समुद्री भूमिका के लिए इंडोनेशिया का नया दृष्टिकोण
इंडोनेशिया रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज़ों पर शुल्क लगाने के विवादास्पद प्रस्ताव पर विचार कर रहा है। यह कदम दुनिया के सबसे व्यस्त नौवहन गलियारों में से एक से सदियों से जारी मुक्त आवागमन को चुनौती देगा। वित्त मंत्री पुरबाया युधि सदेवा ने बुधवार को जकार्ता में एक संगोष्ठी के दौरान यह विचार सामने रखा। उन्होंने इसे राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के उस रणनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा बताया, जिसका उद्देश्य इंडोनेशिया को वैश्विक वाणिज्य के केंद्र में लाना है, न कि हाशिये की अर्थव्यवस्था बनाए रखना।
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सरकारी बुनियादी ढांचा वित्तपोषक संस्था सराना मल्टी इन्फ्रास्ट्रक्चर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पुरबाया ने कहा, "इंडोनेशिया कोई हाशिये का देश नहीं है। हम वैश्विक व्यापार और ऊर्जा के एक अहम मार्ग पर स्थित हैं, फिर भी मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज़ों से शुल्क नहीं लिया जाता।" उन्होंने जोर दिया कि किसी भी शुल्क प्रणाली के लिए पड़ोसी मलेशिया और सिंगापुर के साथ समन्वय जरूरी होगा, जिनकी इस जलमार्ग पर साझा संप्रभुता है। हालांकि, उन्होंने कहा कि जलडमरूमध्य के तट का सबसे बड़ा हिस्सा इंडोनेशिया के नियंत्रण में है। वित्त मंत्री ने माना कि प्रस्ताव अभी शुरुआती चरण में है और तटीय देशों के बीच सहमति बनाने की जटिलता तथा वैश्विक नौवहन हितों के संभावित विरोध को देखते हुए इसे जल्द लागू किए जाने की संभावना नहीं है।
वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और अन्य क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव के बीच मलक्का जलडमरूमध्य पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान फिर बढ़ा है। यह जलमार्ग हिंद और प्रशांत महासागरों को जोड़ने वाला अहम गलियारा है। इससे हर साल करीब 94,000 जहाज़ गुजरते हैं और दुनिया के कुल व्यापारिक माल का लगभग 30% इसी रास्ते से जाता है। इंडोनेशिया के पास पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन वह बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण की चुनौती से जूझता है। ऐसे में इस जलमार्ग से संभावित राजस्व सरकार के लिए आकर्षक है। सरकार अपने क्षेत्रीय जल पर अधिक आर्थिक संप्रभुता जताने और राजस्व के पारंपरिक स्रोतों पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रही है। यह जलडमरूमध्य जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसी प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को मध्य पूर्व और यूरोप के बाजारों से जोड़ता है, जिससे यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अपरिहार्य बन जाता है।
ईरान का मॉडल और कानूनी उलझन
शुल्क लगाने के पक्ष में तर्क देते हुए पुरबाया ने स्पष्ट रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की मौजूदा गतिविधियों का उल्लेख किया। खबरों के मुताबिक, वहां इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने विवादित जलमार्ग से सुरक्षित गुजरने के लिए चुनिंदा जहाज़ों से 20 लाख डॉलर तक वसूलना शुरू किया है। अमेरिका और इज़राइल के साथ कई हफ्तों तक चले सशस्त्र संघर्ष के बाद ईरान ने प्रभावी रूप से समुद्री टोल प्रणाली कायम कर ली है। नौवहन विश्लेषकों का कहना है कि इससे उसे काफी राजस्व मिल रहा है, साथ ही ऊर्जा के उस अहम मार्ग पर यातायात सीमित हो रहा है जहां से दुनिया की तेल खपत का 20% गुजरता है।
हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ईरान की कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का स्पष्ट उल्लंघन है। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (यूएनसीएलओएस), जिसे 172 देशों ने अनुमोदित किया है, अनुच्छेद 17 में दिए गए "निर्बाध मार्ग के अधिकार" के तहत अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों से नौवहन की स्वतंत्रता की गारंटी देती है। अनुच्छेद 26 तटीय देशों को केवल गुजरने के अधिकार के लिए विदेशी जहाज़ों से शुल्क लेने से स्पष्ट रूप से रोकता है। शुल्क केवल पायलट सेवा या बंदरगाह सुविधाओं जैसी विशिष्ट सेवाओं के लिए लिया जा सकता है।
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रोफेसर डोनाल्ड रोथवेल ने कहा, "ईरान द्वारा टोल लगाने की कोशिश अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों पर लागू समुद्री कानून की हमारी समझ के अनुरूप नहीं है। मलक्का और सिंगापुर जलडमरूमध्य इसके प्रमुख उदाहरण हैं।" पेरिस के सोरबोन विश्वविद्यालय में समुद्री कानून के विशेषज्ञ फिलिप देलेबेक ने चेतावनी दी कि ऐसे उल्लंघनों को अनुमति देने से डोमिनो प्रभाव हो सकता है। उन्होंने पूछा, "अगर होर्मुज जलडमरूमध्य बंद किया जा सकता है, तो भूमध्य सागर और अटलांटिक के बीच जिब्राल्टर जलडमरूमध्य या इंडोनेशिया के पास मलक्का जलडमरूमध्य क्यों नहीं?" उन्होंने ऐसे परिदृश्य को "अंतरराष्ट्रीय समाज का अंत" बताया, जो इस सिद्धांत पर आधारित है कि समुद्र किसी एक देश का नहीं है।
सिंगापुर का अडिग विरोध
इंडोनेशिया के प्रस्ताव का सबसे मुखर विरोध सिंगापुर ने किया है। विदेश मंत्री विवियन बालकृष्णन ने सिंगापुर मैरीटाइम वीक 2026 के दौरान इसे स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। दुनिया के सबसे व्यस्त माल हस्तांतरण केंद्रों में से एक का संचालन करने वाले इस नगर-राज्य का कहना है कि टोल प्रणाली सदियों से समुद्री व्यापार को संचालित करने वाले अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन होगी।
पारगमन का अधिकार सभी के लिए सुनिश्चित है। हम अपने पड़ोस में जलमार्ग बंद करने, आवागमन रोकने या टोल लगाने की किसी भी कोशिश में शामिल नहीं होंगे।
संसद में सवालों के जवाब देते हुए बालकृष्णन ने इस रुख को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों से गुजरना तटीय देशों द्वारा दिया गया विशेषाधिकार नहीं, बल्कि अंतर्निहित अधिकार है। उन्होंने सांसदों से कहा, "यह सीमावर्ती देश द्वारा दिया जाने वाला विशेषाधिकार नहीं है, न ही ऐसा लाइसेंस है जिसके लिए मिन्नत करनी पड़े, और न ही कोई टोल है जिसे चुकाना हो। यह जहाज़ों का वहां से गुजरने का अधिकार है।"
सिंगापुर का रुख उसकी आर्थिक वास्तविकताओं से जुड़ा है। प्राकृतिक संसाधनों से वंचित एक छोटे द्वीपीय देश के रूप में उसकी समृद्धि पूरी तरह समुद्री व्यापार केंद्र की हैसियत पर निर्भर करती है, जहां हर दिन 500 से अधिक जहाज़ गुजरते हैं। मलक्का जलडमरूमध्य से मुक्त आवागमन पर कोई भी रोक इस नगर-राज्य की आर्थिक जीवनरेखा को खतरे में डाल सकती है। साथ ही, दुनिया भर के अहम समुद्री मार्गों पर ऐसी ही पाबंदियां लगने का रास्ता खुल सकता है, स्वेज नहर से लेकर पनामा नहर तक। नगर-राज्य फिलहाल तुआस बंदरगाह का निर्माण कर रहा है, जो 2040 में पूरा होने पर दुनिया का सबसे बड़ा स्वचालित टर्मिनल होगा और निर्बाध समुद्री पहुंच पर उसकी निर्भरता को और मजबूत करेगा।
ऐतिहासिक मिसालें और क्षेत्रीय यादें
इंडोनेशिया का प्रस्ताव तीन दशक पहले की ऐसी ही कोशिशों की याद दिलाता है। अक्टूबर 1992 में मलेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज़ों पर टोल लगाने पर चर्चा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाने की योजना घोषित की थी। महाथिर ने जहाज़ों से जुड़ी दुर्घटनाओं में बढ़ोतरी का हवाला देते हुए कहा था कि सुरक्षा उपायों का खर्च उपयोगकर्ताओं को उठाना चाहिए। उन्होंने कहा था कि "किसी प्राधिकरण को किसी न किसी रूप में भुगतान करना होगा, जो जलडमरूमध्य को खुला रखने और नौवहन के जोखिम घटाने के लिए जिम्मेदार होगा।" इससे पहले दक्षिण में इंडोनेशिया और उत्तर में मलेशिया तथा सिंगापुर के बीच स्थित 1,000 किलोमीटर लंबे जलमार्ग के इस्तेमाल के लिए जहाज़ कोई टोल नहीं देते थे।
अंतरराष्ट्रीय विरोध और इस एहसास के चलते कि एकतरफा टोल स्थापित समुद्री कानून का उल्लंघन होगा, वह पहल नाकाम हो गई। आज रणनीतिक माहौल और जटिल हो गया है। अब वैश्विक व्यापार का करीब 40% इस जलडमरूमध्य से गुजरता है। इसमें मध्य पूर्व से चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी एशियाई आर्थिक शक्तियों तक जाने वाले तेल का बड़ा हिस्सा शामिल है। अपने सबसे संकरे बिंदु पर यह जलमार्ग महज 2.7 किलोमीटर चौड़ा है। यह होर्मुज जलडमरूमध्य से दस गुने से भी अधिक संकरा है और व्यवधान के प्रति खास तौर पर संवेदनशील है।
मलेशियाई अधिकारी आज मलक्का जलडमरूमध्य की तुलना होर्मुज से करने को खारिज करते हैं। रक्षा मंत्री मोहम्मद खालिद नोर्दिन ने हाल ही में जोर देकर कहा कि तीनों तटीय देशों पर ईरान जैसे भू-राजनीतिक दबाव नहीं हैं। उन्होंने कहा, "होर्मुज में जो हुआ, उसका अनुकरण नहीं किया जाना चाहिए। मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर को ईरान जैसी परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ रहा है।" इसके बावजूद, मलेशिया ने क्षेत्रीय तनावों से निपटने के लिए अपना अलग रास्ता अपनाया है। उसने नाकेबंदी वाले होर्मुज जलडमरूमध्य से मलेशियाई जहाज़ों के गुजरने का रास्ता सुनिश्चित करने के लिए ईरान से सीधी बातचीत की। सिंगापुर के अधिकारियों ने इसकी आलोचना की है, क्योंकि उनके मुताबिक ऐसी बातचीत अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन को वैधता देती है।
महाशक्तियों की होड़ और संप्रभुता से जुड़ी चिंताएं
टोल पर यह बहस इंडोनेशिया और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग के बीच हो रही है। अप्रैल की शुरुआत में जकार्ता और वाशिंगटन ने प्रमुख रक्षा सहयोग साझेदारी (एमडीसीपी) पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद खबरें आईं कि ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी सैन्य विमानों के लिए इंडोनेशियाई हवाई क्षेत्र से असीमित उड़ान की अनुमति मांगी है। इंडोनेशियाई अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ऐसी कोई निर्बाध पहुंच नहीं दी गई है, लेकिन इस खुलासे से संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर सैन्य हलकों में बहस छिड़ गई।
इंडोनेशियाई सशस्त्र बलों के कर्नल आर्म ओके किस्तियान्तो ने एक विस्तृत आकलन प्रकाशित कर चेतावनी दी कि ऐसे समझौते गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं और इंडोनेशिया को ऐसे संघर्षों में खींच सकते हैं जिन पर उसका नियंत्रण न हो। किस्तियान्तो ने लिखा, "हवाई क्षेत्र राज्य की संप्रभुता का एक मूल क्षेत्र है। जब कोई बड़ी शक्ति इस क्षेत्र तक पहुंच मांगती है, तो दांव पर केवल उड़ान की अनुमति नहीं होती, बल्कि उसका रणनीतिक महत्व भी होता है: किसे परिचालन लाभ मिलता है, दूसरे देश इसकी क्या व्याख्या करते हैं और क्या यह फैसला इंडोनेशिया की विदेश नीति की दिशा के अनुरूप है।"
हाल में अमेरिकी नौसेना की गतिविधियों ने इस जलमार्ग में अमेरिका की रणनीतिक दिलचस्पी को रेखांकित किया है। 240 मीटर लंबा अभियान समुद्री अड्डा पोत यूएसएस मिगुएल कीथ अप्रैल के मध्य में जलडमरूमध्य से गुजरा। अमेरिकी नौसेना ने इन गतिविधियों को नियमित बताया। इंडोनेशिया ने पुष्टि की कि यह आवागमन अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप था, लेकिन अमेरिकी युद्धपोतों की मौजूदगी यह दिखाती है कि आर्थिक संप्रभुता जताने और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा में उलझने से बचने के बीच जकार्ता को कितना नाजुक संतुलन बनाए रखना होगा।
चीन इन घटनाक्रमों को लेकर खास तौर पर चिंतित है। चीनी रणनीतिकार लंबे समय से मलक्का जलडमरूमध्य को देश की ऊर्जा सुरक्षा व्यवस्था की एक बड़ी कमजोर कड़ी मानते आए हैं। 2000 के दशक की शुरुआत में हू जिंताओ के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान उन्होंने तेल आपूर्ति रोक सकने वाली नौसैनिक नाकेबंदी के जोखिम को बताने के लिए "मलक्का दुविधा" शब्द गढ़ा था। जलडमरूमध्य से गुजरने पर कोई भी रोक या शुल्क लगाने का कदम बीजिंग में चिंता बढ़ाएगा। चीन अपनी आयातित ऊर्जा का करीब 70% इसी जलमार्ग से मंगाता है और वहां अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ने को गहरी शंका से देखता है।
आर्थिक वास्तविकताएं और व्यावहारिक बाधाएं
जलडमरूमध्य से राजस्व जुटाने का राजनीतिक आकर्षण होने के बावजूद, इंडोनेशिया को किसी भी टोल प्रणाली को लागू करने में बड़ी व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। मलक्का जलडमरूमध्य करीब 1,000 किलोमीटर लंबा है और इसके किनारे तीन संप्रभु देश हैं। तीनों देशों के बीच समझौता न होने पर जहाज़ इंडोनेशियाई शुल्क से बचने के लिए मलेशिया या सिंगापुर के तटों के करीब से गुजर सकते हैं। इससे शुल्क का कोई आर्थिक अर्थ नहीं रह जाएगा और क्षेत्रीय संबंधों पर दबाव पड़ेगा। इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर दशकों से समुद्री डकैती रोकने के लिए सहयोग करते आए हैं, लेकिन टोल प्रणाली के लिए समन्वय का बिल्कुल अलग स्तर जरूरी होगा।
आर्थिक दांव जकार्ता के राजस्व अनुमानों से कहीं आगे तक जाते हैं। इस जलडमरूमध्य से हर साल करीब 82,000 जहाज़ गुजरते हैं। इनमें कच्चे तेल के टैंकर, तरलीकृत प्राकृतिक गैस के जहाज़ और पूर्वी एशिया की विनिर्माण आपूर्ति शृंखलाओं के लिए माल ले जाने वाले कंटेनर जहाज़ शामिल हैं। किसी भी व्यवधान या अतिरिक्त लागत का असर वैश्विक बाजारों पर पड़ेगा। इससे दुनिया भर के उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ सकती हैं और उन समयबद्ध आपूर्ति प्रणालियों को खतरा हो सकता है जिन पर आधुनिक उद्योग निर्भर हैं। ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि 10 लाख करोड़ डॉलर मूल्य का वैश्विक समुद्री व्यापार, यानी कुल व्यापार का तीन-चौथाई हिस्सा, मलक्का समेत 13 प्रमुख समुद्री संकरे मार्गों से गुजरता है।
वित्त मंत्री पुरबाया ने इन जटिलताओं को स्वीकार करते हुए कहा कि प्रस्ताव अभी शुरुआती चरण में है और इसे जल्द लागू किए जाने की संभावना नहीं है। उन्होंने कहा, "हमारे पास इतने संसाधन हैं कि हमें रक्षात्मक ढंग से नहीं सोचना चाहिए। हमें अधिक सक्रिय होकर सोचना शुरू करना होगा, लेकिन नपे-तुले तरीके से।" इस नपे-तुले दृष्टिकोण में इंडोनेशिया की अधिक आर्थिक संप्रभुता की आकांक्षाओं को उन कानूनी व्यवस्थाओं और कूटनीतिक वास्तविकताओं के साथ संतुलित करना होगा, जिनकी वजह से मलक्का जलडमरूमध्य पीढ़ियों से वैश्विक वाणिज्य के लिए खुला रहा है।
मुख्य बिंदु
- इंडोनेशिया के वित्त मंत्री पुरबाया युधि सदेवा ने मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज़ों पर शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। उन्होंने इसे राष्ट्रपति प्रबोवो के उस दृष्टिकोण से जोड़ा, जिसका उद्देश्य इंडोनेशिया को हाशिये की अर्थव्यवस्था के बजाय वैश्विक व्यापार का केंद्रीय भागीदार बनाना है।
- सिंगापुर के विदेश मंत्री विवियन बालकृष्णन ने इस प्रस्ताव को कड़े शब्दों में खारिज किया है। उनका कहना है कि यूएनसीएलओएस के तहत अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्यों से पारगमन का अधिकार सुनिश्चित है और उस पर टोल नहीं लगाया जाना चाहिए।
- इस प्रस्ताव में होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की मौजूदा टोल वसूली का संदर्भ दिया गया है, जहां खबरों के मुताबिक जहाज़ों से गुजरने के लिए 20 लाख डॉलर तक लिए जा रहे हैं। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे शुल्क संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन करते हैं।
- मलक्का जलडमरूमध्य से वैश्विक व्यापार का करीब 40% और सालाना 82,000 जहाज़ गुजरते हैं। यह चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं तक ऊर्जा आपूर्ति पहुंचाने वाला अपरिहार्य मार्ग है।
- मलेशिया ने 1992 में इसी तरह का टोल लगाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन कानूनी और कूटनीतिक विरोध के चलते योजना छोड़ दी। मलेशियाई अधिकारी अब मलक्का और होर्मुज की तुलना को खारिज करते हैं, जबकि नाकेबंदी वाले जलडमरूमध्य को लेकर ईरान के साथ अलग से बातचीत कर रहे हैं।
- अमेरिका ने हाल में इंडोनेशिया के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाया है और जलडमरूमध्य में नौसैनिक गश्त जारी रखी है। इससे वाशिंगटन और बीजिंग के साथ संबंधों को संतुलित करते हुए आर्थिक संप्रभुता जताने की जकार्ता की कोशिश और जटिल हो गई है।






