया आपराधिक अपराध (ताज़ीर) अधिनियम 2016 के तहत आता है, जिसमें शुक्रवार की नमाज़ छोड़ने पर सज़ा बढ़ाने के लिए संशोधन किया गया था। यह प्रावधान 2001 से मौजूद है, 2016 में इसे और सख्त किया गया और अब इसे कड़ाई से लागू किया जा रहा है। कानून के मुताबिक, बिना वैध कारण साप्ताहिक सामूहिक जुमा नमाज़ में शामिल न होने वाले मुस्लिम पुरुषों पर जुर्माना लगाया जा सकता है, उन्हें जेल भेजा जा सकता है या दोनों सजाएं दी जा सकती हैं। राज्य सरकार ने लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान शुरू किया है। इसमें मस्जिदों पर बैनर लगाकर नमाज़ियों को उनके धार्मिक दायित्वों और उनकी उपेक्षा के नतीजों की याद दिलाई जा रही है।
खलील अब्दुल हादी के मुताबिक,
यह याद दिलाना अहम है, क्योंकि शुक्रवार की नमाज़ न सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक है, बल्कि मुसलमानों की आज्ञाकारिता की अभिव्यक्ति भी है।उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि याद दिलाने के बाद भी अनदेखी होने पर ही आखिरी उपाय के तौर पर सज़ा दी जाएगी।
इस्लाम में शुक्रवार की नमाज़ क्यों अहम है
शुक्रवार की नमाज़, यानी जुमा, इस्लामी धार्मिक जीवन में केंद्रीय स्थान रखती है। मुस्लिम पुरुषों के लिए हर शुक्रवार मस्जिद में सामूहिक नमाज़ में शामिल होना धार्मिक दायित्व माना जाता है। कुरान और हदीस (पैगंबर मुहम्मद के कथन) इस साप्ताहिक जमावड़े के महत्व पर ज़ोर देते हैं, जो आध्यात्मिक और सामुदायिक, दोनों तरह की भूमिका निभाता है। मलेशिया में इस्लाम राजकीय धर्म है और आबादी का करीब 60% हिस्सा जातीय मलय मुसलमानों का है। यहां शुक्रवार की नमाज़ धार्मिक पहचान और सामाजिक एकजुटता का अहम प्रतीक है।
धार्मिक अधिकारियों का कहना है कि इस्लाम की पवित्रता बनाए रखने के लिए सख्ती से कानून लागू करना जरूरी है, खासकर युवा पीढ़ी के बीच, जो अपने धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा कर सकती है। इस कदम को धार्मिक संस्थानों के अधिकार और इस्लामी कानून को कायम रखने की राज्य की प्रतिबद्धता मजबूत करने के तरीके के रूप में भी देखा जा रहा है।
कानून कैसे लागू किया जाता है?
तेरेंगानू में शुक्रवार की नमाज़ से जुड़े कानून को लागू करने की जिम्मेदारी तेरेंगानू इस्लामी मामलों के विभाग की है, जो अक्सर स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर काम करता है। सार्वजनिक शिकायतों या गश्त और संयुक्त अभियानों के आधार पर कार्रवाई की जा सकती है। कुछ मामलों में, नमाज़ छोड़ने वालों को पकड़ने के लिए अधिकारियों ने शुक्रवार की नमाज़ के वक्त मनोरंजन स्थलों पर छापे मारे हैं।
अगस्त 2019 में एक उल्लेखनीय मामला सामने आया था। शुक्रवार की नमाज़ छोड़कर झरने पर पिकनिक मनाने के लिए छह मुस्लिम पुरुषों, जिनमें तीन किशोर थे, को एक महीने की जेल और 2,000 रिंगिट से अधिक का जुर्माना सुनाया गया। महिला अधिकारियों ने पहले निगरानी की और नमाज़ खत्म होने के बाद पुरुष अधिकारियों ने गिरफ्तारियां कीं। इस मामले की व्यापक रिपोर्टिंग हुई और इससे पता चला कि राज्य इस अपराध को कितनी गंभीरता से देखता है तथा अधिकारी दोषियों पर मुकदमा चलाने के लिए कितने तत्पर हैं।
शुक्रवार की नमाज़ के लिए संस्थागत समर्थन
शुक्रवार की नमाज़ लागू कराने की तेरेंगानू की प्रतिबद्धता व्यक्तिगत सज़ा तक सीमित नहीं है। 2014 में राज्य सरकार ने सभी शॉपिंग मॉल को हर शुक्रवार नमाज़ के वक्त दो घंटे बंद रखने का आदेश दिया था। इसका उद्देश्य मुसलमानों को नमाज़ में शामिल होने के बजाय इधर-उधर समय बिताने से रोकना था। नियम का पालन न करने वाले कारोबारों को स्थानीय अधिकारी समन जारी कर सकते हैं और अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए मॉल में प्रवर्तन अधिकारी तैनात रहते हैं। यह संस्थागत समर्थन राज्य के सार्वजनिक जीवन में शुक्रवार की नमाज़ की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है।
मलेशिया के अन्य राज्यों से तुलना
धार्मिक कानूनों को सख्ती से लागू करने में तेरेंगानू सबसे आगे है, लेकिन ऐसा करने वाला यह अकेला राज्य नहीं है। केलंतान और केदाह जैसे अन्य रूढ़िवादी राज्यों में भी ऐसे कानून हैं, हालांकि उन्हें लागू करने के तरीके अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, केलंतान में लगातार तीन शुक्रवार की नमाज़ छोड़ने पर जुर्माना या जेल हो सकती है। लेकिन कुआलालंपुर और सेलांगोर जैसे अधिक शहरी राज्यों में ऐसे कानून मौजूद तो हैं, मगर ग्रामीण इलाकों में भी शायद ही कभी लागू किए जाते हैं। यह अंतर मलेशिया के जटिल कानूनी ढांचे को दर्शाता है, जहां इस्लामी मामलों में राज्यों को काफी स्वायत्तता हासिल है।
एक अन्य मलेशियाई राज्य जोहोर ने भी यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए हैं कि मुस्लिम पुरुष शुक्रवार की नमाज़ में शामिल हों। सप्ताहांत शनिवार और रविवार किए जाने के बाद, राज्य के इस्लामी धार्मिक विभाग ने घोषणा की कि वह यह सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई करेगा कि कारोबारियों और कर्मचारियों समेत सभी मुस्लिम पुरुष अपना धार्मिक दायित्व निभाएं। बड़ी मुस्लिम आबादी वाले स्कूलों को अपने परिसर में शुक्रवार की नमाज़ आयोजित करने की अनुमति दी जा रही है, ताकि नियम का पालन आसान हो।
व्यापक संदर्भ: मलेशिया में शरिया कानून और रूढ़िवाद
मलेशिया में दोहरी कानूनी व्यवस्था है: सभी नागरिकों के लिए दीवानी कानून और मुसलमानों के निजी तथा पारिवारिक मामलों में शरिया कानून। संविधान इस्लाम को राजकीय धर्म का दर्जा देता है, लेकिन साथ ही धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी भी देता है। हालांकि, हाल के वर्षों में शरिया कानून का दायरा बढ़ा है, खासकर पैन-मलेशियन इस्लामिक पार्टी (पीएएस) के शासन वाले राज्यों, जैसे तेरेंगानू और केलंतान में।
तेरेंगानू की विधान सभा की सभी 32 सीटें पीएएस के पास हैं। पार्टी ने अपने राजनीतिक दबदबे का इस्तेमाल सख्त धार्मिक कानूनों को आगे बढ़ाने के लिए किया है। पार्टी के नेताओं का तर्क है कि तेजी से आधुनिक और बहुलतावादी होते समाज में इस्लामी मूल्यों की रक्षा के लिए ऐसे कदम जरूरी हैं। हालांकि, आलोचक इन कदमों को धार्मिक रूढ़िवाद की ओर व्यापक रुझान का हिस्सा मानते हैं, जिससे मलेशिया की धर्मनिरपेक्ष नींव और बहुसांस्कृतिक सौहार्द को खतरा है।
सार्वजनिक कोड़े और अन्य सजाएं
शुक्रवार की नमाज़ से जुड़े कानूनों का अमल तेरेंगानू में शरिया के तहत सख्त सजाओं के व्यापक चलन का हिस्सा है। हाल के वर्षों में राज्य ने खलवत (अविवाहित लोगों का एक-दूसरे के करीब होना) जैसे अपराधों के लिए सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे हैं। यह निजी से सार्वजनिक सज़ाओं की ओर बदलाव का संकेत है। मानवाधिकार समूहों और प्रगतिशील इस्लामी संगठनों ने इन कार्रवाइयों की आलोचना की है। उनका कहना है कि ये मानवाधिकारों का उल्लंघन करती हैं और हिंसा को सामान्य बना सकती हैं।
संघीय धार्मिक मामलों के मंत्री ने कहा है कि ऐसे मामले राज्य के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जिससे केंद्र सरकार की दखल देने की क्षमता सीमित हो जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कठोर सजाओं की मांग प्रशासनिक कमियों से ध्यान हटाने और राष्ट्रीय चुनावों से पहले राजनीतिक समर्थन मजबूत करने का तरीका भी हो सकती है।
जन प्रतिक्रिया और बहस
शुक्रवार की नमाज़ से जुड़े कानूनों को सख्ती से लागू करने पर मलेशिया और उसके बाहर बहस छिड़ गई है। समर्थकों का कहना है कि धार्मिक अनुशासन कायम रखने और नैतिक पतन रोकने के लिए ये कदम जरूरी हैं। वे इस्लाम में शुक्रवार की नमाज़ के महत्व और युवा पीढ़ी को उनके धार्मिक कर्तव्यों के बारे में शिक्षित करने की जरूरत की ओर इशारा करते हैं।
मानवाधिकार समर्थकों और कुछ धार्मिक विद्वानों समेत विरोधियों का कहना है कि धार्मिक आचरण को अपराध ठहराने से व्यक्तिगत आस्था और स्वायत्तता कमजोर होती है। उनके मुताबिक, ऐसे कानून जरूरत से ज्यादा सख्त हैं और उन मुसलमानों को अलग-थलग कर सकते हैं जो पहले से ही हाशिये पर महसूस करते हैं। एक अधिकार समूह के प्रतिनिधि ने कहा,
शुक्रवार की नमाज़ में शामिल न होना निजी मामला है और इसके लिए आपराधिक सज़ा जरूरत से ज्यादा है।आलोचकों ने यह चेतावनी भी दी है कि सख्त सजाओं की ओर बढ़ता रुझान मलेशिया की धार्मिक सहिष्णुता की परंपरा को कमजोर करता है और सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दे सकता है।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
अमेरिकी विदेश विभाग की मलेशिया पर 2019 की अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट के मुताबिक, संविधान धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन निजी मामलों में इस्लामी कानून का इस्तेमाल और धार्मिक दायित्वों को लागू करना धार्मिक अल्पसंख्यकों और आधिकारिक व्याख्याओं का पालन न करने वाले मुसलमानों के लिए चुनौतियां पैदा कर सकता है। रिपोर्ट में धार्मिक भेदभाव को लेकर चिंता जताई गई है और धार्मिक अधिकार तथा व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर ज़ोर दिया गया है।
मलेशिया के भविष्य पर असर
तेरेंगानू में शुक्रवार की नमाज़ से जुड़े कानूनों का अमल मलेशियाई समाज में मौजूद व्यापक तनाव का छोटा रूप है। एक ओर आबादी के कुछ हिस्सों और राजनीतिक नेतृत्व में इस्लामी पहचान और मूल्यों को मजबूत करने की इच्छा है। दूसरी ओर, धार्मिक रूढ़िवाद के व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक एकजुटता और मध्यमार्गी मुस्लिम-बहुल देश के रूप में मलेशिया की छवि पर असर को लेकर चिंता है।
तेरेंगानू में पीएएस की पकड़ मजबूत होने और राष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश के साथ धार्मिक कानूनों के अमल पर बहस तेज होने की संभावना है। इसका नतीजा न सिर्फ तेरेंगानू के मुसलमानों, बल्कि पूरे मलेशिया में धार्मिक शासन और बहुलवाद के भविष्य पर भी महत्वपूर्ण असर डालेगा।
संक्षेप में
- तेरेंगानू ने उस कानून को पूरी तरह लागू करना शुरू कर दिया है, जिसके तहत बिना वैध कारण शुक्रवार की नमाज़ छोड़ने वाले मुस्लिम पुरुषों को जेल या जुर्माना हो सकता है।
- यह कानून पीएएस-शासित राज्यों में धार्मिक नियमों को सख्ती से लागू करने के व्यापक रुझान का हिस्सा है।
- शुक्रवार की नमाज़ इस्लाम का एक केंद्रीय दायित्व है। इसके पालन को बढ़ावा देने के लिए राज्य ने जन-जागरूकता अभियान और संस्थागत उपाय किए हैं।
- कानून लागू करने में गश्त, सार्वजनिक शिकायतें और नमाज़ के वक्त मनोरंजन स्थलों पर छापे तक शामिल हैं।
- मलेशिया के अन्य राज्यों में भी ऐसे कानून हैं, लेकिन उनके अमल में काफी अंतर है।
- इस कदम से धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वायत्तता और मलेशियाई समाज की दिशा को लेकर बहस छिड़ी है।
- मानवाधिकार समूहों और प्रगतिशील इस्लामी संगठनों ने धार्मिक आचरण को अपराध ठहराने और सार्वजनिक सज़ाओं के इस्तेमाल की आलोचना की है।
- यह मुद्दा धार्मिक रूढ़िवाद और मलेशिया की धर्मनिरपेक्ष, बहुलतावादी नींव के बीच गहरे तनाव को दर्शाता है।






