आकार से क्यों पैदा हुआ संदेह
चीन ने ऐसे मानवरहित पनडुब्बी वाहन विकसित किए हैं जो अब तक बनाए गए सबसे बड़े अंडरवॉटर ड्रोन हैं। इनके मकसद को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। पिछले साल बीजिंग ने सैन्य परेड के दौरान दो मॉडल, HSU001 और AJX002, प्रदर्शित किए थे। दोनों की लंबाई लगभग 20 मीटर है। बाद में पश्चिमी मीडिया की समीक्षा में उपग्रह तस्वीरों से एक नौसैनिक प्रतिष्ठान पर 40 मीटर से अधिक लंबा गोपनीय मॉडल सामने आया। इससे XXLUUV नाम के स्वायत्त पोतों की एक बिल्कुल नई श्रेणी स्थापित हुई।
विषय-सूची
ये विशाल अंडरवॉटर ड्रोन अमेरिका के सबसे बड़े मानवरहित अंडरवॉटर वाहन, बोइंग द्वारा विकसित 15 मीटर लंबे Orca, से कहीं बड़े हैं। इन प्लेटफॉर्मों के विशाल आकार ने अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों को अमेरिका के पश्चिमी तट की संभावित कमजोरियों को लेकर कड़ी चेतावनी देने पर मजबूर किया है। कुछ विश्लेषकों ने सिएटल, ओकलैंड, लॉस एंजिलिस और यहां तक कि पनामा नहर को संभावित निशानों में शामिल किया है। तकनीकी क्षमताओं से संकेत मिलता है कि इनकी रेंज 10,000 समुद्री मील से अधिक हो सकती है, जिससे ये स्वायत्त पोत सैद्धांतिक रूप से पूरी तरह जलमग्न रहकर प्रशांत महासागर पार कर सकते हैं।
वैज्ञानिक की सफाई
चीन में पनडुब्बी वाहनों के अग्रणी विशेषज्ञ और हार्बिन इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ इंटेलिजेंट सिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग में मानवरहित प्रणालियों के निदेशक यान झेपिंग ने पिछले महीने प्रकाशित सहकर्मी-समीक्षित शोध में इन चिंताओं पर सीधे बात की है। उनका लेख आम लोगों के लिए इन पोतों के रणनीतिक उद्देश्य की पहली आधिकारिक सफाई है।
चीन के अति विशाल मॉडल क्षेत्रीय सुरक्षा और तट के निकट रक्षात्मक टोही को प्राथमिकता देते हैं, साथ ही नागरिक अनुसंधान और पर्यावरण निगरानी में भी मदद करते हैं।
यान ने ये बातें चाइनीज जर्नल ऑफ शिप रिसर्च में लिखीं। उनके मुताबिक, गहरे समुद्र में चलने वाले ये विशाल पोत संभावित ताइवान जलडमरूमध्य या दक्षिण चीन सागर संकट के दौरान मुख्य रूप से अमेरिकी सैन्य अभियानों का मुकाबला करेंगे, न कि अमेरिकी शहरों पर प्रशांत महासागर पार से हमला करेंगे। पश्चिमी तट पर खतरे को लेकर बढ़ती अटकलों पर बीजिंग की यह पहली सीधी प्रतिक्रिया है।
चिंता बढ़ाने वाली तकनीकी क्षमताएं
यह समझने के लिए कि विश्लेषकों को शुरू में प्रशांत महासागर पार अभियानों की आशंका क्यों हुई, इन पोतों की इंजीनियरिंग पर गौर करना जरूरी है। छोटे स्वायत्त पनडुब्बी वाहनों के विपरीत, चीन के XXLUUV पारंपरिक पनडुब्बियों जैसी डीजल-इलेक्ट्रिक प्रणोदन प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इनमें चालक दल के लिए जगह नहीं होती। रक्षा प्रदर्शनियों में दिखाए गए निर्माता के मॉडलों में डीजल जनरेटर और बड़ी बैटरी इकाइयां पूरे ढांचे में लगी दिखती हैं, जिससे ईंधन भंडारण और विद्युत क्षमता अधिकतम होती है।
इन डिजाइनों में इंसानों के लिए जगह के बजाय लंबे समय तक संचालन और अधिक दूरी तय करने को प्राथमिकता दी गई है। विश्लेषकों का अनुमान है कि इन ड्रोन की परिचालन रेंज करीब 10,000 समुद्री मील है। यह आंकड़ा चीनी जहाज निर्माताओं द्वारा प्रकाशित विनिर्देशों और पोतों के आकार के आधार पर की गई गणनाओं से निकाला गया है। बताया जाता है कि ये पोत पेरिस्कोप की गहराई पर स्नॉर्कलिंग करते हुए डीजल इंजनों से करीब 7,000 समुद्री मील तक जा सकते हैं। इसके बाद बैटरी के सहारे पूरी तरह जलमग्न अवस्था में 3,000 समुद्री मील और तय कर सकते हैं।
इनकी बैटरियों में लिथियम आयरन फॉस्फेट तकनीक का इस्तेमाल होता है। इससे शांत इलेक्ट्रिक प्रणोदन पर ये ड्रोन पारंपरिक डीजल पनडुब्बियों के मुकाबले पानी के भीतर करीब छह गुना अधिक दूरी तय कर सकते हैं। पानी के भीतर इतनी देर तक चल पाने से ये पोत पहचान से बचते हुए तट के पास पहुंच सकते हैं और गश्ती बलों से बचने के लिए समुद्र का अंतिम हिस्सा पूरी तरह जलमग्न रहकर पार कर सकते हैं।
संभावित हथियार और मिशन
रक्षा विश्लेषकों ने कई ऐसी क्षमताओं की पहचान की है जिनसे शुरुआत में अमेरिका के पश्चिमी तट को निशाना बनाए जाने की आशंका बढ़ी। XXLUUV में मॉड्यूलर पेलोड बे हैं, जिनमें टॉरपीडो ट्यूब, समुद्री बारूदी सुरंगें और छोटे अंडरवॉटर वाहन तक रखे जा सकते हैं। सैद्धांतिक रूप से ये स्वायत्त प्लेटफॉर्म ऐसे कई मिशन कर सकते हैं जो आम तौर पर चालक दल वाली पनडुब्बियों को सौंपे जाते हैं। इनमें समुद्री सुरंगें बिछाना, सतह पर चलने वाले जहाजों पर हमला करना या छोटे ड्रोन के झुंड तैनात करना शामिल है। हाइनान के पास परीक्षण किया गया AJX002 माइनलेयर UUV, ताइवान या नौसैनिक मार्गों पर समुद्री सुरंगें बिछाने के अभियानों की खास क्षमता दिखाता है।
सीधे हमलों के अलावा, शोधकर्ताओं ने समुद्र के नीचे मौजूद महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के लिए खतरों की ओर ध्यान दिलाया है। ग्लोबल ताइवान इंस्टीट्यूट के विश्लेषण के मुताबिक, इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए ताइवान केवल 24 समुद्र के नीचे की केबलों पर निर्भर है। इन केबलों को काटने से बैंकिंग से लेकर आपातकालीन सेवाओं तक सब कुछ बाधित हो सकता है। जापान, गुआम और हवाई को जोड़ने वाला ट्रांस-पैसिफिक केबल नेटवर्क भी संभावित निशाना है। इसमें तोड़फोड़ से क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को भारी नुकसान हो सकता है और प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सेना की कमान तथा नियंत्रण व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।
खबरों के मुताबिक, चीन ने बख्तरबंद समुद्र के नीचे की केबल काटने के लिए विशेष उपकरण विकसित किए हैं। इनमें रोबोटिक भुजाओं पर लगे ऐसे उपकरण शामिल हैं जो हीरे की परत वाले ग्राइंडिंग पहियों का इस्तेमाल करते हैं और 4,000 मीटर तक की गहराई पर काम कर सकते हैं। ऐसी क्षमताओं से XXLUUV को अपनी भूमिका से इनकार की गुंजाइश बनाए रखते हुए बुनियादी ढांचे पर हमला करने में मदद मिल सकती है।
क्षेत्रीय जलक्षेत्र में रक्षात्मक इस्तेमाल
रेंज के चौंकाने वाले अनुमानों के बावजूद, यान झेपिंग के शोध में इन प्लेटफॉर्मों को आक्रामक के बजाय रक्षात्मक रणनीतिक मकसद से बनाया गया बताया गया है। इन पोतों का मुख्य काम तट के निकट रक्षात्मक टोही और क्षेत्रीय सुरक्षा अभियानों में सहायता करना है। इससे संकेत मिलता है कि ये जापान से ताइवान होते हुए फिलीपींस तक फैली द्वीपों की शृंखला, यानी प्रथम द्वीप शृंखला के भीतर काम करेंगे, न कि महाद्वीपों के पार लंबी यात्राएं करेंगे।
ये ड्रोन चीन के अंडरवॉटर ग्रेट वॉल सेंसर नेटवर्क को सहयोग दे सकते हैं, जो अमेरिकी और सहयोगी देशों की पनडुब्बियों की गतिविधियों पर नजर रखता है। ये चीन की नौसेना के खुले प्रशांत महासागर में प्रवेश की कोशिश से पहले विस्फोटक लगाकर या केबल काटकर अमेरिकी समुद्र के नीचे के सेंसर नेटवर्क को निष्क्रिय कर सकते हैं। इसमें फिश हुक नेटवर्क भी शामिल है, जो जापान, ताइवान, फिलीपींस और जावा सागर तक फैला है।
इनके अन्य नागरिक उपयोगों में पर्यावरण निगरानी और समुद्र विज्ञान अनुसंधान शामिल हैं, जो चीन के व्यापक समुद्री वैज्ञानिक प्रयासों से मेल खाते हैं। इन प्लेटफॉर्मों की दोहरे उपयोग वाली प्रकृति उन्हें शांतिकाल में अनुसंधान में मदद करने के साथ-साथ संकट के समय सैन्य कामों में इस्तेमाल किए जाने योग्य बनाती है।
परीक्षण और तैनाती की मौजूदा स्थिति
हाल की उपग्रह तस्वीरों से पुष्टि होती है कि चीन हाइनान द्वीप के पास स्थित केंद्रों पर XXLUUV के दो अलग-अलग डिजाइनों का एक साथ सक्रिय परीक्षण कर रहा है। ये केंद्र खास तौर पर गांगमेन हार्बर और यिंगगेज़ुई के आसपास हैं, जो नौसेना के सान्या परमाणु पनडुब्बी अड्डे के पश्चिम में स्थित हैं। इन पोतों को तैरते हुए ड्राई डॉक में आंशिक रूप से जलमग्न देखा गया है। यह छिपाने का तरीका उस रणनीति जैसा है जिसके तहत अमेरिकी नौसेना ने विकास के दौरान प्रायोगिक पोतों को ढका था।
इस कार्यक्रम की गोपनीयता चीन के शिपयार्डों की आम कार्यशैली से अलग है। आम तौर पर वहां ध्यान खींचने के लिए प्रोटोटाइप परियोजनाओं का प्रचार किया जाता है। असामान्य गोपनीयता से संकेत मिलता है कि यह केवल अनुसंधान परीक्षण नहीं, बल्कि वास्तविक तैनाती के लिए प्रतिस्पर्धी खरीद कार्यक्रम हो सकता है। नौसैनिक हथियारों के विकास के लिए मशहूर चाइना शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री कॉरपोरेशन के अधीन 705 रिसर्च इंस्टीट्यूट का संबंध XXLUUV के एक मॉडल से जोड़ा गया है।
चीन एक साथ XXLUUV के दो अलग-अलग डिजाइनों का परीक्षण कर रहा है, जिससे लगता है कि सबसे बेहतर संरचना चुनने के लिए प्रतिस्पर्धी मूल्यांकन किया जा रहा है। यह तरीका चीन द्वारा बड़े विस्थापन वाले UUV की पिछली पीढ़ियों के विकास जैसा है, जो अब परिचालन में हैं। हाल ही में बीजिंग परेड में दिखाए गए आठ बड़े UUV भी स्वायत्त समुद्र के नीचे की प्रणालियों में चीन के निवेश का पैमाना दिखाते हैं। इनमें समुद्री सुरंगें बिछाने वाले पांच छोटे AJX002 ड्रोन और तीन HSU 100 UUV शामिल थे। यह निवेश पश्चिमी देशों के कार्यक्रमों से कहीं बड़ा है।
रणनीतिक संदर्भ और अमेरिका की प्रतिक्रिया
XXLUUV का सामने आना नौसैनिक युद्ध की रणनीति में बड़े बदलाव का संकेत है। पश्चिमी विश्लेषक लंबे समय से मानते आए थे कि उन्नत मानवरहित प्रणालियों के मामले में चीन पीछे है, लेकिन इनकी तैनाती ने इस धारणा को पुराना साबित किया है। अमेरिकी नौसेना अपने Orca XLUUV प्रोटोटाइप का सावधानी से परीक्षण कर रही है, जबकि चीन पूर्ण आकार के परिचालन प्लेटफॉर्म तैनात करने की दिशा में उससे आगे निकल गया है।
ये पोत पनडुब्बी रोधी युद्ध की पारंपरिक रणनीतियों के लिए चुनौती हैं। इनकी स्वायत्त प्रकृति से कमांडर ऐसे एकतरफा या अधिक जोखिम वाले मिशनों पर विचार कर सकते हैं जिनसे चालक दल वाली पनडुब्बियां बचेंगी। जोखिम उठाने की यह क्षमता नई रणनीतिक संभावनाएं पैदा करती है, जिनमें संख्या और स्वायत्तता के दम पर पारंपरिक सुरक्षा को भारी दबाव में डालने की रणनीति भी शामिल है।
हालांकि, इन प्लेटफॉर्मों की कुछ सीमाएं भी हैं। जटिल फैसले लेने, खासकर लक्ष्य की पहचान करने में मानवरहित पनडुब्बियां मानव चालक दल जितनी अनुकूलनशील नहीं होतीं। जामिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की गलतियों या नियंत्रण संपर्क के बाधित होने जैसी कमजोरियों का विरोधी फायदा उठा सकते हैं। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही समुद्र तल के सेंसर और निर्देशित ऊर्जा हथियारों समेत UUV का मुकाबला करने वाली तकनीकों में निवेश कर रहे हैं।
मुख्य बातें
- चीन ने दुनिया के सबसे बड़े अंडरवॉटर ड्रोन विकसित किए हैं, जिन्हें XXLUUV श्रेणी में रखा गया है। इनके प्रोटोटाइप 40 मीटर से अधिक लंबे हैं
- अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों ने शुरुआत में चेतावनी दी थी कि 10,000 से अधिक समुद्री मील की रेंज वाले ये पोत सिएटल, लॉस एंजिलिस और ओकलैंड समेत पश्चिमी तट के शहरों को निशाना बना सकते हैं
- चीन के प्रमुख वैज्ञानिक यान झेपिंग ने स्पष्ट किया है कि ये ड्रोन प्रशांत महासागर पार हमलों के बजाय क्षेत्रीय सुरक्षा और तट के निकट रक्षात्मक टोही को प्राथमिकता देते हैं
- इन पोतों का मुख्य उद्देश्य ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर में संभावित संकटों के दौरान सैन्य अभियानों के साथ-साथ नागरिक अनुसंधान में मदद करना है
- तकनीकी विशेषताओं में डीजल-इलेक्ट्रिक प्रणोदन, बड़ी बैटरी इकाइयां और टॉरपीडो, समुद्री सुरंगें या छोटे ड्रोन ले जाने में सक्षम मॉड्यूलर पेलोड बे शामिल हैं
- हाइनान द्वीप के जलक्षेत्र में मौजूदा परीक्षण, अंतरमहाद्वीपीय हमले की तैयारी के बजाय क्षेत्रीय रक्षा के दावे का समर्थन करते हैं
- ये प्लेटफॉर्म स्वायत्त समुद्र के नीचे के युद्ध में बड़ी प्रगति हैं और प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की पारंपरिक नौसैनिक श्रेष्ठता को चुनौती देते हैं






