होर्मुज़ की नाकेबंदी
ईरान में युद्ध, जो फरवरी के अंत में संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरानी ठिकानों पर हमले शुरू करने के बाद भड़का, 1970 के दशक के अरब तेल प्रतिबंध के बाद सबसे गंभीर ऊर्जा संकट बन गया है। शुरुआती हमलों के कुछ ही दिनों के भीतर ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया। यह संकरा समुद्री मार्ग अपने सबसे पतले हिस्से में महज़ 33 किलोमीटर चौड़ा है और दुनिया की कुल तेल खपत का करीब 20 प्रतिशत संभालता है। इस अहम मार्ग से टैंकरों की आवाजाही प्रतिदिन लगभग 100 से 150 जहाज़ों से घटकर कुछ दिनों में इकाई अंकों तक रह गई है। जलडमरूमध्य में या उसके आसपास सैन्य हमलों में अब तक 18 जहाज़ निशाना बनाए जा चुके हैं।
विषय-सूची
आर्थिक झटके तुरंत और भीषण रहे हैं। संघर्ष से पहले ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत करीब 71 डॉलर प्रति बैरल थी, जो बाद के हफ्तों में बढ़कर 100 डॉलर से ऊपर पहुंच गई और कुछ समय के लिए कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर जा पहुंची। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों से अब तक की सबसे बड़ी निकासी का समन्वय किया। सदस्य देशों ने बाज़ार को शांत करने के लिए 40 करोड़ बैरल तक भंडार से निकाले। लेकिन इस अभूतपूर्व हस्तक्षेप से भी केवल अस्थायी राहत मिली है, क्योंकि आपूर्ति में वास्तविक व्यवधान आपातकालीन निकासी की रफ्तार से कहीं तेज़ है।
मध्य पूर्व में मिसाइलें बरस रही हैं, लेकिन इसके आर्थिक नतीजों का सबसे गहरा असर एशिया पर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का लगभग 80 प्रतिशत और तरलीकृत प्राकृतिक गैस का करीब 90 प्रतिशत एशियाई बाज़ारों के लिए था। इस भौगोलिक स्थिति ने क्षेत्रीय संघर्ष को पूरे महाद्वीप का आर्थिक आपातकाल बना दिया है। सरकारों को उस प्रक्रिया में ऊर्जा का बंटवारा करना पड़ रहा है जिसे विशेषज्ञ ‘ऊर्जा ट्रायेज’ कहते हैं: यह मुश्किल फैसला कि किन क्षेत्रों को ईंधन मिलेगा और किन्हें नहीं।
जोखिम सभी पर समान रूप से नहीं है। जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और हांगकांग समेत एशिया की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और रणनीतिक भंडार हैं, जो उन्हें तत्काल संकट से कुछ हद तक बचाते हैं। जापान के पास करीब 254 दिनों की तेल आपूर्ति है, जबकि दक्षिण कोरिया ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के कार्यक्रम के तहत अपने भंडार से 2.246 करोड़ बैरल जारी किए हैं। फिर भी, इन भंडारों को लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने की स्थिति से निपटने के लिए नहीं बनाया गया था। दोनों देशों के राष्ट्रीय भंडार समाप्त होने से पहले करीब 200 दिनों की आपूर्ति ही दे सकते हैं।
एशिया के वे देश जो अमीर नहीं हैं, उनकी आर्थिक स्थिरता पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे देशों में जीवाश्म ईंधन के आयात पर भारी निर्भरता, राजकोषीय गुंजाइश की गंभीर कमी और ऐसे ऊर्जा तंत्र का खतरनाक मेल है जो तेजी से दूसरे विकल्पों पर नहीं जा सकते। इन देशों के लिए होर्मुज़ का बंद होना केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक अशांति, खाद्य असुरक्षा और राजनीतिक अस्थिरता को भड़का सकता है। यह स्थिति उन संकटों की याद दिलाती है जिन्होंने 1997 के एशियाई वित्तीय संकट के दौरान सरकारों को गिरा दिया था।
सड़कों पर मानवीय कीमत
आंकड़ों के पीछे पूरे महाद्वीप में रोज़ सामने आ रही गहरी मानवीय तकलीफ छिपी है। फिलीपींस में, जहां सरकार ने राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित किया है, सार्वजनिक परिवहन की रीढ़ माने जाने वाले मशहूर जीपनी चालक अपनी रोज़ी-रोटी को मिटते देख रहे हैं। रंग-बिरंगे सजावटी वाहनों में से एक को वर्षों तक चलाने वाले कार्लोस ब्रागल जूनियर की रोज़ की कमाई बारह घंटे की पारी के लिए 1,000 से 1,200 पेसो से घटकर महज़ 200 से 500 पेसो रह गई है। उनका कहना है कि सरकार की ईंधन सब्सिडी से बमुश्किल दो दिन गाड़ी चलाई जा सकती है।
इस काम की वजह से मैंने अपनी बेटियों को स्कूल भेजा। एक अभी-अभी स्नातक हुई है और दूसरी स्नातक होने वाली है। हमारी ज़िंदगी अच्छी थी। लेकिन अब हमें नहीं पता कि अगले कुछ हफ्तों में हमारा क्या होगा। अगर यह जारी रहा, तो यह निश्चित रूप से हमें और हमारे परिवार को खत्म कर देगा।
श्रीलंका में, जहां ईंधन बचाने के लिए सरकार ने बुधवार को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है, 2022 के वित्तीय संकट को याद करने वाले कामगारों को इस विडंबना का एहसास है कि उस संकट के दौरान देश के पास ईंधन खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार नहीं बचा था। कोलंबो के एक निवासी ने कहा, “पिछली बार देश के पास ईंधन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। अब देश के पास पैसे हैं, लेकिन खरीदने के लिए ईंधन नहीं है।” लॉन काटने की मशीन चलाने वाले निमल पेट्रोल पंपों पर लंबी, घुमावदार कतारों में इतना इंतज़ार करते हैं कि काम के मौके प्रतिद्वंद्वियों के हाथ चले जाते हैं। उन्होंने कहा, “हम बड़ी मुश्किल से रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी कर रहे हैं। ईंधन भरवाकर काम पर लौटने तक हो सकता है कि मेरी जगह कोई और काम पर लग चुका हो।”
थाईलैंड ने ऐसे कदम उठाए हैं जो सामान्य हालात में अविश्वसनीय लगते। सरकारी प्रसारक थाई पीबीएस के समाचार प्रस्तोताओं ने ऊर्जा बचत को बढ़ावा देने के लिए प्रसारण के दौरान अपने ब्लेज़र उतार दिए। सरकारी कार्यालयों में अब तापमान 26 से 27 डिग्री सेल्सियस रखा जा रहा है और अधिकारियों से लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करने को कहा गया है। प्रसारण के दौरान पोशाक बदलने की पहल में शामिल समाचार प्रस्तोता सिरिमा सोंगक्लिन ने कहा कि यह यकीन करना मुश्किल है कि इतनी छोटी-सी बात हम पर मौजूदा संघर्ष के स्पष्ट असर को दिखा सकती है।
भारत में, जहां गैस की कमी के कारण गुजरात का सिरेमिक उद्योग कई हफ्तों से बंद है, प्रवासी कामगारों को तत्काल भूख का सामना करना पड़ रहा है। कारखाने बंद होने से काम ठप पड़े करीब 4 लाख श्रमिकों में से एक सचिन पराशर ने कहा, “अगर मैं बिना काम के यहां रहा, तो मुझे भूखा रहना पड़ेगा।” उपमहाद्वीप में खाना पकाने के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली तरलीकृत पेट्रोलियम गैस की कमी ने मुंबई के रेस्तरां को धीमी आंच पर पकने वाली करी और डीप-फ्राइड चीज़ें मेन्यू से हटाने पर मजबूर किया है। वहीं, जेट ईंधन की बढ़ती कीमतों और यात्रियों की चिंता के चलते होटलों में कमरों की बुकिंग घटकर 10 प्रतिशत तक रह गई है।
आपातकालीन उपाय और राशनिंग
आर्थिक पतन की आशंका के बीच एशियाई सरकारों ने ऊर्जा बचाने के लिए सख्त कदम उठाए हैं, जो कोविड-19 महामारी के दौरान समाज को अपनाने पड़े बदलावों की याद दिलाते हैं। फिलीपींस ने सरकारी कर्मचारियों के लिए चार-दिवसीय कार्यसप्ताह लागू किया है और दोपहर के भोजन के अवकाश में कंप्यूटर बंद रखने का आदेश दिया है। पाकिस्तान ने दो हफ्तों के लिए स्कूल बंद कर दिए हैं और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए हाइब्रिड काम की व्यवस्था लागू की है। बांग्लादेश ने रमज़ान के साथ मेल बैठाने के लिए विश्वविद्यालयों की छुट्टियां पहले कर दीं, जबकि श्रीलंका ने स्कूलों और सार्वजनिक क्षेत्र के कामकाज के लिए चार-दिवसीय सप्ताह शुरू किया है।
म्यांमार के सैन्य अधिकारियों ने वाहन नंबर प्लेट के आधार पर सख्त ईंधन राशनिंग लागू की है, जिसके तहत निजी वाहन केवल एक दिन छोड़कर चलाए जा सकते हैं। वियतनाम ने बड़े पैमाने पर दूरस्थ काम अपनाने की अपील की है। इंडोनेशिया के सामने ईद-उल-फितर के दौरान ईंधन सब्सिडी जारी रखने की चुनौती है। इस अवधि में 14.39 करोड़ यात्राओं का अनुमान है, जबकि इसकी लागत से राष्ट्रीय बजट घाटा सकल घरेलू उत्पाद की तीन प्रतिशत की कानूनी सीमा से ऊपर जा सकता है।
सब्सिडी की दुविधा गरीब एशियाई देशों के सामने मौजूद असंभव विकल्पों को दिखाती है। इंडोनेशिया ने ईंधन और बिजली की कीमतें सस्ती बनाए रखने के लिए अरबों डॉलर की राशि आवंटित की है, लेकिन राजकोषीय सीमाएं तय करती हैं कि यह सहायता कितने समय तक जारी रह सकती है। पाकिस्तान ने शुरुआत में किसानों और परिवहन कामगारों के लिए लक्षित सब्सिडी शुरू की थी, लेकिन संकट लंबा खिंचने पर उसे घटाना पड़ा। थाईलैंड के अधिकारियों के सामने कठिन विकल्प है: सब्सिडी खत्म करने से भंडार और घटने पर लोगों में घबराहट फैल सकती है, जबकि इसे जारी रखने से सीमित राजकोषीय संसाधन खत्म होते हैं। इंडोनेशिया में ईद के बाद ईंधन की कीमतों को लेकर क्या होगा, इस पर एनर्जी शिफ्ट इंस्टीट्यूट के पुत्र अधिगुना ने कहा, “इसके बाद क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है।”
गहरी खाई: भंडार बनाम दिवालियापन
संकट ने एशिया के अमीर और विकासशील देशों के बीच की बुनियादी खाई उजागर कर दी है। जापान और दक्षिण कोरिया के पास विदेशी मुद्रा भंडार और संस्थागत क्षमता है, जिससे वे महीनों तक व्यवधान झेल सकते हैं। हालांकि, इन देशों को भी मुद्रास्फीतिजनित मंदी और औद्योगिक सुस्ती का जोखिम है। चीन के पास 130 दिनों की खपत के बराबर विशाल भंडार है और रूसी पाइपलाइनों से अतिरिक्त आपूर्ति भी मिलती है। घरेलू आपूर्ति बचाने के लिए उसने पेट्रोलियम निर्यात पर रोक लगाई है, हालांकि दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के लिए रणनीतिक अपवाद रखे हैं।
पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे संकटों से जूझ चुके देशों के लिए हालात गंभीर हैं। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार सकल आधार पर 16.4 अरब डॉलर है, लेकिन विदेशी मुद्रा देनदारियों को गिनने पर यह प्रभावी रूप से नकारात्मक हो जाता है। देश को संयुक्त अरब अमीरात का 3.5 अरब डॉलर का कर्ज चुकाना है और साथ ही 7 अरब डॉलर का आईएमएफ कार्यक्रम भी जारी रखना है। इस बीच ईंधन की कीमतें 40 प्रतिशत बढ़ गई हैं और खाड़ी देशों में काम करने वाले श्रमिकों से आने वाले धन में कमी की आशंका है। श्रीलंका ने आईएमएफ के बेलआउट कार्यक्रम की शर्तों में अस्थायी ढील पर बातचीत की है और ईंधन सब्सिडी फिर शुरू की है। लेकिन पर्यटन संचालक सानोज़ वीरतुंगे का कहना है कि कोविड के बाद सुधार की उम्मीदों के बावजूद कारोबार एक-तिहाई घट गया है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने संकेत दिया है कि वह प्रभावित देशों को 20 अरब से 50 अरब डॉलर तक की आपात सहायता देने के लिए तैयार है। इसकी प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने माना कि किसी के हित में यह नहीं है कि शर्तों पर सख्ती बरती जाए और इन देशों को विफल होने दिया जाए। पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के पूर्व गवर्नर रज़ा बाक़िर ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आईएमएफ और अन्य संस्थानों को भरोसेमंद बयान देना चाहिए कि वे इन देशों को सहारा देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा, “और मेरे विचार में जितनी जल्दी हो, उतना बेहतर।”
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मुद्रा पर दबाव और पूंजी के बाहर जाने के लिहाज़ से मौजूदा संकट 1997 के एशियाई वित्तीय संकट की याद दिलाता है, लेकिन इसकी बुनियादी प्रकृति अलग है। 1997 का संकट निश्चित विनिमय दरों, अल्पकालिक विदेशी कर्ज़ के ऊंचे स्तर और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी के घातक मेल से पैदा हुआ था। आज एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के पास कहीं बड़ा भंडार है और उनकी विनिमय दरें कहीं अधिक लचीली हैं। इससे उन्हें ऐसे सुरक्षा कवच मिले हैं जो तीन दशक पहले मौजूद नहीं थे। हालांकि, मौजूदा झटका वित्तीय नहीं, बल्कि भौतिक है: आपूर्ति में ऐसा व्यवधान जो पूंजी खाते के बजाय चालू खाते पर चोट करता है और मुद्रास्फीतिजनित मंदी का जोखिम पैदा करता है, जिससे निपटना मौद्रिक नीति के लिए मुश्किल है।
उद्योगों पर असर और कोयले की वापसी
शायद सबसे अहम प्रतिक्रिया एशिया के बिजली क्षेत्र में देखने को मिली है, जहां संकट ने जलवायु प्रतिबद्धताओं को अस्थायी रूप से छोड़ने पर मजबूर किया है। थाईलैंड ने माए मो बिजलीघर की बंद पड़ी दो कोयला-चालित इकाइयां फिर शुरू कर दी हैं। दक्षिण कोरिया और जापान ने कोयले से बिजली उत्पादन पर लगी पाबंदियां हटा दी हैं, जिससे पुराने संयंत्र अधिक क्षमता पर चल सकेंगे। भारत ने कोयला बिजलीघरों को पूरी क्षमता से चलाने और नियोजित बंदी से बचने का आदेश दिया है। चीन भी, हालांकि अपने घरेलू ऊर्जा उत्पादन के कारण कम प्रभावित है, अधिक कोयला जला रहा है और जहां संभव हो प्राकृतिक गैस की जगह नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहा है।
औद्योगिक असर बिजली से आगे तक फैला है। कच्चे तेल से बनने वाले पेट्रोकेमिकल कच्चे माल नैफ्था की कमी ने एशिया में सेमीकंडक्टर और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन के लिए वह संकट पैदा किया है जिसे विशेषज्ञ लगभग तत्काल संकट कह रहे हैं। नैफ्था की कमी की आशंका से दक्षिण कोरिया के परिवारों ने प्लास्टिक के कचरा बैग जमा कर लिए हैं। जापानी अस्पतालों को पेट्रोलियम से बनी सिरिंज, दस्ताने और डायलिसिस उपकरणों की घटती आपूर्ति की चिंता है। भारत के गुजरात राज्य में गैस की कमी के कारण सिरेमिक उद्योग पूरी तरह बंद हो गया है, जिससे लाखों कामगारों का काम ठप है।
उर्वरक की कमी से खाद्य सुरक्षा को भी उतना ही गंभीर खतरा है। दुनिया के कुल उर्वरक व्यापार का करीब 30 प्रतिशत होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरता है और युद्ध शुरू होने के बाद से कीमतें 35 प्रतिशत बढ़ चुकी हैं। उत्तरी गोलार्ध में बुवाई का मौसम चल रहा है। उर्वरक का कम इस्तेमाल दक्षिण एशिया में फसल पैदावार घटा सकता है, जहां लोग अपनी आय का करीब आधा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम के मुताबिक, जहाज़ों के मार्ग बदलने से दक्षिण सूडान और सोमालिया जैसे खाद्य असुरक्षा वाले क्षेत्रों में मानवीय सहायता की प्रतिक्रिया पहले ही धीमी पड़ रही है। म्यांमार में संयुक्त राष्ट्र की कार्यवाहक आवासीय और मानवीय समन्वयक ग्विन लुईस ने कहा कि कीमतें बढ़ रही हैं, ज़रूरी चीज़ें मिलना मुश्किल हो रहा है और परिवारों की खरीदने की क्षमता लगातार घट रही है।
भूराजनीतिक बदलाव और स्वच्छ तकनीक में चीन की बढ़त
जहां तत्काल संकट पारंपरिक ऊर्जा आयातकों को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है, वहीं उसने स्वच्छ तकनीक में चीन की रणनीतिक बढ़त को और तेज़ी से उभारा है। सौर पैनलों, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों और खुद इलेक्ट्रिक वाहनों के वैश्विक विनिर्माण पर बीजिंग का दबदबा है। दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण का 70 प्रतिशत से अधिक और बैटरी सेल उत्पादन का 85 प्रतिशत चीन में होता है। जीवाश्म ईंधन की आपूर्ति शृंखलाओं की नाज़ुकता का सामना कर रहे एशियाई देशों में चीनी स्वच्छ तकनीक की मांग तेज़ी से बढ़ रही है।
पाकिस्तान इसका एक उदाहरण है। अब भी अपनी एक-तिहाई ऊर्जा आयात करने के बावजूद, देश में 2017 से अब तक 50 गीगावाट से अधिक क्षमता के चीनी सौर पैनल लगाए जा चुके हैं। विश्लेषण के मुताबिक, अगर कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो सौर ऊर्जा अगले साल पाकिस्तान को जीवाश्म ईंधन के आयात पर 6.3 अरब डॉलर बचा सकती है। यूनाइटेड किंगडम में मार्च के पहले तीन हफ्तों में इलेक्ट्रिक वाहन लीज़ की मांग एक-तिहाई से अधिक बढ़ी, जबकि छतों पर लगने वाले सौर पैनलों की बिक्री में उछाल आया है। वियतनाम की इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी विनफास्ट ईंधन की कीमतों के झटके की भरपाई के लिए छूट दे रही है। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने इलेक्ट्रिक वाहन उत्पादन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने की घोषणा की है।
यह संकट पश्चिमी गोलार्ध के ऊर्जा उत्पादकों के लिए अवसर भी पैदा कर रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ब्राज़ील और गुयाना को ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति में विविधता पर नए सिरे से ज़ोर दिए जाने से लाभ मिल सकता है, क्योंकि उनका उत्पादन जोखिमभरे होर्मुज़ मार्ग पर निर्भर नहीं है। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि मेक्सिको और वेनेज़ुएला के पास संसाधन होने के बावजूद उनकी राजनीतिक अनिश्चितता और परिचालन संबंधी चुनौतियां इतनी अधिक हैं कि वे दूसरे अमेरिकी उत्पादकों को मिल रहे निवेश को आकर्षित नहीं कर सकते। ईरान युद्ध के संकट के बाद दुनिया ऊर्जा सुरक्षा की नई परिकल्पना कर रही है। पश्चिमी गोलार्ध के पास देने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन इसकी तैयारी अभी से करनी होगी।
मुख्य बिंदु
- फरवरी के अंत में शुरू हुए ईरान युद्ध ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है। इससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं और दुनिया की 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति बाधित हुई है।
- जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल का करीब 80 प्रतिशत और एलएनजी का 90 प्रतिशत एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को मिलता है, जिससे यह क्षेत्र नाकेबंदी के असर के प्रति असमान रूप से अधिक संवेदनशील है।
- पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका समेत गरीब एशियाई देशों के पास अस्थिर बाज़ारों में ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार नहीं हैं और वे गंभीर राजकोषीय सीमाओं का सामना कर रहे हैं।
- पूरे महाद्वीप में आपातकालीन उपायों में फिलीपींस, पाकिस्तान और श्रीलंका में चार-दिवसीय कार्यसप्ताह; म्यांमार में नंबर प्लेट के आधार पर ईंधन राशनिंग; और बांग्लादेश से पाकिस्तान तक स्कूल बंद करना शामिल है।
- जापान और दक्षिण कोरिया जैसे समृद्ध देशों ने रणनीतिक भंडार से रिकॉर्ड मात्रा में तेल जारी किया है, लेकिन ये भंडार केवल करीब 200 दिनों की आपूर्ति दे सकते हैं और लंबे समय तक व्यवधान से निपटने के लिए नहीं बनाए गए हैं।
- कई एशियाई देशों ने कोयला बिजलीघर फिर शुरू किए हैं या कोयले से बिजली उत्पादन पर लगी पाबंदियां हटाई हैं। इससे जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल बढ़ने और जलवायु लक्ष्यों में बाधा आने का खतरा है, जबकि लंबे समय में नवीकरणीय ऊर्जा को तेज़ी से अपनाने का अवसर भी मौजूद है।
- संकट ने स्वच्छ तकनीक में चीन को रणनीतिक बढ़त दी है। जीवाश्म ईंधन की कमी झेल रहे एशियाई देश ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने के लिए चीनी सौर पैनलों, बैटरियों और इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं।
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने संकटग्रस्त देशों को 20 अरब से 50 अरब डॉलर तक की आपात सहायता देने की तत्परता जताई है। इन देशों को ऊर्जा उपलब्धता, महंगाई पर नियंत्रण और राजकोषीय स्थिरता के बीच कठिन संतुलन बनाना पड़ रहा है।






