शांति के लिए नई पीढ़ी ने थामी लाइटसेबर
जापान की राष्ट्रीय संसद भवन के आसपास की संकरी सड़कों पर 19 अप्रैल, 2026 की शाम चमकती लाइट स्टिक्स का सैलाब अंधेरे को चीर रहा था। देश के युद्धोत्तर शांतिवादी संविधान की रक्षा के लिए जुटे अनुमानित 36,000 प्रदर्शनकारियों में 22 वर्षीय विश्वविद्यालय छात्र गोता हाशिमोतो भी शामिल थे। उनके हाथ में खिलौना लाइटसेबर था, जो अनपेक्षित रूप से प्रतिरोध का प्रतीक बन गया है। अनुच्छेद 9 की रक्षा के लिए याचिका अभियान शुरू करने वाली रैली में हाशिमोतो ने कहा, "मैं करीब एक साल से संविधान में दिलचस्पी ले रहा हूं, जब से जापान में अति-दक्षिणपंथी दलों का उभार हुआ है। मैं ऐसे आंदोलन का हिस्सा बनना चाहता था जो मेरे देश को शांतिपूर्ण रखे और संविधान की रक्षा करे।"
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यह जमावड़ा तेजी से बढ़ती प्रदर्शनों की लहर का अब तक का सबसे बड़ा हिस्सा था। फरवरी के आखिर में 3,600 प्रतिभागियों से शुरू हुई यह संख्या मार्च के आखिर तक 24,000 तक पहुंची और फिर जापान की संसद के बाहर इस विशाल जुटान में तब्दील हो गई। इस आंदोलन को पिछले प्रदर्शनों से अलग बनाती है इसमें शामिल लोगों की संरचना: स्मार्टफोन डेटा के विश्लेषण से पता चला कि 30 वर्ष की उम्र के लोग सबसे बड़ा समूह थे, 20 वर्ष की उम्र वाले 20 प्रतिशत से अधिक थे और कुल प्रतिभागियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत थी।
घेराबंदी में अनुच्छेद 9
इस नागरिक जागरण के केंद्र में जापान के 1947 के संविधान का अनुच्छेद 9 है। अमेरिकी कब्जे वाले प्रशासन ने जनरल डगलस मैकआर्थर के नेतृत्व में इसका मसौदा तैयार किया था। यह प्रावधान युद्ध को राष्ट्र के संप्रभु अधिकार के रूप में हमेशा के लिए त्यागता है और सशस्त्र बल रखने पर रोक लगाता है। करीब 80 वर्षों से इस अनुच्छेद ने जापान की सेना को पूरी तरह रक्षात्मक भूमिका तक सीमित रखा है और देश को विदेशों में शक्ति-प्रदर्शन करने या सहयोगी देशों के साथ संयुक्त सैन्य अभियानों में शामिल होने से रोका है।
प्रधानमंत्री साने ताकाइची के नेतृत्व में अब यह ढांचा चरमरा रहा है। ताकाइची को संवैधानिक संशोधन का एजेंडा अपने मार्गदर्शक और पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे से विरासत में मिला, जिनकी हत्या कर दी गई थी। अप्रैल 2026 के मध्य में, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के 70वें स्थापना दिवस सम्मेलन में ताकाइची ने कहा कि संवैधानिक सुधार का "समय आ गया है" और एक साल के भीतर औपचारिक संशोधन प्रस्ताव पेश करने की योजना घोषित की। उनकी सरकार ने कार्यकारी कार्रवाई के जरिए शांतिवाद के कानूनी ढांचे को पहले ही कमजोर करना शुरू कर दिया है। इनमें सबसे अहम अप्रैल के प्रदर्शन से कुछ ही दिन पहले दशकों पुराना घातक हथियारों के निर्यात पर प्रतिबंध हटाना था।
संविधान हमें इस क्षेत्र समेत अमेरिका के युद्धों से दूर रहने में सक्षम बनाता है। यह सोचकर कि शायद यह बदल जाए, मुझे बहुत गुस्सा आता है।
मंत्रिमंडल और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बाद हुए इस नीतिगत बदलाव से जापान अब लड़ाकू विमान, मिसाइलें और युद्धपोत सहयोगी देशों को निर्यात कर सकता है। इनमें ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है, जिसने मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज़ से 11 युद्धपोत बनवाने के लिए हाल ही में 7 अरब डॉलर का समझौता किया। नए नियमों के तहत खरीददार देशों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुरूप रहने का वचन देना होगा, लेकिन जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी "विशेष परिस्थितियों" में छूट का प्रावधान है। आलोचकों का कहना है कि यह इतनी बड़ी खामी है कि शांतिवादी सिद्धांतों को पूरी तरह दरकिनार किया जा सकता है।
लाइट स्टिक क्रांति
इन प्रदर्शनों की दृश्य भाषा तकनीकी समझ और सांस्कृतिक जुड़ाव, दोनों को दर्शाती है। प्रदर्शनकारी दिसंबर 2024 में दक्षिण कोरिया के महाभियोग झेल चुके राष्ट्रपति यून सुक योल के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से प्रेरित चमकती स्टिक्स लिए हुए हैं। डिजिटल युग में एकजुटता का प्रतीक बनती ये रोशनियां लहरों जैसी दिखती हैं। कुछ प्रदर्शनकारी चमकीली पीली लाइट स्टिक्स लहराते हैं; दूसरे "9" अंक के आकार के गुब्बारे या "बम नहीं, बिल्लियां" और "किसी को भी युद्ध में नहीं भेजा जाना चाहिए" लिखे पोस्टर लिए हैं।
टोक्यो रैली में पीली लाइट स्टिक थामे 28 वर्षीय प्रोग्रामर यूरी हियोकी ने कहा कि इस चीज़ से उन्हें हौसला मिलता है। उन्होंने कहा, "जब आपके पास इनमें से एक होती है तो आपको एहसास होता है कि आप अकेले नहीं हैं। इससे आपको यहां आकर प्रदर्शन करने की हिम्मत मिलती है।" यह भावना उस पीढ़ी की है जिसने राजनीतिक संकोच को पीछे छोड़ा है। पहले जापानी युवाओं में राजनीति पर चर्चा करना अक्सर सामाजिक रूप से वर्जित माना जाता था।
यह आंदोलन टोक्यो से आगे फैल चुका है। टोक्यो शिंबुन की खबरों के मुताबिक, 9 अप्रैल को जापान भर में 130 से अधिक जगहों पर समन्वित प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने सैन्य विकास के खास कदमों को निशाना बनाया है। इनमें 31 मार्च को कुमामोतो और शिजुओका प्रांतों में "दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने की क्षमता" वाली लंबी दूरी की मिसाइलों की तैनाती शामिल है। ये मिसाइलें 1,000 किलोमीटर से अधिक दूर के ठिकानों पर हमला कर सकती हैं और रक्षात्मक से आक्रामक सैन्य रुख की ओर स्पष्ट बदलाव का संकेत हैं।
सोफिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर कोइची नाकानो का मानना है कि ईरान युद्ध और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अस्थिर विदेश नीति ने युवाओं की इस लामबंदी को गति दी है। नाकानो ने कहा, "इस युद्ध ने यह खतरा लोगों के सामने ला दिया है कि ताकाइची के नेतृत्व में जापान किसी अवैध युद्ध में शामिल हो सकता है। अब कहीं अधिक लोगों को लगता है कि युद्ध के खिलाफ आखिरी ढाल के रूप में अनुच्छेद 9 का समर्थन दिखाना जरूरी है।"
कार्यकारी दायरे के विस्तार से संविधान में व्यापक बदलाव तक
ताकाइची अपने संवैधानिक अभियान को जापान के "सामान्य देश" बनने की यात्रा पूरी करने के रूप में पेश करती हैं। आलोचकों की नजर में यह कानून बनाने के बजाय संविधान की पुनर्व्याख्या से शांतिवादी सीमाओं को धीरे-धीरे खोखला करने की दशक भर पुरानी रणनीति का नतीजा है। पूर्व प्रधानमंत्री आबे ने 2015 में अनुच्छेद 9 की व्याख्या का विस्तार कर "सामूहिक आत्मरक्षा" की अनुमति दी थी। इससे जापानी सेनाएं हमले का शिकार हुए सहयोगियों की मदद कर सकती हैं, भले ही जापान को खुद कोई सीधा खतरा न हो। इसके बाद की सरकारों ने संवैधानिक संशोधन के बिना ही पहले से हमला करने की क्षमता और विदेशों में तैनाती की अनुमति हासिल की।
नाकानो ने कहा, "संशोधन के समर्थक जानते हैं कि इन कथित संवैधानिक आक्रामक उपायों पर कोई वास्तविक सहमति नहीं है, इसलिए वे शांतिवादी संविधान के ताबूत में आखिरी कील ठोकना चाहते हैं।" उन्होंने आगे कहा, "आत्मरक्षा बलों को 'संवैधानिक' घोषित करके वे बलों की हर कार्रवाई को वैध ठहराना चाहते हैं, जिसमें तथाकथित सीमित सामूहिक आत्मरक्षा भी शामिल है।"
ताकाइची कौन-से संशोधन चाहती हैं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। हालांकि विश्लेषकों को उम्मीद है कि प्रस्तावों में आत्मरक्षा बलों की कानूनी स्थिति को औपचारिक मान्यता देने की बात होगी, जबकि नाममात्र के लिए अनुच्छेद 9 में युद्ध त्यागने का प्रावधान बरकरार रह सकता है। ऐसे बदलावों के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और उसके बाद राष्ट्रीय जनमत-संग्रह की मंजूरी जरूरी होगी। यह कठिन कसौटी पहले भी संशोधन समर्थकों के प्रयासों को नाकाम कर चुकी है।
फरवरी 2026 के मध्यावधि चुनावों के बाद निचले सदन में सत्तारूढ़ एलडीपी को दो-तिहाई बहुमत मिला, जिससे ताकाइची के पास संवैधानिक प्रस्ताव आगे बढ़ाने की राजनीतिक गति है। हालांकि ऊपरी सदन में उन्हें वैसा समर्थन नहीं है, जहां विपक्षी दल जनमत-संग्रह की मंजूरी रोक सकते हैं। जनता की राय गहराई से बंटी हुई है। सर्वेक्षणों में करीब आधे लोग सेना को संवैधानिक मान्यता देने के पक्ष में हैं, जबकि हथियार निर्यात पर प्रतिबंध हटाने और ईरान युद्ध से जुड़े जोखिमों के कारण अनुच्छेद 9 को बरकरार रखने का समर्थन बढ़ सकता है।
इतिहास की गूंज और पीढ़ियों के बीच मतभेद
आज के युवा आंदोलन में 2015 के उन प्रदर्शनों की स्पष्ट गूंज सुनाई देती है, जो आबे के सुरक्षा कानूनों के खिलाफ हुए थे। उस समय छात्र समूह सील्ड्स (उदार लोकतंत्र के लिए छात्रों की आपात कार्रवाई) ने जापानी सक्रियता का नया रूप पेश किया था, जिसमें सड़क का फैशन, संगीत और सोशल मीडिया की समझ को राजनीतिक भागीदारी के साथ जोड़ा गया। सुरक्षा विधेयकों को रोकने में नाकाम रहने के बावजूद उन प्रदर्शनों ने समावेशी और अहिंसक विरोध के लिए मिसाल कायम की। यह शैली 1960 के दशक के छात्र आंदोलनों की कट्टरपंथी मार्क्सवादी छवियों और पुलिस के साथ हिंसक झड़पों से अलग थी।
मौजूदा लहर इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए छात्र समुदाय से बाहर तक फैल रही है और इसमें परिवार, दफ्तरों में काम करने वाले लोग तथा पुराने शांति अभियानों के कार्यकर्ता शामिल हैं। टोक्यो खाड़ी के पास 3 मई को संविधान दिवस की वार्षिक रैलियों में 2019 में 70,000 लोग जुटे थे, जिसके बाद महामारी ने आयोजनों को बाधित किया। इस साल के प्रदर्शनों में भी कई पीढ़ियों के लोग शामिल हुए हैं, जिनमें 1945 के परमाणु बम हमलों से बचे लोग और "निहोन हेइवा" (शांति के लिए जापान) आंदोलन के युवा कार्यकर्ता शामिल हैं।
फिर भी इस आंदोलन के सामने पीढ़ीगत बदलाव की चुनौती है। युद्धोत्तर आर्थिक उछाल के दौर में सक्रिय रहे कई प्रमुख कार्यकर्ता उम्रदराज हो रहे हैं। 1960 के दशक के कुछ आंदोलनकारी अब शारीरिक रूप से मार्च नहीं कर पाते, लेकिन हर महीने की नौ तारीख को स्थानीय रेलवे स्टेशनों पर जागरण जारी रखते हैं, जो अनुच्छेद 9 का प्रतीक है। हाशिमोतो जैसे बीस-बाईस साल के युवाओं का जुड़ना आंदोलन की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए अहम है। उन्हें डर है कि संविधान में संशोधन से उनकी पीढ़ी को अनिवार्य सैन्य सेवा या युद्ध में तैनाती का सामना करना पड़ सकता है।
हाशिमोतो ने कहा, "मैं हमेशा सोचता था कि राजनीति बुजुर्गों का मामला है, लेकिन ऐसा करना अपना भविष्य किसी और के हाथ में सौंपने जैसा लगता है। अब तक मैंने नहीं सोचा था कि युवाओं को संविधान की रक्षा के लिए लड़ना पड़ेगा।"
क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं और आर्थिक तनाव
जापान की शांतिवादी सीमाएं हटाने के कदम पर पूर्वी एशिया के देशों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा, "चीन समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे पर बेहद सतर्क रहेगा और जापान के लापरवाही भरे नए सैन्यीकरण का दृढ़ता से विरोध करेगा।" बीजिंग की आलोचना में ताकाइची की यासुकुनी श्राइन को धार्मिक भेंट भी शामिल है। यह मंदिर जापान के युद्ध में मारे गए लोगों के साथ 1,000 से अधिक दोषी ठहराए गए युद्ध अपराधियों का भी सम्मान करता है। इस भेंट को उन देशों के प्रति अवमानना के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने जापानी युद्धकालीन आक्रमण झेला था।
दक्षिण कोरिया ने मंदिर में भेंट और हथियार निर्यात, दोनों पर खास चिंता जताई है। वहीं अमेरिका ने जापान के सैन्यीकरण का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे गठबंधन के भीतर तालमेल बेहतर होगा। युद्धपोत निर्माण अनुबंध से लाभान्वित होने वाले ऑस्ट्रेलिया ने निर्यात नीति में बदलाव से मिली "नियामकीय स्पष्टता" पर संतोष जताया।
देश के भीतर प्रदर्शनकारियों ने सैन्य विस्तार को सामाजिक कल्याण के संसाधनों की चोरी बताया है। वित्त वर्ष 2026 में जापान का रक्षा बजट रिकॉर्ड 9.04 ट्रिलियन येन (करीब 56.8 अरब डॉलर) तक पहुंच गया है, जबकि देश की आबादी आर्थिक ठहराव और जीवन स्तर में गिरावट का सामना कर रही है। प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया है कि स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सेवाओं के बजाय सैन्य उद्योग के विकास को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है।
एक प्रदर्शनकारी ने चीनी मीडिया से कहा, "क्या यह हत्या नहीं है? हथियारों का इस्तेमाल लोगों को मारने और युद्ध लड़ने के लिए होता है। आखिर सिर्फ हथियार बनाने वाला सैन्य उद्योग ही मुनाफा क्यों कमाता है? ये हथियार हमारे कर के पैसे से भी बनते हैं। मैं ऐसी बात से सहमत नहीं हो सकता।"
हथियार निर्यात की घोषणा के बाद शिंजुकु में हुई रैली में 74 वर्षीय रियोजो सावादा ने कई बुजुर्ग जापानियों की ओर से महसूस किए जा रहे राष्ट्रीय विश्वासघात के भाव को जाहिर किया। उन्होंने कहा, "बचपन से जापान की जिस एक बात पर मुझे सचमुच गर्व था, वह यह कि हमने युद्ध त्याग दिया था। यह बेहद डरावना है कि उन्होंने सचमुच हथियार निर्यात करने का फैसला कर लिया।"
जनमत-संग्रह की राह
ताकाइची संसद में संवैधानिक संशोधन पेश करने की तैयारी कर रही हैं, लेकिन प्रक्रिया की बाधाएं अभी भी बड़ी हैं। निचले सदन में दो-तिहाई बहुमत होने के बावजूद उन्हें या तो ऊपरी सदन में विपक्ष का सहयोग हासिल करना होगा या वहां जरूरी दो-तिहाई बहुमत पाने के लिए राष्ट्रीय चुनाव जीतना होगा। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संशोधन को राष्ट्रीय जनमत-संग्रह में साधारण बहुमत से मंजूरी भी मिलनी चाहिए।
प्रदर्शनों ने एक अमूर्त संवैधानिक बहस को जापान के युद्धकालीन इतिहास और भविष्य की सुरक्षा पहचान पर तीखी सार्वजनिक बहस में बदल दिया है। प्रदर्शनकारी "अमेरिका की खुशामद बंद करो" के नारे लगाते हैं और "संविधान से दूर रहो" लिखे पोस्टर लेकर चलते हैं। वे संशोधन अभियान को स्वतंत्र जापानी फैसले के बजाय वॉशिंगटन की भू-राजनीतिक मांगों के आगे समर्पण के रूप में पेश करते हैं।
अपने दादा-दादी के जन्म से पहले लिखे गए दस्तावेज़ की रक्षा के लिए राजनीतिक उदासीनता छोड़ चुके युवा कार्यकर्ताओं के लिए दांव कानूनी बारीकियों से कहीं आगे तक हैं। ये राष्ट्रीय पहचान और निजी सुरक्षा से जुड़े बुनियादी सवाल हैं। जापानी निर्माताओं के लिए वैश्विक हथियार बाजार खुलने और आत्मरक्षा बलों के विदेशों में संभावित युद्ध अभियानों की तैयारी के बीच, हाशिमोतो और उनकी पीढ़ी ऐसे जनमत-संग्रह का सामना कर रही है जो तय करेगा कि शांतिवादी प्रयोग अपने नौवें दशक में भी कायम रहेगा या इतिहास में विलीन हो जाएगा।
एक प्रदर्शनकारी ने कहा, "और भी युवा आगे आ रहे हैं, जो मुझे सचमुच उत्साहजनक लगता है। पहले रैलियों में शामिल होने वाले लोग 60, 70 और 80 वर्ष के होते थे। लेकिन अब मैं देख रहा हूं कि वे आखिरकार संसद के सामने प्रदर्शन करने और पेनलाइट रैलियों में शामिल होने आए हैं।"
मुख्य बातें
- अनुमानित 36,000 प्रदर्शनकारी 19 अप्रैल, 2026 को जापान की राष्ट्रीय संसद के बाहर संवैधानिक संशोधन और घातक हथियारों के निर्यात के विरोध में जुटे
- प्रधानमंत्री साने ताकाइची की सरकार ने 7 अप्रैल, 2026 को घातक हथियारों के निर्यात पर 80 साल पुराना प्रतिबंध हटाया, जिससे जापान सहयोगियों को लड़ाकू विमान, मिसाइलें और युद्धपोत बेच सकेगा
- अमेरिकी कब्जे वाले प्रशासन द्वारा तैयार जापान के 1947 के संविधान का अनुच्छेद 9 युद्ध को संप्रभु अधिकार के रूप में त्यागता है और सशस्त्र बल बनाए रखने पर रोक लगाता है
- प्रदर्शनकारियों की जनसांख्यिकी में बड़ा बदलाव आया है: 30 वर्ष की उम्र के लोग सबसे बड़ा समूह हैं और प्रदर्शनकारियों में 60 प्रतिशत महिलाएं हैं
- संविधान में औपचारिक संशोधन के लिए ताकाइची को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और राष्ट्रीय जनमत-संग्रह में जीत की जरूरत है
- आत्मरक्षा बलों के पास अब "दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने की क्षमता" है और कुमामोतो तथा शिजुओका प्रांतों में मिसाइलें तैनात हैं
- नए निर्यात नियमों के तहत जापान और ऑस्ट्रेलिया ने 7 अरब डॉलर का युद्धपोत निर्माण समझौता किया
- संवैधानिक बदलाव का विरोध जापान भर में 130 से अधिक जगहों पर समन्वित प्रदर्शनों तक फैल गया है
- रक्षा खर्च बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि प्रदर्शनकारी स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं
- चीन और दक्षिण कोरिया ने जापान के सैन्यीकरण की कड़ी आलोचना की है, जबकि अमेरिका ने रक्षा सहयोग बढ़ाने का समर्थन किया है






