अतिसख्त पदार्थों का नया युग
चीनी शोधकर्ताओं ने वह उपलब्धि हासिल की है, जिसके लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक छह दशकों से अधिक समय से प्रयासरत थे: शुद्ध षट्कोणीय हीरे का बड़े आकार में निर्माण। नेचर पत्रिका में प्रकाशित यह सफलता पहली बार है जब वैज्ञानिकों ने इस दुर्लभ कार्बन अपररूप के मिलीमीटर आकार के नमूने तैयार किए हैं। सिद्धांततः यह पदार्थ पारंपरिक घनीय हीरे से अधिक कठोर हो सकता है, जो पीढ़ियों से मोह्स कठोरता पैमाने में शीर्ष पर रहे हैं।
विषय-सूची
झेंगझोऊ विश्वविद्यालय, जिलिन विश्वविद्यालय और हाई प्रेशर साइंस एंड टेक्नोलॉजी एडवांस्ड रिसर्च केंद्र के भौतिकविदों वाली शोध टीम ने इस लंबे वैज्ञानिक विवाद को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया है कि क्या षट्कोणीय हीरा एक अलग पदार्थ के रूप में मौजूद है। उनका काम पुष्टि करता है कि लोंसडेलाइट, जिसे 1967 में एरिज़ोना के एक उल्कापिंड में पहली बार खोजा गया था, केवल दोषयुक्त घनीय हीरा नहीं, बल्कि विशिष्ट गुणों वाला कार्बन का वास्तविक चरण है। यह औद्योगिक विनिर्माण, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग और क्वांटम सेंसिंग तकनीकों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।
पृथ्वी के मेंटल में गहराई पर घनीय परमाणु व्यवस्था के तहत बनने वाले प्राकृतिक हीरों से अलग, षट्कोणीय हीरे में कार्बन परमाणु मधुमक्खी के छत्ते जैसी जालीनुमा संरचना में व्यवस्थित होते हैं। इस बनावट से परतों के बीच छोटे और मजबूत बंध बनते हैं। इससे काटने के औजारों, ड्रिलिंग उपकरणों और उच्च-प्रदर्शन वाले इलेक्ट्रॉनिक्स में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक हीरों की तुलना में अधिक कठोरता और तापीय स्थिरता मिल सकती है।
यह संश्लेषण प्रयोगशाला की महज एक जिज्ञासापूर्ण उपलब्धि से कहीं बढ़कर है। दशकों तक पर्याप्त मात्रा में शुद्ध षट्कोणीय हीरा न बना पाने के कारण इसके सैद्धांतिक गुण केवल सिद्धांत तक सीमित रहे। पहले के प्रयासों में या तो केवल नैनोस्केल के क्रिस्टल बने, जो कुछ नैनोसेकंड ही टिके, या फिर ग्रेफाइट और घनीय हीरे से दूषित मिश्रण तैयार हुए, जिनका निर्णायक विश्लेषण संभव नहीं था। 100 माइक्रोमीटर से लेकर 1.8 मिलीमीटर व्यास तक के क्रिस्टल बनाकर चीनी टीम ने इस दुर्लभ पदार्थ का व्यापक यांत्रिक परीक्षण करने का पहला अवसर दिया है।
छह दशकों का वैज्ञानिक विवाद
षट्कोणीय हीरे की कहानी 1962 में शुरू हुई, जब पिट्सबर्ग कोल रिसर्च सेंटर के शोधकर्ताओं ने पहली बार प्रस्ताव रखा कि कार्बन परमाणु परिचित घनीय संरचना के बजाय षट्कोणीय जाल में व्यवस्थित हो सकते हैं। बंधों की इस अनूठी बनावट के कारण इस सैद्धांतिक रूपांतर के अधिक कठोर होने की संभावना थी, लेकिन इसके अस्तित्व को साबित करने में पांच साल और एक अलौकिक माध्यम लगा।
1967 में एरिज़ोना के बैरिंगर क्रेटर से मिले कैन्यन डियाब्लो उल्कापिंड के टुकड़ों की जांच कर रहे भूवैज्ञानिकों ने एक नए खनिज की खोज की घोषणा की। बेंजीन की संरचना स्थापित करने वाली अग्रणी क्रिस्टलोग्राफर डेम कैथलीन लॉन्सडेल के सम्मान में इसका नाम लोंसडेलाइट रखा गया। माना गया कि ये षट्कोणीय हीरे करीब 50,000 साल पहले उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने पर पैदा हुई अत्यधिक गर्मी और दबाव में बने थे। बाद में भारत के असम में गोलपाड़ा उल्कापिंड में भी इनके समान अंश पाए गए।
हालांकि, यह जश्न समय से पहले था। आलोचकों का तर्क था कि ये नमूने असली षट्कोणीय हीरे नहीं, बल्कि परतों के क्रम में दोष या अव्यवस्थित संरचनात्मक खामियों वाले घनीय हीरे थे, जो केवल षट्कोणीय सममिति जैसे दिखते थे। 2021 में शोधकर्ताओं ने ऐसे अध्ययन प्रकाशित किए जिनमें कहा गया कि पहले पहचाने गए सभी लोंसडेलाइट नमूने वास्तव में घनीय हीरे के गलत पहचाने गए रूप थे। यह संदेह इसलिए बना रहा क्योंकि किसी प्रयोगशाला ने विवाद का निर्णायक समाधान करने के लिए पर्याप्त मात्रा में शुद्ध षट्कोणीय हीरा कभी नहीं बनाया था।
सफलता की इंजीनियरिंग
चीनी टीम की सफलता उच्च दबाव और उच्च तापमान की एक नई तकनीक विकसित करने पर निर्भर थी, जिसने षट्कोणीय हीरे की ऊष्मागतिक अस्थिरता की चुनौती का समाधान किया। 2 टेरापास्कल तक के दबाव में sp3-बद्ध कार्बन का सबसे स्थिर रूप घनीय हीरा ही रहता है। शोधकर्ताओं ने समझा कि प्रारंभिक पदार्थ की बनावट और संश्लेषण की स्थितियों को सावधानी से नियंत्रित करके षट्कोणीय हीरे का निर्माण गतिज रूप से नियंत्रित करना होगा।
कार्बन की एक कृत्रिम सामग्री, अत्यधिक व्यवस्थित परतों वाले उच्च अभिविन्यासयुक्त पायरोलाइटिक ग्रेफाइट के साथ काम करते हुए शोधकर्ताओं ने एक विशिष्ट संयोजन तैयार किया। इसमें उच्च-शक्ति वाले सघन एल्युमिनियम ऑक्साइड का इस्तेमाल करने वाली पिस्टन-सिलिंडर प्रेस को मल्टी-एनविल प्रेस में जोड़ा गया। इस व्यवस्था से वे ग्रेफाइट को किनारों से दबाने के बजाय मुख्यतः z-अक्ष की दिशा में, यानी कार्बन की चादरों के लंबवत, संपीड़ित कर सके।
नमूनों को 20 गीगापास्कल के दबाव पर दस घंटे तक संपीड़ित किया गया। यह समुद्र तल पर पृथ्वी के वायुमंडलीय दबाव से लगभग 200,000 गुना अधिक है। तापमान 2,300 से 3,450 डिग्री फ़ारेनहाइट (1,300 से 1,900 डिग्री सेल्सियस) तक रखा गया। इन-सिटू एक्स-रे विवर्तन से वास्तविक समय में निगरानी कर वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म रूपांतरण प्रक्रिया देखी। इससे मार्टेंसाइटिक रूपांतरण की पुष्टि हुई, जिसमें ग्रेफाइट की षट्कोणीय संरचना परतों के बीच खिसकने और ग्रेफाइट चादरों के सीधे जुड़ने से षट्कोणीय हीरे में बदल गई।
बेहतर प्रदर्शन का मापन
मिलीमीटर आकार के नमूने उपलब्ध होने के बाद शोध टीम निर्णायक यांत्रिक परीक्षण कर सकी। विकर्स कठोरता परीक्षण और अन्य जांच विधियों से उन्होंने खरोंच और विकृति का प्रतिरोध मापा। नतीजों में षट्कोणीय हीरे की कठोरता 114 से 165 गीगापास्कल के बीच पाई गई, जबकि प्राकृतिक घनीय हीरे की कठोरता करीब 110 गीगापास्कल होती है। यह कठोरता में उल्लेखनीय वृद्धि है, हालांकि शुरुआती अनुमानों में जताई गई 50 प्रतिशत बढ़ोतरी से कुछ कम है।
कठोरता के अलावा, इस पदार्थ ने उल्लेखनीय तापीय स्थिरता दिखाई और 1,100 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान पर ऑक्सीकरण का प्रतिरोध किया। यह घनीय हीरे की एक गंभीर सीमा का समाधान करता है। औद्योगिक ड्रिलिंग या काटने के काम के दौरान अधिक तापमान पर ऑक्सीजन के संपर्क से घनीय हीरे की सतह में दोष आ सकते हैं। षट्कोणीय संरचना की कठोरता और ऑक्सीकरण-प्रतिरोध ऐसे अत्यंत कठिन परिवेशों में इसके इस्तेमाल की संभावना दिखाते हैं, जहां पारंपरिक हीरे काम नहीं आते।
उच्च-रिज़ॉल्यूशन ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी से संरचना की जांच ने षट्कोणीय हीरे की पहचान बताने वाली उभरी हुई मधुमक्खी-छत्ते जैसी परतों की AB स्टैकिंग की पुष्टि की। स्पेक्ट्रोस्कोपिक विश्लेषण से पता चला कि सभी बंध sp3 सिग्मा बंध थे और इनमें sp2 पाई बंध नहीं थे, जो ग्रेफाइट के बचे हुए अंशों का संकेत देते। खास बात यह थी कि परतों के बीच एक बंध बाकी तीन बंधों से छोटा था। इससे घनीय हीरे की तुलना में इसकी अधिक संरचनात्मक मजबूती की वजह समझ में आती है।
औद्योगिक और वैज्ञानिक उपयोग
बड़े आकार में षट्कोणीय हीरा बनाने से उन उपयोगों के रास्ते खुलते हैं, जो अब तक घनीय हीरे की प्रदर्शन-सीमा के कारण संभव नहीं थे। अध्ययन के सह-प्रमुख लेखक और झेंगझोऊ विश्वविद्यालय के भौतिकविद् चोंग-शिन शान ने कई संभावनाशील क्षेत्रों का उल्लेख किया।
कई क्षेत्रों में इसके संभावित उपयोग हैं, जैसे काटने के औजारों, तापीय प्रबंधन की सामग्रियों और क्वांटम सेंसिंग में,
शान ने नेचर को बताया।
एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र को इससे खास लाभ हो सकता है। षट्कोणीय हीरे की अधिक कठोरता और तापीय स्थिरता इसे अत्यधिक सटीकता और टिकाऊपन की जरूरत वाले मशीनिंग और ड्रिलिंग कार्यों के लिए उपयुक्त बनाती है। खनन की सीमाओं और नैतिक चिंताओं से बंधे प्राकृतिक हीरों के विपरीत, प्रयोगशाला में तैयार षट्कोणीय हीरे बेहतर प्रदर्शन के साथ एक टिकाऊ विकल्प बन सकते हैं।
भूविज्ञान के लिहाज से यह संश्लेषण उल्कापिंडों के टकराव की प्रक्रियाओं के बारे में अहम जानकारी देता है। अत्यधिक दबाव और तापमान में षट्कोणीय हीरे कैसे बनते हैं, यह समझने से वैज्ञानिक टक्कर की घटनाओं की पहचान कर सकते हैं और हमारे सौर मंडल में ग्रहों के निर्माण का इतिहास फिर से गढ़ सकते हैं। कैन्यन डियाब्लो जैसे उल्कापिंडों में लोंसडेलाइट की मौजूदगी अब समझ में आती है: यह खास तरह के शॉक मेटामॉर्फिज्म का परिणाम है, जिसकी परिस्थितियों को चीनी टीम ने सफलतापूर्वक दोहराया है।
वैश्विक वैज्ञानिक पुष्टि
इस शोध ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय का काफी ध्यान खींचा है। नेवादा विश्वविद्यालय, लास वेगास के क्रिस्टलोग्राफर ओलिवर शॉनर ने नेचर के लिए अध्ययन की सहकर्मी समीक्षा की और निष्कर्षों को मजबूत पुष्टि दी।
ऐसे सैकड़ों दावे हैं जिनमें लोगों का मानना है कि उन्होंने इसे देखा है, लेकिन इस दुर्लभ पदार्थ का यह पहला बेहद सटीक विश्लेषण है,
शॉनर ने कहा।
टोक्यो विश्वविद्यालय के अकार्बनिक रसायनज्ञ एइची नाकामुरा, जिन्होंने पहले कार्बन के अपररूपों पर काम किया है, ने इस पद्धति के महत्व पर जोर दिया।
यह नई दो-चरणीय विधि पहली बार निर्णायक प्रमाण देती है कि षट्कोणीय हीरा एक अलग और पुनः प्राप्त किया जा सकने वाला ठोस पदार्थ है,
नाकामुरा ने कहा।
उच्च-दबाव विज्ञान के विशेषज्ञ और चीनी विज्ञान अकादमी के विदेशी सदस्य हो-क्वांग माओ ने पदार्थ विज्ञान के लिए इसके व्यापक महत्व की ओर ध्यान दिलाया।
इस संश्लेषित षट्कोणीय हीरे से अतिसख्त पदार्थों और उच्चस्तरीय इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के विकास के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है,
माओ ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट को बताया।
उत्साह के बावजूद, शोधकर्ताओं का मानना है कि व्यावसायिक उपयोग से पहले चुनौतियां बनी हुई हैं। संश्लेषण के लिए जरूरी विशेष उच्च-दबाव उपकरणों के कारण फिलहाल उत्पादन सीमित है। इसलिए शुरुआती उपयोग बड़े पैमाने पर बिकने वाले आभूषणों के बजाय उच्च-मूल्य वाले विशिष्ट क्षेत्रों, जैसे सटीक वैज्ञानिक उपकरणों और खास औद्योगिक काटने के औजारों में होने की संभावना है।
मुख्य बातें
- चीनी वैज्ञानिकों ने पहली बार मिलीमीटर आकार का शुद्ध षट्कोणीय हीरा (लोंसडेलाइट) बनाया है। इससे छह दशक पुराना यह विवाद समाप्त हुआ कि क्या यह एक अलग पदार्थ के रूप में मौजूद है।
- इस पदार्थ की कठोरता 114 से 165 गीगापास्कल के बीच है, जो प्राकृतिक घनीय हीरे के लगभग 110 गीगापास्कल से अधिक है। यह 1,100 डिग्री सेल्सियस तक बेहतर तापीय स्थिरता भी दिखाता है।
- रूपांतरण के लिए शोधकर्ताओं ने उच्च अभिविन्यासयुक्त पायरोलाइटिक ग्रेफाइट को 20 गीगापास्कल दबाव (वायुमंडलीय दबाव से 200,000 गुना) और 1,300 से 1,900 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 10 घंटे तक संपीड़ित किया।
- इसके संभावित उपयोगों में उन्नत काटने के औजार, इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए तापीय प्रबंधन प्रणालियां, क्वांटम सेंसिंग उपकरण और अत्यधिक टिकाऊपन की जरूरत वाले एयरोस्पेस घटक शामिल हैं।
- यह उपलब्धि इस लंबे संदेह को दूर करती है कि षट्कोणीय हीरा कार्बन का एक अलग चरण है या केवल दोषयुक्त घनीय हीरे की संरचना।






