संरक्षणवाद से खुलेपन तक: भारत की आर्थिक दिशा में बदलाव
भारत लंबे समय से व्यापार बाधाओं और नौकरशाही की जटिलताओं का पर्याय रहा है। यहां सामान आयात करने का मतलब अक्सर शुल्कों और नियमों की भूलभुलैया से गुजरना होता था। लेकिन अब एक उल्लेखनीय बदलाव हो रहा है, जिस पर वैश्विक बाजारों की नजर है: दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था संरक्षणवाद का चोला उतारने की ओर बढ़ती दिख रही है। हाल के कई व्यापार समझौते, जिनमें यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ ऐतिहासिक करार भी शामिल हैं, उस बदलाव का संकेत देते हैं जिसे अधिकारी और अर्थशास्त्री भारत के आर्थिक डीएनए में संरचनात्मक परिवर्तन बता रहे हैं। मुंबई से ब्रसेल्स तक के बोर्डरूम में अब यह सवाल चर्चा के केंद्र में है कि क्या यह बदलाव वास्तविक रूपांतरण है या अस्थिर भू-राजनीतिक परिदृश्य में महज रणनीतिक फेरबदल।
विषय-सूची
- संरक्षणवाद से खुलेपन तक: भारत की आर्थिक दिशा में बदलाव
- सभी समझौतों में सबसे बड़ा: वैश्विक मंच पर नई स्थिति के लिए बातचीत
- विनिर्माण की हकीकत: कारखानों की रफ्तार क्यों थमती है
- चीन की चुनौती: निर्भरता और विविधीकरण
- क्षेत्रवार अवसर: कपड़ा उद्योग से सेमीकंडक्टर तक
- आधार तैयार करना: व्यापार समझौतों से आगे के सुधार
- मुख्य बातें
उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि कुछ बुनियादी बदलाव हो रहा है। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26, जिसे इस साल की शुरुआत में संसद में पेश किया गया, ने असामान्य रूप से स्पष्ट संदेश दिया: सेवा निर्यात ने भारत को समृद्ध बनाया, लेकिन विनिर्माण ही उसे लचीला बनाएगा। दशकों तक भारत ने वृद्धि को गति देने के लिए सॉफ्टवेयर और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग में अपनी ताकत पर भरोसा किया। इससे दोहरी अर्थव्यवस्था बनी, जिसमें विश्वस्तरीय आईटी केंद्रों के साथ कृषि में ठहराव और उद्योगों का कमजोर प्रदर्शन मौजूद रहा। सर्वेक्षण का तर्क है कि सेवाएं "राज्य की क्षमता में व्यापक सुधार को व्यवस्थित रूप से अनिवार्य नहीं बनातीं", क्योंकि कंपनियां कमजोर संस्थानों से बचकर आसानी से कहीं और जा सकती हैं। इसके उलट, विनिर्माण सरकारों पर बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स, कौशल और नियमन में सुधार का ठोस दबाव बनाता है। यही वैचारिक बदलाव नई दिल्ली की नई व्यापार रणनीति के केंद्र में है। इसमें निर्यातोन्मुख औद्योगीकरण को महज आर्थिक लक्ष्य नहीं, बल्कि राज्य-निर्माण और रोजगार सृजन का माध्यम माना गया है। भारत की युवा आबादी के लिए हर साल लाखों नौकरियां पैदा करना जरूरी है।
आंकड़े अवसर और चुनौती, दोनों दिखाते हैं। दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी महज 1.8% है, जबकि चीन की 14%। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण का योगदान सिर्फ 14% है। यह पांच साल पहले के 15% से अधिक के स्तर से घटा है और 2025 के लिए तय 25% के लक्ष्य से काफी नीचे है। फिर भी रुझान बदल रहा है। 2020 के बाद से कुल निर्यात में सालाना 9.4% की वृद्धि हुई और मार्च 2025 में समाप्त वित्त वर्ष में यह रिकॉर्ड 825.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया। निर्यात की संरचना भी उसकी मात्रा जितनी ही अहम है। नीति-निर्माता अब सॉफ्टवेयर सेवाओं से आगे बढ़कर ऐसे ठोस उत्पादों पर जोर दे रहे हैं, जिनका निर्माण कारखानों में अर्ध-कुशल कामगार करते हैं, न कि कार्यालय परिसरों में इंजीनियरिंग स्नातक।
सभी समझौतों में सबसे बड़ा: वैश्विक मंच पर नई स्थिति के लिए बातचीत
भारत की व्यापार मुहिम का केंद्र यूरोपीय संघ के साथ व्यापक मुक्त व्यापार समझौता है। इस पर करीब दो दशक से बातचीत चल रही थी और आखिरकार 2026 की शुरुआत में इसे अंतिम रूप दिया गया। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेर लेयेन ने इसे "सभी समझौतों में सबसे बड़ा" बताया। यह टिप्पणी दुनिया के दो सबसे बड़े आर्थिक समूहों को करीब दो अरब लोगों को समेटने वाले एकल व्यापार क्षेत्र में जोड़ने की इसकी क्षमता को रेखांकित करती है। भारत के लिए यह समझौता शुल्कों में कटौती से कहीं अधिक है; यह शुल्क युद्धों और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रभावित, लगातार अप्रत्याशित होते वैश्विक क्रम से बचाव का एक रणनीतिक उपाय है।
ईयू समझौते के तहत भारतीय वस्तुओं पर 90% से अधिक शुल्क तुरंत समाप्त होंगे और सात साल के भीतर यह हिस्सेदारी 93% तक पहुंच जाएगी। इससे लाभ पाने वाले क्षेत्रों में कपड़ा, दवा, चमड़ा और इंजीनियरिंग उत्पाद शामिल हैं। रत्न और आभूषण निर्यातकों को खास फायदा होने की उम्मीद है। बाजार तक पहुंच के अलावा, यह समझौता उन जरूरी कच्चे माल और कल-पुर्जों की लागत पर भी असर डालता है, जो लंबे समय से भारतीय विनिर्माताओं के लिए बाधा रहे हैं। फिलहाल इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन लागत का 35-40% हिस्सा महंगे आयातित कल-पुर्जों पर खर्च होता है, जिन पर 40% या उससे अधिक शुल्क लगता है। मुक्त व्यापार समझौता यूरोप से आने वाले सटीक कल-पुर्जों, परीक्षण उपकरणों और लिथोग्राफी उपकरणों पर शुल्क घटाता है। इससे उद्योग जगत के नेताओं के अनुसार, उत्पादन के लिए जरूरी इनपुट के मोर्चे पर क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है।
हाइसेंस इंडिया के सीईओ पंकज राणा का कहना है कि सबसे बड़ा बदलाव सिर्फ निर्यात बाजारों के बजाय आपूर्ति पक्ष में सुधार से आ सकता है।
उत्पादन के लिए जरूरी इनपुट के मोर्चे पर हो रहा कम आंका गया बदलाव बहुत बड़ा है। यूरोपीय आपूर्तिकर्ताओं से आने वाले सटीक कल-पुर्जों, परीक्षण उपकरणों और लिथोग्राफी उपकरणों पर फिलहाल 40% से अधिक आयात शुल्क लगता है, जो अब काफी कम हो रहा है। इससे लागत में अभूतपूर्व कमी आएगी और आपसी प्रमाणन तथा यूरोपीय संघ के नियमों का तेजी से अनुपालन संभव होने से गुणवत्ता भी बेहतर होगी।
इन समझौतों का रणनीतिक समय वैश्विक व्यापार में व्यापक बदलाव को दर्शाता है। राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका जहां बाधा पैदा करने वाले शुल्क लगा रहा है और पारंपरिक गठबंधनों पर सवाल उठा रहा है, वहीं भारत और यूरोप, दोनों वॉशिंगटन की अनिश्चितता से खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष फॉन डेर लेयेन ने स्पष्ट रूप से भारत के साथ हुए समझौते को ऐसे दौर की प्रतिक्रिया बताया, जिसमें व्यापार का इस्तेमाल तेजी से हथियार के रूप में हो रहा है।
अपनी ताकतों को मिलाकर हम ऐसे समय में रणनीतिक निर्भरताएं घटा रहे हैं, जब व्यापार का इस्तेमाल तेजी से हथियार के रूप में हो रहा है।
भारत के लिए ये समझौते वैकल्पिक बाजार मुहैया कराते हैं। इस बीच, मॉस्को के साथ उसके संबंधों और अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष को लेकर वॉशिंगटन का दबाव बना हुआ है। दोनों समझौते भारत को प्रतिस्पर्धी समूहों के बीच एक सेतु अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करते हैं। इससे उसे रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए पश्चिमी बाजारों में तरजीही पहुंच मिलती है।
ईयू समझौते के एक हफ्ते से भी कम समय बाद भारत ने अमेरिका के साथ एक और बड़ी सफलता हासिल की। दोनों देश भारतीय निर्यात पर शुल्क 25% से घटाकर 18% करने पर सहमत हुए। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित इस समझौते में भारत की रूसी तेल खरीद के जवाब में लगाए गए अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क भी हटा दिए गए। इसके बदले भारत ने ऊर्जा, कोयला और कृषि उत्पादों समेत 500 अरब डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जताई और खबरों के मुताबिक रूसी तेल का आयात घटाने का वादा भी किया। ईयू समझौते के तुरंत बाद हुए इस करार की तेजी ने कई पर्यवेक्षकों को चौंकाया। इससे संकेत मिलता है कि नई दिल्ली कई पक्षों के साथ तालमेल की रणनीति का सफलतापूर्वक अपने हित में इस्तेमाल कर रही है।
विनिर्माण की हकीकत: कारखानों की रफ्तार क्यों थमती है
व्यापार समझौतों की धूम के बावजूद, कागजी प्रतिबद्धताओं को औद्योगिक उत्पादन में बदलने के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। भारत की प्रमुख उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना 2020 में शुरू की गई थी। इसके तहत 14 क्षेत्रों के लिए 1.97 लाख करोड़ रुपये (23 अरब डॉलर) का प्रावधान किया गया, जिसका उद्देश्य विनिर्माण में नई जान डालना था। लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे हैं। विनिर्माण का जीडीपी में हिस्सा बढ़ने के बजाय, योजना शुरू होने के समय के 15% से अधिक के स्तर से घटकर वित्त वर्ष 2024-25 में 14% रह गया। कार्यक्रम का लक्ष्य 15.52 लाख करोड़ रुपये का उत्पादन था, लेकिन 2024 के अंत तक यह केवल 14 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच पाया। इसके बाद अटकलें लगने लगीं कि सरकार इस योजना को आगे जारी न रखने दे।
असमान प्रदर्शन उन संरचनात्मक बाधाओं को उजागर करता है, जिन्हें केवल सब्सिडी से दूर नहीं किया जा सकता। स्मार्टफोन असेंबली सबसे बड़ी कामयाबी बनकर उभरी है। वित्त वर्ष 2024 में इसके निर्यात में 42% की वृद्धि हुई और अब एप्पल अपने 20-25% आईफोन भारत में बना रहा है। फॉक्सकॉन, पेगाट्रॉन और अन्य प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं ने यहां बड़े पैमाने पर कामकाज शुरू किया है। इससे भारत 2025 में अमेरिका को स्मार्टफोन निर्यात करने के मामले में चीन को पीछे छोड़कर शीर्ष पर पहुंच गया। लेकिन यह सफलता एक बड़ी कमी भी दिखाती है: भारत अंतिम असेंबली में तो अच्छा है, पर अब भी आयातित कल-पुर्जों, खासकर चीन से आने वाले पुर्जों पर निर्भर है। भारत के इलेक्ट्रॉनिक कल-पुर्जों के करीब 40% आयात अब भी चीनी आपूर्तिकर्ताओं से आते हैं, जबकि सक्रिय दवा सामग्री का 70% उसी स्रोत से आता है। यह निर्भरता आत्मनिर्भर आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाने के रणनीतिक लक्ष्य को कमजोर करती है और भारतीय विनिर्माण को भू-राजनीतिक दबावों के प्रति असुरक्षित बनाती है।
ऐसी गहरी अड़चनें भी बनी हुई हैं जिन्हें व्यापार समझौतों से आसानी से दूर नहीं किया जा सकता। भारत की लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी का करीब 14% है, जबकि चीन में यह 8-10% है। बंदरगाहों पर माल की निकासी में औसतन 6-8 दिन लगते हैं, जबकि सिंगापुर में 1-2 दिन। जेएलएल के आंकड़ों के अनुसार, भारत में श्रम उत्पादकता चीन से काफी कम है, हालांकि यहां विनिर्माण क्षेत्र में प्रति घंटे 2 डॉलर की मजदूरी चीन के 5.58 डॉलर से आधी से भी कम है। कड़े श्रम कानूनों ने ऐतिहासिक रूप से बड़े पैमाने पर विनिर्माण रोजगार को हतोत्साहित किया है। हाल के सुधारों से पहले कंपनियों को कर्मचारियों की भर्ती और छंटनी में बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ता था। जमीन अधिग्रहण में देरी, औद्योगिक बिजली की ऊंची दरें और कौशल की भारी कमी इन चुनौतियों को और बढ़ाती हैं। भारत के करीब 80% नियोक्ता कहते हैं कि उन्हें कुशल कर्मचारी ढूंढने में दिक्कत होती है। रोबोटिक्स, औद्योगिक इंटरनेट ऑफ थिंग्स और सीएनसी मशीन संचालन में यह कमी विशेष रूप से गंभीर है। विनिर्माण क्षेत्र के केवल 11.7% कर्मचारियों को नियमित कर्मचारी का दर्जा प्राप्त है। बाकी अधिकतर अनौपचारिक व्यवस्थाओं में काम करते हैं, जिससे उत्पादकता और नई तकनीक अपनाने की क्षमता सीमित रहती है।
चीन की चुनौती: निर्भरता और विविधीकरण
भारत की विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं के किसी भी विश्लेषण में कमरे में मौजूद हाथी यानी चीन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एशिया की इन दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच संबंधों में भारी असंतुलन है। 2014 से 2024 के बीच चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़ता गया। वित्त वर्ष 2025 में चीन से आयात 113.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि निर्यात सिर्फ 14.3 अरब डॉलर रहा। भारत चीन से जो सामान खरीदता है, उसका करीब 90% कम और मध्यम प्रौद्योगिकी श्रेणियों में आता है। सही नीतियों के साथ भारत सैद्धांतिक रूप से इन वस्तुओं का उत्पादन खुद कर सकता है। फिर भी, अहम इनपुट पर चीन का दबदबा बना हुआ है। भारत के दूरसंचार और इलेक्ट्रॉनिक्स आयात में चीन की हिस्सेदारी 57% है, जबकि मशीनरी आयात में यह 44% है।
बीजिंग ने दिखाया है कि वह इन निर्भरताओं को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। हाल के महीनों में चीन ने गैलियम, जर्मेनियम और ग्रेफाइट समेत अहम खनिजों के निर्यात पर पाबंदियां लगाई हैं। ये खनिज भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और इलेक्ट्रिक वाहन विनिर्माण के लिए जरूरी हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए चीनी अधिकारियों ने भारत को जरूरी मशीनरी का निर्यात रोक दिया। यह कदम रणनीतिक रूप से उस समय उठाया गया, जब नई दिल्ली अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर अंतिम बातचीत कर रही थी। हाल ही में जब चीन की बैटरी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी सीएटीएल ने फॉक्सकॉन से चेन्नई स्थित अपने कारखाने से सभी चीनी इंजीनियरों को वापस बुलाने को कहा, तो उद्योग जगत के जानकारों ने इसे आर्थिक दबाव की रणनीति माना। उनके मुताबिक, इसका मकसद भारत को अमेरिकी समझौते में ऐसी शर्तें शामिल करने से रोकना था, जिनसे चीनी मूल के कल-पुर्जों पर पाबंदी लग सकती थी।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक और व्यापार मामलों के पूर्व अधिकारी अजय श्रीवास्तव ने चेतावनी दी है कि बीजिंग आर्थिक शक्ति का फायदा उठाने की अपनी मंशा दिखा रहा है।
चीन साफ संदेश दे रहा है। भारत का औद्योगिक विकास चीनी कच्चे माल, तकनीक और इंजीनियरों पर बहुत अधिक निर्भर है। इन निर्भरताओं को किसी भी समय हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।
लेकिन यही कमजोरियां अवसर भी पैदा करती हैं। "चीन प्लस वन" रणनीति के तहत वैश्विक विनिर्माता चीनी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भरता घटाने के लिए अपने कामकाज को विविध बना रहे हैं। इससे दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में तेजी आई है। इंडोनेशिया में पिछले साल विनिर्माण क्षेत्र में 28.7 अरब डॉलर का निवेश आया, जबकि वियतनाम में विनिर्माण क्षेत्र का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 30% से अधिक बढ़कर 23.5 अरब डॉलर हो गया। भारत ने भी इस बदलाव का कुछ लाभ उठाया है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली में, लेकिन आपूर्ति श्रृंखलाओं से गहरे जुड़ाव के मामले में वह छोटे प्रतिस्पर्धियों से पीछे है। चुनौती यह है कि अंतिम असेंबली के काम को ऐसे व्यापक विनिर्माण तंत्र में बदला जाए, जहां कल-पुर्जों को केवल जोड़ने के बजाय उनका डिजाइन और इंजीनियरिंग भारत में हो और उन्हें स्थानीय स्तर पर हासिल किया जाए।
क्षेत्रवार अवसर: कपड़ा उद्योग से सेमीकंडक्टर तक
नए व्यापार समझौतों से अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों को विशिष्ट लाभ मिलेंगे। कपड़ा और परिधान उद्योग को यूरोपीय संघ में शुल्क-मुक्त पहुंच से बड़ा फायदा हो सकता है। यह 750 अरब डॉलर का बाजार है। फिलहाल ईयू के कपड़ा बाजार में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 5-6% है, जबकि बांग्लादेश की 21-22% और चीन की 28-30% है। इसकी बड़ी वजह यह है कि शुल्कों के कारण भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते थे। ये बाधाएं हटने के बाद विश्लेषकों का अनुमान है कि ईयू को भारत का कपड़ा निर्यात पांच साल के भीतर 7 अरब डॉलर से दोगुना होकर 15 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इससे 70 लाख से अधिक अतिरिक्त लोगों को रोजगार मिल सकता है। यह मौका खास तौर पर इसलिए अनुकूल है क्योंकि 2026 में बांग्लादेश में सरकार बदलने के बाद राजनीतिक अस्थिरता के बीच कपड़ा मिलों पर बंद होने का खतरा है और नीतियों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
दवा क्षेत्र भी एक और रणनीतिक अवसर है। भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते के तहत कैंसर उपचार और जैविक दवाओं समेत यूरोपीय दवा आयात पर 11% शुल्क समाप्त होगा। साथ ही, यूरोप को भारतीय दवाओं के निर्यात के लिए नियामकीय अनुपालन प्रक्रिया भी सरल होगी। उद्योग के अनुमान के मुताबिक, भारत का घरेलू दवा बाजार 2025 के 31.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2035 तक 45.7 अरब डॉलर हो जाएगा। इससे भी अहम बात यह है कि इस समझौते से सक्रिय दवा सामग्री का घरेलू उत्पादन बढ़ाने को प्रोत्साहन मिलेगा। फिलहाल इसका 70% चीन से आयात होता है। बजट में भारत को जैव-दवा केंद्र बनाने के लिए खास तौर पर 1 लाख करोड़ रुपये (1 अरब डॉलर) रखे गए हैं। सेमीकंडक्टर विनिर्माण और कंटेनर उत्पादन के लिए भी ऐसे ही प्रावधान हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक वाहनों पर नीति-निर्माताओं का खास ध्यान है। एप्पल के लिए भारत में आईफोन उत्पादन तेजी से बढ़ा है, लेकिन देश में सेमीकंडक्टर निर्माण और उन्नत कल-पुर्जे बनाने की क्षमता नहीं है। नए व्यापार समझौते यूरोप से आने वाले सटीक परीक्षण उपकरणों और लिथोग्राफी उपकरणों पर शुल्क घटाते हैं, जिससे उत्पादन लागत में दो अंकों तक कमी आ सकती है। इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र में चीनी कंपनी बीवाईडी ने थाईलैंड की एक फैक्टरी में 500 मिलियन डॉलर का निवेश किया है, जहां हर साल 1,50,000 वाहन बनाए जा सकते हैं। वहीं भारत का अपना ईवी क्षेत्र बैटरी की आपूर्ति में बाधाओं से जूझ रहा है। सरकार का हालिया बजट जैव-दवा, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक कल-पुर्जों और दुर्लभ मृदा चुंबकों समेत सात रणनीतिक क्षेत्रों में विनिर्माण बढ़ाने पर जोर देता है। आयात पर निर्भरता घटाने के लिए तीन विशेष रासायनिक उत्पादन पार्क बनाने की योजना भी है।
आधार तैयार करना: व्यापार समझौतों से आगे के सुधार
व्यापार समझौते दरवाजे खोलते हैं, लेकिन भारत उन अवसरों का लाभ उठा पाएगा या नहीं, यह उसकी घरेलू क्षमताओं पर निर्भर करता है। आर्थिक सर्वेक्षण स्पष्ट चेतावनी देता है कि "व्यापार समझौतों की क्षमता का लाभ उठाने के लिए जरूरी है कि हम प्रतिस्पर्धी ढंग से उत्पादन कर सकें।" यह बात एक अहम हकीकत को रेखांकित करती है: मुक्त व्यापार समझौते बाहरी बाधाएं घटाते हैं, लेकिन जमीन, श्रम, लॉजिस्टिक्स और पूंजी से जुड़ी घरेलू अड़चनें विनिर्माण की प्रतिस्पर्धा क्षमता में बाधा बनी रहती हैं। सर्वेक्षण आगाह करता है कि इस्पात और एल्युमीनियम जैसे शुरुआती उत्पादन क्षेत्रों में संरक्षणवादी उपाय आगे के विनिर्माण पर कर की तरह असर डाल सकते हैं। इसलिए, "क्या संरक्षित न किया जाए, इस पर फैसले उतने ही अहम हो सकते हैं जितने कि किसे समर्थन दिया जाए, इस पर फैसले।"
इन बाधाओं को दूर करने के लिए राज्यों के स्तर पर कदम उठाने होंगे, क्योंकि कई आर्थिक अधिकार उन्हीं के पास हैं। सरकार के प्रमुख नीति संस्थान नीति आयोग ने तीन बड़ी बाधाएं बताई हैं: जमीन की उपलब्धता और अधिग्रहण में देरी, औद्योगिक बिजली की ऊंची दरें जो कई बार उत्पादन लागत से भी अधिक होती हैं, और शिक्षा तथा कौशल प्रशिक्षण की कमी। व्यापार नीति पर केंद्र सरकार का नियंत्रण है, लेकिन इन क्षेत्रों में उन राज्य सरकारों के साथ तालमेल जरूरी है, जो औद्योगिक नीति में सहयोग के बजाय ऐतिहासिक रूप से प्रतिस्पर्धा करती रही हैं। प्रस्तावित उपायों में जमीन के रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण और अधिग्रहण की समयसीमा सरल करना, औद्योगिक बिजली दरों को तर्कसंगत बनाना और राज्यों की तुलना के लिए विनिर्माण प्रदर्शन सूचकांक तैयार करना शामिल हैं। इन पूरक सुधारों के बिना भारत को पिछले दशक वाला सिलसिला दोहराने का जोखिम है: केंद्र की महत्वाकांक्षी नीतियां राज्य स्तर पर क्रियान्वयन की अड़चनों और वैश्विक मांग में कमजोरी के बीच दम तोड़ देती हैं।
क्षेत्रीय एकीकरण से भी विनिर्माण का पैमाना बढ़ाया जा सकता है। फिलहाल दक्षिण एशिया में आपसी व्यापार कुल व्यापार का केवल 5% है, जबकि आसियान में यह 25% और यूरोपीय संघ में 60% है। व्यापार बाधाओं और अक्षम सीमा चौकियों के कारण मुंबई से ढाका तक एक कंटेनर भेजने की लागत 538 डॉलर है, जो चीन से वियतनाम तक के 108 डॉलर के खर्च से पांच गुना अधिक है। रणनीतिक विशेषज्ञ कपड़ा और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए बांग्लादेश, खाद्य प्रसंस्करण के लिए नेपाल और वाहन कल-पुर्जों तथा दवाओं के लिए श्रीलंका के साथ सीमापार आर्थिक क्षेत्र बनाने का प्रस्ताव देते हैं। इससे दक्षिण एशिया में ऐसा विनिर्माण तंत्र बन सकता है, जैसा चीन ने वियतनाम और थाईलैंड के साथ क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखलाएं विकसित करके बनाया। अगले डेढ़ दशक में इससे क्षेत्रीय व्यापार बढ़कर 2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है।
मुख्य बातें
- भारत ने यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ बड़े व्यापार समझौते किए हैं। इनसे शुल्क घटेंगे और विनिर्मित वस्तुओं के लिए बाजार तक पहुंच बढ़ेगी। यह बदलाव संरक्षणवाद से रणनीतिक खुलेपन की ओर बढ़ने का संकेत है।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2026 आर्थिक लचीलेपन, रोजगार सृजन और राज्य की क्षमता मजबूत करने के लिए सेवाओं के बजाय विनिर्माण को अहम बताता है। 2030 तक कुल निर्यात 2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
- जीडीपी के 14% के बराबर लॉजिस्टिक्स लागत, कड़े श्रम कानून, जमीन अधिग्रहण में देरी और कौशल की भारी कमी जैसी संरचनात्मक चुनौतियां बनी हुई हैं। ये विनिर्माण उत्पादकता और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जुड़ाव को सीमित करती हैं।
- चीन से आयात पर निर्भरता अब भी बहुत अधिक है। दवा सामग्री का 70% और इलेक्ट्रॉनिक कल-पुर्जों का 40% चीन से आता है। इससे ऐसी कमजोरियां पैदा होती हैं, जिनका फायदा बीजिंग ने निर्यात पर रोक लगाकर उठाने की तत्परता दिखाई है।
- कपड़ा उद्योग (जहां ईयू को निर्यात दोगुना होकर 15 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है), दवा, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली और जैव-दवा क्षेत्रों में खास अवसर हैं। यूरोप से जरूरी उत्पादन सामग्री पर शुल्क घटने से इन क्षेत्रों को समर्थन मिलेगा।
- सफलता के लिए बुनियादी ढांचे, बिजली दरों, जमीन की उपलब्धता और दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के साथ क्षेत्रीय एकीकरण में पूरक घरेलू सुधार जरूरी हैं। इनसे केवल अंतिम असेंबली से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर विनिर्माण तंत्र बनाया जा सकता है।






