खनन अभिलेखों से यौन शोषण की व्यवस्था का खुलासा
कोरियाई पुरुषों को खदानों और अन्य उद्योगों में काम के लिए लामबंद किए जाने के दौरान उनकी सेवा में संचालित औद्योगिक यौन शोषण केंद्रों के रूप में वर्णित कम-से-कम 39 प्रतिष्ठान युद्धकालीन जापान में सक्रिय थे। कोरिया म्यूज़ियम के शोध पर एक अलग विवरण में यह संख्या 57 बताई गई है। इस अंतर का कारण स्पष्ट नहीं किया गया है, लेकिन दोनों निष्कर्ष होक्काइडो से क्यूशू तक फैले एक नेटवर्क का वर्णन करते हैं। इन प्रतिष्ठानों में कोरियाई महिलाओं को उन जगहों पर रखा जाता था जिनका इस्तेमाल श्रमिकों पर नियंत्रण रखने और उन्हें भागने से रोकने के लिए किया जाता था।
विषय-सूची
- खनन अभिलेखों से यौन शोषण की व्यवस्था का खुलासा
- निष्कर्षों में खदानों का ज़िक्र अधिक क्यों है
- कोरिया म्यूज़ियम के शोध से क्या सामने आया
- सरकारी दिशा-निर्देश और कंपनियों की भूमिका
- संख्याओं में अंतर क्यों है
- होक्काइडो में रेस्तरां, खदानों और अधिकारियों के बीच संबंध
- पुरुषों की गवाहियां बचीं, महिलाओं का इतिहास अधूरा
- नीति और शोध की समयरेखा
- जानने योग्य बातें
इसका विशेष रूप से खुलासा करने वाला एक दस्तावेज़ 1945 में युद्धकालीन कोयला नियंत्रण संघ की क्यूशू शाखा को सौंपा गया एक पत्र है। इसमें हर 1,000 कोरियाई मजदूरों के लिए करीब 10 महिलाओं का प्रस्ताव था और विशेष यौन शोषण केंद्रों को यौन राहत के स्थान बताया गया था। पत्र में कोरियाई महिलाओं की मौजूदगी को श्रमिकों को भागने से रोकने और उत्पादन बढ़ाने से जोड़ा गया था।
ये निष्कर्ष जापानी सैन्य कर्मियों के लिए संचालित केंद्रों के बजाय नागरिक उद्योग से जुड़े प्रतिष्ठानों के बारे में हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन्हें किसने संगठित किया, यह पहचानने के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है: दस्तावेज़ों में कंपनी के श्रम विभागों, उद्योग संघों और सार्वजनिक प्राधिकरणों, सभी की भूमिका दिखाई देती है।
कोरिया म्यूज़ियम का शोध एक बड़ी कमी भी उजागर करता है। दस्तावेज़ और पूर्व पुरुष श्रमिकों की गवाही इन प्रतिष्ठानों के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं, लेकिन स्वयं महिलाओं के बारे में बहुत कम जानकारी है। सर्वर के रूप में वर्णित कई महिलाएं किशोरावस्था में थीं। उनकी भर्ती, कामकाजी परिस्थितियों और बाद के जीवन के बारे में रिकॉर्ड अब भी अधूरे हैं।
निष्कर्षों में खदानों का ज़िक्र अधिक क्यों है
जापानी सरकार की श्रम लामबंदी योजनाएं 1939 से 1945 के बीच लागू थीं, जब कोरियाई प्रायद्वीप जापानी औपनिवेशिक शासन के अधीन था। अनुमान है कि 7,00,000 कोरियाई नागरिकों को जबरन जापान लाया गया। युद्ध अर्थव्यवस्था को आपूर्ति करने वाले कोयला खदानों, धातु खदानों और अन्य उद्योगों में उनके श्रम पर भारी निर्भरता थी।
पूर्व स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 1939 से 1942 के बीच लामबंद किए गए कोरियाई श्रमिकों में से करीब 75% को कोयला खदानों और अन्य खनन स्थलों पर नियुक्त किया गया था। उस अवधि में यह हर चार में से लगभग तीन श्रमिकों के बराबर है। इस प्रतिशत को व्यापक युद्धकालीन अवधि में जापान लाए गए अनुमानित 7,00,000 लोगों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
कई श्रमिक कठोर परिस्थितियों से भाग गए। म्यूज़ियम के अनुसार, सरकार ने खनन कंपनियों को श्रमिकों को जाने से रोकने के उपाय के तौर पर कोरियाई रेस्तरां और ऐसे ही प्रतिष्ठानों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया। इस तरह मनोरंजन या आतिथ्य के रूप में पेश की गई इन सुविधाओं का औद्योगिक मकसद था: ऐसे कार्यबल को बनाए रखना जिसकी स्वतंत्रता पहले ही सीमित थी।
चिह्नित स्थलों में होक्काइडो और फुकुओका प्रान्त की कोयला खदानें, साथ ही नागासाकी प्रान्त की मित्सुबिशी हाशिमा कोयला खदान शामिल हैं। गवाहियों में नागानो और क्योतो प्रान्तों के प्रतिष्ठानों का भी ज़िक्र है। इन निष्कर्षों से पता चलता है कि यह प्रथा किसी एक खनन क्षेत्र तक सीमित नहीं थी, हालांकि उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि हर खदान में ऐसे प्रतिष्ठान थे।
कोरिया म्यूज़ियम के शोध से क्या सामने आया
कोरिया म्यूज़ियम ने अपने कोरियाई महिला इतिहास शोध समूह के ज़रिए जांच की है कि कोरियाई रेस्तरां और अन्य प्रतिष्ठान युद्धकालीन श्रम प्रबंधन से कैसे जुड़े। उसके 2017 की प्रदर्शनी के वक्तव्य के अनुसार, दस्तावेज़ी साक्ष्यों से कंपनी के श्रम कर्मियों की भागीदारी और सार्वजनिक प्राधिकरणों के ज़रिए लामबंदी का पता चला।
यह प्रदर्शनी 30 अगस्त से 28 दिसंबर 2017 तक चली। इसकी तैयारी के दौरान शोधकर्ताओं ने जापान के छह स्थानों पर मैदानी काम किया और गवाहियां जुटाईं। म्यूज़ियम ने इसे उद्योगों में यौन शोषण केंद्रों पर पहली प्रदर्शनी बताया, साथ ही यह भी माना कि गवाहियां कम थीं और बचे हुए दस्तावेज़ सीमित थे।
म्यूज़ियम के वक्तव्य के अनुसार, जापान में पहले से कोरियाई रेस्तरां में काम कर रही महिलाओं के साथ-साथ कोरिया से नई आई महिलाओं को भी ऐसे प्रतिष्ठानों में लामबंद किया गया जिनका मकसद श्रमिकों को भागने से रोकना और श्रम प्रदर्शन बेहतर करना था। यह विवरण हर प्रतिष्ठान को नए सिरे से बनाया गया संस्थान बताने के बजाय, मौजूदा कारोबारों को युद्धकालीन उद्योग की जरूरतों से जोड़ता है।
म्यूज़ियम के पूर्व निदेशक यूइची हिगुची ने इन प्रतिष्ठानों को सैन्य यौन शोषण केंद्रों से अलग बताया और इन्हें औद्योगिक यौन शोषण केंद्र की संज्ञा दी। यह शब्द कार्यस्थल पर नियंत्रण से उनके संबंध को दर्शाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि ‘आराम’ वाला व्यंजना शब्द महिलाओं के अनुभवों का सटीक वर्णन करता है।
यह शोध कई चरणों में आगे बढ़ा है। एक विवरण में छह साल की जांच के बाद किताब प्रकाशित होने की बात है, जबकि कम-से-कम 39 प्रतिष्ठानों का निष्कर्ष विशेषज्ञों के साक्षात्कार से मिलान किए गए दशक भर के दस्तावेज़ी और मैदानी शोध पर आधारित है। इन विवरणों को एक ही शोध अवधि नहीं मानना चाहिए।
सरकारी दिशा-निर्देश और कंपनियों की भूमिका
फरवरी 1942 में स्वास्थ्य और गृह मंत्रालयों द्वारा संयुक्त रूप से जारी दिशा-निर्देश में जापान लाए गए कोरियाई श्रमिकों के साथ व्यवहार और उनके प्रशिक्षण का उल्लेख था। इसमें कहा गया था कि नियोक्ता स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विशेष यौन शोषण केंद्रों की व्यवस्था कर सकते हैं। इस शब्दावली ने व्यावहारिक इंतज़ाम की जिम्मेदारी नियोक्ताओं पर रखी, जबकि इन प्रतिष्ठानों को आधिकारिक श्रम नीति का हिस्सा बनाया।
1945 के कोयला उद्योग संबंधी पत्र में इनका मकसद और स्पष्ट किया गया था। इसमें हर 1,000 कोरियाई मजदूरों के लिए करीब 10 महिलाओं का प्रस्ताव था, यानी हर 100 पुरुषों के लिए एक महिला। यह प्रस्तावित अनुपात था, इस बात का सबूत नहीं कि हर प्रतिष्ठान ने इसका पालन किया, और न ही इससे शामिल महिलाओं की कुल संख्या निकाली जा सकती है।
पत्र में कहा गया था कि कोरियाई प्रायद्वीप की महिलाओं की मौजूदगी सुविधाजनक होगी। इसके घोषित उद्देश्यों में भागने से हतोत्साहित करना और उत्पादन को प्रोत्साहन देना शामिल था। मंत्रालय के दिशा-निर्देशों और कंपनी के श्रम विभागों की भूमिका पर म्यूज़ियम के निष्कर्षों के साथ पढ़ने पर, यह दिखाता है कि यौन पहुंच को कार्यबल प्रबंधन के साधन के रूप में देखा गया था।
दस्तावेज़ों में दर्ज प्रतिष्ठानों के रूप अलग-अलग थे। बड़ी कोरियाई आबादी वाले इलाकों के कुछ कोरियाई रेस्तरां को बदलकर इन कामों में लगाया गया, जबकि कंपनियों ने अन्य प्रतिष्ठानों की स्थापना को प्रोत्साहित किया। इस विविधता से समझ आता है कि शोधकर्ताओं को कारोबारी अभिलेखों, प्रशासनिक दस्तावेज़ों और गवाहियों, सभी की जांच क्यों करनी पड़ती है। केवल किसी कारोबार का नाम यह साबित नहीं करता कि उसके भीतर क्या हुआ।
संख्याओं में अंतर क्यों है
विशेषज्ञों के साक्षात्कार से मिलान किए गए शोध में देशभर में कम-से-कम 39 औद्योगिक यौन शोषण केंद्रों की पहचान की गई। म्यूज़ियम समूह की किताब के एक अलग विवरण में 57 केंद्रों की पुष्टि का दावा है। इसलिए रिपोर्टों में 18 स्थानों का अंतर है और किसी भी संख्या की जगह चुपचाप दूसरी संख्या नहीं रखनी चाहिए।
ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं है जिससे पता चले कि यह अंतर बाद में हुई खोजों, अलग-अलग परिभाषाओं, भौगोलिक दायरे या किसी स्थल की पुष्टि के अलग मानकों के कारण है। सबसे सावधान निष्कर्ष यही है कि एक जांच में कम-से-कम 39 स्थानों की पहचान हुई, जबकि एक अलग शोध विवरण में इससे बड़ी संख्या दी गई है।
एक अन्य रिपोर्ट में होक्काइडो के 17 स्थानों की पहचान की गई है और इसे सबसे अधिक संख्या वाला क्षेत्र बताया गया है। यह संख्या जांच में द्वीप के महत्व को रेखांकित करती है, लेकिन जब तक यह न पता हो कि तीनों गणनाएं एक ही सूची पर आधारित हैं या नहीं, इसे देशव्यापी किसी भी कुल संख्या के हिस्से के रूप में विश्वसनीय ढंग से नहीं बताया जा सकता।
प्रतिष्ठानों की संख्या से शोषित महिलाओं की संख्या भी पता नहीं चलती। एक स्थान पर कई इमारतें हो सकती थीं और समय के साथ कर्मचारियों की संख्या बदल सकती थी। उपलब्ध साक्ष्य से महिलाओं की राष्ट्रीय कुल संख्या, उनकी सेवा की अवधि या उनमें से कितनी किशोरियां थीं, यह स्थापित नहीं होता।
होक्काइडो में रेस्तरां, खदानों और अधिकारियों के बीच संबंध
होक्काइडो के एबेत्सु में रहने वाली क्षेत्रीय इतिहासकार हिदेको निशिदा ने कोरियाई रेस्तरां, कोयला उद्योग और स्थानीय प्रशासन के बीच संबंधों का पता लगाया है। निशिदा के अनुसार, 1938 में सप्पोरो में कोरियाई बार के नाम से जाने जाने वाले लगभग 50 कोरियाई रेस्तरां थे, जहां यौन सेवाएं बेची जाती थीं।
1939 में होक्काइडो कोयला खनन उद्योग संघ ने कोरियाई श्रमिकों को आराम देने के घोषित उद्देश्य से 26 नए कोरियाई रेस्तरां खोलने की अनुमति मांगी। यह अनुरोध इस बात का ठोस उदाहरण है कि एक उद्योग संगठन ने अपने कार्यबल से जुड़े प्रतिष्ठानों के लिए प्रशासनिक अनुमति मांगी।
निशिदा द्वारा जांचे गए उस समय के स्थानीय अखबारों की खबरों में बार संचालकों द्वारा बनाए गए एक संगठन का भी ज़िक्र था, जो यौन संचारित संक्रमणों के फैलाव समेत कई मुद्दों पर काम करता था। स्थानीय पुलिस थाने ने उस संगठन को मान्यता दी थी। ये रिकॉर्ड सार्वजनिक प्राधिकरणों के साथ संपर्क का संकेत देते हैं, हालांकि इनसे प्रतिष्ठानों में काम करने वाली हर महिला की परिस्थितियां साबित नहीं होतीं।
सप्पोरो के करीब 50 कारोबार और अनुरोध किए गए 26 प्रतिष्ठान अलग-अलग तरह के साक्ष्य हैं। पहली संख्या एक शहर में पहले से मौजूद स्थानों की गणना है; दूसरी नए स्थान खोलने की अनुमति के अनुरोध की। इन्हें सीधे जोड़ना या पुष्टि किए गए औद्योगिक यौन शोषण केंद्रों की संख्या के बराबर मानना सही नहीं होगा।
भौतिक निशानों की भी जांच हो रही है। जुलाई के मध्य में एक मैदानी दौरे के दौरान निशिदा आशिबेत्सु में एक कथित औद्योगिक यौन शोषण केंद्र के स्थल पर गईं। यह स्थान पूर्व ताकाने नंबर 2 कोयला खदान के पास था, जिसे मित्सुई माइनिंग ने 1944 में खरीदा था। जांच में एक छोटी बस्ती में कतार से बनी इमारत के बचे होने का उल्लेख किया गया। बची हुई इमारत भूगोल के लिहाज़ से आगे जांच का सुराग देती है, लेकिन इससे अपने-आप महिलाओं के जीवन का पूरा ब्यौरा नहीं मिलता।
पुरुषों की गवाहियां बचीं, महिलाओं का इतिहास अधूरा
जबरन लामबंदी की जांच और पीड़ितों की सहायता करने वाले दक्षिण कोरियाई सरकारी आयोग की 2008 की रिपोर्ट में करीब 50 लोगों ने औद्योगिक यौन शोषण केंद्रों का ज़िक्र किया है। इसका जापानी संस्करण दिसंबर 2024 में प्रकाशित हुआ, जिससे ये विवरण जापान के अधिक पाठकों तक पहुंचे।
गवाहियों में होक्काइडो, नागानो, क्योतो और फुकुओका समेत अन्य क्षेत्रों के प्रतिष्ठानों का ज़िक्र है। होक्काइडो कोलियरी एंड स्टीमशिप के युबारी खनन केंद्र में, करीब 1940 में कोरियाई श्रमिकों के छात्रावास के पास कथित तौर पर तीन इमारतें थीं। उस समय की स्थानीय खबरों में उन्हें विश्राम गृह कहा गया था।
ये विवरण प्रतिष्ठानों को सीधे श्रमिकों के रहने के स्थानों से जोड़ते हैं। साथ ही, ये दिखाते हैं कि आराम का संकेत देने वाला सार्वजनिक नाम किसी प्रतिष्ठान की वास्तविक भूमिका को कैसे छिपा सकता है। पुरुषों की गवाहियों में खदान के श्रम के इर्द-गिर्द संगठित व्यवस्था के भीतर महिलाओं तक पहुंच का वर्णन है।
फिर भी, करीब 50 लोगों द्वारा प्रतिष्ठानों का ज़िक्र किए जाने का अर्थ यह नहीं कि 50 अलग-अलग केंद्र थे। हो सकता है कि कई गवाहों ने एक ही जगह का वर्णन किया हो। उनकी गवाहियां स्थानों और प्रथाओं की पुष्टि करने में मदद करती हैं, लेकिन भर्ती, दबाव या रोज़मर्रा की परिस्थितियों के बारे में महिलाओं की अपनी बातों की जगह नहीं ले सकतीं।
म्यूज़ियम के कोरियाई महिला इतिहास शोध समूह की प्रमुख सायोको ओबा कहती हैं कि गवाहियों से यह धारणा सामने आती है कि कोरियाई महिलाओं को कोरियाई श्रमिकों के लिए नियुक्त किया जाना चाहिए। वह इस धारणा को लिंग और जातीयता, दोनों के आधार पर भेदभाव मानती हैं।
शोधकर्ता यांग युहा, जो जापान में रहने वाली दूसरी पीढ़ी की कोरियाई हैं, ने इससे जुड़ी एक व्याख्या दी है: इस नीति में यह अपेक्षा झलकती थी कि कोरियाई महिलाओं को कोरियाई पुरुषों की सेवा करनी चाहिए, साथ ही जापानी जातीय शुद्धता को बनाए रखने की चिंता भी थी। यह नीति के तर्क के बारे में यांग की व्याख्या है, हर प्रतिष्ठान के संबंध में स्थापित निष्कर्ष नहीं।
कई सर्वर किशोरियां थीं, इस निष्कर्ष के कारण उनके निजी इतिहास का अभाव विशेष रूप से गंभीर हो जाता है। महिलाओं को निजी वेश्याओं के रूप में प्रशासनिक वर्गीकरण में दर्ज करने से यह स्पष्ट नहीं होता कि उनकी सहमति थी या नहीं, वे वहां कैसे पहुंचीं या उन्हें छोड़ने की अनुमति थी या नहीं। रिकॉर्ड शोषण के संस्थागत मकसद को अधिक मजबूती से स्थापित करते हैं, जबकि हर महिला की परिस्थितियों का पूरा ब्यौरा नहीं देते।
नीति और शोध की समयरेखा
साक्ष्य युद्धकालीन प्रशासनिक फैसलों और उसके बाद दशकों तक चले शोध में फैले हैं। इन तारीखों को अलग-अलग रखने से प्रतिष्ठानों में हुई घटनाओं और उनके इतिहास पर हुए शोध व प्रकाशन में अंतर स्पष्ट रहता है।
- 1938: निशिदा ने सप्पोरो में यौन सेवाओं की बिक्री से जुड़े करीब 50 कोरियाई बारों की पहचान की।
- 1939: जापान की सरकारी श्रम लामबंदी योजनाएं शुरू हुईं और होक्काइडो कोयला उद्योग संघ ने 26 कोरियाई रेस्तरां खोलने की अनुमति मांगी।
- करीब 1940: युबारी खनन केंद्र में कोरियाई श्रमिकों के आवास के पास तीन इमारतें होने की जानकारी दी गई।
- फरवरी 1942: स्वास्थ्य और गृह मंत्रालयों के संयुक्त दिशा-निर्देश में नियोक्ताओं को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विशेष यौन शोषण केंद्रों की व्यवस्था करने की अनुमति दी गई।
- 1944: मित्सुई माइनिंग ने आशिबेत्सु स्थित ताकाने नंबर 2 कोयला खदान खरीदी।
- 1945: क्यूशू कोयला नियंत्रण संघ की शाखा को सौंपे गए एक पत्र में हर 1,000 कोरियाई मजदूरों के लिए करीब 10 महिलाओं का प्रस्ताव रखा गया।
- 2008: दक्षिण कोरियाई सरकारी आयोग ने ऐसी गवाहियां प्रकाशित कीं जिनमें औद्योगिक यौन शोषण केंद्रों का करीब 50 बार ज़िक्र था।
- अगस्त से दिसंबर 2017: जापान के छह स्थानों पर मैदानी शोध के बाद कोरिया म्यूज़ियम ने अपनी प्रदर्शनी लगाई।
- दिसंबर 2024: दक्षिण कोरियाई आयोग की रिपोर्ट का जापानी संस्करण प्रकाशित हुआ।
आगे के किसी प्रकाशन, सुनवाई या औपचारिक फैसले की तारीख नहीं दी गई है। बाकी काम ऐतिहासिक है: प्रतिष्ठानों की गिनती में अंतर का समाधान करना, महिलाओं के बारे में जानकारी जुटाना और अलग-अलग कंपनियों तथा प्राधिकरणों की जिम्मेदारी तय करना। रिपोर्टों में पूर्व खदान स्थलों से जुड़ी कंपनियों से ठोस जवाब पाने के असफल प्रयासों का ज़िक्र है। इससे कारोबारी रिकॉर्ड और कंपनी के स्पष्टीकरण जांच का अनसुलझा हिस्सा बने हुए हैं।
जानने योग्य बातें
- एक जांच में कम-से-कम 39 औद्योगिक यौन शोषण केंद्रों की पहचान की गई है; एक अलग विवरण में इनकी संख्या 57 बताई गई है, लेकिन अंतर का कारण स्पष्ट नहीं है।
- इन प्रतिष्ठानों में युद्धकालीन उद्योगों में काम के लिए लामबंद किए गए कोरियाई पुरुषों की सेवा की जाती थी और उनका इस्तेमाल भागने से रोकने तथा उत्पादन बनाए रखने के लिए हुआ।
- फरवरी 1942 के मंत्रालयी दिशा-निर्देश में व्यावहारिक इंतज़ाम की जिम्मेदारी नियोक्ताओं को दी गई थी।
- 1945 के कोयला उद्योग संबंधी पत्र में हर 1,000 कोरियाई मजदूरों के लिए करीब 10 महिलाओं का प्रस्ताव था।
- कोरिया म्यूज़ियम के दस्तावेज़ों में कंपनी के श्रम विभागों की भागीदारी और सार्वजनिक प्राधिकरणों के ज़रिए लामबंदी का उल्लेख है।
- सर्वर के रूप में वर्णित कई महिलाएं किशोरियां थीं, लेकिन उनके निजी इतिहास और इसमें शामिल महिलाओं की कुल संख्या अज्ञात है।
- साक्ष्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों को सैन्य यौन शोषण केंद्रों से अलग बताते हैं, साथ ही युद्धकालीन श्रम प्रबंधन में यौन शोषण की पहचान भी करते हैं।






