स्कूलों में विरोध प्रदर्शनों से कपड़ों के नियम चर्चा के केंद्र में
अज़रबैजान के मसाली जिले के बाकू स्थित स्कूल नंबर 69 और मोल्लाओबा के बी. शिरियेव माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों ने कथित तौर पर उन सहपाठियों को वापस लाने की मांग में कक्षाओं का बहिष्कार किया, जिन्हें हिजाब पहनने के कारण स्कूल आने से रोका गया था। जलीलाबाद जिले से मिली अलग-अलग खबरों में बताया गया कि कई लड़कियों को सिर पर स्कार्फ पहनने के कारण स्कूल के प्रवेश द्वारों पर रोका गया और घर भेज दिया गया।
विषय-सूची
- स्कूलों में विरोध प्रदर्शनों से कपड़ों के नियम चर्चा के केंद्र में
- स्कूलों में क्या हुआ?
- पहनावे से जुड़ी आवश्यकताएं क्या कहती हैं
- शिक्षकों के लिए अलग मानक
- भूख हड़ताल से विवाद में एक परिवार की शिकायत शामिल
- समान पहुंच को लेकर दो अलग-अलग तर्क
- एनजीओ मंच ने बहस को धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के रूप में पेश किया
- स्कूलों का विवाद व्यापक सुरक्षा बहस का हिस्सा कैसे बना
- बार-बार उठता विवाद, इस बार नियमों का नया क्रम
- अब भी किन बातों की पुष्टि होनी बाकी है
- मुख्य बिंदु
इस विवाद में शिक्षक भी शामिल हैं। खबरों के मुताबिक, हिजाब पहनने वाली एक महिला को बाकू के रिचर्ड सोरगे माध्यमिक विद्यालय नंबर 90 से बर्खास्त कर दिया गया। वहीं, जेल में बंद पत्रकार पोलाद असलानोव ने उन पाबंदियों के विरोध में भूख हड़ताल शुरू करने की घोषणा की, जिनके बारे में उनका कहना है कि उनसे उनके अपने बच्चे की शिक्षा प्रभावित हुई है।
स्कूलों से बाहर रखे जाने की इन खबरों ने अज़रबैजान में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा पर जारी बहस के केंद्र में एक व्यावहारिक सवाल ला दिया है: क्या एक समान पोशाक मानक लागू करना विद्यार्थियों को पाठों से दूर रखने को उचित ठहरा सकता है? समर्थकों का कहना है कि ये नियम समानता और स्कूल के तटस्थ माहौल की रक्षा का तरीका हैं। विरोधियों के मुताबिक, इन्हें लागू करने से लड़कियों और महिला शिक्षकों को धार्मिक पहनावे तथा शिक्षा या रोजगार तक पहुंच में से एक चुनने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
खबरों में कानूनी उपायों का उल्लेख 21 सितंबर, 2026 को मंत्रिमंडल के उस फैसले के रूप में किया गया है जो विद्यार्थियों की वर्दी से जुड़ा है, और 6 अक्टूबर, 2026 को अपनाई गई शिक्षकों के लिए अलग आवश्यकताओं के रूप में भी। अधिकारियों ने स्कूलों में हिजाब पर पूरी तरह पाबंदी की सार्वजनिक घोषणा नहीं की है। विद्यार्थियों के पहनावे से जुड़े बताए गए प्रावधानों में हिजाब शब्द स्पष्ट रूप से इस्तेमाल नहीं हुआ है, इसलिए उनकी व्याख्या और उन्हें लागू करने का तरीका विवाद का अहम मुद्दा है।
स्कूलों से बाहर रखे गए विद्यार्थियों की संख्या स्पष्ट नहीं है। अज़रबैजानी अधिकारियों ने जलीलाबाद की घटनाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं की थी। वहां प्रभावित विद्यार्थियों की संख्या और उठाए गए सटीक कदम भी तय नहीं हो पाए थे।
स्कूलों में क्या हुआ?
ऑनलाइन प्रसारित हो रहे वीडियो में बच्चे स्कूलों के बाहर विरोध करते और कक्षाओं में जाने से इनकार करते दिखाई दे रहे हैं। यह उन खबरों के बाद हुआ जिनमें कहा गया था कि सिर पर स्कार्फ पहनने वाले विद्यार्थियों को स्कूल में प्रवेश नहीं दिया गया। बाकू और मोल्लाओबा के स्कूलों में कथित मांग स्पष्ट थी: उनके सहपाठियों को वापस आने दिया जाए।
जलीलाबाद में आरोपों का एक अलग मामला सामने आया है। खबरों के मुताबिक, कई छात्राओं को स्कूल से लौटाकर घर भेज दिया गया, लेकिन उनकी पुष्ट संख्या या स्कूलों के नाम नहीं बताए गए। इन खबरों को देशभर का सत्यापित कुल आंकड़ा नहीं माना जा सकता, न ही इन्हें अन्य घटनाओं के साथ जोड़कर यह तय किया जा सकता है कि कितने बच्चों की पाठों तक पहुंच छिन गई।
इससे पहले मेहदीाबाद के माध्यमिक विद्यालय नंबर 3 में एक घटना की खबर आई थी। 10 मार्च, 2026 को निदेशक आफत जमालोवा ने कथित तौर पर हिजाब पहनने के कारण 23 विद्यार्थियों को निष्कासित कर दिया था। यह घटना सितंबर में वर्दी संबंधी संशोधन से पहले की है, इसलिए इससे यह साबित नहीं होता कि बाद का फैसला मार्च की कार्रवाई का कानूनी आधार था।
स्कूल नंबर 90 से शिक्षिका की कथित बर्खास्तगी ने विवाद का एक और पहलू सामने रखा है। प्रसारित फुटेज में कथित तौर पर उनके हटाए जाने के बाद विद्यार्थियों को रोते और उन्हें गले लगाते दिखाया गया। इन खबरों से बर्खास्तगी के औपचारिक आधार, लिखित आदेश जारी होने या शिक्षिका द्वारा उसे चुनौती दिए जाने की पुष्टि नहीं होती।
पहनावे से जुड़ी आवश्यकताएं क्या कहती हैं
21 सितंबर, 2026 की मंत्रिमंडल निर्णय संख्या 309 को विद्यार्थियों के पहनावे से जुड़ी आवश्यकताओं में संशोधन का उपाय बताया गया है। खबरों के अनुसार, यह ऐसे कपड़ों के तत्वों पर रोक लगाता है जो वर्दी के मानक को तोड़ते हों या सामान्य शिक्षा के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत से टकराते हों।
धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का अर्थ है कि सरकारी स्कूल धार्मिक प्राधिकार से अलग होकर काम करते हैं। विवाद इस बात पर है कि यह संस्थागत सिद्धांत किसी व्यक्ति के पहनावे पर कैसे लागू होता है। स्कूल के माहौल से जुड़ा नियम और किसी खास विद्यार्थी को बाहर रखने का फैसला संबंधित तो हैं, लेकिन ये एक ही प्रशासनिक कार्रवाई नहीं हैं।
नियामक दस्तावेजों के बारे में खबरों में अलग-अलग विवरण दिए गए हैं। एक खबर में 21 सितंबर के बदलावों को वर्दी और शिक्षकों के पहनावे, दोनों पर लागू बताया गया है। अधिक विस्तृत विवरणों में दो अलग दस्तावेजों का उल्लेख है: सितंबर का विद्यार्थियों से जुड़ा संशोधन और 6 अक्टूबर की शिक्षकों संबंधी आवश्यकताएं। इन दोनों को एक ही आदेश के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
विद्यार्थियों के नियमों में एक अपवाद का भी उल्लेख है। किसी स्कूल की शैक्षणिक परिषद अज़रबैजानी इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय नैतिक मूल्यों से जुड़े आयोजनों में राष्ट्रीय पोशाक या उसके कुछ तत्व पहनने की अनुमति दे सकती है। यह कुछ खास आयोजनों के लिए सीमित छूट है, सामान्य कक्षाओं में धार्मिक कपड़े पहनने के लिए किसी व्यापक अपवाद की बात खबरों में नहीं कही गई है।
शिक्षकों के लिए अलग मानक
6 अक्टूबर, 2026 की आवश्यकताओं में शिक्षकों के कपड़ों को मौसम के अनुकूल, साफ-सुथरा, व्यवस्थित, सादा और औपचारिक शैली का बताया गया है। कपड़ों के तत्वों को सामान्य शिक्षा के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत के अनुरूप होना चाहिए और शिक्षक के काम में बाधा नहीं डालनी चाहिए।
नियमों में खास पाठों और कामकाजी परिस्थितियों के अनुकूल व्यावहारिक और आरामदायक कपड़ों की भी अनुमति है। सूची में शारीरिक शिक्षा, सैन्य सेवा से पहले की तैयारी, प्रौद्योगिकी, भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान शामिल हैं। इन छूटों से पता चलता है कि शिक्षकों के लिए बताए गए मानक में कक्षा के व्यावहारिक कामकाज का ध्यान रखा गया है, न कि हर गतिविधि के लिए एक जैसे कपड़े तय किए गए हैं।
अज़रबैजान का राष्ट्रीय एनजीओ मंच कहता है कि शिक्षकों से जुड़ी आवश्यकताओं का उद्देश्य पेशेवर पहनावे और शैक्षणिक माहौल के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखना है। यह मंच की ओर से नियमों के उद्देश्य की व्याख्या है, बाकू में हुई कथित बर्खास्तगी की परिस्थितियों की पुष्टि नहीं।
बाकू शहर के शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों में नियमों के पालन की निगरानी करने की योजना घोषित की है। किसी निरीक्षण की समय-सारणी, निष्कर्ष या विस्तृत प्रवर्तन प्रक्रिया का उल्लेख नहीं है। निगरानी से यह स्पष्ट हो सकता है कि स्कूल इन आवश्यकताओं को कैसे लागू कर रहे हैं, लेकिन इससे अपने आप यह तय नहीं होता कि विद्यार्थियों को बाहर रखना या शिक्षकों को बर्खास्त करना उचित था या नहीं।
भूख हड़ताल से विवाद में एक परिवार की शिकायत शामिल
खबरों के मुताबिक, जेल में बंद खबरमान समाचार वेबसाइट के प्रमुख पोलाद असलानोव ने 8 अक्टूबर, 2026 को भूख हड़ताल शुरू की। उनकी पत्नी गुलमिरा असलानोवा ने फेसबुक पोस्ट में इसकी घोषणा की और बताया कि उन्हें पेनिटेंशरी फैसिलिटी नंबर 15 में रखा गया है।
असलानोव ने कहा कि इन पाबंदियों से उनके अपने बच्चे के शिक्षा के अधिकार पर असर पड़ा है। अपने विरोध की वजह बताते हुए उन्होंने स्कूल जाने से रोके गए विद्यार्थियों और कपड़ों पर पाबंदियों का सामना कर रही महिला शिक्षकों, दोनों का जिक्र किया:
"मैं घोषणा करता हूं कि मैंने अपने बच्चे और उन सभी हिजाब पहनने वाले विद्यार्थियों के अधिकारों की रक्षा के लिए भूख हड़ताल शुरू की है, जिनके शिक्षा के अधिकार पर पाबंदी लगाई जा रही है। साथ ही, उन सभी हिजाब पहनने वाली महिला शिक्षकों के लिए भी, जिन्हें शिक्षा और हिजाब पहनने में से एक चुनने के लिए मजबूर किया जा रहा है," उन्होंने कहा।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ दिन पहले उन्होंने कॉकसस मुस्लिम बोर्ड के प्रमुख अल्लाहशुकुर पशाजादेह से अपील की थी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। पशाजादेह की ओर से जवाब या भूख हड़ताल की अवधि और असलानोव की सेहत के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।
असलानोव को 2019 में देशद्रोह के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था और शुरुआत में 16 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। बाद में उनकी सजा घटाकर 13 साल कर दी गई। वह आरोपों से इनकार करते हैं और कहते हैं कि उनकी कैद का संबंध उनकी पत्रकारिता से है।
समान पहुंच को लेकर दो अलग-अलग तर्क
असलानोव का तर्क है कि पहनावे पर पाबंदियां अज़रबैजान के संविधान के अनुच्छेद 48 का उल्लंघन करती हैं, जो अंतरात्मा की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। खबरों में संविधान को मुफ्त और अनिवार्य सामान्य माध्यमिक शिक्षा की गारंटी देने वाला भी बताया गया है, हालांकि उसमें स्कूलों में हिजाब पहनने के अधिकार का स्पष्ट उल्लेख करने वाला कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है।
हिजाब का स्पष्ट उल्लेख न होना अपने आप यह तय नहीं करता कि व्यापक अधिकारों का संरक्षण कैसे लागू होगा। इन खास स्कूल निष्कासनों पर किसी अदालत के फैसले का उल्लेख नहीं है। इसलिए इस विवाद में सामान्य अधिकारों की व्याख्या और स्कूलों में नियम लागू करने के व्यावहारिक नतीजे, दोनों शामिल हैं।
वर्दी की आवश्यकताओं के समर्थक समानता को एक अलग अर्थ में देखते हैं। शिक्षा विशेषज्ञ मज़ाहिर मम्मदली का कहना है कि सभी पर समान सिद्धांत लागू करने से विद्यार्थियों के बीच समानता की रक्षा हो सकती है, पाठों पर ध्यान बना रह सकता है और विवाद या भेदभाव घट सकता है। उन्होंने अभिभावकों से तय नियमों को समझदारी से अपनाने की अपील भी की।
क्यूएचटी.एज़ प्लेटफॉर्म के प्रमुख जसारत हुसैनज़ादे का तर्क है कि वर्दी से दिखने वाले सामाजिक अंतर और रूढ़ियां कम होती हैं। 11 अक्टूबर, 2026 को दिए गए बयान में उन्होंने कहा कि पहनावे की बहस शिक्षा से जुड़े अधिक महत्वपूर्ण मुद्दों को पीछे धकेल रही है।
संसद सदस्य एलनारा अकीमोवा भी कहती हैं कि एक जैसे पहनावे के मानक समानता, तटस्थता, जिम्मेदारी और साझा नियमों के सम्मान को बढ़ावा देते हैं। उनका कहना है कि विद्यार्थियों द्वारा पहने जाने वाले प्रतीक स्कूल की तटस्थता को बाधित कर सकते हैं। उन्होंने परिवारों और स्कूलों के बीच सहयोग की अपील की।
ये तर्क अलग-अलग नतीजों पर ध्यान देते हैं। वर्दी के समर्थक एक जैसे पहनावे और संपन्नता या कपड़ों के आधार पर तुलना घटाने पर जोर देते हैं। प्रदर्शनकारी इस बात पर ध्यान देते हैं कि क्या बच्चे अपनी मान्यताओं का पालन करते हुए स्कूल जा सकते हैं। वर्दी से सामाजिक अंतर घटने का सबूत अपने आप इस अलग सवाल का जवाब नहीं देता कि किसी को स्कूल से बाहर रखने से शिक्षा तक पहुंच पर क्या असर पड़ता है।
एनजीओ मंच ने बहस को धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के रूप में पेश किया
अज़रबैजान का राष्ट्रीय एनजीओ मंच, जो खुद को सैकड़ों गैर-सरकारी संगठनों को साथ लाने वाला एक छत्र संगठन बताता है, स्कूलों के पहनावे से जुड़ी आवश्यकताओं को लगातार, पारदर्शी और समान रूप से लागू करने का समर्थन करता है। उसके बयान में संबंधित मंत्रिमंडल फैसले का हवाला दिया गया है और इस सुझाव को खारिज किया गया है कि नियम धार्मिक मूल्यों को निशाना बनाते हैं।
मंच ने अपने बयान में यह रुख रखा:
इन नियमों को लागू करने का उद्देश्य न तो धार्मिक मूल्यों के खिलाफ है और न ही स्कूल से बाहर नागरिकों के निजी जीवन को नियंत्रित करना है।
मंच धर्मनिरपेक्षता को एक ऐतिहासिक उपलब्धि और राष्ट्रीय धरोहर बताता है, साथ ही इस्लाम को अज़रबैजान की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानता है। वह एक-दूसरे के साथ संचालित मस्जिदों, गिरजाघरों और सभाघरों का, और इबादतगाहों के संरक्षण एवं पुनर्स्थापन का उल्लेख करता है। उसके उदाहरणों में आगदम जुम्मा मस्जिद का जीर्णोद्धार और शुशा पर कब्जे के समय अज़ान शामिल हैं।
मंच का यह भी आरोप है कि ईरान और अन्य विदेशी देशों के ऑनलाइन स्रोत अज़रबैजान के धर्मनिरपेक्ष राज्य मॉडल के खिलाफ सूचना हमले कर रहे हैं, शरिया सिद्धांतों पर आधारित राज्य को बढ़ावा दे रहे हैं और धार्मिक संवेदनशीलताओं का फायदा उठा रहे हैं। उसने पहनावे की बहस का जान-बूझकर राजनीतिकरण करने और उसे धार्मिक टकराव में बदलने की कोशिशों की निंदा की।
ये आरोप मंच का अपना पक्ष हैं। इनसे यह साबित नहीं होता कि स्कूल बहिष्कार में शामिल विद्यार्थियों को विदेशी पक्षों ने निर्देश दिए थे। बयान में नामित स्कूलों के विरोध प्रदर्शनों को ऐसे अभियानों से जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत नहीं दिया गया है। यह स्कूलों से बाहर रखे जाने की खबरों की सरकारी पुष्टि भी नहीं है।
स्कूलों का विवाद व्यापक सुरक्षा बहस का हिस्सा कैसे बना
पहनावे के विवाद को वैचारिक सुरक्षा का मामला भी बताया जा रहा है। इसका अर्थ उन विचारों और सूचनाओं से सुरक्षा है जिन्हें अधिकारी सार्वजनिक एकता या राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए खतरा मानते हैं। इस दृष्टिकोण से ध्यान स्कूलों के अलग-अलग फैसलों से हटकर विदेशी प्रभाव को लेकर राज्य की चिंताओं पर चला जाता है।
राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने न्यू अज़रबैजान पार्टी की आठवीं कांग्रेस में इन चिंताओं पर बात की। राष्ट्रीय सुरक्षा और समाज के भीतर प्रभाव के संबंध पर अपनी टिप्पणी में उन्होंने कहा:
वैचारिक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी भौतिक सुरक्षा। क्योंकि वैचारिक विध्वंसक गतिविधियां देश के भीतर निर्देशित होती हैं। हम अपनी सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, और यह भी हमारे कामों में से एक है। आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर हमने अपनी राज्य सीमाओं की सुरक्षा और रक्षा सुनिश्चित की है।
अलीयेव ने शिक्षा और देशभक्ति को वैचारिक प्रभाव के खिलाफ बचाव भी बताया और औपचारिक आयोजनों तथा पुराने ढर्रों के बजाय आधुनिक सार्वजनिक संवाद की अपील की। उनकी टिप्पणियां विदेशी ऑनलाइन अभियानों से जुड़ी दलीलों की व्यापक राजनीतिक पृष्ठभूमि बताती हैं। इन्हें स्कूलों की खास घटनाओं पर फैसला नहीं बताया गया है।
विवाद का आकलन करते समय यह फर्क अहम है। ऑनलाइन हेरफेर की चिंताएं विद्यार्थियों और अभिभावकों की वास्तविक शिकायतों के साथ मौजूद हो सकती हैं। किसी विद्यार्थी को स्कूल से क्यों लौटाया गया, यह तय करने के लिए अब भी स्कूल के फैसले, लागू किए गए नियम और परिवार के पास उपलब्ध विकल्पों की जानकारी चाहिए।
बार-बार उठता विवाद, इस बार नियमों का नया क्रम
खबरों में हालिया टकराव को स्कूलों में सिर पर स्कार्फ पहनने को लेकर विरोध प्रदर्शनों के लंबे इतिहास का हिस्सा बताया गया है। नवंबर 2010 में शिक्षा मंत्रालय ने कथित तौर पर स्कूलों में हिजाब पर पाबंदी लागू करने की कोशिश की थी और बाकू, गांजा तथा अन्य शहरों में प्रदर्शनों के बाद फैसला पलट दिया था। दिसंबर में बाकू में सैकड़ों लोगों ने विरोध किया था। मसाली और नारदारान में भी प्रदर्शनों की खबरें आई थीं।
6 मई, 2011 को पुलिस ने बाकू में शिक्षा मंत्रालय के बाहर एक विरोध प्रदर्शन को तितर-बितर कर दिया था। गृह मंत्रालय ने 45 लोगों को हिरासत में लेने की जानकारी दी थी। 5 अक्टूबर, 2012 को करीब 200 लोगों का प्रदर्शन झड़पों में बदल गया था और खबरों के मुताबिक 65 लोगों को हिरासत में लिया गया। बाद में कुछ प्रतिभागियों को साढ़े छह साल तक की जेल की सजा हुई।
मौजूदा विवाद की खबरों में घटनाओं का क्रम इस तरह बताया गया है:
- फरवरी 2026 के अंत में: देशभर के स्कूलों में हिजाब पर संभावित पाबंदी के दावे प्रसारित होने लगे।
- 10 मार्च, 2026: मेहदीाबाद के माध्यमिक विद्यालय नंबर 3 से कथित तौर पर 23 विद्यार्थियों को निष्कासित किया गया।
- जुलाई 2026: सामान्य शिक्षा कानून में संशोधनों ने कथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष शिक्षा और विद्यार्थियों तथा शिक्षकों के पहनावे से जुड़ी आवश्यकताओं को मजबूत किया।
- 21 सितंबर, 2026: मंत्रिमंडल के निर्णय संख्या 309 से विद्यार्थियों की वर्दी संबंधी आवश्यकताओं में कथित तौर पर संशोधन किया गया।
- 6 अक्टूबर, 2026: शिक्षकों के पहनावे से जुड़ी अलग आवश्यकताएं अपनाई गईं।
- 8 अक्टूबर, 2026: असलानोव ने कथित तौर पर भूख हड़ताल शुरू की।
खबरों में उद्धृत एक जनसांख्यिकीय अनुमान के मुताबिक, अज़रबैजान की करीब 96% आबादी मुस्लिम है। मुसलमानों में लगभग 65% शिया और 35% सुन्नी बताए गए हैं। ये आंकड़े धार्मिक पहचान बताते हैं, पहनावे के विवाद में किसी भी पक्ष के समर्थन को नहीं। विद्यार्थियों या अभिभावकों की राय का कोई सर्वेक्षण भी नहीं बताया गया है।
अब भी किन बातों की पुष्टि होनी बाकी है
स्कूलों से बाहर रखे गए विद्यार्थियों या प्रभावित शिक्षकों की कोई पुष्ट राष्ट्रीय संख्या नहीं दी गई है। जलीलाबाद में कथित तौर पर घर भेजे गए बच्चों, मेहदीाबाद के 23 विद्यार्थियों और स्कूल नंबर 90 से हटाई गई शिक्षिका की मौजूदा स्थिति इन विवरणों से स्पष्ट नहीं होती।
किसी सुनवाई, अपील की समय-सीमा, समीक्षा की तारीख या बाकू में निगरानी के नतीजे जारी करने का कार्यक्रम भी घोषित नहीं किया गया है। तात्कालिक सवाल हैं कि क्या प्रभावित विद्यार्थियों को कक्षाओं में लौटने दिया जा सकता है, स्कूलों ने अपने फैसलों के लिए लिखित में क्या कारण दिए हैं, और क्या परिवारों तथा शिक्षकों के पास समीक्षा की कोई प्रक्रिया उपलब्ध है।
मुख्य फर्क नियमों के बताए गए उद्देश्य और उनके कथित प्रभावों के बीच है। मंच और अन्य समर्थक धर्मनिरपेक्ष शिक्षा तथा समानता की रक्षा के लिए साझा मानकों का समर्थन करते हैं। बहिष्कार और असलानोव का विरोध नियमों को लागू करने के उस तरीके को चुनौती देते हैं, जिसके बारे में उनका कहना है कि इससे बच्चे और शिक्षक कक्षाओं से बाहर हो रहे हैं। इन खास मामलों का समाधान धर्मनिरपेक्षता के पक्ष या विपक्ष में सामान्य घोषणा से आगे की बात मांगता है।
मुख्य बिंदु
- बाकू के स्कूल नंबर 69 और मोल्लाओबा के बी. शिरियेव माध्यमिक विद्यालय में कक्षाओं के बहिष्कार की खबरें आईं।
- जलीलाबाद में कई लड़कियों को कथित तौर पर प्रवेश नहीं दिया गया, लेकिन अधिकारियों ने घटनाओं या प्रभावित विद्यार्थियों की संख्या की पुष्टि नहीं की थी।
- खबरों में 21 सितंबर, 2026 को विद्यार्थियों की वर्दी में संशोधन और 6 अक्टूबर को शिक्षकों के पहनावे से जुड़ी अलग आवश्यकताओं का उल्लेख है।
- खबरों के मुताबिक, हिजाब पहनने वाली एक शिक्षिका को बाकू के रिचर्ड सोरगे माध्यमिक विद्यालय नंबर 90 से बर्खास्त किया गया।
- असलानोव ने कथित तौर पर 8 अक्टूबर को भूख हड़ताल शुरू की और अपने बच्चे की शिक्षा तथा अंतरात्मा की स्वतंत्रता का हवाला दिया।
- राष्ट्रीय एनजीओ मंच समान रूप से नियम लागू करने का समर्थन करता है और विदेशी राजनीतिकरण का आरोप लगाता है, लेकिन नामित स्कूलों के विरोध प्रदर्शनों से उसका संबंध स्थापित नहीं करता।
- खबरों में स्कूलों में हिजाब पर पूरी तरह पाबंदी, बाहर रखे गए विद्यार्थियों की राष्ट्रीय संख्या या अलग-अलग मामलों के समाधान की समय-सारणी सार्वजनिक रूप से तय नहीं हुई है।






