कूटनीतिक चुप्पी बहुत कुछ कहती है
जब चीनी विदेश मंत्री वांग यी इस अप्रैल में प्योंगयांग पहुंचे, तो उच्चस्तरीय कूटनीति का घटनाक्रम परिचित ढर्रे पर चला। हाथ मिलाए गए, भोज आयोजित हुए और संयुक्त वक्तव्य तैयार किए गए। लेकिन आधिकारिक बयानों की पंक्तियों के बीच एक गहरा रणनीतिक बदलाव स्पष्ट हो गया। दशकों में पहली बार, "परमाणु निरस्त्रीकरण" शब्द कूटनीतिक शब्दावली से पूरी तरह गायब हो गया। यह चूक संयोगवश नहीं थी। बीजिंग में भाषा ही नीति है, और कई उच्चस्तरीय बयानों से इस कभी सामान्य रहे पदबंध का गायब होना संकेत देता है कि चीन ने अनिच्छुक मध्यस्थ की अपनी पुरानी भूमिका छोड़ दी है। यह चुप्पी, निरंतर नीति की किसी भी दलील से कहीं अधिक मुखर है।
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इसके बजाय, वांग ने साझा "समाजवादी उद्देश्यों" और पार्टी-से-पार्टी एकजुटता की बात की और इस रिश्ते को परमाणु प्रसार के संकट के व्यावहारिक प्रबंधन के बजाय वैचारिक गठबंधन के रूप में पेश किया। द्विपक्षीय संबंधों को इन शब्दों में नए सिरे से परिभाषित करके, बीजिंग ने उत्तर कोरिया को हल की जाने वाली समस्या के बजाय विकसित किए जाने वाले भू-राजनीतिक संसाधन के रूप में देखना शुरू कर दिया है। प्योंगयांग ने जिस परमाणु शस्त्रागार को लंबे प्रयासों से विकसित किया है, वह अब अमेरिकी सैन्य संसाधनों को बांधे रखकर और तेज होती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में वॉशिंगटन की रणनीतिक स्वतंत्रता सीमित करके चीन के हितों की पूर्ति करता है। यह बीजिंग के पुराने दोहरी नीति वाले दृष्टिकोण से निर्णायक बदलाव है, जिसमें यह दिखावा बरकरार रखा जाता था कि पार्टी कूटनीति, राज्य-नेतृत्व वाली समग्र कूटनीति के अधीन है।
पार्टी ने संभाली कमान
इस बयानबाजी के बदलाव के पीछे चीन की संस्थागत व्यवस्था का बुनियादी पुनर्गठन है। ऐतिहासिक रूप से, विदेश मंत्रालय नीति का सार्वजनिक चेहरा होता था, जबकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का अंतरराष्ट्रीय संपर्क विभाग प्योंगयांग के साथ वास्तविक संबंध संभालता था। इस दोहरी व्यवस्था से बीजिंग को अंतरराष्ट्रीय दायित्वों, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों, का पालन करते हुए दिखने का अवसर मिलता था, जबकि पार्टी पर्दे के पीछे वास्तविक संबंधों का संचालन करती थी। राज्य संस्था होने के कारण विदेश मंत्रालय अंतरराष्ट्रीय कानून से बंधा था और उसकी भूमिका संरचनात्मक रूप से सीमित थी; व्यवहार में नीति भटकने के बावजूद उसे परमाणु निरस्त्रीकरण के सिद्धांतों का समर्थन करना पड़ता था।
अब यह दिखावा खत्म हो गया है। वांग यी सत्ता के नए केंद्रीकरण के प्रतीक हैं। वह एक साथ विदेश मंत्री, पोलितब्यूरो सदस्य और केंद्रीय विदेश मामलों के आयोग के कार्यालय के निदेशक हैं। इससे पहले किसी चीनी अधिकारी ने ये तीनों पद एक साथ नहीं संभाले। सत्ता का यह केंद्रीकरण रणनीतिक दिशा और कूटनीतिक संदेश के बीच की पारंपरिक अस्पष्टता खत्म करता है। जब वांग प्योंगयांग में बोलते हैं, तो उनकी आवाज में पार्टी और राज्य की पूरी सत्ता एकजुट होकर बोलती है। इससे वह रणनीतिक अस्पष्टता नहीं रह जाती, जिसके जरिए बीजिंग पहले अंतरराष्ट्रीय मानकों का समर्थन करते हुए द्विपक्षीय हित साध सकता था।
कार्यान्वयन का स्तर भी इस बदलाव को पुष्ट करता है। केंद्रीय राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी लियू हाईशिंग की अंतरराष्ट्रीय संपर्क विभाग के प्रमुख के रूप में नियुक्ति, चीन की उत्तर कोरिया नीति के सुरक्षा-केंद्रित होने का संकेत देती है। कोरिया की वर्कर्स पार्टी के साथ संपर्क को अब पारंपरिक कूटनीति नहीं माना जाता; इसे चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था में समाहित कर लिया गया है। इस रिश्ते को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बजाय आंतरिक, वैचारिक सहयोग के रूप में पेश करके, बीजिंग प्रतिबंधों को लागू करने से पैदा होने वाले टकराव से बचने की गुंजाइश बनाता है, साथ ही प्योंगयांग की आर्थिक जीवनरेखाएं कायम रखता है और सीमा-पार परिवहन फिर शुरू करता है।
सौदेबाजी के पत्ते से युद्धक क्षमता तक
बीजिंग की इस सहमति के साथ प्योंगयांग के सिद्धांतों में भी बदलाव आया है। फरवरी 2026 में किम जोंग उन ने पार्टी की नौवीं कांग्रेस में "शत्रुतापूर्ण दो-राज्य" सिद्धांत को औपचारिक रूप दिया। उन्होंने शांतिपूर्ण पुनर्एकीकरण के दशकों पुराने लक्ष्य को छोड़ दिया और परमाणु हथियारों को कूटनीतिक सौदेबाजी के पत्ते के बजाय युद्ध में इस्तेमाल की जा सकने वाली परिचालन क्षमता के रूप में स्थापित किया। एक दशक पहले ऐसा कदम बीजिंग में चिंता पैदा करता और नए सिरे से बातचीत की मांग उठती। इसके बजाय, वांग यी ने कांग्रेस को स्पष्ट रूप से बधाई दी और प्योंगयांग ने अभूतपूर्व तालमेल के संकेत दिए, जिनमें ताइवान पर चीन के रुख का सीधा समर्थन और अमेरिकी हिंद-प्रशांत नीति की आलोचना शामिल थी।
सिद्धांतों में यह बदलाव पिछले वर्षों में रखी गई कानूनी नींव पर आधारित है। उत्तर कोरिया के 2022 के परमाणु बलों पर राज्य नीति संबंधी कानून ने रक्षात्मक प्रतिरोध के साथ-साथ पहले हमला करने के विकल्पों को भी कानूनी रूप दिया। कानून में कमान और नियंत्रण ढांचे के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने के खतरे का सामना करने पर परमाणु हथियार "स्वचालित" रूप से दागे जाने के चिंताजनक प्रावधान हैं। इससे सोवियत दौर की "डेड हैंड" प्रणालियों की आशंका पैदा होती है, जिनमें संचार टूट जाने पर नेतृत्व की अनुमति के बिना भी मिसाइलें दागी जा सकती थीं। दक्षिण कोरिया और जापान के ठिकानों के खिलाफ युद्धक्षेत्र में इस्तेमाल के लिए सामरिक परमाणु हथियार विकसित किए गए हैं। किम जोंग उन ने 2021 में कहा था कि यह शस्त्रागार "विश्वसनीय ढाल" और "अनमोल तलवार", दोनों का काम करेगा।
2023 के संवैधानिक संशोधन ने इस स्थिति को और मजबूत किया, जबकि 2026 की पार्टी कांग्रेस ने दक्षिण कोरिया को "सबसे शत्रुतापूर्ण राज्य" घोषित करके और एकीकरण की बयानबाजी को खारिज करके वैचारिक बदलाव पूरा कर दिया। प्योंगयांग के पास लगभग पचास परमाणु बम हैं और उसने चालीस से पचास और हथियार बनाने के लिए पर्याप्त विखंडनीय सामग्री जमा कर रखी है। उसने अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों सहित करीब बीस अलग-अलग प्रक्षेपण प्रणालियां विकसित की हैं, जो अमेरिकी मुख्यभूमि तक हमला कर सकती हैं। कम विस्फोटक क्षमता वाले सामरिक हथियारों को विसैन्यीकृत क्षेत्र के पास अग्रिम मोर्चे की इकाइयों में तैनात किया गया है, जिससे किसी भी पारंपरिक संघर्ष के दौरान हथियारों का जल्द इस्तेमाल करने का दबाव बढ़ता है।
यूरेशियाई त्रिकोण
यह बदलाव उस व्यापक पुनर्संरेखण के बीच हो रहा है, जिसने बीजिंग, मॉस्को और प्योंगयांग को एक त्रिपक्षीय व्यवस्था में जोड़ दिया है। सितंबर 2025 में तियानआनमेन चौक पर विजय दिवस परेड ने इस धुरी की तस्वीर पेश की। किम जोंग उन, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन के साथ खड़े थे और अमेरिका-नेतृत्व वाली व्यवस्था के विरोध का प्रदर्शन कर रहे थे। इस दृश्य के पीछे ठोस सैन्य सहयोग था, जो यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद से तेज हुआ है। इस युद्ध ने तीनों राजधानियों के हितों में नई समानताएं पैदा की हैं।
उत्तर कोरिया ने रूस को लाखों तोप के गोले दिए हैं और कब्जे वाले क्षेत्रों में लड़ाई में मदद के लिए लगभग दस हजार सैनिक तैनात किए हैं। बदले में, मॉस्को उन्नत सैन्य तकनीक, खाद्य सामग्री, ऊर्जा और विदेशी मुद्रा देता है, जो अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग पाबंदियों से बचकर उत्तर कोरिया तक पहुंचती है। इस संबंध ने प्योंगयांग को अंतरराष्ट्रीय दबाव से प्रभावी रूप से बचाया है, खासकर मार्च 2024 में रूस द्वारा संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ पैनल के नवीनीकरण पर वीटो करने के बाद। चीन ने वीटो को रोकने के बजाय मतदान में अनुपस्थित रहकर साथ दिया। इससे प्रतिबंध व्यवस्था निगरानी और जांच करने की क्षमता खो बैठी, हालांकि वह नाममात्र के लिए लागू है।
इस व्यवस्था से बीजिंग को ऐसा बफर राज्य बनाए रखने का लाभ मिलता है, जो पूर्वोत्तर एशिया में अमेरिकी सैन्य ध्यान को लगातार बांधे रखता है। वॉशिंगटन के मध्य पूर्व में एक साथ कई संकटों का सामना करने के बीच, जिनमें होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान भी शामिल हैं, चीन ने अपने पूर्वी परिक्षेत्र पर पकड़ मजबूत की है। वांग यी ने चीन-उत्तर कोरिया सहयोग को "विकासशील देशों के साझा हितों" की पूर्ति करने वाला बताकर परमाणु प्रसार को साम्राज्यवाद के खिलाफ राजनीतिक प्रतिरोध के रूप में पेश करने की कोशिश की। वांग की यात्रा का समय, जो अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के साथ मेल खाता है, अमेरिकी क्षमता पर बढ़ते दबाव का फायदा उठाते हुए अपनी स्थिति मजबूत करने के बीजिंग के इरादे को रेखांकित करता है।
सियोल की संवैधानिक दुविधा
इस नई वास्तविकता का जवाब देने में दक्षिण कोरिया के सामने अस्तित्व का संकट है। राष्ट्रपति ली जे-म्यॉंग के प्रशासन ने ईएनडी पहल के जरिए परिस्थिति के अनुरूप ढलने की कोशिश की है। यह पहल परमाणु निरस्त्रीकरण को बातचीत की पूर्वशर्त नहीं, बल्कि आदान-प्रदान और संबंधों के सामान्यीकरण के जरिए हासिल होने वाला अंतिम लक्ष्य मानती है। एकीकरण मंत्री चुंग डोंग-यंग ने उत्तर कोरिया को उसके औपचारिक नाम, डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया, से संबोधित करना शुरू किया है और अंतर-कोरियाई संबंधों को "हान जो संबंध" बताने लगे हैं। यह शब्द दो अलग-अलग राज्यों का संकेत देता है, न कि बंटे हुए भाई-बहनों का।
लेकिन यह व्यावहारिक दृष्टिकोण बुनियादी कानूनी और रणनीतिक बाधाओं से टकराता है। दक्षिण कोरियाई संविधान का अनुच्छेद 3 राष्ट्रीय क्षेत्र को पूरे कोरियाई प्रायद्वीप तक फैला हुआ बताता है। इसके चलते किम शासन तकनीकी रूप से अवैध कब्जा करने वाली ताकत और उत्तर कोरियाई नागरिक तकनीकी रूप से दक्षिण कोरियाई नागरिक ठहरते हैं। प्योंगयांग को संप्रभु राज्य के रूप में औपचारिक मान्यता देने के लिए संवैधानिक संशोधन करना होगा। अब तक कोई राष्ट्रपति इस सीमा तक नहीं पहुंचा है। इसके अलावा, वॉशिंगटन उत्तर कोरिया की संप्रभुता का औपचारिक विरोध करता है। ऐसे में सियोल का एकतरफा कदम गठबंधन में तनाव पैदा कर सकता है।
सैन्य कमान का सवाल सियोल की मुश्किलें और बढ़ाता है। कोरिया में अमेरिकी सेना के कमांडर जनरल जेवियर ब्रनसन ने हाल ही में चेतावनी दी कि युद्धकालीन परिचालन नियंत्रण सियोल को सौंपने की समयसीमा "राजनीतिक सुविधा" के आधार पर तय नहीं होनी चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि शर्तें आधुनिक संघर्ष के परमाणु पहलुओं को ध्यान में रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यूक्रेन में तैनाती के कारण उत्तर कोरिया "और अनुभवी सेना" बन गया है। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिकी सैन्य नेता कोरियाई प्रायद्वीप को चीन के खिलाफ व्यापक क्षेत्रीय रणनीति का एक अहम केंद्र मानते हैं। इससे सियोल के लिए गठबंधन की एकजुटता बनाए रखते हुए प्योंगयांग के साथ संबंध सामान्य करना जटिल हो जाता है।
जापान का परमाणु मोड़
क्षेत्रीय पुनर्संरेखण के जवाब में जापान ने ऐसे कदम उठाए हैं, जो रणनीतिक बदलाव की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी इस बात पर सक्रियता से चर्चा कर रही है कि 1971 से जापान को अपने क्षेत्र में परमाणु हथियार रखने, बनाने या उनकी तैनाती की अनुमति देने से रोकने वाले लंबे समय से चले आ रहे तीन सिद्धांतों को खत्म किया जाए या नहीं। प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने इन सिद्धांतों का पालन जारी रखने की पुष्टि करने से इनकार किया है। वहीं, पार्टी के अधिकारी "किसी भी पहलू को वर्जित न मानते हुए" सुरक्षा नीति की पूरी समीक्षा की बात कर रहे हैं, जिसमें स्वदेशी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की संभावना भी शामिल है।
यह बहस ऐसे समय हो रही है जब ताइवान को लेकर आकस्मिक स्थिति की योजना बनाने के मुद्दे पर जापान और चीन के बीच तनाव बढ़ा है। रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी ने हाल ही में ताइवान से महज 110 किलोमीटर दूर स्थित योनागुनी द्वीप पर मिसाइल तैनाती स्थलों का निरीक्षण किया। इस पर चीन ने आरोप लगाया कि जापान "क्षेत्रीय तनाव पैदा करने" की कोशिश कर रहा है। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमबारी की अस्सीवीं बरसी वाले वर्ष में जापान की स्वतंत्र परमाणु क्षमता विकसित करने की संभावना के सुझाव पर परमाणु बम हमलों के पीड़ितों और शांति संगठनों ने कड़ा घरेलू विरोध किया है।
जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, जापान के लगभग सत्तर प्रतिशत नागरिक गैर-परमाणु सिद्धांतों को बरकरार रखने के पक्ष में हैं। लेकिन रणनीतिक जरूरतें उलटी दिशा में धकेल रही हैं। उत्तर कोरिया के परमाणु शस्त्रागार और क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता ने अमेरिकी विस्तारित प्रतिरोधक सुरक्षा की कमियां उजागर कर दी हैं। विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर जापान ने परमाणु हथियार विकसित किए, तो अस्थिरता का सिलसिला शुरू हो सकता है। इससे दक्षिण कोरिया भी परमाणु प्रसार की राह पर जा सकता है और क्षेत्रीय हथियारों की होड़ छिड़ सकती है, जो बीजिंग के हिसाब-किताब को और जटिल करेगी तथा पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मौजूदा परमाणु अप्रसार व्यवस्थाओं को कमजोर कर सकती है।
सीवीआईडी का अंत
वॉशिंगटन भी अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करने की स्थिति में है। ट्रंप प्रशासन की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में उत्तर कोरिया का बिल्कुल उल्लेख नहीं था, जो उच्चतम स्तर पर नीतिगत शून्य का संकेत देता है। इस बीच, "पूर्ण, सत्यापन योग्य और अपरिवर्तनीय परमाणु निरस्त्रीकरण" का पारंपरिक लक्ष्य अब कूटनीतिक दिखावा बन गया है। बीजिंग अब प्रतिबंध व्यवस्था में अनिच्छुक भागीदार नहीं रहा; आर्थिक जीवनरेखाएं और कूटनीतिक संरक्षण देकर वह तेजी से इसे कमजोर करने वाला केंद्रीय किरदार बन गया है।
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के प्रमुख सुरक्षा अध्ययन विशेषज्ञ विक्टर चा ने अमेरिका से परमाणु निरस्त्रीकरण की अवास्तविक कोशिश छोड़कर "शीत शांति" की राह अपनाने का आग्रह किया है। इसमें हथियार नियंत्रण, संकट प्रबंधन और जोखिम घटाने को प्राथमिकता दी जाएगी। उनका मानना है कि उत्तर कोरिया के मौजूदा शस्त्रागार का आकार और परिष्कार दिखाता है कि पहले अपनाए गए तरीके नाकाम रहे हैं।
परमाणु निरस्त्रीकरण एक नेक लक्ष्य है, लेकिन अतीत की नीतिगत विफलताओं और परमाणु हथियार हासिल करने के उत्तर कोरिया के अडिग संकल्प ने फिलहाल इसे अप्राप्य बना दिया है। वॉशिंगटन को अपनी रणनीति का तर्क उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों को खत्म करने से हटाकर ऐसे तात्कालिक लक्ष्य हासिल करने की ओर मोड़ना होगा, जो इन हथियारों से अमेरिका को अधिक सुरक्षित बनाएंगे।
चा का तर्क है कि उत्तर कोरिया का शस्त्रागार इतना बड़ा हो चुका है कि उसे खत्म करने की कोशिश से अमेरिकी सहयोगियों पर तबाही का जोखिम होगा। वहीं, चीन की सीमा के पास स्थित ठिकानों पर सैन्य हमले बीजिंग के साथ व्यापक तनाव भड़का सकते हैं। इसके बजाय, वह आकस्मिक तनाव बढ़ने से रोकने के लिए सीधे संचार चैनल, परीक्षणों की आवृत्ति और मिसाइल उत्पादन पर सीमाएं, तथा सियोल और टोक्यो के साथ मजबूत मिसाइल रक्षा सहयोग का प्रस्ताव रखते हैं। लक्ष्य अब हथियार खत्म करना नहीं, बल्कि उनका प्रबंधन होगा। परमाणु-सशस्त्र उत्तर कोरिया को रणनीतिक परिदृश्य की स्थायी वास्तविकता मानते हुए, परमाणु तकनीक को दूसरे पक्षों तक पहुंचने से रोकना होगा।
यह यथार्थवाद उस परिचालन वास्तविकता को दर्शाता है जिसे चीन और रूस पहले ही स्वीकार कर चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र का प्रतिबंध निगरानी तंत्र निष्क्रिय हो चुका है और चीन की आर्थिक मदद तथा रूस के सैन्य सहयोग से प्रतिबंध व्यवस्था कमजोर पड़ रही है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास निरस्त्रीकरण के लिए दबाव बनाने के साधन नहीं बचे हैं। इस अप्रैल में प्योंगयांग में हुए मुस्कुराहटों और हाथ मिलाने के दौर परमाणु वार्ता फिर शुरू होने के संकेत नहीं थे। वे एक नई यथास्थिति की पुष्टि थे, जिसमें परमाणु-सशस्त्र उत्तर कोरिया महाशक्तियों के टकराव के दौर में एक स्थायी बफर का काम करता है।
निचोड़
- चीन ने उत्तर कोरिया के संदर्भ में अपनी कूटनीतिक शब्दावली से "परमाणु निरस्त्रीकरण" हटा दिया है। यह संकेत देता है कि उसने प्योंगयांग की परमाणु स्थिति को अमेरिका के खिलाफ रणनीतिक बफर के रूप में स्वीकार कर लिया है।
- वांग यी के हाथों पार्टी और राज्य की सत्ता का केंद्रीकरण तथा अहम संपर्क पदों पर सुरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति दर्शाती है कि बीजिंग ने इस रिश्ते को कूटनीतिक के बजाय वैचारिक और आंतरिक रूप में नए सिरे से परिभाषित किया है।
- उत्तर कोरिया का फरवरी 2026 का "शत्रुतापूर्ण दो-राज्य" सिद्धांत एकीकरण की बयानबाजी छोड़ता है और परमाणु हथियारों को युद्ध में इस्तेमाल की जा सकने वाली परिचालन क्षमता के रूप में स्थापित करता है। इसमें कमान ढांचे को खतरा होने पर स्वचालित प्रक्षेपण के प्रावधान भी शामिल हैं।
- बीजिंग, मॉस्को और प्योंगयांग को जोड़ने वाला त्रिपक्षीय गठजोड़ मजबूत हुआ है। उत्तर कोरिया तकनीक और आर्थिक मदद के बदले रूस को हथियार और सैनिक दे रहा है, जबकि चीन कूटनीतिक संरक्षण दे रहा है।
- उत्तर कोरिया को अलग राज्य मानकर उससे जुड़ने की दक्षिण कोरिया की कोशिशों के सामने संवैधानिक बाधाएं हैं, क्योंकि संविधान पूरे प्रायद्वीप को दक्षिण कोरियाई क्षेत्र मानता है। वहीं, अमेरिका गठबंधन के औपचारिक लक्ष्य के रूप में परमाणु निरस्त्रीकरण पर कायम है।
- क्षेत्रीय खतरों के जवाब में जापान अपने गैर-परमाणु सिद्धांत छोड़ने पर बहस कर रहा है। इससे पूर्वोत्तर एशिया में व्यापक परमाणु प्रसार शुरू हो सकता है।
- अमेरिकी नीति विशेषज्ञ तेजी से सीवीआईडी लक्ष्य से हटकर "शीत शांति" की रणनीति अपनाने की वकालत कर रहे हैं, जिसमें निरस्त्रीकरण के बजाय हथियार नियंत्रण, संकट प्रबंधन और प्रतिरोध पर जोर हो।






