कार्बन डाइऑक्साइड से कैलोरी का निर्माण
चीनी शोधकर्ताओं ने औद्योगिक अपशिष्ट गैस को खाने योग्य स्टार्च में बदलने की प्रक्रिया को नाटकीय रूप से तेज किया है। उनकी इस उपलब्धि से उत्पादकता 2021 की उनकी अभूतपूर्व विधि की तुलना में दस गुना बढ़ गई है। चीनी विज्ञान अकादमी (CAS) की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रगति दुनिया को खेतों, फसलों या पारंपरिक कृषि के बिना औद्योगिक पैमाने पर स्टार्च उत्पादन के और करीब ले जाती है। तियानजिन औद्योगिक जैवप्रौद्योगिकी संस्थान (TIB) के वैज्ञानिकों ने अपनी कोशिका-मुक्त एंजाइमी प्रणाली को बेहतर बनाया है, जो कार्बन डाइऑक्साइड को जटिल कार्बोहाइड्रेट में उस गति से बदलती है जो अब प्राकृतिक प्रकाश संश्लेषण से कहीं अधिक है। यह विकास वैश्विक खाद्य सुरक्षा में संभावित प्रतिमान बदलाव का संकेत देता है। इससे पारंपरिक खेती की पर्यावरणीय लागत से बचते हुए जरूरी खाद्य सामग्री और औद्योगिक कच्चे माल बनाने का रास्ता खुल सकता है।
विषय-सूची
प्रोफेसर काई ताओ के नेतृत्व वाली शोध टीम पिछले पांच वर्षों से उस रासायनिक-जैव रासायनिक संकर प्रक्रिया को बेहतर बनाने में जुटी है, जिसका पहली बार Science पत्रिका में खुलासा हुआ था। 2021 की उनकी मूल उपलब्धि ने दिखाया था कि CO2 से स्टार्च का संश्लेषण मक्का के पौधों की तुलना में 8.5 गुना तेज हो सकता है। हालिया सुधारों से यह उत्पादन दस गुना और बढ़ गया है। इससे ऐसी प्रणाली बनी है जिसकी दक्षता पहले केवल सैद्धांतिक अटकलों तक सीमित थी। कृत्रिम स्टार्च उपचय प्रक्रिया (ASAP) अब उस कृषि व्यवस्था को चुनौती देने की स्थिति में है, जिसका सहस्राब्दियों से मानव सभ्यता पर प्रभुत्व रहा है।
कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण का रसायन
यह प्रक्रिया प्रकृति की नकल करती है, लेकिन पौधों की वृद्धि में मौजूद जैविक अक्षमताओं को दूर करती है। मक्का के पकने के लिए महीनों इंतजार करने के बजाय, प्रयोगशाला में यह रूपांतरण कुछ घंटों में पूरा हो जाता है। इस प्रक्रिया में ग्यारह मुख्य अभिक्रियाएं शामिल हैं, जो रासायनिक और एंजाइमी चरणों के सुनियोजित क्रम से गैसीय कार्बन डाइऑक्साइड को बहुलकीय स्टार्च में बदलती हैं।
सबसे पहले, एक अकार्बनिक उत्प्रेरक नियंत्रित परिस्थितियों में कार्बन डाइऑक्साइड को मेथनॉल में बदलता है। फिर यह सरल अणु एंजाइमी अभिक्रियाओं की श्रृंखला के लिए आधार बनता है। शोध टीम ने 31 अलग-अलग प्रजातियों से एंजाइम जुटाए और उन्हें अभियांत्रिक रूप से संशोधित किया। इसके बाद 62 संभावित एंजाइमों में से काम के लिए दस सबसे प्रभावी उत्प्रेरक चुने। ये जैविक मशीनें मेथनॉल को तीन-कार्बन और छह-कार्बन वाली शर्करा इकाइयों में बदलती हैं, जिन्हें फिर प्राकृतिक स्टार्च के दो मुख्य घटकों, एमाइलोज या एमाइलोपेक्टिन, में बहुलकीकृत किया जाता है।
इस तरह बना कृत्रिम स्टार्च रासायनिक और भौतिक रूप से कृषि से प्राप्त स्टार्च के समान है। प्रयोगशाला विश्लेषण में इसकी संरचना और गुणों के मेल की पुष्टि हुई है। इसका मतलब है कि कृत्रिम उत्पाद खाद्य पदार्थों, दवाओं, कागज निर्माण, वस्त्रों, चिपकाने वाले पदार्थों और जैव-अपघटनीय प्लास्टिक में सीधे मक्के के स्टार्च की जगह ले सकता है। यह विधि स्टार्च की संरचना को अपनी जरूरत के मुताबिक ढालने की भी अनुमति देती है। इससे औद्योगिक आवश्यकताओं के अनुरूप पाचन की विशिष्ट दर या कार्यात्मक गुणों वाली किस्में बनाई जा सकती हैं।
प्रयोगशाला से कारखाने तक
प्रयोगशाला की सफलता को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाना ऐसी चुनौतियां पेश करता है जो वैज्ञानिक उपलब्धि से भी बड़ी हैं। प्रोफेसर काई ताओ ने चाइना साइंस डेली को दिए एक साक्षात्कार में उत्पादन का पैमाना बढ़ाने की कठिनाई स्वीकार की। उन्होंने बताया कि अवधारणा के प्रमाण से औद्योगिक उपयोग तक पहुंचने के लिए बड़ी आर्थिक बाधाओं को पार करना होगा।
शून्य से एक तक पहुंचना कठिन है, लागत घटाना कठिन है और अंततः औद्योगिक उपयोग हासिल करना उससे भी अधिक कठिन है। फिर भी, हमें चुनौती स्वीकार करनी होगी।
मुख्य बाधा एंजाइमों की लागत है। 2021 की मूल प्रणाली में एक प्रमुख एंजाइम की लागत कुल सामग्री खर्च का आधा थी। टीम ने इस बाधा को दूर करने पर खास ध्यान दिया है। अधिक स्थिर और प्रभावी एंजाइम रूपों की छंटाई के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग किया जा रहा है और जैविक उत्प्रेरकों को दोबारा इस्तेमाल करने के तरीके विकसित किए जा रहे हैं। इन सुधारों से अभिक्रिया की दक्षता बनाए रखते हुए जरूरी एंजाइमों की मात्रा काफी घट गई है।
शोधकर्ताओं ने ऊर्जा लागत घटाने के लिए अभिक्रिया की परिस्थितियों को भी बेहतर बनाया है। यह प्रक्रिया नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में चलती है, जिससे मौसम, ऋतु या जलवायु में बदलाव से अप्रभावित, अनुमानित उत्पादन मिलता है। यह स्थिरता कृषि उत्पादन से बिल्कुल अलग है, जहां सूखा, बाढ़ और कीट सालाना पैदावार को तबाह कर सकते हैं।
कृषि अर्थव्यवस्था की नई परिभाषा
संसाधनों की संभावित बचत केवल दक्षता के साधारण मापदंडों तक सीमित नहीं है। TIB टीम की गणना के अनुसार, एक घन मीटर का जैव-अभिक्रियक सैद्धांतिक रूप से लगभग एक-तिहाई हेक्टेयर मक्के के खेतों से सालाना मिलने वाले स्टार्च के बराबर उत्पादन कर सकता है। यदि उत्पादन लागत पारंपरिक खेती के मुकाबले प्रतिस्पर्धी स्तर तक लाई जा सके, तो यह तकनीक स्टार्च उत्पादन के लिए अभी इस्तेमाल हो रही 90 प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि और मीठे पानी की जरूरत खत्म कर सकती है।
भूमि उपयोग में इस बदलाव का वैश्विक कृषि पर गहरा असर हो सकता है। फिलहाल, औद्योगिक स्टार्च उत्पादन लगभग पूरी तरह मक्के पर निर्भर है। इस फसल के लिए उपजाऊ भूमि के बड़े हिस्से, गहन सिंचाई और उर्वरकों तथा कीटनाशकों के भारी इस्तेमाल की जरूरत होती है। सीमित कृषि भूमि के लिए खाद्य फसलों और औद्योगिक कच्चे माल की फसलों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हुई है, क्योंकि दुनिया की आबादी बढ़ रही है और जलवायु परिवर्तन से कृषि पैदावार को खतरा है।
TIB के संस्थापक निदेशक मा यान्हे ने 2021 के एक बयान में इस शोध की दिशा बताई थी, जो आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा था कि औद्योगिकीकरण इस परियोजना का शुरुआती आदर्श और अंतिम लक्ष्य, दोनों है। उन्होंने जोर दिया कि विकास के दौरान आई कठिनाइयों के बावजूद टीम यह प्रयास नहीं छोड़ेगी।
कार्बन चक्र पर पड़ने वाले असर को देखें तो पर्यावरणीय लाभ और बढ़ जाते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड को वायुमंडल में छोड़ने के बजाय यह प्रक्रिया उसे कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करती है। नवीकरणीय बिजली से चलने पर यह प्रणाली कार्बन-ऋणात्मक स्टार्च उत्पादन हासिल कर सकती है। यानी मूल्यवान उत्पाद बनाते हुए सक्रिय रूप से ग्रीनहाउस गैसों को वायुमंडल से हटाया जा सकता है। उसी टीम के 2023 के एक अध्ययन में, जो Science Bulletin में प्रकाशित हुआ, दिखाया गया कि उनकी प्रणाली प्राकृतिक पौधों की प्रणालियों की तुलना में 3.5 गुना अधिक ऊर्जा दक्षता और 23 गुना तेज संश्लेषण दर हासिल कर सकती है।
जैविक विकल्प
जहां एंजाइमी तरीका सुर्खियों में है, वहीं समानांतर शोध कार्बन डाइऑक्साइड से स्टार्च बनाने के दूसरे व्यवहार्य रास्ते दिखाता है। वैज्ञानिकों ने अभियांत्रिक रूप से तैयार यीस्ट, खास तौर पर तेल-संचय करने वाले स्ट्रेन Yarrowia lipolytica का इस्तेमाल कर एक वैकल्पिक विधि विकसित की है। इससे वे ऐसा उत्पाद बनाते हैं जिसे वे "स्टार्च-समृद्ध सूक्ष्म-कण" कहते हैं।
यह जैविक तरीका यीस्ट के चयापचय को इस तरह बदलता है कि उसमें स्टार्च कोशिका के शुष्क भार का 47 प्रतिशत तक जमा हो सके। स्टार्च जैवसंश्लेषण और ग्लूकोनियोजेनेसिस के रास्तों को फिर से व्यवस्थित करने तथा आकार बढ़ाने के लिए कोशिका की बनावट में बदलाव करके शोधकर्ताओं ने पारंपरिक फसल खेती की तुलना में लगभग 50 गुना अधिक स्थानिक-कालिक उत्पादकता हासिल की। यीस्ट विधि में एसीटेट का उपयोग होता है, जिसे नवीकरणीय बिजली की मदद से कार्बन डाइऑक्साइड से विद्युत-संश्लेषित किया जा सकता है। इससे कार्बन-ऋणात्मक खाद्य उत्पादन का एक और रास्ता बनता है।
एसीटेट के साथ मिलाने पर अभियांत्रिक रूप से तैयार यीस्ट पुआल जैसे कृषि अपशिष्ट का उपभोग कर सकता है। इससे सेल्यूलोज को खाने योग्य स्टार्च में बदलने का रास्ता मिलता है। यह क्षमता कृषि की एक और चुनौती का समाधान करती है: फसल अवशेषों का अपर्याप्त उपयोग। एंजाइमी और सूक्ष्मजीवी तरीके भले ही अलग हों, दोनों का साझा लक्ष्य खाद्य उत्पादन को पारंपरिक खेती से अलग करना है।
राष्ट्रीय संदर्भ और वैश्विक प्रभाव
कृत्रिम स्टार्च तकनीक में चीन का निवेश देश पर मौजूद गंभीर दबावों को दर्शाता है। सीमित प्रति व्यक्ति कृषि भूमि और जल संसाधनों के बीच देश को दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का भरण-पोषण करना है। उर्वरक उत्पादन, मशीनों में ईंधन की खपत, धान की खेती से मीथेन उत्सर्जन और ऊर्जा-गहन सिंचाई प्रणालियों के कारण कृषि गतिविधियां राष्ट्रीय कार्बन उत्सर्जन में बड़ा योगदान देती हैं।
2005 से 2021 के हालिया आंकड़े बताते हैं कि चीन ने दो स्तरों वाली कृषि व्यवस्था अपनाई है। इसमें बड़े कृषि फार्मों के साथ साझा पेशेवर सेवाओं को जोड़कर उत्पादन बनाए रखते हुए कार्बन तीव्रता घटाने की कोशिश की गई है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के तेज होने और कृषि भूमि के क्षरण के बीच ये सुधार पर्याप्त साबित नहीं हो सकते। कृत्रिम स्टार्च एक पूरक रणनीति दे सकता है, जो कार्बोहाइड्रेट की औद्योगिक मांग पूरी करते हुए पारिस्थितिकी तंत्र बहाली या खाद्य फसल की खेती के लिए लाखों हेक्टेयर भूमि मुक्त कर सकता है।
यह तकनीक चीन के व्यापक ऊर्जा बदलाव के अनुरूप भी है। जैसे-जैसे देश नवीकरणीय बिजली उत्पादन बढ़ा रहा है और बिजली क्षेत्र के उत्सर्जन घटा रहा है, स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता कार्बन पकड़ने और उसके उपयोग की तकनीकों को अधिक व्यवहार्य बना रही है। CO2 से स्टार्च बनाने की प्रक्रिया में ऊर्जा लगती है, खासकर शुरुआती चरण में कार्बन डाइऑक्साइड को मेथनॉल में बदलने और पानी के विद्युत अपघटन से हाइड्रोजन बनाने के लिए। सौर या पवन ऊर्जा से चलने पर यह प्रणाली विद्युत ऊर्जा को रासायनिक बंधों में प्रभावी रूप से जमा करती है और खाद्य-आधारित ऊर्जा भंडारण का रूप लेती है।
मुख्य बिंदु
- तियानजिन औद्योगिक जैवप्रौद्योगिकी संस्थान के चीनी वैज्ञानिकों ने कार्बन डाइऑक्साइड को स्टार्च में बदलने की उत्पादकता अपनी 2021 की उपलब्धि वाली विधि की तुलना में दस गुना बढ़ाई है।
- इस कृत्रिम प्रक्रिया में CO2 को कृषि उत्पादों के समान स्टार्च में बदलने के लिए एंजाइमों के ग्यारह चरण इस्तेमाल होते हैं। इसकी गति अब प्राकृतिक रूप से मक्के में स्टार्च बनने की प्रक्रिया से लगभग 85 गुना अधिक है।
- एक घन मीटर का जैव-अभिक्रियक सैद्धांतिक रूप से एक-तिहाई हेक्टेयर मक्के के खेतों जितना सालाना स्टार्च उत्पादन कर सकता है। इससे पारंपरिक स्टार्च उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली 90 प्रतिशत से अधिक भूमि और पानी बच सकता है।
- शोध टीमें एंजाइमों को बेहतर बनाने और लागत घटाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग कर रही हैं। इससे व्यावसायिक औद्योगिक उपयोग की मुख्य बाधाओं को दूर करने में मदद मिल रही है।
- अभियांत्रिक यीस्ट पर समानांतर शोध फसल खेती से 50 गुना अधिक स्थानिक उत्पादकता वाला एक वैकल्पिक जैविक रास्ता देता है। इसमें कच्चे माल के रूप में विद्युत-संश्लेषित एसीटेट का उपयोग होता है।
- यह तकनीक कृषि से होने वाले कार्बन उत्सर्जन घटा सकती है, कृषि भूमि के लिए खाद्य और औद्योगिक फसलों के बीच प्रतिस्पर्धा खत्म कर सकती है और नवीकरणीय ऊर्जा से चलने पर कार्बन-ऋणात्मक विनिर्माण का रास्ता दे सकती है।






