अंटार्कटिका में रूस और चीन का विस्तार: विज्ञान, रणनीति और बर्फीले महाद्वीप का भविष्य

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अंटार्कटिका में रूस और चीन का विस्तार: विज्ञान, रणनीति और बर्फीले महाद्वीप का भविष्य

अंटार्कटिका चौराहे पर: रूस और चीन के विस्तार को लेकर बढ़ता तनाव

दुनिया के आखिरी विशाल निर्जन क्षेत्र के रूप में लंबे समय से देखे जाने वाले अंटार्कटिका में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का नया दौर शुरू हो रहा है। बर्फीले महाद्वीप पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने के रूस और चीन के हालिया कदमों ने विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और नीति-निर्माताओं में चिंता पैदा कर दी है। दोनों देश जोर देकर कहते हैं कि उनकी गतिविधियां शांतिपूर्ण और वैज्ञानिक हैं, लेकिन कई जानकारों को आशंका है कि उनकी महत्वाकांक्षाएं शोध से कहीं आगे तक जा सकती हैं। इससे अंटार्कटिक संधि प्रणाली के भविष्य और पृथ्वी के सबसे नाजुक पर्यावरणों में से एक के संरक्षण पर सवाल उठ रहे हैं।

विषय-सूची
  1. अंटार्कटिका चौराहे पर: रूस और चीन के विस्तार को लेकर बढ़ता तनाव
  2. रूस और चीन अंटार्कटिका में विस्तार क्यों कर रहे हैं?
  3. अंटार्कटिक संधि प्रणाली: संरक्षक या कागजी शेर?
  4. विज्ञान या रणनीति? दोहरे इस्तेमाल की दुविधा
  5. संसाधनों की होड़: तेल, खनिज और क्रिल
  6. 2048 का सवाल: क्या खनन पर प्रतिबंध कायम रहेगा?
  7. भू-राजनीति और अमेरिका की घटती मौजूदगी
  8. सहयोग, प्रतिस्पर्धा और अंटार्कटिक संधि का भविष्य
  9. पर्यावरण का दांव: आखिरी निर्जन क्षेत्र का संरक्षण
  10. संक्षेप में

इस बहस के केंद्र में चीन की छठा स्थायी अनुसंधान स्टेशन बनाने की योजना और रूस की अपने कई स्टेशन फिर से खोलने और आधुनिक बनाने की योजना है, जिसमें लंबी दूरी के विमानों के लिए नए रनवे बनाना भी शामिल है। ये घटनाक्रम ऐसे समय हो रहे हैं, जब अंटार्कटिका से जुड़े मामलों में ऐतिहासिक रूप से प्रमुख शक्ति रहे अमेरिका के ध्रुवीय विज्ञान बजट में भारी कटौती की जा रही है। इससे ऐसा खालीपन पैदा हो सकता है, जिसे दूसरे देश भरने की कोशिश करें।

रूस और चीन अंटार्कटिका में विस्तार क्यों कर रहे हैं?

आधिकारिक तौर पर रूस और चीन, दोनों अंटार्कटिका में अपनी गतिविधियों को वैज्ञानिक प्रयास बताते हैं। ये गतिविधियां 1959 की अंटार्कटिक संधि के अनुरूप हैं, जिसके तहत महाद्वीप को शांति और विज्ञान के लिए समर्पित प्राकृतिक आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। हालांकि, हाल के घटनाक्रमों और विशेषज्ञों के विश्लेषण पर करीब से नजर डालने पर तस्वीर अधिक जटिल दिखाई देती है।

मैरी बर्ड लैंड में प्रस्तावित चीन का नया स्टेशन महाद्वीप पर उसका छठा स्टेशन होगा और इसे 25 शोधकर्ताओं तक की सहायता के लिए बनाया जाएगा। चीनी अधिकारियों का कहना है कि केंद्र जलवायु और समुद्री अध्ययन पर ध्यान देगा और वे किसी भी "भू-राजनीतिक मंशा" से इनकार करते हैं। फिर भी, अमेरिका, न्यूजीलैंड और रूस के ठिकानों के करीब इसकी स्थिति ने सवाल खड़े किए हैं, खासकर इसकी उन्नत उपग्रह निगरानी क्षमताओं को देखते हुए। कुछ पश्चिमी विश्लेषकों को आशंका है कि इस तकनीक का इस्तेमाल सैन्य निगरानी या संचार में अवरोधन समेत दोहरे उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

इस बीच, रूस न केवल अपने रुस्काया स्टेशन को फिर से खोल रहा है और उसका उन्नयन कर रहा है, बल्कि एक नया हवाई क्षेत्र भी बना रहा है और अपनी रसद संबंधी मौजूदगी का विस्तार कर रहा है। रूसी शोध जहाजों ने वेडेल सागर में भूकंपीय सर्वेक्षण किए हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इनका उद्देश्य केवल वैज्ञानिक शोध के बजाय तेल और गैस भंडारों का पता लगाना हो सकता है। हाल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रूसी शोधकर्ताओं ने अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे अनुमानित 511 अरब बैरल तेल खोजा है—जो सऊदी अरब के ज्ञात भंडारों का लगभग दोगुना है। हालांकि, रूस का कहना है कि उसकी गतिविधियां संधि की पाबंदियों के अनुरूप हैं।

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दोनों देशों ने नए समुद्री संरक्षित क्षेत्र बनाने के प्रस्तावों को भी रोक दिया है। इससे संरक्षणवादियों में नाराजगी है और यह संदेह बढ़ा है कि वे भविष्य में जीवित और खनिज संसाधनों तक पहुंच बनाए रखना चाहते हैं।

अंटार्कटिक संधि प्रणाली: संरक्षक या कागजी शेर?

1959 में हस्ताक्षरित अंटार्कटिक संधि पर अब 54 देशों के हस्ताक्षर हैं और यह दुनिया के सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय समझौतों में से एक है। यह सैन्य गतिविधियों पर रोक लगाती है, क्षेत्रीय दावों को स्थगित रखती है और 1991 के मैड्रिड प्रोटोकॉल के तहत खनिजों के निष्कर्षण पर प्रतिबंध लगाती है। संधि के मूल सिद्धांत शांति, विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण हैं।

हालांकि, संधि के सामने चुनौतियां बढ़ रही हैं। इसमें प्रभावी प्रवर्तन तंत्र का अभाव है और खनन पर लगी रोक की 2048 में समीक्षा होनी है, जिससे महाद्वीप के दीर्घकालीन भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है। भू-राजनीतिक सलाहकार सैमुअल जार्डिन कहते हैं, "तेल के बड़े भंडारों की खोज से अंटार्कटिक संधि प्रणाली को लेकर तनाव बढ़ता है। रूस और चीन शासन व्यवस्था को आर्थिक दोहन की दिशा में मोड़ना चाहते हैं।"

संधि के तहत अनुसंधान केंद्रों का निरीक्षण किया जा सकता है, लेकिन ये निरीक्षण कम होते हैं और अक्सर पहले से घोषित कर दिए जाते हैं। अंटार्कटिक संधि बैठकों में अमेरिका के पूर्व प्रतिनिधि बिल मंटियन अधिक कठोर निगरानी की वकालत करते हैं:

अगर वहां सैन्य उपकरणों, कर्मियों या जासूसी के बारे में कोई सवाल है, तो हमें उसकी जांच करनी चाहिए। बिस्तर के नीचे टॉर्च डालकर देखिए—वह कोई टेडी बियर है या कोई डरावना राक्षस? हमारे पास टॉर्च है। उसका इस्तेमाल कीजिए।

विज्ञान या रणनीति? दोहरे इस्तेमाल की दुविधा

आधुनिक अंटार्कटिक अनुसंधान केंद्रों में इन्फ्रारेड दूरबीन, जीपीएस रिसीवर और उपग्रह अपलिंक जैसी उन्नत तकनीकें मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल वैज्ञानिक और सैन्य, दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। तस्मानिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेफ्री मैगी बताते हैं,

यहां हम इन्फ्रारेड दूरबीनों, जीपीएस और उन ग्राउंड-स्टेशन रिसीवरों की बात कर रहे हैं जो उपग्रहों से संचार कर सकते हैं। इससे यह संभावना पैदा होती है कि इन उपकरणों का दोहरा इस्तेमाल हो सकता है। इनका उपयोग वैज्ञानिक कामों के लिए किया जा सकता है, लेकिन ये सैन्य और निगरानी उपग्रहों से भी जुड़ सकते हैं, सूचना अपलोड और डाउनलोड कर सकते हैं या सैन्य कमान, नियंत्रण और संचार प्रणालियों का हिस्सा बन सकते हैं।

दोहरा इस्तेमाल करने की यह संभावना अंतरराष्ट्रीय चिंताओं की जड़ में है। सैन्य गतिविधियों या व्यावसायिक खनन का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, लेकिन आज बनाया जा रहा बुनियादी ढांचा भविष्य में दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, खासकर अगर संधि की पाबंदियां ढीली की जाती हैं या उनकी अनदेखी होती है।

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संसाधनों की होड़: तेल, खनिज और क्रिल

माना जाता है कि अंटार्कटिका में तेल, गैस, कोयले और खनिजों के विशाल अप्रयुक्त भंडार हैं। यहां दुनिया के कुछ सबसे समृद्ध मछली पकड़ने के क्षेत्र भी हैं। वेडेल सागर में 511 अरब बैरल तेल मिलने के रूस के हालिया दावे से यह चिंता तेज हुई है कि वैज्ञानिक अभियान संसाधनों की खोज का बहाना हो सकते हैं।

चीन तेजी से अंटार्कटिक क्रिल मछली पकड़ने के अपने उद्योग का विस्तार कर रहा है। वह विशाल ट्रॉलर तैनात कर रहा है और संरक्षण के नए उपायों का विरोध कर रहा है। क्रिल दक्षिणी महासागर के पारिस्थितिकी तंत्र की एक प्रमुख प्रजाति है। जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने से व्हेल, सील और पेंगुइन पर दूरगामी असर पड़ सकता है।

फिलहाल खनन और बड़े पैमाने पर संसाधन निष्कर्षण पर प्रतिबंध है, लेकिन नियम बदलने की स्थिति में बढ़त पाने के लिए रूस और चीन, दोनों तकनीक और बुनियादी ढांचे में निवेश कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से महाद्वीप तक पहुंच आसान होने और संसाधनों की वैश्विक मांग बढ़ने के साथ अंटार्कटिका के भंडारों का दोहन करने का प्रलोभन रोकना मुश्किल हो सकता है।

2048 का सवाल: क्या खनन पर प्रतिबंध कायम रहेगा?

अंटार्कटिक संधि का पर्यावरण संरक्षण प्रोटोकॉल (मैड्रिड प्रोटोकॉल) वैज्ञानिक शोध को छोड़कर खनिज संसाधनों से जुड़ी सभी गतिविधियों पर रोक लगाता है। हालांकि, 2048 में इस प्रतिबंध की समीक्षा होनी है और कोई भी हस्ताक्षरकर्ता देश किसी भी समय फिर से बातचीत की मांग कर सकता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और रूस ऐसी बातचीत को प्रभावित करने या उसकी अगुवाई करने की स्थिति बना रहे हैं, जिससे कानूनी तौर पर संसाधन निकालने का रास्ता खुल सकता है।

रैंड कॉरपोरेशन के एक विश्लेषण में कहा गया है, "चीन प्रोटोकॉल पर भविष्य में होने वाली फिर से बातचीत की तैयारी में उन्नत खनन तकनीक विकसित कर सकता है और उस दौरान कुछ खनन गतिविधियों को वैध बनाने की कोशिश कर सकता है।" मौजूदा व्यवस्था में प्रवर्तन तंत्र की कमी का अर्थ है कि व्यवहार में शक्तिशाली देश अपने हित में होने पर एकतरफा कार्रवाई कर सकते हैं।

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भू-राजनीति और अमेरिका की घटती मौजूदगी

दशकों से अमेरिका ने अंटार्कटिका में सबसे बड़ी और उन्नत मौजूदगी बनाए रखी है। वह भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव पर एकमात्र स्टेशन चलाता है और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग की अगुवाई करता है। हालांकि, हाल में की गई और प्रस्तावित बजट कटौतियां—ध्रुवीय विज्ञान के वित्तपोषण में 70 प्रतिशत की कमी—अमेरिका के प्रभाव को कमजोर करने का खतरा पैदा कर रही हैं।

नेशनल साइंस फाउंडेशन के ध्रुवीय कार्यक्रम कार्यालय में बुनियादी ढांचे के उन्नयन में देरी हो रही है और उसका आखिरी समर्पित अंटार्कटिक अनुसंधान जहाज सेवा से हटाया जा रहा है। विशेषज्ञों को चेतावनी है कि अमेरिका की घटती मौजूदगी से रूस और चीन को खाली जगह भरने का मौका मिल सकता है और महाद्वीप पर शक्ति संतुलन बदल सकता है।

ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड जैसी अंटार्कटिका में पारंपरिक रूप से सक्रिय अन्य शक्तियां घटनाक्रम पर करीबी नजर रख रही हैं। महाद्वीप के 42 प्रतिशत हिस्से पर दावा करने वाले ऑस्ट्रेलिया ने अधिक सतर्कता बरतने की मांग की है और चीन के नए स्टेशन के प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है। ब्रिटेन की पर्यावरण लेखा परीक्षा समिति ने, खासकर रूसी भूकंपीय सर्वेक्षणों के मामले में, कड़ी निगरानी और पारदर्शिता की मांग की है।

सहयोग, प्रतिस्पर्धा और अंटार्कटिक संधि का भविष्य

बढ़ते तनाव के बावजूद प्रमुख शक्तियों के बीच सहयोग के क्षेत्र अब भी मौजूद हैं। संयुक्त वैज्ञानिक परियोजनाएं, खोज और बचाव अभियान तथा पर्यावरण निगरानी जारी हैं। संधि की परामर्श बैठकें संवाद का मंच भी देती हैं।

हालांकि, व्यापक रुझान रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की ओर है। रूस और चीन ने नए समुद्री संरक्षित क्षेत्रों को रोकने के लिए अपने रुख में तालमेल बनाया है और रसद तथा शोध में सहयोग के समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। दोनों अपने आइसब्रेकर बेड़ों का विस्तार भी कर रहे हैं और ध्रुवीय अभियानों के लिए नई तकनीक विकसित कर रहे हैं।

कुछ विश्लेषक इसकी तुलना आर्कटिक से करते हैं, जहां पश्चिमी प्रतिबंधों और सैन्य जमावड़े के बीच रूस और चीन की साझेदारी गहरी हुई है। अंटार्कटिका तक पहुंचना कठिन है और वहां से तत्काल बड़ा आर्थिक लाभ मिलने की संभावना भी कम है, फिर भी उसे वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के परीक्षण-स्थल और भविष्य के संघर्ष के संभावित केंद्र के रूप में देखा जा रहा है।

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पर्यावरण का दांव: आखिरी निर्जन क्षेत्र का संरक्षण

अंटार्कटिका अनूठे पारिस्थितिकी तंत्र, विशिष्ट वन्यजीवों और जलवायु के अहम रिकॉर्ड का घर है। इसकी बर्फ की चादरों में दुनिया का 90 प्रतिशत मीठा पानी मौजूद है और इसके आसपास के महासागर वैश्विक मौसम प्रणालियों को प्रभावित करते हैं। इस महाद्वीप का संरक्षण केवल भू-राजनीति का नहीं, बल्कि पृथ्वी पर जीवन के भविष्य का सवाल है।

पर्यावरणविदों को चेतावनी है कि विज्ञान, पर्यटन या संसाधन निष्कर्षण के लिए बढ़ती मानवीय गतिविधियां ऐसा नुकसान पहुंचा सकती हैं जिसकी भरपाई संभव न हो। जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ना, प्रदूषण और बाहरी आक्रामक प्रजातियों का प्रवेश पहले से ही गंभीर चिंताएं हैं। तेल की ड्रिलिंग या बड़े पैमाने पर खनन की आशंका संरक्षणवादियों को पूरी तरह अस्वीकार्य है। उनका कहना है कि महाद्वीप को व्यावसायिक दोहन से दूर रखा जाना चाहिए।

हाल की संधि बैठकों में सम्राट पेंगुइन के संरक्षण, प्लास्टिक प्रदूषण और पर्यटन के नियमन जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई है, लेकिन भू-राजनीतिक मतभेदों के कारण प्रगति धीमी रही है। चुनौती यह है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग की उस भावना को कायम रखा जाए जिसने छह दशक से अधिक समय तक अंटार्कटिका के शासन को दिशा दी है।

संक्षेप में

  • रूस और चीन अंटार्कटिका में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। इससे उनकी वैज्ञानिक गतिविधियों के पीछे संभावित सैन्य और संसाधन संबंधी मंशाओं को लेकर चिंता बढ़ी है।
  • अंटार्कटिक संधि प्रणाली सैन्य गतिविधियों और खनन पर रोक लगाती है, लेकिन कमजोर प्रवर्तन और 2048 में फिर से बातचीत की संभावना से इसे चुनौतियों का सामना है।
  • रूस के हालिया भूकंपीय सर्वेक्षणों और तेल के विशाल भंडारों की खोज के दावों ने भविष्य में संसाधनों की होड़ की आशंका बढ़ा दी है।
  • चीन का नया अनुसंधान स्टेशन और क्रिल मछली पकड़ने के उसके बढ़ते उद्योग से क्षेत्र में उसके दीर्घकालीन रणनीतिक और आर्थिक हित जाहिर होते हैं।
  • अमेरिकी बजट कटौतियों से देश का प्रभाव घटने का खतरा है, जिससे रूस और चीन को महाद्वीप के भविष्य के नियम तय करने का मौका मिल सकता है।
  • पर्यावरणविदों को चेतावनी है कि बढ़ती गतिविधियों से अंटार्कटिका के अनूठे पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है और वैश्विक जलवायु स्थिरता कमजोर हो सकती है।
  • अंटार्कटिका का भविष्य प्रभावी अंतरराष्ट्रीय निगरानी, संधि के सिद्धांतों के प्रति नई प्रतिबद्धता और तात्कालिक लाभ से ऊपर शांति तथा विज्ञान को प्राथमिकता देने की इच्छा पर निर्भर है।
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