आकार लेती एक विशाल परियोजना
इंडोनेशिया जावा के उत्तरी तट के साथ एक विशाल समुद्री दीवार बनाने की महत्वाकांक्षी योजना पर आगे बढ़ रहा है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि लाखों निवासियों और महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्रों को बढ़ते पर्यावरणीय खतरों से बचाने के लिए यह परियोजना जरूरी है। बुनियादी ढांचे और क्षेत्रीय विकास के समन्वय मंत्री अगुस हरिमूर्ति युधोयोनो, जिन्हें व्यापक रूप से एएचवाई के नाम से जाना जाता है, ने पुष्टि की कि योजना का काम जारी है और प्रस्ताव अगले साल तक और परिपक्व होना चाहिए। एक दशक से अधिक समय से चर्चा में रही इस पहल को राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के कार्यकाल में नई गति मिली है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय रणनीतिक प्राथमिकता घोषित किया है और अवधारणा को वास्तविक निर्माण की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए एक विशेष प्राधिकरण बनाया है।
विषय-सूची
- आकार लेती एक विशाल परियोजना
- सैकड़ों किलोमीटर तक फैली सुरक्षा दीवार का दायरा और पैमाना
- सैकड़ों अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था पर खतरा
- तटीय संवेदनशीलता बढ़ाने वाले कारकों को समझना
- पर्यावरण संबंधी चिंताएं और समुदायों का विरोध
- वित्तपोषण और विदेशी साझेदारियों का रास्ता
- विकल्प और एकीकृत समाधान की तलाश
- अंतरराष्ट्रीय दांव और दीर्घकालीन नजरिया
- बुनियादी ढांचे और समुदाय विकास में संतुलन
- निष्कर्ष
यह परियोजना द्वीपीय देश के लिए एक निर्णायक समय पर सामने आई है। जावा के उत्तरी तट के तटीय समुदाय, जिसे स्थानीय तौर पर पंतुरा कहा जाता है, समुद्र-स्तर में वृद्धि, जमीन के लगातार धंसने और बार-बार आने वाली ज्वारीय बाढ़ के संयुक्त खतरे का सामना कर रहे हैं। इनसे घरों, खेतों और औद्योगिक बुनियादी ढांचे को खतरा है। सरकारी अनुमानों के मुताबिक प्रभावित क्षेत्रों में करीब 5 करोड़ लोग रहते हैं। उत्तर के कुछ इलाकों में जमीन हर साल पांच से 20 सेंटीमीटर तक धंस रही है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि हस्तक्षेप नहीं हुआ तो मानवीय और आर्थिक नुकसान तेजी से बढ़ेगा और हर मानसून में लाखों लोग बदतर होती जलमग्नता की चपेट में रहेंगे।
राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया है कि इस काम को अब और टाला नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि पूर्व राष्ट्रपति सुहार्तो के दौर से ही यह अवधारणा राष्ट्रीय विकास योजनाओं में शामिल रही है, जो दिखाता है कि योजनाकारों को इस घनी आबादी वाले तट की संवेदनशीलता का एहसास लंबे समय से है। अब जलवायु का दबाव बढ़ने और तटीय हालात के पुराने अनुमानों से अधिक तेजी से बिगड़ने के बीच जकार्ता खाका तैयार करने से आगे बढ़कर निर्माण शुरू करने की दिशा में कदम उठा रहा है। पिछली सरकारों में ऐसी तत्परता नहीं दिखी थी।
सैकड़ों किलोमीटर तक फैली सुरक्षा दीवार का दायरा और पैमाना
विशाल समुद्री दीवार को बैंटन से पूर्वी जावा के ग्रेसिक तक करीब 500 किलोमीटर लंबी एकीकृत तटीय सुरक्षा प्रणाली के रूप में परिकल्पित किया गया है, हालांकि कुछ अनुमानों के मुताबिक इसकी लंबाई अंततः 700 किलोमीटर से भी अधिक हो सकती है। यह अवरोध तटरेखा से करीब चार से छह किलोमीटर दूर समुद्र में बनेगा और इसके पीछे एक विशाल संरक्षित क्षेत्र होगा। इसकी अनुमानित कुल लागत 80 अरब डॉलर है, जो पूर्वी बोर्नियो में इंडोनेशिया की नई राजधानी की अनुमानित लागत से दोगुने से भी अधिक होगी।
परियोजना को 15 खंडों में बांटा गया है, ताकि उपलब्ध धन और तकनीकी तैयारी के अनुरूप चरणबद्ध तरीके से काम हो सके। अकेले जकार्ता खाड़ी के शुरुआती चरण पर आठ से 10 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है। अधिकारियों की योजना में कंक्रीट की दीवारों और तटीय तटबंधों जैसे ठोस ढांचों के साथ मैंग्रोव बहाली जैसे प्राकृतिक उपाय भी शामिल हैं, जो लहरों की ऊर्जा कम कर सकते हैं। डिजाइन में मुख्य दीवार के पीछे एक बड़ा लैगून भी है, जिस पर इंजीनियरों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने रुचि के साथ-साथ संदेह भी जताया है।
समन्वय मंत्री एएचवाई ने बताया कि यह परियोजना पांच प्रांतों, 20 जिलों और पांच शहरों में फैली है। इसके लिए अलग-अलग प्राथमिकताओं वाली कई सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय जरूरी होगा। राष्ट्रपति प्रबोवो ने योजना, निर्माण और वित्तपोषण की निगरानी के लिए उत्तरी जावा तट प्रबंधन प्राधिकरण बनाया है। इसका नेतृत्व समुद्री मामलों और मत्स्य पालन के उपमंत्री दिदित हेरदियावान अशफ कर रहे हैं। यह ढांचा दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले द्वीपों में से एक पर स्थानीय और राष्ट्रीय हितों को साथ लाने की जटिलता को दर्शाता है, जहां किसी भी चूक का असर लाखों लोगों पर पड़ सकता है।
सैकड़ों अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था पर खतरा
रिहायशी इलाकों पर सीधे खतरे के अलावा सरकार ने समुद्री दीवार को अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा बताया है। जावा के उत्तरी तट पर औद्योगिक विकास के पांच बड़े केंद्र, करीब 70 औद्योगिक एस्टेट, 28 अधिसूचित औद्योगिक क्षेत्र और पांच विशेष आर्थिक क्षेत्र हैं। कुल मिलाकर पंतुरा क्षेत्र इंडोनेशिया के सकल घरेलू उत्पाद में करीब 27.53 प्रतिशत, यानी लगभग 368.4 अरब डॉलर का योगदान देता है। इस तटीय पट्टी को बाढ़ के हवाले करने से देश भर में आपूर्ति शृंखलाएं बाधित हो सकती हैं, कारखाने बंद हो सकते हैं और बड़े पैमाने पर नौकरियां जा सकती हैं।
मंत्री एएचवाई ने जोर देकर कहा कि यह परियोजना केवल समुद्री दीवार बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रक्षा का व्यापक प्रयास है। कृषि भूमि भी खारे पानी के प्रवेश के खतरे में है, जिससे धान के खेत बंजर हो सकते हैं और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। देश के लाखों लोग स्थानीय स्तर पर उगाई जाने वाली मुख्य फसलों पर निर्भर हैं। तट के बंदरगाह और हवाई अड्डे व्यापार तथा यात्रा के लिए अहम मार्ग हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा इंडोनेशिया और उसके व्यापारिक साझेदारों, दोनों के लिए रणनीतिक महत्व रखती है।
सरकार ने चेतावनी दी है कि कुछ न करना निर्माण से भी अधिक महंगा पड़ेगा। समुद्र का स्तर हर साल अनुमानित 0.8 से 1.2 सेंटीमीटर बढ़ रहा है और जमीन के धंसने से समस्या और गंभीर हो रही है। ऐसे में 2050 तक ज्वारीय बाढ़ अधिक बार और अधिक विनाशकारी होने की आशंका है। अधिकारियों को डर है कि ठोस सुरक्षा व्यवस्था के बिना पूरे औद्योगिक पार्क बार-बार जलमग्न हो सकते हैं, जिससे निवेशकों का भरोसा घटेगा और क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखलाएं अस्थिर होंगी, जिनका दायरा इंडोनेशिया की सीमाओं से कहीं आगे तक है। खारे पानी से उपजाऊ खेत खोने पर देश को खाद्य आयात बढ़ाना पड़ सकता है, जिससे राष्ट्रीय व्यापार संतुलन पर दबाव और बढ़ेगा।
तटीय संवेदनशीलता बढ़ाने वाले कारकों को समझना
परियोजना की तात्कालिकता समझने के लिए इसके पीछे काम कर रहे दो मुख्य कारकों को जानना जरूरी है: जमीन का धंसना और समुद्र-स्तर का बढ़ना। जमीन धंसने का अर्थ है भूमि का धीरे-धीरे नीचे जाना। उत्तरी जावा में यह प्रक्रिया प्रति वर्ष एक से 20 सेंटीमीटर की दर से हो रही है। इसके कारणों में भूजल का अत्यधिक दोहन, इमारतों का भारी वजन, मैंग्रोव वनों की कटाई और मिट्टी की नमी में बदलाव शामिल हैं। जावा के तट पर कुछ मामलों में जमीन धंसने से स्थानीय जलस्तर प्रभावी तौर पर दो मीटर तक बढ़ गया है, जिससे तटीय सड़कें डूब गईं और इमारतों की नींव को नुकसान पहुंचा।
वैश्विक तापमान बढ़ने और समुद्री जल के गर्म होकर फैलने से समुद्र-स्तर में वृद्धि दबाव की एक और परत जोड़ती है। इंडोनेशिया की मौसम विज्ञान, जलवायु विज्ञान और भूभौतिकी एजेंसी के अनुसार, 1992 से समुद्र-स्तर औसतन करीब 4.3 मिलीमीटर प्रति वर्ष बढ़ा है और हाल के वर्षों में इसकी रफ्तार तेज हुई है। जब ये दोनों रुझान एक साथ आते हैं, तो अधिकारी इसे दोहरा दबाव कहते हैं, जो ज्वारीय बाढ़ और तटीय कटाव को उस स्तर से अधिक बढ़ा देता है जितना दोनों में से कोई एक कारक अकेले करता। इस मेल ने सेमारांग, डेमाक और जकार्ता खाड़ी में ऊंचे ज्वार को पहले ही खतरनाक बना दिया है।
हाल के मॉडल बताते हैं कि समुद्र में बने ढांचे कुछ खास जगहों पर तूफानी लहरों की ऊंचाई घटा सकते हैं, हालांकि नतीजे स्थानीय समुद्र-तल की बनावट के अनुसार अलग-अलग होते हैं। वैज्ञानिक आगाह करते हैं कि समुद्री दीवार जैसे कठोर ढांचे जमीन धंसने के मूल कारणों का समाधान नहीं करते। अगर दीवार के पीछे भूजल का दोहन बिना रोकटोक जारी रहा, तो जमीन धंसती रहेगी। इससे संरक्षित लैगून के भीतर पानी फंस सकता है और पुरानी समस्याएं सुलझने के बजाय जल निकासी की नई दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। इसी खतरे के कारण कुछ शिक्षाविदों का कहना है कि दीवार के साथ संरक्षित क्षेत्र में भूजल पर सख्त नियंत्रण और शहरी जल प्रबंधन में सुधार भी जरूरी है।
पर्यावरण संबंधी चिंताएं और समुदायों का विरोध
सरकार के दृढ़ विश्वास के बावजूद, नागरिक समाज समूहों और स्वतंत्र शोधकर्ताओं ने अनपेक्षित नतीजों को लेकर चिंता जताई है। इंडोनेशियाई संगठनों को आशंका है कि इस परियोजना से रेत खनन बढ़ सकता है, बचे हुए मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंच सकता है और खुले तटीय जल पर निर्भर मछुआरा समुदायों की आजीविका बाधित हो सकती है। पर्यावरण संगठन औरिगा नुसंतारा के समुद्री शोधकर्ता पारिद रिदवानुद्दीन ने कहा कि समुदायों को न तो विशाल दीवार की जरूरत है, न ही नए सरकारी प्राधिकरण की। इसके बजाय उन्होंने स्थानिक योजना और नीतियों की व्यापक समीक्षा की मांग की, ताकि मछुआरे बिना रुकावट अपना काम जारी रख सकें।
राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन पीपल्स कोएलिशन फॉर फिशरीज जस्टिस, जिसे कियारा के नाम से जाना जाता है, की महासचिव सुसान हेरावती ने इस योजना की आलोचना करते हुए इसे ऐसा त्वरित उपाय बताया जो जलवायु से जुड़ी गहरी समस्याओं का समाधान नहीं करता। उन्होंने कहा कि भारी धनराशि को देखते हुए यह परियोजना वास्तविक जन-सुरक्षा के बजाय राजनीतिक संरक्षण का माध्यम बन सकती है।
"जलवायु संबंधी मुद्दों को ऐसे दिखावटी, त्वरित समाधानों तक सीमित नहीं करना चाहिए जो आग बुझाने वाले यंत्र की तरह काम करें और समस्या को आग समझें: पानी डालो और काम खत्म। यह इस तरह काम नहीं करता," उन्होंने कहा।
आलोचकों ने सेमारांग-डेमाक टोल रोड का उदाहरण देते हुए आगाह किया है कि पहले के तटीय निर्माण कार्यों ने मछली पकड़ने के मार्ग बंद किए, मैंग्रोव नष्ट किए और आसपास के गांवों में बाढ़ को बदतर बना दिया। उनका कहना है कि नए निर्माण से पहले इन पुरानी विफलताओं का समाधान जरूरी है। सेमारांग लीगल एड फाउंडेशन के जनहित वकील कॉर्नेल गिया ने कहा कि नए प्राधिकरण को उत्तरी तट के समुदायों से परामर्श को प्राथमिकता देनी चाहिए। खास तौर पर, कंक्रीट डालने से पहले यह तय करना होगा कि मछली पकड़ने के मार्ग कैसे खुले रखे जाएंगे और संभावित विस्थापन से कैसे निपटा जाएगा। गिया ने कहा कि पूरा तटीय क्षेत्र जमीन और समुद्र के जरिए एक-दूसरे से जुड़ा है, इसलिए एक जगह का नुकसान तेजी से दूसरी जगहों को प्रभावित करता है।
वित्तपोषण और विदेशी साझेदारियों का रास्ता
80 अरब डॉलर के अनुमान को देखते हुए जकार्ता वित्तपोषण के नए मिले-जुले मॉडल पर काम कर रहा है, जिसमें राष्ट्रीय और प्रांतीय बजट, सार्वजनिक-निजी साझेदारियां और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश शामिल हैं। निवेश और डाउनस्ट्रीम उद्योग मंत्री रोसन रोएसलानी, जो दानंतारा इंडोनेशिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी हैं, ने काम में तेजी लाने के लिए निवेश सहायता योजनाओं पर चर्चा का समन्वय किया है। सरकार ने जल प्रबंधन के उन्नत अनुभव और पर्याप्त पूंजी वाले देशों के निवेशकों से सक्रिय रूप से संपर्क किया है।
राष्ट्रपति प्रबोवो ने 2025 में चीन के सामने यह परियोजना रखी थी, लेकिन उसके बाद जकार्ता ने संपर्क का दायरा बढ़ाया है। नीदरलैंड, जो 32 किलोमीटर लंबे अफ्सलाउटडाइक बांध और समुद्र से जमीन हासिल करने के सदियों पुराने अनुभव के लिए प्रसिद्ध है, संभावित साझेदार के रूप में उभरा है। दक्षिण कोरिया के पास सैमांगियम समुद्री दीवार का अनुभव है, जो दुनिया के सबसे बड़े तटीय अवरोधों में से एक है। वहीं, जापान ने 2011 के तोहोकू भूकंप और सुनामी के बाद अपनी समुद्री दीवारों के बुनियादी ढांचे को उन्नत किया है। साझेदारी के जरिए योगदान के लिए संयुक्त अरब अमीरात का नाम भी संभावित भागीदार के रूप में सामने आया है।
हालांकि, दीर्घकालीन रखरखाव की लागत अब भी एक बड़ा सवाल है। इतने विशाल पैमाने की दीवार के लिए दशकों तक लगातार निगरानी, मरम्मत और तलछट प्रबंधन करना होगा। अगर विदेशी निवेशक निर्माण के लिए धन दें, लेकिन रखरखाव की जिम्मेदारी न लें, तो कंक्रीट का काम पूरा होने के लंबे समय बाद भी इंडोनेशियाई करदाताओं पर भारी खर्च का बोझ पड़ सकता है। पारदर्शिता बेहद जरूरी होगी। भ्रष्टाचार उन्मूलन आयोग ने परियोजना की निगरानी का वादा किया है, हालांकि जानकारों को संदेह है कि इतने बड़े और कई अधिकार क्षेत्रों तथा राजस्व स्रोतों से जुड़े काम में निगरानी व्यवस्था कदमताल कर पाएगी या नहीं।
विकल्प और एकीकृत समाधान की तलाश
शिक्षाविदों और नीति शोधकर्ताओं ने सरकार से कंक्रीट के अवरोधों से आगे देखने का आग्रह किया है। एकीकृत तटीय प्रबंधन, अपशिष्ट जल व्यवस्था में सुधार, नदियों की सफाई और भूजल दोहन पर कड़ा नियंत्रण, पारिस्थितिकी को कठोर दीवार से होने वाले नुकसान से बचाते हुए जमीन धंसने के मूल कारणों पर काम कर सकते हैं। उच्च शिक्षा मंत्री ब्रायन यूलियार्तो ने बताया कि राष्ट्रपति प्रबोवो ने विश्वविद्यालयों को समुद्री दीवार परियोजना में सहयोग के लिए शोधकर्ताओं और व्याख्याताओं को जुटाने का निर्देश दिया है। साथ ही, उन्हें दक्षता बढ़ाने और अनचाहे नुकसान का खतरा घटाने वाली पूरक रणनीतियां तलाशने को भी कहा है। विश्वविद्यालय डेमाक और सेमारांग क्षेत्रों में तटीय सुरक्षा रणनीतियों का परीक्षण कर चुके हैं। सही तरीके से लागू किए जाने पर ये कारगर तरीके निर्माण लागत और पर्यावरणीय व्यवधान घटा सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि मुख्य सवाल यह है कि क्या इंडोनेशिया ऐसी समुद्री दीवार बना सकता है जो अपेक्षा के मुताबिक काम करे, न कि सिर्फ इस पर बहस हो कि दीवार होनी चाहिए या नहीं। इसके लिए भूजल संबंधी नियम लागू करने होंगे, नदियों को साफ करना होगा ताकि प्रस्तावित लैगून ठहरा हुआ, कम ऑक्सीजन वाला खंदक न बन जाए, और प्रभावित समुदायों के साथ वास्तविक साझेदारी में तटीय निर्माण की योजना बनानी होगी। कम ऊंचाई वाले इलाकों के गरीब परिवारों को घर ऊंचे करने के लिए अनुदान और बेहतर जल निकासी से तत्काल राहत मिल सकती है। वे अक्सर बड़े बुनियादी ढांचा कार्यक्रमों से जुड़ी अनिवार्य सह-वित्तपोषण की शर्तें पूरी नहीं कर पाते।
मध्य जावा के केंडल में किए गए जमीनी अध्ययन पहले ही दिखा चुके हैं कि आंशिक समाधान नुकसान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा सकते हैं। ऊंची सड़कें और छोटी बाढ़-दीवारें कभी-कभी पानी को उन पड़ोसी घरों की ओर मोड़ देती हैं जहां पहले बाढ़ नहीं आती थी। खारा पानी उस उपजाऊ जमीन तक पहुंच गया है जहां पहले नियमित रूप से ज्वार नहीं आता था। इन निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि समानांतर सामाजिक और पर्यावरणीय सुधारों के बिना विशाल समुद्री दीवार एक महंगा ढांचा बन सकती है, जो कुछ लोगों की रक्षा करे और दूसरों को पहले से अधिक असुरक्षित छोड़ दे।
अंतरराष्ट्रीय दांव और दीर्घकालीन नजरिया
इंडोनेशिया के सबसे करीबी पड़ोसी और महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार ऑस्ट्रेलिया के लिए इस परियोजना का नतीजा तटरेखा से कहीं अधिक मायने रखता है। ऑस्ट्रेलिया का विदेश मामलों और व्यापार विभाग ऐतिहासिक रूप से जल और बुनियादी ढांचे की पहल पर इंडोनेशियाई योजना एजेंसियों के साथ सहयोग करता रहा है। समुद्री दीवार की विफलता या खराब प्रबंधन से राजनीतिक अस्थिरता, खारी हुई कृषि भूमि के कारण खाद्य असुरक्षा और आर्थिक व्यवधान पैदा हो सकता है, जिसका असर पूरे क्षेत्र में फैल सकता है। कैनबरा की भी इसमें दिलचस्पी है कि जकार्ता इस प्रक्रिया का पारदर्शी और प्रभावी प्रबंधन करे।
इसके उलट, अच्छी तरह पूरी की गई परियोजना यह दिखा सकती है कि घनी आबादी वाले विकासशील देश जलवायु परिवर्तन के अनुरूप कैसे ढल सकते हैं। दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि इंडोनेशिया इंजीनियरिंग की महत्वाकांक्षा, पारिस्थितिकी संरक्षण और सामाजिक समानता के बीच संतुलन बना पाता है या नहीं। सफलता से यह साबित होगा कि तटीय सुरक्षा के विशाल ढांचे व्यापक अनुकूलन योजना का हिस्सा हो सकते हैं। विफलता इस चेतावनी को मजबूत करेगी कि केवल कंक्रीट से समुद्र को नहीं रोका जा सकता और शासन सुधार तथा समुदायों की सहमति के बिना सबसे महंगी दीवारें भी टिक नहीं सकतीं।
इस परियोजना का इंडोनेशिया की घरेलू राजनीति में प्रतीकात्मक महत्व भी है। राष्ट्रपति प्रबोवो ने अपने प्रशासन को ऐसी पहल से जोड़ा है जो उनके राष्ट्रपति बनने से कई दशक पहले की है। उन्होंने समय पर इसे पूरा करने को राष्ट्रीय संकल्प की परीक्षा के रूप में पेश किया है। विश्वविद्यालयों को जुटाकर, विशेष प्राधिकरण बनाकर और वैश्विक निवेशकों से संपर्क करके उनकी सरकार दांव लगा रही है कि नौकरशाही की गति आखिरकार खतरे के पैमाने से मेल खा सकेगी।
बुनियादी ढांचे और समुदाय विकास में संतुलन
भौतिक दीवार के साथ-साथ सरकार मछुआरा समुदायों के हालात सुधारने का एक समानांतर कार्यक्रम भी आगे बढ़ा रही है। कम्पुंग नेलायन मेराह पुतिह, यानी लाल और सफेद मछुआरा गांव, नाम की इस पहल का लक्ष्य आधुनिक बंदरगाहों, शीत भंडारण सुविधाओं और बाजार कियोस्क वाले एकीकृत केंद्र स्थापित करना है। समुद्री दीवार प्राधिकरण के प्रमुख और मत्स्य पालन के उपमंत्री, दोनों की भूमिका निभा रहे दिदित हेरदियावान अशफ ने कहा कि बुनियादी ढांचे और सामुदायिक विकास के हिस्से एक साथ आगे बढ़ने चाहिए, न कि एक के बाद एक।
अब तक पूर्वी जावा में ग्रेसिक, मलांग जिले, तुबान, पासुरुआन और सुमेनेप में प्रायोगिक गांव स्थापित किए जा चुके हैं। प्रांतीय सरकार ने ऐसे अधिकतम 40 केंद्रों का प्रस्ताव दिया है। प्रत्येक गांव पर दो से 2.5 अरब इंडोनेशियाई रुपिया खर्च होने का अनुमान है। अधिकारियों को उम्मीद है कि मत्स्य उत्पादन बढ़ाकर और तट पर स्थिर आर्थिक केंद्र बनाकर इस परियोजना को स्थानीय आबादी का समर्थन मिलेगा, जो अन्यथा समुद्री दीवार की बड़ी योजना का विरोध कर सकती है।
हालांकि, आलोचक इन गांवों को जरूरी, लेकिन अपर्याप्त भरपाई मानते हैं। जब तक मछली पकड़ने के मार्ग खुले नहीं रहते और निर्माण के दौरान मैंग्रोव आवास बचे नहीं रहते, तब तक बेहतर बंदरगाह उन समुदायों के लिए बहुत मायने नहीं रखेंगे जिनकी पकड़ स्वस्थ समुद्री पारिस्थितिकी पर निर्भर है। राष्ट्रीय आर्थिक प्राथमिकताओं और स्थानीय पर्यावरणीय वास्तविकताओं के बीच तनाव अब भी अनसुलझा है। सरकार इस अंतर से कैसे निपटती है, इसी से परियोजना की दीर्घकालीन वैधता तय होने की संभावना है।
निष्कर्ष
- इंडोनेशिया सरकार जावा के उत्तरी तट पर करीब 500 से 700 किलोमीटर लंबी विशाल समुद्री दीवार परियोजना को आगे बढ़ा रही है। इसकी अनुमानित लागत 80 अरब डॉलर है।
- समन्वय मंत्री अगुस हरिमूर्ति युधोयोनो का कहना है कि परियोजना 2027 तक परिपक्व होनी चाहिए। निर्माण चरणबद्ध होगा और इसे 15 खंडों में बांटा गया है, जिनमें जकार्ता खाड़ी का शुरुआती चरण भी शामिल है।
- पंतुरा क्षेत्र राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में करीब 368 अरब डॉलर का योगदान देता है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि सुरक्षा नहीं मिलने पर समुद्र-स्तर बढ़ने और जमीन धंसने से औद्योगिक क्षेत्रों तथा कृषि भूमि को नुकसान हो सकता है।
- पर्यावरण समूहों और समुद्री शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि दीवार से मैंग्रोव को नुकसान पहुंच सकता है, मछली पकड़ने के मार्ग बाधित हो सकते हैं और भूजल दोहन तथा जमीन धंसने की समस्या का एक साथ समाधान न होने पर यह परियोजना विफल हो सकती है।
- जकार्ता इस परियोजना के लिए चीन, नीदरलैंड, दक्षिण कोरिया, जापान और संयुक्त अरब अमीरात समेत विदेशी साझेदारों के साथ मिले-जुले वित्तपोषण की संभावनाएं तलाश रहा है।
- राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने परियोजना की निगरानी के लिए विश्वविद्यालयों को जुटाया है और एक विशेष प्राधिकरण बनाया है। यह परियोजना सुहार्तो के दौर से राष्ट्रीय विकास योजनाओं में शामिल रही है।






