चीन का नया अभिजात वर्ग: कम्युनिस्ट पार्टी वंशानुगत कुलीन वर्ग के उदय को रोकने में कैसे नाकाम हो रही है

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चीन का नया अभिजात वर्ग: कम्युनिस्ट पार्टी वंशानुगत कुलीन वर्ग के उदय को रोकने में कैसे नाकाम हो रही है

संपत्ति का पहला बड़ा पीढ़ीगत हस्तांतरण

पिछली आधी सदी में चीन ने ऐसा आर्थिक चमत्कार किया, जिसने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला और रातोंरात अपार संपत्ति पैदा की। इस देश ने पचास वर्षों में मानव इतिहास की किसी भी सभ्यता से अधिक संपत्ति अर्जित की है। मुख्यतः कृषि प्रधान समाज से बदलकर यह दुनिया का विनिर्माण केंद्र और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। शेनझेन जैसे शहर मछुआरों की बस्तियों से ऐसे महानगरीय केंद्रों में तब्दील हो गए, जहां प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों के बराबर है। प्रौद्योगिकी दिग्गजों से लेकर रियल एस्टेट साम्राज्यों तक, निजी उद्यमों ने इतनी बड़ी पूंजी जमा की है कि कई संप्रभु देशों के सरकारी खजाने भी उसके सामने छोटे पड़ जाते हैं। अब इस सफलता की कहानी के सामने एक ऐसी चुनौती है, जो इस प्रगति को कमजोर कर सकती है: चीन के आधुनिक इतिहास में संपत्ति का पहला बड़ा पीढ़ीगत हस्तांतरण शुरू हो चुका है। सुधारों के दौर में साम्राज्य खड़े करने वाले उद्यमी उम्रदराज हो रहे हैं और अपनी संपत्ति बच्चों को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में एक वंशानुगत अभिजात वर्ग आकार ले रहा है, जो पीढ़ियों तक कायम रह सकता है।

विषय-सूची
  1. संपत्ति का पहला बड़ा पीढ़ीगत हस्तांतरण
  2. इतिहास की उलटी दिशा
  3. जब पूंजी की कमाई विकास से आगे निकल जाए
  4. विरासत कर का अभाव
  5. असंतोष का जोखिम
  6. वैश्विक संदर्भ और भविष्य
  7. मुख्य बातें

इस बदलाव के जोखिम अर्थव्यवस्था से कहीं आगे तक जाते हैं। मौजूदा राह पर संपत्ति का यह हस्तांतरण असमानता बढ़ाएगा, पीढ़ी-दर-पीढ़ी विशेषाधिकार को मजबूत करेगा और सामाजिक असंतोष को जन्म देगा, जो खुद कम्युनिस्ट पार्टी की स्थिरता को चुनौती दे सकता है। पहले अरबपतियों के बच्चे वयस्क हो रहे हैं। उन्होंने विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में शिक्षा पाई है और वैश्विक पूंजी के संपर्कों से जुड़े हैं। अब वे अरबों डॉलर मूल्य के पारिवारिक कारोबारी समूहों की कमान संभालने को तैयार हैं। अपने माता-पिता से अलग, जो अक्सर साधारण हालात से मेहनत और सही समय का लाभ उठाकर ऊपर आए थे, ये वारिस सिर्फ अपने जन्म के कारण अपार आर्थिक शक्ति वाले पद हासिल करेंगे। विडंबना साफ है। "साझा समृद्धि" के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का दावा करने वाली सरकार उस स्थायी अभिजात वर्ग के उभार को रोकने वाले उपायों के प्रति चौंकाने वाली उदासीनता दिखाती है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग संपत्ति की खाई घटाने और समृद्धि का लाभ साझा करने की बात बार-बार करते हैं, लेकिन उनका प्रशासन वंशानुगत संपत्ति के संकेंद्रण को रोकने का सबसे बुनियादी उपाय लागू करने में नाकाम रहा है: एक प्रभावी विरासत कर। बयानबाजी और वास्तविकता के बीच की यह खाई आधुनिक चीनी शासन के केंद्र में मौजूद तनाव को उजागर करती है।

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इतिहास की उलटी दिशा

आज हो रहे बदलाव का महत्व समझने के लिए चीन के साम्राज्यवादी अतीत और उसकी उल्लेखनीय योग्यता-आधारित परंपराओं पर नजर डालनी होगी। 1644 से 1911 तक शासन करने वाले छिंग राजवंश ने इतिहास की सबसे परिष्कृत नौकरशाही व्यवस्थाओं में से एक कायम रखी, क्योंकि उसने अपने प्रशासकों के बीच वंशानुगत शासन को अस्वीकार किया था। यूरोपीय अभिजात वर्ग में जहां पदवियां और सत्ता अपने आप वंश के आधार पर आगे बढ़ती थीं, वहीं छिंग शासन एक कठोर परीक्षा प्रणाली पर निर्भर था। इसके जरिए आम लोग जन्म के अधिकार के बजाय विद्वत्ता और योग्यता के आधार पर सर्वोच्च पदों तक पहुंच सकते थे।

कोज्यू नाम से जानी जाने वाली इस योग्यता-आधारित व्यवस्था में सरकारी पद के आकांक्षियों को कन्फ्यूशियस के शास्त्रीय ग्रंथों में दक्षता हासिल करनी होती थी और काउंटी, प्रांतीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए नैतिक और प्रशासनिक क्षमता साबित करनी होती थी। धनी परिवार निजी शिक्षक और किताबें जुटा सकते थे, लेकिन व्यवस्था इतनी खुली थी कि साधारण पृष्ठभूमि के प्रतिभाशाली लोग भी सत्ता तक पहुंच सकते थे। परीक्षाओं में दर्शन, कविता और शासन संबंधी ज्ञान परखा जाता था, ताकि अधिकारी बौद्धिक क्षमता के साथ-साथ नैतिक आधार भी रखते हों। सर्वोच्च स्तर की परीक्षाएं पास करने वाले लोग मंदारिनों में शामिल होते थे। ये कुलीन नौकरशाहों का छोटा समूह था, जो विशाल साम्राज्य पर शासन करता था।

छिंग शासन ने "परहेज के नियम" को भी लागू किया, जिसके तहत अधिकारी अपने गृह प्रांतों में नियुक्त नहीं हो सकते थे। इससे भाई-भतीजावाद और स्थानीय पक्षपात का जोखिम घटता था। अधिकारियों के पद हर तीन साल में बदल दिए जाते थे, ताकि वे स्थानीय सत्ता के ऐसे केंद्र न बना सकें जो केंद्रीय शासन को चुनौती दें या परिवार के हितों को तरजीह दें। इससे ऐसी सरकार बनी, जिसमें इतिहासकारों के शब्दों में "अभिजात आम लोग" शासन करते थे: ऐसे शासक, जिनका व्यापक समाज से जुड़ाव बना रहता था, न कि वे किसी बंद जाति का हिस्सा बनते थे।

मानवविज्ञानी और आर्थिक व्यवस्थाओं के आलोचक डेविड ग्रेबर ने कहा था कि इतिहास में योग्यता-आधारित व्यवस्थाएं अक्सर आदर्शवाद के बजाय राजनीतिक जरूरतों के चलते उभरीं। वैश्विक पूंजीवाद के अपने विश्लेषण में उन्होंने कहा कि अपेक्षाकृत समानता वाले दौर में आम तौर पर सत्ताधारी अभिजात वर्ग पर बाहरी दबाव रहा। छिंग की परीक्षा प्रणाली भी शाही शासन को वैधता देने का जरिया थी, क्योंकि इससे प्रशासनिक वर्ग और उसके शासन वाले समुदायों के बीच जुड़ाव बना रहता था। आज चीन इस ऐतिहासिक पैटर्न को उलटते देख रहा है। उच्च पदस्थ अधिकारियों और सफल उद्यमियों के बच्चों, यानी "प्रिंसलिंग्स", का कारोबार और राजनीति दोनों पर दबदबा बढ़ रहा है। अब विशिष्ट शिक्षा, सामाजिक संपर्कों और अवसरों तक पहुंच परीक्षा के अंकों के बजाय संपत्ति से तय होती है। 21वीं सदी का लाल अभिजात वर्ग उन वंशानुगत कुलीनों जैसा दिखता है, जिनका कम्युनिस्ट पार्टी ने 1949 में सत्ता में आने पर सैद्धांतिक रूप से विरोध किया था।

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जब पूंजी की कमाई विकास से आगे निकल जाए

संपत्ति के इस संकेंद्रण के पीछे के गणितीय सच की पहचान फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक "इक्कीसवीं सदी में पूंजी" में की थी। पिकेटी ने दिखाया कि जब पूंजी पर मिलने वाला प्रतिफल समग्र आर्थिक विकास दर से अधिक होता है, तो संपत्ति स्वाभाविक रूप से उन्हीं लोगों के हाथों में जमा होती जाती है जिनके पास पहले से संपत्ति है। इस सूत्र को r > g के रूप में लिखा जाता है, जहां r पूंजी पर प्रतिफल की दर और g अर्थव्यवस्था की विकास दर है। यह बताता है कि सुधारात्मक कदम न उठाए जाएं तो बाजार आधारित अर्थव्यवस्थाएं असमानता की ओर क्यों बढ़ती हैं।

चीन में आर्थिक विकास 2000 के दशक की शुरुआत की दो अंकों वाली दरों से धीमा होकर आज अपेक्षाकृत मामूली स्तर पर आ गया है। वहीं, मौजूदा पूंजी रखने वालों के लिए संपत्ति, प्रौद्योगिकी और वित्त में निवेश का प्रतिफल अब भी काफी है। नतीजा यह है कि संपत्ति रखने वालों और बाकी लोगों के बीच खाई बढ़ रही है। चीनी अरबपतियों ने तेज आर्थिक विकास के दौर में अपनी संपत्ति बनाई और उनके वारिसों को देश के इतिहास में अभूतपूर्व स्तर की संपत्ति विरासत में मिल सकती है। रोकथाम के कदम न उठाए गए तो ये संपत्तियां पीढ़ियों तक बढ़ती रहेंगी और ऐसा स्थायी किराया-आधारित वर्ग बनेगा, जिसकी आय उत्पादक योगदान के बजाय निवेश से आती है।

पूंजीवाद पर ग्रेबर की आलोचना चीन की राह को समझने के लिए अतिरिक्त संदर्भ देती है। उनका तर्क था कि लगभग 1917 से 1975 के बीच का दौर, जब पश्चिमी पूंजीवाद ने व्यापक समृद्धि पैदा की और असमानता घटाई, व्यवस्था की स्वाभाविक प्रवृत्ति के बजाय इतिहास का अपवाद था।

पूंजीवाद में खुद को सभ्य बनाने की कोई अंतर्निहित प्रवृत्ति नहीं है। अपने हाल पर छोड़ दिया जाए तो उससे निवेश पर ऐसा प्रतिफल मिलने की उम्मीद की जा सकती है, जो समग्र आर्थिक विकास दर से कहीं अधिक हो। इसका एकमात्र संभावित नतीजा यह होगा कि अधिकाधिक संपत्ति निवेशकों के एक वंशानुगत अभिजात वर्ग के हाथों में चली जाएगी।

उन दशकों में पूंजीवादी अभिजात वर्ग को समाजवादी विकल्पों, मजबूत श्रमिक आंदोलनों और सोवियत संघ से प्रतिस्पर्धा के विश्वसनीय खतरे का सामना करना पड़ा। इन दबावों के कारण ऐसी रियायतें देनी पड़ीं, जिनसे मध्यम वर्ग समृद्ध हुआ। ऊंची सीमांत कर दरों, मजबूत विरासत करों और ताकतवर श्रमिक संघों ने यह सुनिश्चित किया कि संपत्ति वंशानुगत तिजोरियों में जमा होने के बजाय अर्थव्यवस्था में घूमती रहे। आज चीन में ऐसे संतुलनकारी दबाव नहीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टी श्रमिक संगठनों पर कड़ा नियंत्रण रखती है और मौजूदा व्यवस्था को चुनौती देने वाला कोई वैचारिक विकल्प नहीं है। बाहरी दबाव के बिना पूंजी के संकेंद्रण की स्वाभाविक प्रवृत्ति पर कोई रोक नहीं है।

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विरासत कर का अभाव

चीन की नीतिगत व्यवस्था की सबसे स्पष्ट कमी प्रभावी विरासत कर का न होना है। अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों समेत अधिकांश विकसित देश वंशानुगत संपत्ति के जमाव को रोकने के लिए बड़ी संपत्तियों पर पर्याप्त कर लगाते हैं, लेकिन चीन में ऐसा कोई उपाय नहीं है। समानता के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता और "साझा समृद्धि" की बात करने के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी ने विरासत में मिली संपत्ति पर कर लगाने से इनकार किया है। यह उन दूसरी विकसित अर्थव्यवस्थाओं से बिल्कुल उलट है, जहां संपत्ति कर लंबे समय से वंशानुगत विशेषाधिकार पर अंकुश का काम करते आए हैं।

यह निष्क्रियता प्रशासनिक अक्षमता के बजाय राजनीतिक गणना का नतीजा लगती है। पार्टी के अभिजात वर्ग में भी कई धनी लोग हैं, जिनकी संपत्तियों को सुरक्षा की जरूरत है। इसके अलावा, आर्थिक विकास को गति देने वाला कारोबारी वर्ग उन नीतियों का विरोध कर सकता है, जिनसे पारिवारिक संपत्ति को खतरा हो। लेकिन इस राजनीतिक सतर्कता की दीर्घकालीन कीमत चुकानी पड़ सकती है। विरासत में मिली संपत्ति पर कर न होने से चीनी अरबपतियों की पहली पीढ़ी ऐसे पारिवारिक वंश स्थापित करेगी, जो कई पीढ़ियों तक टिक सकते हैं। इससे ऐसी कठोर सामाजिक व्यवस्था बनेगी, जो पार्टी के स्थापना-सिद्धांतों के विपरीत है। संपत्ति की खाई वर्गीय अवरोध में बदल जाएगी, जिसे आर्थिक विकास की कोई भी दर पाट नहीं सकेगी।

बीसवीं सदी के मध्य के पश्चिमी सामाजिक लोकतंत्रों से तुलना करना उपयोगी है। युद्ध के बाद के दौर में अमेरिका और ब्रिटेन में कुछ वर्षों के दौरान शीर्ष सीमांत कर दरें 90% से अधिक थीं। संपत्ति करों ने रॉकफेलर और कार्नेगी परिवारों की गिल्डेड एज की विशाल संपत्तियों को फिर से बनने से रोका। इन नीतियों ने आर्थिक विकास को बाधित नहीं किया। इसके बजाय, इन्होंने यह सुनिश्चित करके व्यापक समृद्धि की स्थितियां बनाने में मदद की कि संपत्ति वंशानुगत तिजोरियों में जमा होने के बजाय अर्थव्यवस्था में दोबारा निवेश होती रहे। थॉमस पिकेटी का तर्क है कि वामपंथ को ऐसे शासन चुनने पर ध्यान देना चाहिए, जो संकेंद्रित संपत्ति पर कर लगाने और उसे नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं बनाने के लिए प्रतिबद्ध हों। उन्होंने बड़े आय-समूहों पर 80% तक की दरों का सुझाव दिया है, ताकि परजीवी किराया-आधारित वर्ग न बन सके।

चीन के मौजूदा नेतृत्व को लगता है कि स्वैच्छिक परोपकारी दान या अमीरों पर अनौपचारिक दबाव सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए काफी होगा। प्रौद्योगिकी क्षेत्र के अरबपति कभी-कभी सामाजिक कार्यों के लिए बड़े दान देते हैं, अक्सर नियामकीय कार्रवाई या जनदबाव अभियानों के बाद। लेकिन ऐसे दिखावटी कदम ऐसी व्यवस्थित कर नीति की जगह नहीं ले सकते, जो अर्थव्यवस्था में विरासत के बजाय योग्यता को बढ़ावा दे। विरासत में मिली संपत्ति पर कर लगाने से पार्टी की हिचक यह संकेत देती है कि उसने उन पूंजीपतियों के साथ मौन गठजोड़ कर लिया है, जिन्हें नियंत्रित करने का वह दावा करती है। वह दीर्घकालीन समानता के बजाय अल्पकालीन स्थिरता को प्राथमिकता दे रही है।

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असंतोष का जोखिम

चीन में ऐतिहासिक वैधता हमेशा "स्वर्गादेश" की अवधारणा पर निर्भर रही है। इसका अर्थ है कि सत्ता में बने रहने का अधिकार कायम रखने के लिए शासकों को सक्षम और निष्पक्ष शासन करना चाहिए। छिंग राजवंश के दौर में अधिकारी समझते थे कि असमानता या भ्रष्टाचार पर काबू पाने में नाकामी विद्रोह और सत्ता परिवर्तन को जायज ठहरा सकती है। आधुनिक कम्युनिस्ट पार्टी ने इस पारंपरिक आध्यात्मिक धारणा की जगह आर्थिक विकास और जीवन स्तर में बढ़ोतरी पर आधारित प्रदर्शन-केंद्रित वैधता को काफी हद तक अपना लिया है। अर्थव्यवस्था में तेजी के दौरान पार्टी समृद्धि देने का श्रेय ले सकती थी। जैसे-जैसे विकास धीमा पड़ रहा है और असमानता अस्थायी न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन रही है, सामाजिक अनुबंध कमजोर हो रहा है और पार्टी अपनी नैतिक वैधता खोने का जोखिम उठा रही है।

चीनी युवा कामगार असंभव लगती आवास कीमतों और सीमित तरक्की के विरोध में "लेटे रहने" की बात करते हैं। यह जानकारी कि संपत्ति अब व्यक्तिगत मेहनत के बजाय परिवार की पृष्ठभूमि पर अधिक निर्भर होती जा रही है, योग्यता-आधारित व्यवस्था की उस कहानी को कमजोर करती है जिसे पार्टी ने 1978 में सुधारों का दौर शुरू होने के बाद से आगे बढ़ाया है। विश्वविद्यालय के स्नातकों को नौकरियों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, जबकि अमीर परिवारों के बच्चे विदेश में विशिष्ट संस्थानों से पढ़ाई करते हैं और लौटकर पारिवारिक कंपनियों या सरकारी उपक्रमों में पद संभाल लेते हैं। यह एहसास कि कड़ी मेहनत अब तरक्की की गारंटी नहीं देती, ऐसे निराश युवाओं की पीढ़ी पैदा करता है जिन्हें आगे बढ़ने की कोशिश का कोई मतलब नहीं दिखता।

खतरा केवल आर्थिक नहीं, राजनीतिक भी है। कठोर वर्गीय सीमाओं और अभिजात वर्ग में सीमित आवाजाही वाला समाज ऐतिहासिक रूप से अस्थिरता पैदा करता है। जब साधारण पृष्ठभूमि के प्रतिभाशाली लोगों का रास्ता वंशानुगत विशेषाधिकार रोकने लगते हैं, तो इससे पैदा असंतोष कट्टरपंथ को बढ़ावा दे सकता है। कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता हासिल करने के लिए ठीक इसी असंतोष को 1949 से पहले के जमींदार और पूंजीपति वर्गों के खिलाफ लामबंद किया था। अब उसे ऐसे नए अभिजात वर्ग की रखवाली करने का जोखिम है, जो उन पुराने दमनकारियों की हूबहू छवि है जिन्हें उसने कभी सत्ता से हटाया था।

"साझा समृद्धि" पर शी जिनपिंग की बयानबाजी इस खतरे को पहचानती है। इस अभियान का निशाना "अनुचित आय" है और यह "अत्यधिक" संपत्ति संचय को नियंत्रित करने की मांग करता है। लेकिन विरासत कर जैसे संरचनात्मक सुधारों के बिना ऐसे अभियान व्यवस्थित समाधान के बजाय छिटपुट हस्तक्षेप बनकर रह जाते हैं। इनसे अलग-अलग अरबपतियों को सजा मिल सकती है, लेकिन उस बुनियादी प्रक्रिया पर ध्यान नहीं जाता जो अरबपतियों को एक वर्ग के रूप में पैदा करती है। आने वाले दशकों में सामाजिक स्थिरता पर इसके असर को लेकर सरकार चौंकाने वाली बेफिक्री दिखाती है।

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वैश्विक संदर्भ और भविष्य

चीन की चुनौती एक व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है। अमेरिका से लेकर भारत तक, देश वंशानुगत संपत्ति की वापसी और सामाजिक गतिशीलता में गिरावट से जूझ रहे हैं। बीसवीं सदी के मध्य का अपेक्षाकृत समानतावादी पूंजीवाद तेजी से एक ऐसे अनोखे दौर के रूप में दिख रहा है, जिसे युद्ध की तबाही, ऊंचे करों और शीत युद्ध की प्रतिस्पर्धा ने जन्म दिया था। जैसे-जैसे ये दबाव कम हो रहे हैं, अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं में पूंजी के संकेंद्रण की स्वाभाविक प्रवृत्ति फिर उभर रही है।

अपनी आधिकारिक विचारधारा और केंद्रीकृत राज्य शक्ति के कारण चीन इस प्रवृत्ति का विरोध करने के लिए खास तौर पर सक्षम दिखाई दे सकता है। कम्युनिस्ट पार्टी चुनावी बाधाओं से मुक्त होकर आर्थिक नीति निर्देशित कर सकती है, जो पश्चिमी सरकारों के हाथ बांधती हैं। चाहे तो वह संपत्ति जब्त करने वाले विरासत कर लागू कर सकती है, निजी संपत्ति को सार्वजनिक स्वामित्व में बदल सकती है या संपत्ति का व्यापक पुनर्वितरण अनिवार्य कर सकती है। उसने ऐसा नहीं किया है। इससे संकेत मिलता है कि या तो पार्टी पर अमीरों के हितों का कब्जा हो गया है, या उसे डर है कि बड़े पैमाने पर पुनर्वितरण से निवेश और विकास को नुकसान पहुंचेगा।

दोनों ही वजहें एक कठिन भविष्य की ओर इशारा करती हैं। अगर चीन मौजूदा राह पर चलता रहा तो वहां क्रांति-पूर्व दौर जैसी सामाजिक संरचना बन जाएगी, जिसमें एक छोटा वंशानुगत अभिजात वर्ग असमान रूप से बड़ी आर्थिक और राजनीतिक शक्ति पर नियंत्रण रखेगा। यह अंतिम विडंबना होगी: एक कम्युनिस्ट राज्य उसी वर्गीय व्यवस्था को जन्म दे, जिसे खत्म करने के लिए उसकी स्थापना हुई थी। चीनी पूंजीपतियों की पहली पीढ़ी ने जोखिम उठाकर और नए विचारों के सहारे संपत्ति बनाई। उनके पोते-पोतियां केवल जन्म लेने के कारण ये संपत्तियां विरासत में पाएंगे, भले ही उनकी अपनी क्षमता या मेहनत कुछ भी हो। संपत्ति के इन संकेंद्रणों को तोड़ने के लिए कर व्यवस्था न हुई तो चीन ऐसे समाज में बदलने का जोखिम उठाएगा, जहां योग्यता से अधिक जन्म मायने रखता है। यह आधुनिक राज्य के घोषित आदर्शों का पूरा उलट होगा।

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मुख्य बातें

  • चीन में संपत्ति का पहला बड़ा पीढ़ीगत हस्तांतरण हो रहा है, जिससे अरबपति वारिसों और प्रिंसलिंग्स का वंशानुगत अभिजात वर्ग बन रहा है।
  • कम्युनिस्ट पार्टी वंशानुगत संपत्ति के संचय को रोकने के लिए विरासत कर या अन्य उपाय लागू करने में नाकाम रही है।
  • यह प्रवृत्ति योग्यता-आधारित चीनी ऐतिहासिक परंपराओं को उलटती है। इनमें छिंग राजवंश की परीक्षा प्रणाली शामिल है, जिसने विद्वतापूर्ण उपलब्धि के आधार पर सामाजिक तरक्की का अवसर दिया था।
  • आर्थिक विश्लेषण बताता है कि जब पूंजी पर प्रतिफल विकास दर से अधिक होता है, तो सुधारात्मक करों के बिना संपत्ति स्वाभाविक रूप से संकेंद्रित होती जाती है।
  • शी जिनपिंग के "साझा समृद्धि" अभियान में असमानता के मूल कारणों से निपटने वाले संरचनात्मक सुधार नहीं हैं।
  • स्थायी अभिजात वर्ग के उभार से सामाजिक असंतोष बढ़ने और पार्टी की राजनीतिक वैधता कमजोर पड़ने का जोखिम है।
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