कुत्तों के फल से सबकी पसंद तक: भारत में एवोकाडो का बाजार कैसे जड़ें जमा रहा है

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कुत्तों के फल से सबकी पसंद तक: भारत में एवोकाडो का बाजार कैसे जड़ें जमा रहा है

भारत में एवोकाडो का उछाल: नई चीज़ से गंभीर कारोबार तक

पंद्रह साल पहले भारत के कुछ हिस्सों में पके एवोकाडो का व्यावसायिक मूल्य बहुत कम था। फल पेड़ों से गिर जाते थे और अक्सर कुत्ते उन्हें खा लेते थे, इसलिए इस फसल को स्थानीय तौर पर एक नापसंद नाम मिला: कुत्तों का फल। आज एवोकाडो रेस्तरां के व्यंजनों, सुपरमार्केट की अलमारियों, त्वचा की देखभाल से जुड़ी चर्चाओं और देश भर में नए व्यावसायिक बागानों में दिखाई दे रहा है।

विषय-सूची
  1. भारत में एवोकाडो का उछाल: नई चीज़ से गंभीर कारोबार तक
  2. छाया देने वाला पेड़ कैसे मूल्यवान फसल बना
  3. आपूर्ति मांग से पीछे क्यों है
  4. व्यावसायिक बागानों के लिए विशेषज्ञ कौशल जरूरी
  5. क्या भारतीय किस्में हस को टक्कर दे सकती हैं?
  6. एशिया के बदलते बाजार का भारत के लिए क्या मतलब है
  7. किसानों को बेहतर पेड़ों के साथ खरीदार भी चाहिए
  8. अर्थव्यवस्था और पर्यावरण से जुड़े सवाल
  9. मुख्य बातें

यह बदलाव मांग और घरेलू आपूर्ति के बीच बढ़ते अंतर को दर्शाता है। भारत हर साल करीब 15,000 टन एवोकाडो आयात करता है, जबकि स्थानीय उत्पादन केवल 8,000 से 9,000 टन होने का अनुमान है। इस कमी ने बागान कंपनियों, विशेषज्ञ पौधशालाओं और छोटे किसानों को इस फल को छाया के लिए अनौपचारिक रूप से लगाए जाने वाले पेड़ के बजाय गंभीर कारोबार के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया है।

भारत के बढ़ते मध्यम वर्ग, विस्तारित खाद्य-वितरण क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों में बढ़ती रुचि ने एवोकाडो को उपभोक्ताओं के बीच अधिक परिचित बनाया है। अब इस फल का इस्तेमाल सलाद, सैंडविच, टोस्ट, स्मूदी, मिठाइयों और आधुनिक भारतीय खाना पकाने में किया जा रहा है। स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में इसकी छवि ने भी शहरी खरीदारों के बीच मांग को बढ़ावा दिया है।

बाजार अभी विकसित हो रहा है। आयात पर निर्भरता घटाने से पहले किसानों को फल की गुणवत्ता, रोपण सामग्री, बागान प्रबंधन और खरीदारों तक पहुंच बेहतर करनी होगी। केरल की दक्षिणी पहाड़ियों में यह बदलाव पहले ही दिख रहा है, जहां कॉफी और काली मिर्च जैसी पारंपरिक फसलों के साथ, और कभी-कभी उनकी जगह, एवोकाडो लगाया जा रहा है।

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छाया देने वाला पेड़ कैसे मूल्यवान फसल बना

केरल के वायनाड में कॉटनाड प्लांटेशंस के समूह प्रबंधक मधु बोपैया ने भारत के बागान उद्योग में 26 साल काम किया है। उन्हें याद है कि एवोकाडो को कभी आय का मुख्य स्रोत नहीं माना जाता था। कॉटनाड ने मूल रूप से कॉफी के पौधों को छाया देने के लिए पेड़ लगाए थे और उसे बहुत कम उम्मीद थी कि फल खुद मुनाफे का जरिया बनेगा।

यह सोच 2011 के आसपास बदलने लगी, जब बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने एवोकाडो के त्वचा की देखभाल में इस्तेमाल के बारे में सार्वजनिक रूप से बात की। बोपैया के मुताबिक, कीमतें लगभग रातोंरात दोगुनी हो गईं और फल के बारे में उपभोक्ताओं की जानकारी बढ़ने के साथ लगातार चढ़ती रहीं।

कॉटनाड अब करीब 40 एकड़ में एवोकाडो उगाता है। बागान ने पिछले साल 10 से 15 टन फल काटा और उसे उम्मीद है कि तीन या चार साल में उत्पादन 40 से 50 टन तक पहुंच जाएगा। दक्षिण अफ्रीका में व्यावसायिक उत्पादन का अध्ययन करने के बाद कंपनी को अपनी विधियों में बदलाव करना पड़ा।

एवोकाडो की जड़ें बीमारी के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं, खासकर गीली परिस्थितियों में। जल निकासी बेहतर करने और जड़ों को नुकसान का खतरा घटाने के लिए कॉटनाड अब ऊंची क्यारियों, पौधों के बीच अधिक दूरी और अलग-अलग रोपण व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करता है। ये बदलाव दिखाते हैं कि व्यावसायिक उत्पादन, अन्य फसलों के बीच एवोकाडो का पेड़ लगा देने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है।

हमने एवोकाडो को कभी अपनी मुख्य फसल के रूप में नहीं लगाया। कॉफी के बागानों में छाया देने के लिए इसे लगाया था और बाद में समझ आया कि यह मुनाफे का कारोबार बन सकता है।

बोपैया का अनुभव एक व्यापक रुझान को दर्शाता है। कई उत्पादक क्षेत्रों में जलवायु के दबाव ने कॉफी और काली मिर्च के उत्पादन को प्रभावित किया है, जिससे फसलों में विविधता लाना अधिक आकर्षक हो गया है। एवोकाडो आय का एक और स्रोत बन सकता है, हालांकि इसके लिए तकनीकी जानकारी और भरोसेमंद खरीदारों की जरूरत है।

आपूर्ति मांग से पीछे क्यों है

भारत के एवोकाडो उद्योग को बढ़ावा देने में मदद करने वाले मनिलाल पल्लियथ घरेलू बाजार में आपूर्ति और मांग के बीच बड़ा अंतर बताते हैं। आयातित फल इस कमी का बड़ा हिस्सा पूरा करता है, खासकर उन खुदरा विक्रेताओं, होटलों और रेस्तरां के लिए जिन्हें पूरे साल भरोसेमंद गुणवत्ता चाहिए।

भारत में उगाए गए एवोकाडो कई क्षेत्रों से आते हैं और इनमें कई तरह के ऐसे स्थानीय प्रकार शामिल हैं जिनके नाम तय नहीं हैं। उनका आकार, बनावट, स्वाद और पकने का ढंग एक खेत से दूसरे खेत तक अलग हो सकता है। मौसम के बदलाव भी उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे पेशेवर रसोईघरों के लिए स्थानीय फल के आधार पर मेनू की योजना बनाना मुश्किल होता है।

मुंबई में हंगर इंक. हॉस्पिटैलिटी के कार्यकारी शेफ हुसैन शहजाद कहते हैं कि फिलहाल आयातित एवोकाडो उनके समूह के रेस्तरां, जिनमें वेरोनिका और द बॉम्बे कैंटीन शामिल हैं, को जरूरी एकरूपता देता है। शेफ के लिए एकरूपता का मतलब है कि रसोई में पहुंचने पर फल का आकार, स्वाद, सख्ती और पकने का समय अपेक्षा के अनुरूप हो।

उनका यह भी कहना है कि भारतीय कृषि के विकास के साथ समूह अधिक स्थानीय उपज का इस्तेमाल करना चाहता है। इससे उन उत्पादकों के लिए व्यावसायिक अवसर पैदा होता है जो मानक किस्में उगा सकें और तय समय पर आपूर्ति कर सकें। रेस्तरां भरोसेमंद फल के लिए अधिक भुगतान कर सकते हैं, क्योंकि अनियमित आपूर्ति से बर्बादी, मेनू में बदलाव और तैयारी की लागत बढ़ सकती है।

भारत में उगाए गए एवोकाडो की गुणवत्ता सुधर रही है और स्थानीय किस्मों पर काम करने वाले कुछ बेहतरीन किसान हैं, लेकिन मौसम और क्षेत्र के अनुसार गुणवत्ता और उपलब्धता बदल सकती है।

इसलिए चुनौती सिर्फ अधिक टन उत्पादन करने की नहीं है। भारत को ऐसी आपूर्ति शृंखला की जरूरत है जो पौधशालाओं, किसानों, पैकिंग कंपनियों, परिवहन कंपनियों, खुदरा विक्रेताओं और खाद्य कारोबारों को जोड़े। सही समय पर कटाई और नियंत्रित तरीके से पकाना भी जरूरी है, क्योंकि एवोकाडो तोड़े जाने के बाद भी पकते रहते हैं।

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व्यावसायिक बागानों के लिए विशेषज्ञ कौशल जरूरी

मध्य प्रदेश के भोपाल में इंडो इज़राइल एवोकाडो नर्सरी के संस्थापक हर्षित गोधा ने इज़राइल में इस उद्योग का अध्ययन करने के लिए एक महीना बिताने के बाद 2021 में नर्सरी शुरू की। उनकी नर्सरी हस और पिंकर्टन जैसी अंतरराष्ट्रीय किस्मों की आपूर्ति करती है, जो वैश्विक बाजारों के उपभोक्ताओं और खरीदारों के लिए पहले से परिचित हैं।

गोधा के मुताबिक, उनके कारोबार ने पिछले पांच वर्षों में पूरे भारत के किसानों को करीब 18,000 एवोकाडो के पौधे दिए हैं। यह दिलचस्पी ऐसी रोपण सामग्री की तलाश को दर्शाती है, जो घरों के बगीचों और पुराने खेतों में आम तौर पर पाए जाने वाले मिश्रित पेड़ों की तुलना में अधिक एकसमान फल दे सके।

व्यावसायिक एवोकाडो का पेड़ आम तौर पर कलम से तैयार किया जाता है। निचले हिस्से, जिसे रूटस्टॉक कहते हैं, का चुनाव स्थानीय मिट्टी, पानी और रोग की परिस्थितियों को सहने जैसी खूबियों के आधार पर किया जाता है। ऊपरी हिस्सा फल की किस्म तय करता है। इस मेल से उत्पादक पेड़ की भूमिगत विशेषताओं को उन गुणों के अनुरूप बना सकते हैं जिन्हें वे बाजार में बेचना चाहते हैं।

बागान की योजना भी बहुत जरूरी है। अगर एवोकाडो के पेड़ों की बढ़त को नियंत्रित न किया जाए तो वे छह या सात साल में करीब 25 फीट ऊंचे हो सकते हैं। इतनी ऊंचाई से कटाई मुश्किल हो जाती है और श्रम लागत बढ़ती है। नियमित और कड़ी छंटाई से पेड़ों की ऊंचाई काबू में रहती है और फल तक पहुंच आसान होती है।

परागण से चुनौती और बढ़ जाती है। एवोकाडो की कई किस्में अपने आप प्रभावी ढंग से परागित नहीं होतीं। उत्पादक आम तौर पर एक साथ परागण के अनुकूल किस्में लगाते हैं, क्योंकि फूल अलग-अलग समय पर पराग छोड़ते और ग्रहण करते हैं। सही किस्मों का मेल और उनके बीच उचित दूरी यह तय कर सकती है कि बागान व्यावसायिक फसल देगा या नहीं।

अगर किसान ने पौधे लगाने का यह अनुपात गलत रखा, तो पेड़ फल नहीं देंगे, चाहे सिंचाई तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो।

इन बारीकियों के कारण तकनीकी सलाह के बिना पौधे लगाने वाले किसानों के लिए एवोकाडो अच्छा विकल्प नहीं है। बीमारी, परागण या किस्म के चुनाव की समस्याएं सामने आने से पहले बागान कई वर्षों तक स्वस्थ दिख सकता है। बड़े पेड़ों को बदलने की लागत बहुत भारी पड़ सकती है।

क्या भारतीय किस्में हस को टक्कर दे सकती हैं?

कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आयातित हस एवोकाडो का दबदबा है, क्योंकि खरीदार इस किस्म को पहचानते हैं और जानते हैं कि परिवहन तथा पकने के दौरान यह कैसा व्यवहार करती है। भारतीय पौधशालाओं के जरिए पिंकर्टन और अन्य उन्नत किस्में भी लाई जा रही हैं। इन पेड़ों से किसानों को अधिक अनुमानित विशेषताओं वाले फल उगाने में मदद मिल सकती है।

भारत में स्थानीय एवोकाडो पेड़ों का भी बड़ा आधार है। समस्या यह है कि घरों के पिछवाड़े में लगे कई पेड़ आनुवंशिक रूप से अलग-अलग हैं। बेंगलुरु स्थित आईसीएआर भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. गणेशन करुणाकरन कहते हैं कि इस आनुवंशिक विविधता के कारण बाजार में असमान गुणवत्ता वाले फल पहुंचते हैं।

करुणाकरन ने स्थानीय पेड़ों पर आधारित प्रजनन कार्यक्रम पर 25 साल काम किया है। इस कार्यक्रम ने दो ऐसी किस्में जारी की हैं जिनका उद्देश्य किसानों को एकसमान, अधिक उपज देने वाली और अच्छी गुणवत्ता की रोपण सामग्री उपलब्ध कराना है। ऐसी किस्में भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल विशेषताओं को बरकरार रखते हुए घरेलू बाजार को मजबूत करने में मदद कर सकती हैं।

मानकीकरण का यह अर्थ नहीं है कि हर खेत में एक ही फल उगाया जाए। इसका मतलब है कि किसान और खरीदार किसी किस्म के अपेक्षित आकार, स्वाद, कटाई के समय और प्रदर्शन को पहचान सकें। यह जानकारी रेस्तरां को खरीद की योजना बनाने में मदद करती है और खुदरा विक्रेताओं को अधिक भरोसेमंद उत्पाद देती है।

पौधों का स्वास्थ्य भी एक चिंता है। बिना नियमन वाली पौधशालाएं अज्ञात किस्म के या रोगग्रस्त पौधे बेच सकती हैं। कोई पौधा छोटा होने पर स्वस्थ दिख सकता है, लेकिन पांच या सात साल बाद कमजोर होकर मर सकता है। तब तक किसान सिंचाई, छंटाई, खाद और जमीन तैयार करने पर कई साल लगा चुका होता है।

किसान अनजाने में रोगग्रस्त पौधे खरीद सकते हैं। पेड़ शुरुआत में स्वस्थ दिख सकते हैं, लेकिन पांच या सात साल बाद अचानक मर सकते हैं, जिससे भारी आर्थिक नुकसान होता है।

एशिया के बदलते बाजार का भारत के लिए क्या मतलब है

भारत का एवोकाडो बाजार एशिया में हो रहे व्यापक विस्तार का हिस्सा है, हालांकि पूरे क्षेत्र में उपभोक्ताओं की पसंद एक जैसी नहीं है। चीन में पेय और तैयार खाद्य पदार्थों में एवोकाडो का इस्तेमाल बढ़ रहा है, जापान में प्रस्तुति और एकसमान गुणवत्ता को खास महत्व दिया जाता है, जबकि दक्षिण कोरिया में ताजा फल के साथ एवोकाडो से बने उत्पादों की भी मांग है।

एशिया भर में काम करने वाले उद्योग समूह तेजी से यह अध्ययन कर रहे हैं कि उपभोक्ता फल कैसे खाते हैं, कब खरीदते हैं और कौन-से रूप उनके लिए उपयुक्त हैं। इनमें ताजा फल, खाने के लिए तैयार उत्पाद, खाद्य-सेवा सामग्री और ऑनलाइन खुदरा विक्रेताओं के जरिए बिकने वाली चीजें शामिल हैं। भारत में ई-कॉमर्स और रेस्तरां से भोजन की डिलीवरी में तेज वृद्धि से आपूर्तिकर्ताओं को उपभोक्ताओं तक पहुंचने के कई रास्ते मिलते हैं।

वैश्विक एवोकाडो कंपनी वेस्टफालिया फ्रूट ने ऐसी रणनीति बताई है जो सिर्फ आपूर्ति बढ़ाने तक सीमित नहीं है। कंपनी का कहना है कि किस्मों, उत्पादक क्षेत्रों, पैकिंग, पकाने और उत्पाद विकास से जुड़े फैसले हर बाजार में उपभोक्ताओं की पसंद से जुड़े होने चाहिए।

कंपनी के उभरते बाजारों के ग्राहक निदेशक हांस बोयुम ने कहा कि आपूर्ति शृंखला के शुरुआती चरण में लिए गए फैसले वर्षों बाद उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाले फल को प्रभावित कर सकते हैं। वेस्टफालिया के एशिया वाणिज्यिक प्रमुख डिएगो वास्केज ने कहा कि फल के मूल स्थान, विशिष्टताओं, पकने की अवस्था और रूप को इस बात के अनुरूप होना चाहिए कि उसे आखिरकार कैसे बेचा और खाया जाएगा।

भारत में यह तरीका अहम है, क्योंकि उपभोक्ता अभी सीख रहे हैं कि अच्छे एवोकाडो का स्वाद और बनावट कैसी होनी चाहिए। कच्चा या जरूरत से ज्यादा पका फल खाने का खराब अनुभव किसी खरीदार को इसे दोबारा खरीदने से रोक सकता है। पकाने की बेहतर प्रणालियां और अधिक स्पष्ट जानकारी कभी-कभार होने वाली खरीद को नियमित मांग में बदलने में मदद कर सकती हैं।

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किसानों को बेहतर पेड़ों के साथ खरीदार भी चाहिए

वायनाड के शिजू सेबेस्टियन ने शुरुआती दौर में एवोकाडो अपनाया। आठ साल पहले उन्होंने अपने खेत के दो एकड़ हिस्से में एवोकाडो लगाया। इस साल उन्हें करीब 3,500 किलोग्राम फल की कटाई की उम्मीद है, जिसे पूरा का पूरा बेंगलुरु में बेचा जाएगा।

उनका अनुभव विस्तार के लिए एक अहम शर्त की ओर इशारा करता है: फसल के लिए जमीन और पैसा लगाने से पहले किसानों को बाजार तक पहुंच चाहिए। एवोकाडो के पेड़ों को अच्छी पैदावार तक पहुंचने में कई साल लगते हैं, इसलिए खरीदार गायब हो जाएं या कीमतें गिर जाएं तो किसान आसानी से दूसरी फसल पर नहीं जा सकते।

किसानों को किस्म के चुनाव, पौधों के बीच दूरी, सिंचाई, छंटाई, रोग नियंत्रण और परागण पर मार्गदर्शन भी चाहिए। प्रशिक्षण से गलतियां कम हो सकती हैं, जबकि खुदरा विक्रेताओं और खाद्य-सेवा कंपनियों से जुड़ाव किसानों को खरीदारों की अपेक्षित फल-विशेषताओं का स्पष्ट अंदाजा दे सकता है।

सेबेस्टियन ने अपने खेत के तीन और एकड़ में पूरी तरह एवोकाडो लगाने की योजना बनाई है। मौजूदा फसल के लिए खरीदार होने से उनका भरोसा बढ़ा है, लेकिन उनके आशावाद में एक चेतावनी भी छिपी है। गुणवत्ता नियंत्रण के बिना तेजी से रोपण करने से असमान फल, निराश ग्राहक और आर्थिक नुकसान का एक और दौर शुरू हो सकता है।

टिकाऊ उद्योग के लिए अनुसंधान संस्थानों, पौधशालाओं, बागान कंपनियों, किसानों और खरीदारों के बीच सहयोग जरूरी होगा। भारत के अनुकूल स्थानीय किस्में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाने वाली किस्मों के साथ विकसित हो सकती हैं। बेहतर बागानों से पैदावार बढ़ सकती है, जबकि भंडारण और पकाने की बेहतर व्यवस्था बर्बादी कम कर सकती है।

अर्थव्यवस्था और पर्यावरण से जुड़े सवाल

जहां कॉफी और काली मिर्च को अस्थिर मौसम का सामना करना पड़ रहा है, वहां एवोकाडो आय का संभावित स्रोत है, लेकिन यह जलवायु की समस्या का आसान समाधान नहीं है। इस फसल के लिए पानी का सावधानीपूर्वक प्रबंधन, स्वस्थ मिट्टी और जड़ के रोगों से बचाव जरूरी है। इज़राइल या दक्षिण अफ्रीका में कारगर तरीकों को भारत के मानसूनी मौसम, मिट्टी के प्रकारों और क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाले बिना नहीं अपनाया जा सकता।

नमी वाले बागान क्षेत्रों में ऊंची क्यारियां और पौधों के बीच अधिक दूरी मददगार हो सकती है, जबकि शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना होगा। बागान लगाने से पहले किसानों को स्थानीय जल उपलब्धता के बारे में भरोसेमंद जानकारी चाहिए। दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जमीन और जल संसाधनों पर जरूरत से ज्यादा दबाव डाले बिना अधिक फल कैसे पैदा किया जाए।

आयात भारत के बाजार का हिस्सा बने रहने की संभावना है, क्योंकि अलग-अलग उत्पादक क्षेत्रों में साल के अलग-अलग समय पर फल तैयार होते हैं। स्थानीय उत्पादन ताजे फल की आपूर्ति, परिवहन समय घटाने और क्षेत्रीय स्वाद के अनुरूप किस्में देने के जरिए अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है। स्थानीय बागानों के परिपक्व होने तक आपूर्ति की मिली-जुली व्यवस्था खरीदारों को अधिक विकल्प दे सकती है।

भारत में एवोकाडो की वृद्धि का अगला चरण क्षेत्रफल जितना ही गुणवत्ता और भरोसेमंद आपूर्ति से भी मापा जाएगा। उपभोक्ता कम कीमतों का स्वागत कर सकते हैं, लेकिन खुदरा विक्रेताओं और रेस्तरां को ऐसा फल भी चाहिए जो अच्छी हालत में पहुंचे और अनुमानित गति से पके।

मुख्य बातें

  • भारत हर साल करीब 15,000 टन एवोकाडो आयात करता है, जबकि घरेलू उत्पादन 8,000 से 9,000 टन होने का अनुमान है।
  • बदलते खानपान, रेस्तरां में इस्तेमाल, त्वचा की देखभाल में रुचि और खुदरा बिक्री तक बढ़ी पहुंच से एवोकाडो की मांग बढ़ी है।
  • व्यावसायिक बागानों के लिए कलम से तैयार पेड़, परागण के लिए सही किस्में, छंटाई और रोग नियंत्रण जरूरी हैं।
  • भारतीय शोधकर्ता स्थानीय एवोकाडो पेड़ों पर आधारित अधिक एकसमान किस्में विकसित कर रहे हैं।
  • बिना नियमन वाली पौधशालाएं और रोगग्रस्त रोपण सामग्री किसानों के लिए गंभीर वित्तीय जोखिम पैदा करती हैं।
  • केरल जैसे क्षेत्रों के किसान कॉफी और काली मिर्च पर जलवायु के दबाव के बीच एवोकाडो की ओर रुख कर रहे हैं।
  • भविष्य की वृद्धि भरोसेमंद गुणवत्ता, पकाने की प्रणालियों, बाजार तक पहुंच और पानी के जिम्मेदार इस्तेमाल पर निर्भर करेगी।
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