भारत की शहरी खनन क्रांति के भीतर
भारत के उत्तर में एक दूरदराज़ संयंत्र में सैकड़ों फेंकी हुई बैटरियाँ कन्वेयर बेल्ट पर खड़खड़ाती हुई क्रशर में जा रही हैं। इससे अरबों डॉलर का ऐसा उद्योग बढ़ रहा है जो देश की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को बल देता है। हरियाणा में एक्सिगो रीसाइक्लिंग की विशाल सुविधा में एक मशीन ई-स्कूटर की बैटरियों को पीसकर काला पाउडर बना देती है। फिर इस सामग्री को गहरे लाल तरल में घोला जाता है, छाना जाता है, वाष्पित किया जाता है और अंततः एक महीन सफेद पाउडर में बदल दिया जाता है, जिसे संयंत्र के वैज्ञानिक ‘सफेद सोना’ कहते हैं। यह लिथियम कार्बोनेट है, एक महत्वपूर्ण खनिज जिसके लिए भारत फिलहाल पूरी तरह आयात पर निर्भर है।
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स्मार्टफोन से लेकर लड़ाकू विमानों और इलेक्ट्रिक कारों तक, हर चीज़ के निर्माण के लिए ज़रूरी संसाधनों को लेकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज़ हो रही है। ऐसे में नई दिल्ली रणनीतिक समाधान के तौर पर देश में तेज़ी से बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पहाड़ों की ओर देख रही है। आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक, पिछले साल भारत में लगभग 1.5 करोड़ टन ई-कचरा पैदा हुआ, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक आँकड़ा इससे दोगुना हो सकता है। इस कचरे में कीमती धातुओं की सांद्रता अक्सर व्यावसायिक खनन से मिलने वाले अयस्कों से अधिक होती है। एक टन कंप्यूटर कबाड़ में 17 टन सोने के अयस्क से अधिक सोना होता है, जबकि मोबाइल फोन में पारंपरिक अयस्कों की तुलना में पाँच से दस गुना अधिक सोना होता है। सर्किट बोर्ड में प्लैटिनम और पैलेडियम होते हैं; एलईडी स्क्रीन में जर्मेनियम होता है; हार्ड डिस्क में दुर्लभ मृदा तत्व होते हैं। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, शहरी खनन यानी फेंके गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से खनिजों की पुनर्प्राप्ति से सालाना 6 अरब डॉलर तक का कारोबार हो सकता है।
भू-राजनीतिक ज़रूरतें और क्वाड गठबंधन
भारत की ई-कचरा मुहिम के पीछे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की गंभीर कमज़ोरियाँ हैं। महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण और परिष्करण पर फिलहाल चीन का दबदबा है। बैटरियों के लिए वह वैश्विक पूर्व-प्रसंस्करण क्षमता के लगभग 75 प्रतिशत और सामग्री पुनर्प्राप्ति क्षमता के 70 प्रतिशत पर नियंत्रण रखता है। इस एकाग्रता ने दुनिया भर की राजधानियों में चिंता बढ़ा दी है, खासकर इसलिए कि हरित प्रौद्योगिकियों को अपनाने और रक्षा प्रणालियों को उन्नत करने के साथ 2040 तक लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्वों की माँग चार गुना होने की उम्मीद है।
इसके जवाब में ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका के बीच चतुर्भुज सुरक्षा संवाद ने जुलाई 2025 में क्वाड महत्वपूर्ण खनिज पहल शुरू की। वॉशिंगटन में क्वाड के विदेश मंत्रियों की 10वीं बैठक के बाद गठबंधन ने ई-कचरे से महत्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति और पुनःप्रसंस्करण पर विशेष सहयोग की घोषणा की। इस पहल का उद्देश्य आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित और विविध बनाना तथा सीमित स्रोतों पर निर्भरता घटाना है। साझेदारी के तहत आपूर्ति शृंखला की मज़बूती के उपायों पर सहयोग बढ़ाया जाएगा और निवेश बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र के साझेदारों के साथ तालमेल किया जाएगा।
इस गठबंधन में भारत की भागीदारी उसकी घरेलू राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन का पूरक है। यह मिशन 2023 में लगभग 4 अरब डॉलर के बजट के साथ शुरू किया गया था। इसका लक्ष्य विदेशों में सौदे करना, घरेलू खदानें खोलना और औपचारिक पुनर्चक्रण का विस्तार करना है। इसी के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले साल 1,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना को मंज़ूरी दी, जिसका विशेष उद्देश्य ई-कचरे, इस्तेमाल की हुई लिथियम-आयन बैटरियों और फेंके गए वाहनों के कैटेलिटिक कन्वर्टर जैसे द्वितीयक स्रोतों से महत्वपूर्ण खनिजों के औपचारिक पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना है।
औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र के बीच खाई
नीतिगत प्रयासों के बावजूद भारत का ई-कचरा तंत्र विनियमित सुविधाओं और अनियमित कार्यशालाओं के बीच गहराई से बँटा हुआ है। दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था टॉक्सिक्स लिंक के अनुमानों के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक कचरे का 90 प्रतिशत से अधिक संग्रह और शुरुआती विघटन अब भी अनौपचारिक कार्यशालाओं में होता है। वहाँ कामगार अक्सर बिना सुरक्षा उपकरणों के लगभग 300 रुपये की आम दैनिक मज़दूरी पर काम करते हैं। दिल्ली के गरीब इलाके सीलमपुर में भारत के सबसे बड़े अनौपचारिक ई-कचरा केंद्रों में से एक है। इसकी तंग गलियों में उलझे तार और टूटे उपकरण बिखरे रहते हैं, जहाँ करीब 50,000 कामगार उत्तर भारत के कचरे का प्रसंस्करण करते हैं।
स्थानीय व्यापारी शब्बीर खान ने अनौपचारिक माध्यमों से सामग्री के लगातार आने-जाने के बारे में बताया।
नई कंपनियाँ सिर्फ़ प्रमाणन के लिए ज़रूरत भर सामग्री रखती हैं, बाकी अब भी हमारे पास आती है। कारोबार घटा नहीं, बढ़ा है।
उनकी बात एक जटिल सच्चाई दिखाती है: अंततः औपचारिक पुनर्चक्रणकर्ताओं तक पहुँचने वाली सामग्री भी अक्सर पहले अनौपचारिक हाथों से गुजरती है, जिससे शुरुआती छँटाई के दौरान महत्वपूर्ण खनिजों का बड़ा नुकसान होता है। सस्टेनेबल इलेक्ट्रॉनिक्स रीसाइक्लिंग इंटरनेशनल के वरिष्ठ सलाहकार संदीप चटर्जी ने कहा कि भारत का अनौपचारिक क्षेत्र कचरा संग्रह की रीढ़ है, लेकिन उसे पता लगाने योग्य आपूर्ति शृंखलाओं में शामिल करने से खनिजों का नुकसान काफी घट सकता है।
अनौपचारिक प्रसंस्करण के तरीकों की पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। कामगार खुले में जलाने, एसिड के घोल में डुबोने और बिना सुरक्षा के उपकरण खोलने जैसे तरीके अपनाते हैं। इससे वे सीसा, कैडमियम, पारा और डाइऑक्सिन जैसी ज़हरीली गैसों के संपर्क में आते हैं और मिट्टी तथा जल प्रणालियाँ दूषित होती हैं। शोध के मुताबिक, अनौपचारिक पुनर्चक्रण में आम तौर पर कीमती धातुओं का केवल 20 से 40 प्रतिशत ही वापस मिल पाता है, जबकि भौतिक क्षति और रासायनिक प्रदूषण के कारण दुर्लभ मृदा चुंबक और अन्य मूल्यवान सामग्री पूरी तरह नष्ट हो जाती हैं।
भारत का एकमात्र अधिकृत गैर-लाभकारी ई-कचरा पुनर्चक्रणकर्ता इकोवर्क प्रशिक्षण और सुरक्षित कार्यस्थलों के ज़रिए इस खाई को पाटने की कोशिश कर रहा है। संचालन प्रबंधक देवेश तिवारी ने उनके प्रशिक्षण के तरीके के बारे में बताया।
हम अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों को उपकरण खोलने और पूरी प्रक्रिया का प्रशिक्षण देते हैं। हम उन्हें ख़तरों, मूल्यवान महत्वपूर्ण खनिजों और सही तरीके से काम करने के बारे में बताते हैं, ताकि सामग्री का मूल्य कम न हो।
इसकी सुविधा में अब 20 वर्षीय रिज़वान सैफ़ी जैसे कामगार हार्ड ड्राइव से स्थायी चुंबक निकालते हैं। पहले इन्हें फेंक दिया जाता था, क्योंकि कबाड़ बाज़ार में केवल तांबे और एल्युमिनियम को मूल्यवान माना जाता था। इन चुंबकों में डिस्प्रोसियम होता है, जो आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए ज़रूरी दुर्लभ मृदा धातु है।
पुनर्चक्रण नियमों को लेकर कानूनी चुनौती
ई-कचरा पुनर्चक्रण को औपचारिक बनाने की भारत की कोशिश को प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं के बड़े कानूनी विरोध का सामना करना पड़ा है। सैमसंग, एलजी, डाइकिन, कैरियर, हिताची और हैवेल्स ने विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व नियमों को लेकर भारत सरकार पर मुकदमा किया है। इन नियमों के तहत उन्हें मार्च 2026 तक अपने इलेक्ट्रॉनिक कचरे का 80 प्रतिशत पुनर्चक्रित करना होगा और अधिकृत पुनर्चक्रणकर्ताओं को कम से कम 22 रुपये प्रति किलोग्राम की तय कीमत चुकानी होगी।
कंपनियों का कहना है कि यह कीमत मनमानी और प्रतिस्पर्धा-विरोधी है, और पिछली दरों से लगभग तीन से चार गुना अधिक है। उनका यह भी तर्क है कि बड़े शहरों के बाहर लाइसेंस प्राप्त पुनर्चक्रणकर्ताओं की संख्या सीमित होने के कारण लक्ष्य अवास्तविक हैं। पहले निर्माता दूसरी कंपनियों के साथ विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व प्रमाणपत्रों का लेन-देन कर अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी कर सकते थे, जिससे एक लचीला बाज़ार बना था। नए नियम यह गुंजाइश खत्म करते हैं और कंपनियों को आशंका है कि अनुपालन की लागत से उनका कामकाज प्रभावित हो सकता है। मुकदमों को एक मामले में मिला दिया गया है और अब अगली सुनवाई का इंतज़ार है।
अदालत का फैसला भारत की इलेक्ट्रॉनिक कचरे से खनिज प्राप्त करने की रणनीति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करेगा। सरकार का कहना है कि न्यूनतम कीमत से पुनर्चक्रणकर्ताओं को उचित भुगतान सुनिश्चित होगा, नियमों का पालन करने वाली सुविधाओं का विस्तार होगा और अनौपचारिक कार्यशालाओं पर निर्भरता घटेगी। हालांकि, स्थिरता विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि उचित बदलाव की व्यवस्था के बिना औपचारिककरण से लाखों अनौपचारिक कामगार बाहर हो सकते हैं। इससे सामाजिक समानता और देश के अधिकांश कचरे को फिलहाल संभालने वाले प्रभावी संग्रह नेटवर्क, दोनों को नुकसान पहुँचेगा।
तकनीकी कमियाँ और अंतरराष्ट्रीय मानक
चीन और यूरोपीय संघ की तुलना में भारत की औपचारिक पुनर्चक्रण क्षमता सीमित है। दोनों ने उन्नत पुनर्प्राप्ति प्रौद्योगिकियों और पता लगाने की प्रणालियों में भारी निवेश किया है। फिलहाल मूल्यवान ‘ब्लैक मास’ का बड़ा हिस्सा निर्यात किया जाता है। यह ऐसा पाउडर है जिसमें लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसी धातुएँ होती हैं, लेकिन भारत में प्रसंस्करण क्षमता अपर्याप्त है। देश में अभी केवल कुछ ही कंपनियाँ ऐसी हैं जो बैटरी के कबाड़ को परिष्कृत धातुओं में बदलने वाली पूरी प्रक्रिया संचालित करती हैं।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुमानों के अनुसार, 2040 तक भारत उपलब्ध बैटरी पुनर्चक्रण सामग्री का केवल 10 प्रतिशत ही संसाधित कर पाएगा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका में यह आँकड़ा 30 प्रतिशत होगा। चीन ने हाल ही में चाइना रिसोर्सेज रीसाइक्लिंग ग्रुप लिमिटेड के गठन की घोषणा की। यह सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी उपयोग-अवधि पूरी कर चुकी बैटरियों और ई-कचरे के पुनर्चक्रण के लिए समर्पित है, जिससे चीन की प्रमुख स्थिति और मज़बूत होगी। वैश्विक पुनर्चक्रण क्षमता तेज़ी से बढ़ रही है। इसमें चीन सबसे आगे है, जहाँ 2023 में नई पूर्व-प्रसंस्करण और सामग्री पुनर्प्राप्ति क्षमता का 80 प्रतिशत स्थापित हुआ।
इन कमियों को दूर करने के लिए खान मंत्रालय आईआईटी और सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं समेत शोध संस्थानों के साथ काम कर रहा है। इन संस्थानों ने धातुओं की पुनर्प्राप्ति और शुद्धिकरण के लिए स्वदेशी जल-रासायनिक प्रक्रियाएँ विकसित की हैं। वे खनिज निष्कर्षण और प्रसंस्करण का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। 2025-26 के केंद्रीय बजट में लिथियम-आयन बैटरी के कबाड़ पर सीमा शुल्क हटाए जाने से ऐसी सामग्री का आयात आसान होने की उम्मीद है। इससे अगले चार से पाँच वर्षों में पुनर्चक्रण के अवसर बढ़ेंगे, जबकि घरेलू क्षमता का विस्तार होगा।
बजट की माँगें और रणनीतिक लक्ष्य
भारत के 2026-27 के केंद्रीय बजट की तैयारी के बीच उद्योग संगठन महत्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति तेज़ करने के लिए लक्षित राजकोषीय प्रोत्साहनों की माँग कर रहे हैं। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ ने एक समर्पित ‘भारत महत्वपूर्ण खनिज अवशेष पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम’ शुरू करने की सिफारिश की है। इसमें खदानों के अवशेषों से खनिज निकालने को रणनीतिक प्राथमिकता मानते हुए दो तरह की वित्तीय सहायता देने का प्रस्ताव है: चालू खदान स्थलों पर त्वरित क्षेत्रीय पायलट परियोजनाओं के लिए और जल-रासायनिक तथा उन्नत पृथक्करण तकनीकों पर केंद्रित प्रौद्योगिकी प्रदर्शन परियोजनाओं के लिए।
पुनर्चक्रणकर्ता बैटरी के कबाड़ और खनिज युक्त कचरे पर जीएसटी की मौजूदा दर घटाकर 5 प्रतिशत करने की विशेष माँग कर रहे हैं। साथ ही, निकल और कोबाल्ट सल्फेट जैसे मध्यवर्ती उत्पादों पर मूल सीमा शुल्क लगाने की माँग है, ताकि आयात के कारण घरेलू क्षमता का पूरा इस्तेमाल न होने से बचा जा सके। कम से कम 22 महत्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति की क्षमता का दावा करने वाली अटेरो रीसाइक्लिंग के सह-संस्थापक और सीईओ नितिन गुप्ता ने इसकी रणनीतिक अहमियत पर ज़ोर दिया।
आज पुनर्चक्रण का मतलब सिर्फ़ स्थिरता नहीं, बल्कि सामग्री की सुरक्षा भी है।
इसका दाँव अर्थव्यवस्था से कहीं आगे तक है। टिप्पणीकारों का कहना है कि 1970 के दशक के तेल संकटों ने भारत को सिखाया कि माप-जोख के बिना प्रबंधन कमज़ोरी पैदा करता है। आज खनिजों की स्थिति वही है जो कभी तेल की थी, लेकिन वे ज़्यादा क्षेत्रों में अहम हैं और उनके प्रभाव लंबे समय तक रहेंगे। 2030 तक ई-कचरे की मात्रा 5 करोड़ टन पहुँचने का अनुमान है। भारत अपने कबाड़ को रणनीतिक संसाधनों में बदल पाएगा या नहीं, इसी से तय होगा कि वह अपने 500 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण लक्ष्य और व्यापक स्वच्छ ऊर्जा बदलाव के लिए ज़रूरी सामग्री जुटा पाएगा या नहीं, और क्या यह लाखों अनौपचारिक कामगारों को पीछे छोड़े बिना हो सकेगा।
मुख्य बातें
- भारत में हर साल 1.5 से 1.75 करोड़ टन ई-कचरा पैदा होता है। शहरी खनन के ज़रिए इससे लिथियम, कोबाल्ट, दुर्लभ मृदा तत्व और कीमती धातुएँ निकालकर 6 अरब डॉलर तक का मूल्य हासिल किया जा सकता है
- जुलाई 2025 में शुरू की गई क्वाड महत्वपूर्ण खनिज पहल में चीनी आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता घटाने के लिए ई-कचरे से महत्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति पर सहयोग शामिल है
- सैमसंग और एलजी समेत प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता सरकार के उन विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व नियमों को अदालत में चुनौती दे रहे हैं, जिनमें 80 प्रतिशत पुनर्चक्रण और प्रति किलोग्राम न्यूनतम तय कीमत अनिवार्य है
- ई-कचरे के 90 प्रतिशत से अधिक संग्रह और विघटन का काम अब भी अनौपचारिक क्षेत्र में होता है, जहाँ कामगार बिना सुरक्षा उपकरणों या मानकों के रोज़ाना लगभग 3.38 डॉलर कमाते हैं
- भारत ने औपचारिक पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने के लिए 1,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना मंज़ूर की है। इसमें बड़े पुनर्चक्रणकर्ताओं के लिए अधिकतम 50 करोड़ रुपये और छोटे उद्यमों के लिए 25 करोड़ रुपये का अनुदान तय है
- अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुमान के अनुसार, 2040 तक भारत में बैटरी पुनर्चक्रण कवरेज केवल 10 प्रतिशत होगी, जो यूरोप और उत्तरी अमेरिका के मानकों से काफी कम है
- उद्योग जगत की 2026 के बजट से माँगों में बैटरी के कबाड़ पर जीएसटी घटाकर 5 प्रतिशत करना और खदानों के कचरे से खनिज निकालने के लिए समर्पित कार्यक्रम शुरू करना शामिल है






