खाद्य आत्मनिर्भरता में दुनिया के अग्रणी देशों में वियतनाम: नए वैश्विक अध्ययन से क्या पता चला

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Xi's food self-sufficiency call marks latest turn inward

वियतनाम की उल्लेखनीय खाद्य आत्मनिर्भरता: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य

ऐसी दुनिया में, जहां वैश्विक व्यापार में बाधाएं, जलवायु संबंधी झटके और भू-राजनीतिक तनाव खाद्य सुरक्षा के लिए लगातार बड़ा खतरा बन रहे हैं, Nature Food पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने वियतनाम को दुनिया के सबसे खाद्य आत्मनिर्भर देशों में से एक बताया है। जर्मनी के गोटिंगेन विश्वविद्यालय और स्कॉटलैंड के एडिनबरा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने यह शोध किया। इसमें 186 देशों और क्षेत्रों की खाद्य उत्पादन क्षमता का विश्लेषण किया गया और यह आंका गया कि वे आयात पर निर्भर हुए बिना अपनी आबादी की आहार संबंधी घरेलू जरूरतें कितनी पूरी कर सकते हैं। वियतनाम का मजबूत प्रदर्शन, गुयाना के ठीक बाद और चीन के साथ, उसके सशक्त कृषि क्षेत्र और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर चर्चा में उसकी रणनीतिक अहमियत को रेखांकित करता है।

विषय-सूची
  1. वियतनाम की उल्लेखनीय खाद्य आत्मनिर्भरता: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य
  2. खाद्य आत्मनिर्भरता कैसे मापी गई?
  3. वियतनाम की कृषि ताकत: सुदृढ़ता का आधार
  4. वैश्विक खाद्य आत्मनिर्भरता: एक गहरी खाई
  5. पूरी आत्मनिर्भरता इतनी दुर्लभ क्यों है?
  6. वियतनाम की दोहरी भूमिका: निर्यात में अग्रणी और घरेलू सुरक्षा का आधार
  7. क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव: अध्ययन से मिले सबक
  8. दूसरे देशों से वियतनाम की तुलना: वैश्विक तस्वीर
  9. आगे की चुनौतियां और अवसर
  10. संक्षेप में

खाद्य आत्मनिर्भरता कैसे मापी गई?

अध्ययन की पद्धति व्यापक और कठोर थी। शोधकर्ताओं ने संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के आंकड़ों का इस्तेमाल किया और प्रत्येक देश के घरेलू खाद्य उत्पादन की तुलना वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड के लाइववेल आहार में बताई गई पोषण संबंधी जरूरतों से की। यह आहार सात आवश्यक खाद्य समूहों के संतुलित सेवन पर जोर देता है: अनाज, सब्जियां, फल, स्टार्चयुक्त मुख्य खाद्य पदार्थ, डेयरी उत्पाद, मांस और मछली। विश्लेषण में एक अहम सवाल पूछा गया: अगर वैश्विक खाद्य व्यापार अचानक रुक जाए, तो कौन-से देश केवल अपने यहां उत्पादित खाद्य पदार्थों से अपनी आबादी का पेट भर सकते हैं?

नतीजे चौंकाने वाले थे। करीब 800,000 की आबादी वाला दक्षिण अमेरिकी देश गुयाना ही ऐसा देश था जो सभी सात खाद्य समूहों में पूरी तरह आत्मनिर्भर रहा। चीन और वियतनाम उसके ठीक पीछे रहे; दोनों सात में से छह श्रेणियों में घरेलू मांग पूरी करने में सक्षम हैं। इससे वियतनाम उन गिने-चुने देशों में शामिल हो जाता है जो खाद्य आयात और निर्यात में बड़े व्यवधानों का सामना कर सकते हैं।

वियतनाम की कृषि ताकत: सुदृढ़ता का आधार

वियतनाम की ऊंची रैंकिंग का श्रेय उसके विविध और उत्पादक कृषि क्षेत्र को जाता है। देश प्रमुख क्षेत्रों में लगातार ऊंची पैदावार हासिल करता है, जिनमें शामिल हैं:

  • चावल: वियतनाम दुनिया के प्रमुख चावल उत्पादकों और निर्यातकों में से एक है। मेकांग और रेड रिवर डेल्टा देश के प्रमुख चावल उत्पादक क्षेत्र हैं।
  • फल और सब्जियां: देश की उष्णकटिबंधीय जलवायु कई तरह के फल (जैसे ड्रैगन फ्रूट, लीची और आम) और सब्जियां उगाने के लिए अनुकूल है। इनका इस्तेमाल घरेलू खपत और निर्यात, दोनों के लिए होता है।
  • मत्स्य उत्पाद: वियतनाम जलीय कृषि में दुनिया का अग्रणी देश है, खासकर पंगासियस मछली और झींगा उत्पादन में।
  • मांस और स्टार्चयुक्त मुख्य खाद्य पदार्थ: पशुपालन और कसावा तथा शकरकंद जैसी फसलों की खेती से खाद्य सुरक्षा और मजबूत होती है।

यह मजबूत उत्पादन क्षमता न केवल वियतनाम की घरेलू जरूरतों को पूरा करती है, बल्कि उसे एक प्रमुख खाद्य निर्यातक देश भी बनाती है। VietnamPlus के अनुसार, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों की जरूरत पूरी करने की यह दोहरी क्षमता वैश्विक खाद्य व्यापार में आए झटकों के प्रति वियतनाम की सुदृढ़ता बढ़ाती है।

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वैश्विक खाद्य आत्मनिर्भरता: एक गहरी खाई

अध्ययन के वैश्विक विश्लेषण में खाद्य संकटों से निपटने की क्षमता में भारी अंतर सामने आया। 186 देशों में से 154 केवल दो से पांच खाद्य समूहों में आत्मनिर्भर पाए गए। चिंताजनक बात यह है कि अफगानिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, मकाऊ (चीन), कतर और यमन समेत कई देश सात में से किसी भी श्रेणी की मांग घरेलू उत्पादन से पूरी नहीं कर सके। इन देशों में खाद्य आपूर्ति का 50% से अधिक हिस्सा आयात पर निर्भर है, जिससे वे आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों, व्यापार प्रतिबंधों या भू-राजनीतिक संकटों के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाते हैं।

अध्ययन के प्रमुख लेखक और गोटिंगेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता डॉ. जोनास स्टेल ने जोखिमों पर जोर देते हुए कहा:

आत्मनिर्भरता का निम्न स्तर और आयात के लिए कुछ ही देशों पर अत्यधिक निर्भरता, वैश्विक झटकों से निपटने की उनकी क्षमता को खतरे में डालती है, खासकर छोटे देशों की।

ये निष्कर्ष कोविड-19 महामारी और यूक्रेन में युद्ध जैसी हालिया वैश्विक घटनाओं के बाद खास तौर पर प्रासंगिक हैं। इन दोनों घटनाओं ने लंबी खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं की कमजोरी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहने के खतरे उजागर किए।

पूरी आत्मनिर्भरता इतनी दुर्लभ क्यों है?

गुयाना की पूरी खाद्य आत्मनिर्भरता की अनूठी उपलब्धि मुख्य रूप से उसकी अनुकूल जलवायु, उपजाऊ मिट्टी और संतुलित कृषि व्यवस्था के कारण है, जो सभी खाद्य समूहों में साल भर खेती को संभव बनाती है। इसके उलट, चीन और वियतनाम जैसे कृषि क्षेत्र के बड़े देश भी एक श्रेणी में, अक्सर डेयरी में, जलवायु या संरचनागत सीमाओं के कारण पीछे रह जाते हैं।

अधिकांश देशों को कुछ खाद्य समूहों में आत्मनिर्भर बनने में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए:

  • डेयरी: कई देशों, खासकर उप-सहारा अफ्रीका और ओशिनिया में, घरेलू डेयरी जरूरतें पूरी करना मुश्किल होता है।
  • मछली और समुद्री खाद्य: केवल लगभग हर चार में से एक देश मछली के मामले में आत्मनिर्भर है। अधिकांश देश अपनी जरूरतों का आधा हिस्सा भी पूरा नहीं कर पाते।
  • सब्जियां और वनस्पति-आधारित प्रोटीन: आधे से भी कम देश घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त दालें, मेवे, बीज या सब्जियां पैदा करते हैं।

इन कमियों को अक्सर आयात से पूरा किया जाता है, लेकिन व्यापार बाधित होने पर इससे जोखिम पैदा होते हैं। BBC Science Focus के मुताबिक, आत्मनिर्भरता का कम होना अपने आप में नकारात्मक नहीं है। कुछ देशों में खास फसलें उगाने के लिए प्राकृतिक संसाधन नहीं होते और खाद्य आयात करना अधिक किफायती हो सकता है। हालांकि, इसका नुकसान यह है कि वैश्विक झटकों के सामने उनकी सुदृढ़ता घट जाती है।

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वियतनाम की दोहरी भूमिका: निर्यात में अग्रणी और घरेलू सुरक्षा का आधार

घरेलू जरूरतों के लिए विविध और टिकाऊ कृषि व्यवस्था बनाए रखते हुए प्रमुख खाद्य निर्यातक की भूमिका निभाने की वियतनाम की क्षमता उसकी सुदृढ़ता का अहम कारण है। Vietnam News के अनुसार, यह दोहरी क्षमता आने वाले वर्षों में वैश्विक खाद्य व्यापार के संभावित झटकों से बेहतर ढंग से निपटने में देश की मदद करेगी।

वियतनाम की सरकार लंबे समय से खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देती आई है और उसने कृषि अनुसंधान, बुनियादी ढांचे तथा ग्रामीण विकास में निवेश किया है। देश के किसानों ने पैदावार बढ़ाने और फसलों में विविधता लाने के लिए नई तकनीकें अपनाई हैं। वहीं, नीतियां निर्यात बढ़ाने के साथ घरेलू आपूर्ति सुरक्षित रखने को भी प्रोत्साहित करती हैं। वैश्विक अनिश्चितता के दौर में यह तरीका खास तौर पर कारगर साबित हुआ है।

क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव: अध्ययन से मिले सबक

अध्ययन के निष्कर्षों का दुनिया भर के नीति-निर्माताओं और खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए व्यापक महत्व है। इसके प्रमुख सबक हैं:

  • व्यापार में विविधता: खाद्य आयात के लिए किसी एक व्यापारिक साझेदार पर बहुत अधिक निर्भर देश खास तौर पर असुरक्षित हैं। व्यापार संबंधों में विविधता लाने से सुदृढ़ता बढ़ सकती है।
  • घरेलू उत्पादन में निवेश: स्थानीय कृषि, खासकर कमजोर प्रदर्शन करने वाले खाद्य समूहों में, मजबूती लाने से निर्भरता घट सकती है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बेहतर हो सकती है।
  • जलवायु अनुकूलन: जलवायु परिवर्तन के तेज होने के साथ, भविष्य की खाद्य आपूर्ति सुरक्षित रखने के लिए देशों को जलवायु-सहिष्णु फसलों और टिकाऊ कृषि पद्धतियों में निवेश करना होगा।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: आत्मनिर्भरता अहम है, लेकिन स्वस्थ और टिकाऊ आहार के लिए अंतरराष्ट्रीय खाद्य व्यापार और सहयोग भी जरूरी हैं, खासकर उन देशों के लिए जिनकी कृषि क्षमता सीमित है।

अध्ययन के सह-लेखक और एडिनबरा विश्वविद्यालय में पीएचडी शोधकर्ता अलेक्जेंडर वोंडर्श्मिट ने खुले व्यापार और नवाचार के महत्व पर जोर देते हुए कहा:

जलवायु संबंधी झटके कृषि क्षेत्र को नया रूप दे रहे हैं और उनका असर लगातार बढ़ेगा। स्वस्थ, कम कार्बन वाले आहार सुनिश्चित करने के लिए खुला व्यापार और नवाचार जरूरी हैं।
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दूसरे देशों से वियतनाम की तुलना: वैश्विक तस्वीर

वियतनाम की लगभग पूरी खाद्य आत्मनिर्भरता कई अन्य देशों और क्षेत्रों से अलग नजर आती है:

  • गुयाना: सभी सात खाद्य समूहों में पूरी तरह आत्मनिर्भर एकमात्र देश, जिसका श्रेय उसकी छोटी आबादी और कृषि के अनुकूल परिस्थितियों को जाता है।
  • चीन: छह श्रेणियों में वियतनाम के बराबर आत्मनिर्भर है। यह उसके विशाल कृषि संसाधनों के साथ-साथ डेयरी उत्पादन की चुनौतियों को भी दर्शाता है।
  • यूरोप और दक्षिण अमेरिका: आम तौर पर अन्य क्षेत्रों से अधिक आत्मनिर्भर हैं, खासकर मांस और डेयरी में, लेकिन वनस्पति-आधारित प्रोटीन और सब्जियों के मामले में अक्सर पीछे रह जाते हैं।
  • छोटे द्वीपीय देश और खाड़ी देश: सबसे कम आत्मनिर्भर देशों में शामिल हैं। ये अक्सर किसी भी खाद्य समूह में घरेलू मांग पूरी नहीं कर पाते और आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं।

खाड़ी सहयोग परिषद जैसे आर्थिक संघ भी आत्मनिर्भरता के मामले में संघर्ष करते हैं और अक्सर केवल एक या दो खाद्य समूहों में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। इससे क्षेत्रीय सहयोग और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप राष्ट्रीय रणनीतियों, दोनों का महत्व सामने आता है।

आगे की चुनौतियां और अवसर

वियतनाम की उपलब्धियां प्रभावशाली हैं, लेकिन अध्ययन के लेखक आगाह करते हैं कि मौजूदा उत्पादन मात्रा किसी देश की पूरी क्षमता को जरूरी नहीं दर्शाती। नीतिगत प्रोत्साहन, आर्थिक बदलाव और तकनीकी नवाचार जैसे कारक भविष्य में देशों की आत्मनिर्भरता बढ़ा सकते हैं। वर्ष 2032 तक के अनुमान बताते हैं कि अधिकांश देश प्रगति कर सकते हैं, खासकर पशु-आधारित खाद्य पदार्थों और वनस्पति-आधारित मुख्य खाद्य पदार्थों में। हालांकि, यह प्रगति क्षेत्र और खाद्य समूह के अनुसार अलग-अलग होगी।

वियतनाम के लिए टिकाऊ कृषि, जलवायु अनुकूलन और ग्रामीण विकास में निरंतर निवेश अहम होगा। देश का अनुभव अनिश्चित दुनिया में खाद्य सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश कर रहे दूसरे देशों के लिए उपयोगी सबक देता है।

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संक्षेप में

  • खाद्य आत्मनिर्भरता में वियतनाम दुनिया के अग्रणी देशों में है और सात में से छह आवश्यक खाद्य समूहों में घरेलू मांग पूरी कर सकता है।
  • सभी श्रेणियों में केवल गुयाना पूरी तरह आत्मनिर्भर है; चीन और वियतनाम उसके करीब हैं।
  • अध्ययन वैश्विक असमानताएं उजागर करता है: कई देश एक भी खाद्य समूह में घरेलू जरूरतें पूरी नहीं कर पाते।
  • वियतनाम का मजबूत कृषि क्षेत्र और निर्यात तथा घरेलू आपूर्ति के बीच संतुलित दृष्टिकोण उसकी सुदृढ़ता का आधार हैं।
  • व्यापार में विविधता, स्थानीय उत्पादन में निवेश और जलवायु अनुकूलन दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा बेहतर करने की प्रमुख रणनीतियां हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग अब भी जरूरी है, क्योंकि कोई भी देश वैश्विक झटकों और जलवायु परिवर्तन से पैदा जोखिमों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
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