चार वारंटों से तालिबान नेताओं के खिलाफ व्यापक मामला सामने आया
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने 5 अक्टूबर 2026 को तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा, मुख्य न्यायाधीश अब्दुल हकीम हक्कानी और अफगानिस्तान के शिक्षा तथा उच्च शिक्षा मंत्रालयों के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ चार गिरफ्तारी वारंट सार्वजनिक किए। न्यायाधीशों ने पाया कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि चारों पर लैंगिक और राजनीतिक आधार पर उत्पीड़न की आपराधिक जिम्मेदारी है। रोम संविधि के अनुच्छेद 7(1)(h) के तहत यह मानवता के खिलाफ अपराध है।
विषय-सूची
- चार वारंटों से तालिबान नेताओं के खिलाफ व्यापक मामला सामने आया
- आरोपियों पर आरोप क्या हैं और शिक्षा क्यों अहम है
- जांच से सार्वजनिक वारंट तक
- इस मामले में उत्पीड़न का अर्थ
- शारीरिक हिंसा से परे नुकसान
- लैंगिक पहचान वाले लोगों और समर्थकों को भी संरक्षण
- वारंट सार्वजनिक होने का मतलब तुरंत गिरफ्तारी नहीं
- तालिबान का खारिज करना और अंतरराष्ट्रीय दबाव
- जांच इन चार संदिग्धों से आगे भी जारी
- मुख्य बिंदु
इस फैसले से ऐसे मामले का दायरा सामने आता है जो शिक्षा पर पाबंदियों तक सीमित नहीं है। इसमें तालिबान की नीतियों के जरिए अधिकारों से गंभीर वंचना, उन नीतियों से जुड़ी कथित हिंसा और महिलाओं व लड़कियों का समर्थक माने जाने वाले या लैंगिक भूमिकाओं को लेकर तालिबान की अपेक्षाओं से असहमत लोगों को निशाना बनाना शामिल है।
ICC के प्री-ट्रायल चैंबर II ने कहा कि कथित अपराध 15 अगस्त 2021 को तालिबान के सत्ता पर कब्जा करने के बाद शुरू हुए और कम से कम 20 जनवरी 2025 तक जारी रहे। यह अंतिम तारीख निष्कर्षों में शामिल न्यूनतम अवधि तय करती है, न कि यह घोषणा कि उत्पीड़न तब रुक गया था।
अदालत की अक्टूबर में वारंट सार्वजनिक करने की घोषणा में दो समूहों के वारंटों का उल्लेख है, जो 8 जुलाई और 9 सितंबर 2025 को जारी हुए थे। अखुंदज़ादा और हक्कानी के खिलाफ जुलाई के वारंटों का अस्तित्व पहले से सार्वजनिक था। ताजा फैसले में कार्यवाहक शिक्षा मंत्री हबीबुल्लाह आगा और कार्यवाहक उच्च शिक्षा मंत्री नेदा मोहम्मद नदीम के खिलाफ वारंट भी सार्वजनिक किए गए।
इस मामले में चारों में से किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया है। गिरफ्तारी वारंट का अर्थ है कि न्यायाधीशों ने यह मानने के लिए उचित आधार पाया है कि किसी संदिग्ध पर कथित अपराध की जिम्मेदारी है। यह दोष का अंतिम निर्धारण नहीं है। वारंट सार्वजनिक किए जाने के समय चारों के खुले घूमने की खबर थी।
आरोपियों पर आरोप क्या हैं और शिक्षा क्यों अहम है
अखुंदज़ादा और हक्कानी तालिबान के सर्वोच्च नेतृत्व और न्यायिक प्राधिकार का प्रतिनिधित्व करते हैं। अदालत ने कहा कि कम से कम 15 अगस्त 2021 से दोनों ने अफगानिस्तान में वास्तविक अधिकार का इस्तेमाल किया। उनके वारंटों में उत्पीड़न का आदेश देने, उकसाने या इसके लिए कहने के जरिए जिम्मेदारी का आरोप है। इसके लिए यह आरोप लगाना जरूरी नहीं कि उन्होंने हर दमनकारी कृत्य खुद किया हो।
आगा और नदीम के पास शिक्षा विभागों की जिम्मेदारी है। उन्हें शामिल करने से स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा के जिम्मेदार अधिकारी, सर्वोच्च नेता और मुख्य न्यायाधीश के साथ एक ही आपराधिक मामले में आते हैं। अभियोजक कार्यालय ने उनके वारंट के लिए 6 मार्च 2025 को आवेदन किया था और न्यायाधीशों ने उसी वर्ष 9 सितंबर को उन्हें जारी किया।
शिक्षा पर पाबंदियां आम आबादी पर लागू नियमों और खास तौर पर महिलाओं व लड़कियों को निशाना बनाने वाले नियमों के बीच सबसे स्पष्ट अंतर दिखाती हैं। तालिबान के नियम लड़कियों को छठी कक्षा से आगे की पढ़ाई और महिलाओं को विश्वविद्यालय में पढ़ने से रोकते हैं। UN Women ने अफगानिस्तान को ऐसा इकलौता देश बताया है जहां लड़कियों के माध्यमिक शिक्षा और महिलाओं के विश्वविद्यालयी शिक्षा पाने पर प्रतिबंध है।
वारंटों का स्वागत करते हुए जारी बयान में ICC के अभियोजक कार्यालय ने इन अतिरिक्त मामलों को सीधे शिक्षा के अधिकार से जोड़ा। उप अभियोजक नज़हत शमीम खान ने कहा:
अफगानिस्तान की स्थिति में दो अतिरिक्त गिरफ्तारी वारंट जारी होना अफगान महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों, खास तौर पर उनके शिक्षा के अधिकार, की एक और पुष्टि है। शिक्षा एक बुनियादी मानवाधिकार है, जिसका लाभ सभी को मिलना चाहिए। अफगान महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं से गंभीर वंचना के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए।
जांच से सार्वजनिक वारंट तक
अक्टूबर का फैसला अफगानिस्तान से जुड़े वर्षों के न्यायिक प्रक्रियाक्रम के बाद आया है। इसके बाद तालिबान के चार अधिकारियों के खिलाफ अलग-अलग आवेदन किए गए। वारंट के लिए आवेदन करने, उसे जारी करने और सार्वजनिक करने के बीच का अंतर बताता है कि दस्तावेज सार्वजनिक होने से काफी पहले कुछ नाम क्यों सामने आ चुके थे।
- मार्च 2020: ICC के न्यायाधीशों ने अफगानिस्तान की स्थिति की जांच को मंजूरी दी।
- अक्टूबर 2022: अफगानिस्तान की पूर्व सरकार की ओर से कार्यवाही टालने के अनुरोध से जुड़े विराम के बाद न्यायाधीशों ने जांच फिर शुरू करने की मंजूरी दी।
- 28 नवंबर 2024: ICC के छह सदस्य देशों ने अफगानिस्तान की स्थिति अभियोजक के पास भेजी।
- 23 जनवरी 2025: अभियोजक ने अखुंदज़ादा और हक्कानी के खिलाफ वारंट के लिए आवेदन किया।
- 6 मार्च 2025: अभियोजक ने आगा और नदीम के खिलाफ वारंट के लिए आवेदन किया।
- 8 जुलाई 2025: न्यायाधीशों ने पहले दो वारंट जारी किए और उन्हें गोपनीय रखते हुए उनके अस्तित्व की जानकारी दी।
- 9 सितंबर 2025: न्यायाधीशों ने आगा और नदीम के खिलाफ वारंट जारी किए।
- 5 अक्टूबर 2026: चैंबर ने संवेदनशील जानकारी हटाकर चारों वारंट सार्वजनिक किए।
ICC की जुलाई की वारंट घोषणा में दस्तावेज गोपनीय रखने के शुरुआती फैसले की वजह बताई गई है: पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा तथा न्यायिक कार्यवाही की रक्षा। वहीं, न्यायाधीशों ने माना कि वारंटों की सार्वजनिक जानकारी से आगे के अपराधों को रोकने में मदद मिल सकती है।
इस मामले में उत्पीड़न का अर्थ
कानूनी आरोप रोम संविधि के अनुच्छेद 7(1)(h) के तहत मानवता के खिलाफ अपराध के रूप में उत्पीड़न का है। रोम संविधि ICC की स्थापना करने वाली संधि है। सरल शब्दों में, मामला इस बात से जुड़ा है कि लोगों को किसी निशाना बनाए गए समूह का सदस्य होने या सदस्य समझे जाने के कारण उनके बुनियादी अधिकारों से गंभीर रूप से वंचित किया गया। चैंबर ने लैंगिक और राजनीतिक, दोनों आधारों की पहचान की।
न्यायाधीशों ने पाया कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि संदिग्धों ने तालिबान की ओर से काम करते हुए ऐसी सरकारी नीति लागू की जिससे आम नागरिकों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ। उन्होंने इस नीति को हत्या, कैद, यातना, बलात्कार और जबरन गुमशुदगी के कृत्यों से जोड़ा। जबरन गुमशुदगी में लोगों को उनकी स्वतंत्रता से वंचित किया जाता है और उनकी हिरासत या ठिकाने को छिपाया जाता है।
घोषणाओं में बताए गए मुख्य कथित अपराध का नाम उत्पीड़न है। अन्य कृत्यों के संदर्भ उनसे जुड़ी हिंसा और दुर्व्यवहार को समझाते हैं; इन्हें हर सूचीबद्ध कृत्य के लिए प्रत्येक संदिग्ध को दोषी ठहराए जाने का अंतिम फैसला नहीं समझना चाहिए।
चैंबर ने सभी अफगानों को प्रभावित करने वाली पाबंदियों और लैंगिक आधार पर महिलाओं तथा लड़कियों को खास तौर पर निशाना बनाने के बीच भी अंतर किया। उसने कहा कि फरमानों और आदेशों ने उन्हें शिक्षा, निजता और पारिवारिक जीवन के साथ-साथ आने-जाने, अभिव्यक्ति, विचार, अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता से गंभीर रूप से वंचित किया।
शारीरिक हिंसा से परे नुकसान
न्यायाधीशों के तर्क का एक अहम हिस्सा यह है कि लैंगिक उत्पीड़न केवल सीधे शारीरिक या यौन हिंसा के रूप में नहीं होता। जब संस्थाएं और भेदभावपूर्ण सामाजिक नियम किसी निशाना बनाए गए समूह से बुनियादी अधिकार छीनते हैं, तो वे खुद भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इस तर्क से शिक्षा पर पाबंदियां रोजगार, सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच और रोजमर्रा की जिंदगी में भागीदारी पर लगी रोक से जुड़ती हैं। इससे मामले में तालिबान की नीतियों के असर की जांच हो सकती है, बजाय इसके कि हर पाबंदी को बाकी से असंबद्ध एक अलग घटना माना जाए।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपने जनवरी 2025 के आकलन में महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों को सीमित करने वाले तालिबान के 100 से अधिक लिखित या घोषित फरमानों का जिक्र किया। संगठन ने आवाजाही, अभिव्यक्ति और संगठन बनाने पर पाबंदियों, कई तरह के काम पर रोक, शिक्षा पर प्रतिबंध और मनमानी हिरासत का उल्लेख किया।
अन्य रिपोर्टों में घरेलू हिंसा को जायज ठहराने, विवाह की न्यूनतम आयु का कानून खत्म करने और महिलाओं की तलाक लेने की क्षमता पर पाबंदी के आरोप हैं। ये आरोप तालिबान शासन के व्यापक विवरण का हिस्सा हैं, लेकिन ICC की घोषणाएं यह स्थापित नहीं करतीं कि इनमें से हर आरोप इन चार वारंटों में अलग आरोप है।
लैंगिक पहचान वाले लोगों और समर्थकों को भी संरक्षण
चैंबर ने रोम संविधि में लैंगिकता की व्याख्या केवल जैविक लिंग तक सीमित न रखते हुए व्यापक रूप में की। उसने कहा कि लैंगिक उत्पीड़न के आकलन में सामाजिक भूमिकाओं, व्यवहारों, अपेक्षाओं और उन पदानुक्रमों को मान्यता देनी चाहिए जो परंपरागत रूप से लोगों के लिंग के आधार पर उनसे जोड़े जाते हैं।
यह व्याख्या इसलिए अहम है क्योंकि कथित निशानेबाजी में वे लोग भी शामिल हैं जिनकी यौनिकता, लैंगिक पहचान या अभिव्यक्ति को तालिबान अपनी नीतियों के खिलाफ मानता है। अभियोजक कार्यालय ने LGBTQI+ समुदाय के सदस्यों का स्पष्ट रूप से उन लोगों में उल्लेख किया जिनके अधिकारों और अनुभवों को वारंट मान्यता देते हैं।
एक अलग पहलू राजनीतिक आधार पर उत्पीड़न का है। न्यायाधीशों ने कहा कि तालिबान की लैंगिक नीतियों का विरोधी माने जाने वाले लोगों को निशाना बनाया गया, भले ही उनका विरोध निष्क्रिय हो या कुछ न करने के रूप में सामने आया हो। चैंबर के अनुसार, महिलाओं और लड़कियों का सहयोगी समझे जाने वाले लोगों को तालिबान राजनीतिक विरोधी मानता था।
इस तरह इन दो पहलुओं में निशाना बनाए जाने के अलग-अलग कारण शामिल हैं। एक का संबंध लैंगिकता और तालिबान की लैंगिक अपेक्षाओं के अनुरूप होने से है। दूसरा उन नीतियों के कथित विरोध से जुड़ा है। निष्कर्ष में राजनीतिक उत्पीड़न के आरोप को केवल उन लोगों तक सीमित नहीं किया गया है जो किसी संगठित विपक्षी आंदोलन में शामिल हुए या जिन्होंने सार्वजनिक रूप से विरोध किया।
वारंट सार्वजनिक होने का मतलब तुरंत गिरफ्तारी नहीं
वारंटों को गोपनीयता से हटाने के बाद आरोप और न्यायिक निष्कर्ष लोगों के लिए उपलब्ध हो जाते हैं, लेकिन इससे संदिग्ध हिरासत में नहीं आ जाते। वारंटों के सार्वजनिक संस्करणों में कुछ जानकारी हटाई गई है और उन्हें जारी करने से जुड़े कुछ दस्तावेज अब भी गोपनीय हैं।
अदालत ने प्रकाशन के कारणों में पीड़ितों और जनता को जानकारी देना, आगे के अपराध रोकना और वारंट लागू करने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना शामिल किया है। फैसले में अदालत की प्रशासनिक शाखा रजिस्ट्री को जरूरत पड़ने पर गिरफ्तारी और प्रत्यर्पण में सहायता के अनुरोध तैयार कर संबंधित अधिकारियों को भेजने का निर्देश भी दिया गया।
वारंट लागू होना देशों और अन्य संबंधित संस्थाओं के सहयोग पर निर्भर करता है। ICC के सदस्य देशों पर अदालत के साथ सहयोग करने की संधि संबंधी जिम्मेदारी है, जिसमें गिरफ्तारी और प्रत्यर्पण के अनुरोधों को लागू करना भी शामिल है। अफगानिस्तान खुद ICC का सदस्य है, हालांकि तालिबान इस संस्था को नहीं मानता।
इसलिए वारंट गिरफ्तारी की कानूनी मांग पेश करते हैं, यह अनुमान नहीं कि गिरफ्तारी कब होगी। सार्वजनिक घोषणाओं में इन चार संदिग्धों की गिरफ्तारी की तारीख, प्रत्यर्पण की व्यवस्था या मुकदमे की तय तारीख नहीं दी गई है। प्रकाशन से वारंट लागू करने में मदद मिल सकती है, लेकिन निर्णायक व्यावहारिक कदम संदिग्धों को अदालत के सामने पेश करना ही है।
तालिबान का खारिज करना और अंतरराष्ट्रीय दबाव
तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने वारंटों को खारिज करते हुए कहा कि उनका आंदोलन ICC को मान्यता नहीं देता और उसके रुख को कोई महत्व नहीं देता। उन्होंने कहा कि तालिबान नेताओं ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार या दंडित किया जाए और वे इस्लामी शरिया के फैसलों तथा अदालतों के प्रति जवाबदेह हैं।
यह जवाब अदालत के अधिकार और आरोपों के तथ्य, दोनों को चुनौती देता है। इससे न्यायाधीशों का फैसला नहीं बदलता और न ही वारंट वापस होते हैं। अफगानिस्तान के दूतावास के नाम से जारी एक बयान में कहा गया कि तालिबान की घोषणाओं से ICC के प्रति देश की जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं।
अलग से, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने महिलाओं और लड़कियों पर बढ़ते दमन की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और तालिबान से भेदभावपूर्ण नीतियां वापस लेने का आह्वान किया। यह प्रतिक्रिया व्यापक मानवाधिकार स्थिति से जुड़ी है, जबकि ICC की कार्यवाही में नामित लोगों की कथित आपराधिक जिम्मेदारी पर विचार हो रहा है।
अपेक्षाओं के लिहाज से यह अंतर अहम है। पाबंदियां हटाने की मांग नीति में बदलाव चाहती है। गिरफ्तारी वारंट किसी संदिग्ध को हिरासत में लेकर आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ाने का प्रयास करता है। इनमें से किसी भी घोषणा से यह साबित नहीं होता कि तालिबान ने शिक्षा पर पाबंदियां या अदालत द्वारा बताई गई अन्य रोक हटा दी हैं।
जांच इन चार संदिग्धों से आगे भी जारी
अभियोजक कार्यालय का कहना है कि वह अफगानिस्तान में कथित लैंगिक उत्पीड़न और राजनीतिक, जातीय तथा धार्मिक आधार पर उत्पीड़न की जांच जारी रखे हुए है। चार वारंटों का मतलब यह नहीं कि जांच पूरी हो गई है। आगे के आवेदनों की कोई तारीख घोषित नहीं की गई है।
अधिकार संगठनों ने जवाबदेही का दायरा बढ़ाने की मांग भी की है। आवेदनों पर अपनी प्रतिक्रिया में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मई 2003 से गंभीर उल्लंघनों की जांच करने का आग्रह किया। इनमें इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत की ओर से हज़ाराओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले भी शामिल हैं।
एमनेस्टी ने अभियोजक से 2021 के उस फैसले पर फिर विचार करने को भी कहा जिसमें अमेरिकी सैन्यकर्मियों और CIA कर्मियों, अन्य विदेशी बलों तथा अफगानिस्तान की पूर्व सरकार के सुरक्षा तंत्र के कथित युद्ध अपराधों की जांच को कम प्राथमिकता दी गई थी। ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी तालिबान और इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत के साथ इन पक्षों के दुर्व्यवहारों की जांच की मांग की।
ये मांगें अफगानिस्तान की जांच के दायरे से जुड़ी हैं, चार तालिबान संदिग्धों के बचाव से नहीं। दोनों संगठनों का कहना है कि जवाबदेही अन्य कथित अपराधियों और उन पीड़ितों तक भी पहुंचनी चाहिए जिनके मामले इन वारंटों में शामिल नहीं हैं।
एमनेस्टी की महासचिव एग्नेस कैलामार ने लैंगिक रंगभेद को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपराध मान्यता देने की मांग भी की। यह एक अलग कानूनी प्रस्ताव है। मौजूदा वारंटों में बताया गया अपराध रोम संविधि के तहत उत्पीड़न है, लैंगिक रंगभेद का अलग आरोप नहीं।
फिलहाल स्थिति स्पष्ट है: चार सार्वजनिक वारंट, अगस्त 2021 से शुरू होने वाली एक तय अवधि के आरोप और जारी जांच। संदिग्धों की गिरफ्तारी होगी या नहीं, आगे और वारंट जारी होंगे या नहीं, और अन्य कथित अपराधों की जांच कितने व्यापक स्तर पर होगी, ये सवाल अभी अनसुलझे हैं। अदालत ने इन चार मामलों में अगली सुनवाई या किसी समय-सीमा की घोषणा नहीं की है।
मुख्य बिंदु
- ICC ने 5 अक्टूबर 2026 को तालिबान के चार गिरफ्तारी वारंट गोपनीयता से हटाकर सार्वजनिक किए।
- संदिग्ध हैं: हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा, अब्दुल हकीम हक्कानी, हबीबुल्लाह आगा और नेदा मोहम्मद नदीम।
- वारंटों में मानवता के खिलाफ अपराध के रूप में लैंगिक और राजनीतिक आधार पर उत्पीड़न के आरोप हैं।
- कथित अपराध 15 अगस्त 2021 से कम से कम 20 जनवरी 2025 तक की अवधि के हैं।
- मामले में महिलाएं, लड़कियां, लैंगिक पहचान या अभिव्यक्ति के कारण निशाना बनाए गए लोग और महिलाओं व लड़कियों के कथित समर्थक शामिल हैं।
- वारंट दोषसिद्धि नहीं हैं और खबरों के अनुसार चारों संदिग्ध अब भी खुले घूम रहे थे।
- वारंट लागू करना सहयोग पर निर्भर है, जबकि उत्पीड़न के अन्य आरोपों की जांच जारी है।






