मेलाका चुनाव से पहले जोहारी ने बीएन से नेगेरी सेम्बिलान के शाही विवाद पर स्पष्टीकरण देने को कहा

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Johari Urges BN to Explain Negeri Sembilan Royal Dispute Before Melaka Polls

चुनावी अभियान की समयसीमा और अनसुलझा शाही विवाद

उमनो के उपाध्यक्ष जोहारी अब्दुल गनी ने बरिसान नेशनल (बीएन) से मेलाका चुनाव के लिए नामांकन से पहले नेगेरी सेम्बिलान के शासक तुआंकू मुहरिज तुआंकू मुनाविर को हटाने की कोशिश पर स्पष्टीकरण देने का आग्रह किया है। गठबंधन के अपने पदाधिकारियों की संवैधानिक विवाद में भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।

विषय-सूची
  1. चुनावी अभियान की समयसीमा और अनसुलझा शाही विवाद
  2. उद्घोषणा से शासक को हटाने की प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं होती
  3. क्षेत्रीय प्रमुखों की विवादित हैसियत
  4. तुआंकू मुहरिज पर प्रमुखों के आरोप
  5. महल से सरकार तक कैसे पहुंचा संकट
  6. इस्माइल का बदलता रुख और बर्खास्त परिषद
  7. अक्टूबर में मामला वापस लेने से क्या सुलझा और क्या नहीं
  8. कामकाजी कार्यकारी परिषद के बिना चुनावी बहुमत
  9. मेलाका में मतदान से पहले बीएन को क्या समझाना होगा
  10. मुख्य बातें

तत्काल राजनीतिक समयसीमा मेलाका चुनाव प्रक्रिया है, जो 31 अक्टूबर से शुरू होनी है और मतदान 14 नवंबर को होगा। कानूनी और प्रशासनिक दांव इससे आगे तक फैले हैं: नेगेरी सेम्बिलान की 10 कार्यकारी परिषद के सदस्य अपने पद गंवा चुके हैं, हटाने की उद्घोषणा को मान्यता देने की मांग वाली न्यायिक समीक्षा 7 अक्टूबर को वापस ले ली गई और उमनो मुख्यमंत्री इस्माइल लासिम के खिलाफ प्रस्ताव लाने पर विचार कर रहा है।

जोहारी, जो संघीय क्षेत्रों में बीएन के अध्यक्ष और तितिवांगसा के सांसद भी हैं, ने कहा कि गठबंधन को उद्घोषणा शुरू करने वालों और उससे जोड़ी जा रही राजनीतिक पार्टी के बीच अंतर स्पष्ट करना चाहिए। कुआलालंपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने उद्घोषणा और शासक को हटाने के लिए जरूरी प्रक्रियाओं, दोनों पर स्पष्टीकरण मांगा।

जनता को बताया जाना चाहिए कि तुआंकू मुहरिज को हटाने की मांग करने वाले लोग उमनो से नहीं हैं। यह बात ठीक से समझाई जानी चाहिए।

यह अंतर इस सवाल का जवाब देता है कि हटाने की कोशिश किसने शुरू की। लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि उमनो के मुख्यमंत्री और उमनो के सात सदस्यों वाली कार्यकारी परिषद ने बाद में इसका समर्थन क्यों किया। अटॉर्नी जनरल के चैंबर्स (एजीसी) ने कहा है कि 19 अप्रैल, 2026 की उद्घोषणा अमान्य थी और राज्य सरकार के समर्थन का कोई कानूनी प्रभाव नहीं था।

इसलिए मेलाका में चुनाव प्रचार से पहले बीएन के सामने दो अलग-अलग काम हैं: संवैधानिक प्रक्रिया समझाना और अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के कदमों का हिसाब देना। चुनाव का कोई भी नतीजा अपने आप यह तय नहीं कर सकता कि नेगेरी सेम्बिलान के सिंहासन पर वैध रूप से किसका अधिकार है।

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उद्घोषणा से शासक को हटाने की प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं होती

मुख्य विवाद नेगेरी सेम्बिलान संविधान 1959 से जुड़ा है, खासकर अनुच्छेद 10 से, जिसमें यांग डि-पर्टुआन बेसार को हटाने की कार्रवाई के आधार और प्रक्रियाएं तय की गई हैं। चार क्षेत्रीय प्रमुख, जिन्हें सामूहिक रूप से उंडांग यांग एम्पत कहा जाता है, शासक के चयन में मान्य भूमिका निभाते हैं और संवैधानिक शर्तों के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई भी कर सकते हैं।

एजीसी के 17 सितंबर के बयान में इस अधिकार से इनकार नहीं किया गया। उसने कहा कि इस अधिकार का इस्तेमाल संविधान के अनुसार होना चाहिए और ऐसा कोई सबूत नहीं है कि निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया हो या अनुच्छेद 10(1) के तहत तुआंकू मुहरिज पर अयोग्य ठहराने वाला कोई आधार लागू होता हो।

प्रक्रियाओं के अनुपालन पर अपना आकलन पेश करते हुए एजीसी ने कहा:

आज तक, ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया है जिससे पता चले कि निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया।

एजीसी ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री और राज्य की कार्यकारी परिषद को शासक का पद एकतरफा समाप्त करने या उसे रिक्त घोषित करने का अधिकार नहीं है। उनकी घोषणा किसी अन्यथा अमान्य उद्घोषणा को कानूनी बल नहीं दे सकती और उसे सरकारी राजपत्र में प्रकाशित करने या लागू करने की कोशिश असंवैधानिक होगी।

जोहारी की अपील के पीछे यही प्रक्रियागत अंतर है। घोषणा जारी करना, उसका राजनीतिक समर्थन करना और उसे सरकारी राजपत्र में प्रकाशित करना अलग-अलग कदम हैं। एजीसी के अनुसार, इनमें से कोई भी शासक को हटाने से जुड़ी संवैधानिक शर्तों के पालन की जगह नहीं ले सकता।

क्षेत्रीय प्रमुखों की विवादित हैसियत

दूसरा सवाल यह है कि क्या उद्घोषणा पर हस्ताक्षर करने वाले सभी लोग उस समय उंडांग के रूप में कार्य करने के पात्र थे। राज्य की सर्वोच्च प्रथागत परिषद, दीवान केआदिलान दान उंडांग (डीकेयू) ने 1 अगस्त को कहा कि 19 अप्रैल की घोषणा के समय चार में से तीन प्रमुख कानूनी रूप से उन पदों पर नहीं थे जिनका वे दावा कर रहे थे।

डीकेयू ने कहा कि मुबारक दोहाक, अब्दुल रहीम यासिन और मारूफ मत राशद या तो पद छोड़ चुके थे या उन्होंने सुंगई उजोंग, रेम्बाउ और जेलेबू में अपने-अपने पद कभी कानूनी रूप से धारण ही नहीं किए थे। चौथे हस्ताक्षरकर्ता मुहम्मद अब्दुल्ला को जोहोल का उंडांग बताया गया।

एजीसी ने भी कहा कि संबंधित समय पर उंडांग यांग एम्पत की संरचना अधूरी थी, क्योंकि कुछ हस्ताक्षरकर्ताओं के पद विवादित थे। उसके बयान में अनुच्छेद 16 का उल्लेख किया गया, जो उंडांग की नियुक्ति और पद से हटाने सहित मलय प्रथागत मामलों को प्रथागत परिषद के अधिकार क्षेत्र में रखता है। एजीसी के अनुसार, अनुच्छेद 16(3) के तहत इन मामलों में परिषद की सलाह अंतिम है और उसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

प्रमुखों ने उनके पदों से जुड़े फैसलों पर आपत्ति जताई है। इसलिए उनकी हैसियत संवैधानिक विवाद का हिस्सा है, महज पदवियों पर छोटा-मोटा मतभेद नहीं। उनके दावा किए गए अधिकार इस बात पर निर्भर करते हैं कि वे कानूनी रूप से पद पर थे या नहीं।

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तुआंकू मुहरिज पर प्रमुखों के आरोप

चार विवादित क्षेत्रीय प्रमुखों और टुंकू बेसार ताम्पिन टुंकू सैयद रज़मान सैयद इद्रिस अल-कादरी ने 12 पन्नों का बयान जारी कर 19 अप्रैल को हटाने के अपने कथित आधार बताए। ये आरोप और विवादित कानूनी दलीलें हैं, तुआंकू मुहरिज के खिलाफ साबित निष्कर्ष नहीं।

उन्होंने शासक पर 4 जुलाई, 2025 को अब्दुल रहीम यासिन की प्रमुख के रूप में नियुक्ति के बाद रेम्बाउ के मामलों में दखल देने का आरोप लगाया। उनका तर्क था कि प्रतिद्वंद्वी गुट की शिकायतों पर विचार की अनुमति देना 1898 के एक समझौते के अनुच्छेद 3 और 4 का उल्लंघन था, जिसे उनके अनुसार राज्य का संविधान अब भी मान्यता देता है।

बयान में यह भी आरोप लगाया गया कि तुआंकू मुहरिज ने शासकों के सम्मेलन की बैठक में शामिल होने से पहले उनसे सलाह नहीं ली और राज्य के मुफ्ती की नियुक्ति में देरी की। उनका कहना था कि 5 मार्च, 2026 को बंद कमरे में हुई बैठक ने अनुच्छेद 10 की जांच संबंधी शर्त पूरी कर दी थी, क्योंकि शासक से सीधे सवाल किए गए और उन्हें जवाब देने का अवसर दिया गया।

प्रमुखों का तर्क था कि संविधान किसी बाहरी न्यायाधिकरण या सार्वजनिक सुनवाई की मांग नहीं करता। उन्होंने 17 अप्रैल को हुई डीकेयू बैठक के विवरण को भी चुनौती दी, जो मुबारक को हटाए जाने से पहले हुई थी। उनका आरोप था कि उन्हें बर्खास्त करने के समर्थन में कोई फैसला नहीं हुआ था।

25 सितंबर को समूह ने प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम और एजीसी से विवाद से दूर रहने का आग्रह किया। अनुच्छेद 7, 10 और 11 का हवाला देते हुए उन्होंने अपने अधिकार को 500 से अधिक वर्षों से चली आ रही प्रथागत विशेषाधिकार बताया। उनका कहना था कि इस्माइल और कार्यकारी परिषद ने शासक को खुद नहीं हटाया, बल्कि उनके फैसले को लागू भर किया। एजीसी का रुख यही है कि प्रथागत अधिकार का इस्तेमाल संवैधानिक प्रक्रियाओं के दायरे में होना चाहिए।

महल से सरकार तक कैसे पहुंचा संकट

विवाद प्रथागत कार्यवाहियों, राजनीतिक समर्थन वापस लेने, चुनाव और कई अदालती कार्रवाइयों के बीच आगे बढ़ा। घटनाक्रम का क्रम बताता है कि अगस्त का मतदान इसे क्यों समाप्त नहीं कर सका:

  • 17 अप्रैल: डीकेयू की बैठक में मुबारक को सुंगई उजोंग के उंडांग पद से हटाने की पुष्टि की गई।
  • 19 अप्रैल: चार कथित उंडांगों ने तुआंकू मुहरिज को हटाने की घोषणा की और उनकी जगह टुंकू नज़रुद्दीन तुआंकू जाफर को नियुक्त किया।
  • 27 अप्रैल: उमनो ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अमिनुद्दीन हारुन से समर्थन वापस ले लिया। सरकार बदलने की कोशिश को तुरंत बहुमत नहीं मिला और बाद में सहयोग फिर बहाल हुआ।
  • 5 जून: राज्य विधानसभा भंग कर दी गई। मेलाका में प्रतिद्वंद्वी शासक की उद्घोषणा हुई, जबकि सेरेम्बन उच्च न्यायालय ने यथास्थिति बनाए रखने के लिए अस्थायी निषेधाज्ञा जारी की।
  • 1 और 2 अगस्त: बीएन और उसके पीएन सहयोगियों ने राज्य चुनाव जीता और तुआंकू मुहरिज के सामने इस्माइल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
  • 17 सितंबर: इस्माइल ने कार्यकारी परिषद के रुख का समर्थन किया और राजपत्र में प्रकाशित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। एजीसी ने उद्घोषणा की कानूनी वैधता खारिज कर दी।
  • 20 और 24 सितंबर: तुआंकू मुहरिज ने कार्यकारी परिषद के 10 सदस्यों की नियुक्तियां रद्द कर दीं और बाद में इन रद्दियों को राजपत्र में प्रकाशित किया गया।
  • 7 अक्टूबर: प्रमुखों ने कुआलालंपुर में अपनी न्यायिक समीक्षा वापस ले ली और उन्हें वही मामला दोबारा दायर करने से रोक दिया गया।

बीच की कई तारीखों को लेकर रिपोर्टों में अंतर है। अमिनुद्दीन के शुरुआती इनकार की तारीख 20 या 21 अप्रैल बताई गई है, बीएन और पकातन हारापन के बीच सहयोग फिर शुरू होने की तारीख 5 या 7 मई और अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की अनुमति 8 या 9 जुलाई बताई गई है। कार्यकारी परिषद की बैठक 15 सितंबर की बताई गई, जबकि उसके सार्वजनिक बयान की तारीख कुछ खबरों में 15 और कुछ में 16 सितंबर है। इस्माइल के समर्थन और एजीसी की प्रतिक्रिया की तारीख लगातार 17 सितंबर बताई गई है।

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इस्माइल का बदलता रुख और बर्खास्त परिषद

राजनीतिक विवाद के केंद्र में इस्माइल का आचरण है। खबरों के अनुसार, उन्होंने पद संभालने के अगले दिन, 3 अगस्त को उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए। सितंबर में हस्ताक्षरित दस्तावेज सार्वजनिक होने पर उन्होंने कहा कि उन्होंने अनिच्छा से और दबाव में ऐसा किया था। उन्होंने उद्घोषणा को अमान्य बताया और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

बाद में उन्होंने कार्यकारी परिषद के इस दावे का समर्थन किया कि तुआंकू मुहरिज को अप्रैल में हटाना वैध था और टुंकू नज़रुद्दीन नए शासक थे। 18 सितंबर को राज्य सचिव ने एजीसी के रुख का हवाला देते हुए उद्घोषणा को राजपत्र में प्रकाशित करने से इनकार कर दिया।

तुआंकू मुहरिज ने 20 सितंबर को सभी 10 कार्यकारी परिषद सदस्यों की नियुक्तियां रद्द कर दीं और इस्माइल पद पर बने रहे। महल ने कहा कि परिषद के सदस्यों ने 7 अगस्त को शासक के सामने ली गई पद और निष्ठा की शपथ का उल्लंघन किया था। बर्खास्त किए गए सदस्यों में सात उमनो से और एक-एक एमसीए, पीएएस और वावासन से थे।

इस्माइल ने बर्खास्तगी पर आपत्ति जताई और तर्क दिया कि शासक उनकी सलाह या अनुरोध के बिना परिषद सदस्यों की नियुक्तियां समाप्त नहीं कर सकते। अटॉर्नी जनरल दुसुकी मोख्तार ने 26 सितंबर को जवाब दिया कि संविधान के तहत मुख्यमंत्री को छोड़कर अन्य कार्यकारी परिषद सदस्य शासक की इच्छा तक पद पर रहते हैं।

टकराव सिविल सेवा तक भी पहुंचा। इस्माइल ने घोषणा की कि कार्यकारी परिषद ने राज्य सचिव और राज्य के कानूनी सलाहकार को निलंबित करने का फैसला किया है, लेकिन एजीसी ने कहा कि परिषद को ऐसा करने का अधिकार नहीं है। बर्खास्त किए गए 10 पूर्व सदस्यों ने अदालत में चुनौती दायर कर घोषणा मांगी है कि उनकी नियुक्तियां रद्द करना अमान्य था।

अक्टूबर में मामला वापस लेने से क्या सुलझा और क्या नहीं

7 अक्टूबर को चार प्रमुखों ने 17 जुलाई को कुआलालंपुर में दायर न्यायिक समीक्षा वापस ले ली। उन्होंने ऐसा आदेश मांगा था जिसमें मुख्यमंत्री को 19 अप्रैल की उनकी घोषणा पर सात दिनों के भीतर हस्ताक्षर करने को कहा जाए और यह घोषित किया जाए कि दस्तावेज राज्य के संविधान के तहत वैध है।

उच्च न्यायालय की न्यायाधीश नोरलिज़ा उस्मान ने वही मामला दोबारा दायर करने की अनुमति दिए बिना याचिका वापस लेने की मंजूरी दी और 40,000 रिंगिट का खर्च भरने का आदेश दिया। यह राशि चार प्रस्तावित हस्तक्षेपकर्ताओं में बांटी गई, यानी प्रत्येक को 10,000 रिंगिट। इनमें डीकेयू, उसके सचिव और मान्यता प्राप्त सुंगई उजोंग तथा रेम्बाउ के उंडांग शामिल थे।

डीकेयू और उसके सचिव का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील स्टीवन थिरू ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने सेरेम्बन में चल रही कार्यवाही, 5 जून की निषेधाज्ञा या अवमानना की कार्यवाही की अनुमति देने वाले 9 जुलाई के आदेश का खुलासा नहीं किया था। उन्होंने दूसरी अदालत में याचिका दायर करने को फोरम शॉपिंग बताया, यानी किसी अन्य अदालत में अधिक अनुकूल नतीजे की कोशिश। यह उनका आकलन था, पूरे शाही विवाद पर अंतिम फैसला नहीं।

याचिका वापस लेने से मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर और घोषणा की न्यायिक मान्यता हासिल करने का वह खास रास्ता बंद हो गया। इससे यह साबित नहीं होता कि संबंधित सभी मुकदमे खत्म हो गए हैं या सभी विवादित संवैधानिक सवालों का फैसला हो चुका है।

अलग से, पुलिस ने पूर्व परिषद सदस्यों के आचरण की जांच शुरू की है। डीकेयू ने टुंकू नज़रुद्दीन और विवादित प्रमुखों पर राजद्रोह का आरोप भी लगाया है और जांच तथा आरोप तय करने की मांग की है। ये आरोप और मांगें हैं, दोषसिद्धि नहीं और न ही इस बात की पुष्टि कि आरोपपत्र दायर किए गए हैं।

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कामकाजी कार्यकारी परिषद के बिना चुनावी बहुमत

अगस्त के चुनाव में 36 सदस्यीय विधानसभा में बीएन को 18, पकातन हारापन को 11 और पेरिकतन नेशनल को सात सीटें मिलीं। बीएन और पीएन के पास कुल 25 सीटें थीं, जो दो-तिहाई बहुमत के लिए जरूरी 24 से एक अधिक थीं। बीएन के पास अकेले विधानसभा की ठीक आधी सीटें थीं, जो साधारण बहुमत के लिए जरूरी 19 से कम थीं।

विधानसभा भंग होने से पहले पकातन हारापन के पास 17, बीएन के पास 14 और पीएन के पास पांच सीटें थीं। इस तरह बीएन ने चार सीटें बढ़ाईं, जबकि पीएन के साथ उसके गठबंधन ने सरकार का संतुलन बदल दिया। चुनाव में मजबूत स्थिति से शासक की हैसियत तय करने का अधिकार नहीं मिला।

वकील जीके गणेशन ने तर्क दिया कि चुनाव से सिंहासन का अधिकार तय नहीं हो सकता। संवैधानिक विशेषज्ञ इकमाल हिशाम एमडी ताह ने इससे जुड़ा सवाल उठाया कि अगले मुख्यमंत्री की नियुक्ति कौन-सा दावेदार करेगा। व्यवहार में इस्माइल ने तुआंकू मुहरिज के सामने शपथ ली, जिन्हें संघीय सरकार मान्यता देती रही।

कार्यकारी परिषद का न होना अब प्रशासनिक चिंता बन गया है। 11 अक्टूबर को डीएपी के महासचिव एंथनी लोक ने बिना देरी नए सदस्यों की नियुक्ति की मांग की और कहा कि अहम फैसलों तथा प्रशासनिक मामलों के लिए कार्यकारी परिषद की बैठकों में मंजूरी जरूरी है।

खबरों के अनुसार, उमनो नेगेरी सेम्बिलान इस्माइल के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने पर विचार कर रहा है। इसे राज्य पार्टी प्रमुख और पर्टांग विधानसभा सदस्य जलालुद्दीन अलियास केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी के अधीन पेश कर सकते हैं। अध्यक्ष अवालुद्दीन सईद ने कहा कि उन्हें कोई औपचारिक सूचना नहीं मिली है और वे मुख्यमंत्री को हटाने के लिए आपात प्रस्ताव की अनुमति नहीं देंगे।

विधानसभा की बैठक 26 नवंबर को होनी है। इसे 16 अक्टूबर से इसलिए आगे बढ़ाया गया था ताकि अगले दिन पेश किए जाने वाले 2027 के राज्य बजट के साथ इसका तालमेल हो सके। खबरों में न तो नेतृत्व परिवर्तन की पुष्टि हुई है और न ही नई परिषद की नियुक्ति की।

मेलाका में मतदान से पहले बीएन को क्या समझाना होगा

जोहारी की मांग महीनों से चल रहे परस्पर विरोधी राजनीतिक संदेशों के बाद आई है। नेगेरी सेम्बिलान चुनाव से पहले लोक ने कहा था कि शाही विवाद को संस्था के भीतर उसकी परंपराओं और कानूनों के अनुसार सुलझाया जाना चाहिए। पकातन हारापन के चुनाव निदेशक अमिरुद्दीन शारी ने भी चुनाव प्रक्रिया को राजशाही विवाद से अलग रखने की मांग की थी।

यूनिवर्सिटी मलाया के विश्लेषक अवांग अज़मान अवांग पावी ने चेतावनी दी थी कि पार्टियां समर्थन मजबूत करने या सीटें हासिल करने के लिए शाही विवाद का इस्तेमाल कर सकती हैं। इसके बाद हुई बर्खास्तगियों और बदलते रुख ने इस विवाद को नेगेरी सेम्बिलान से बाहर भी राजनीतिक मुद्दा बनाए रखा है।

27 सितंबर को बीएन अध्यक्ष अहमद जाहिद हमीदी ने इस्माइल को संकट का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने के लिए तुआंकू मुहरिज और चार उंडांगों से मुलाकात करने का निर्देश दिया। यह निर्देश दिखाता है कि गठबंधन नेतृत्व बातचीत से समाधान चाहता है, लेकिन किसी अंतिम समझौते की खबर नहीं है।

मेलाका के लिए जोहारी ने कहा कि जाहिद मुख्यमंत्री अब रऊफ युसोह की सहायता से बीएन के उम्मीदवारों को अंतिम रूप देंगे। इस तरह उम्मीदवारों का चयन और संवैधानिक स्पष्टीकरण, दोनों एक ही गठबंधन नेतृत्व के तहत आगे बढ़ेंगे।

अनसुलझे मुद्दे स्पष्ट हैं: पूर्व परिषद सदस्यों की चुनौती का नतीजा, सेरेम्बन की बाकी कार्यवाहियों की स्थिति, पुलिस जांच, नई कार्यकारी परिषद की नियुक्ति और इस्माइल के खिलाफ औपचारिक प्रस्ताव पेश होगा या नहीं। प्रमुखों और उमनो के बीच जोहारी का अंतर स्पष्ट करना इस स्पष्टीकरण का हिस्सा है, लेकिन मतदाताओं को यह भी बताना होगा कि बीएन के पदाधिकारियों ने ऐसी उद्घोषणा का समर्थन क्यों किया जिसे एजीसी ने खारिज कर दिया।

मुख्य बातें

  • जोहारी चाहते हैं कि मेलाका में नामांकन से पहले बीएन नेगेरी सेम्बिलान विवाद पर स्पष्टीकरण दे। चुनाव प्रक्रिया 31 अक्टूबर से शुरू होगी और मतदान 14 नवंबर को है।
  • एजीसी का कहना है कि 19 अप्रैल की उद्घोषणा अनुच्छेद 10 की शर्तों पर खरी नहीं उतरी और मुख्यमंत्री तथा कार्यकारी परिषद को उसे कानूनी प्रभाव देने का अधिकार नहीं था।
  • प्रमुख इस आकलन को चुनौती देते हैं और दावा करते हैं कि उनके प्रथागत तथा संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल उचित रूप से किया गया।
  • तुआंकू मुहरिज ने कार्यकारी परिषद के 10 सदस्यों की नियुक्तियां रद्द कर दीं। इस्माइल मुख्यमंत्री पद पर हैं और पूर्व सदस्य अपनी बर्खास्तगी को अदालत में चुनौती दे रहे हैं।
  • प्रमुखों ने 7 अक्टूबर को कुआलालंपुर की न्यायिक समीक्षा वापस ले ली। उन्हें 40,000 रिंगिट खर्च देने का आदेश हुआ और वही मामला फिर दायर करने की अनुमति नहीं मिली।
  • इस्माइल के खिलाफ संभावित प्रस्ताव की पुष्टि नहीं हुई है। विधानसभा की बैठक 26 नवंबर को होनी है, जो 2027 के बजट पेश होने से पहले होगी।
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