इंडोनेशिया में चीन की निकेल रणनीति: खनिजों पर प्रभुत्व का मॉडल बाजार की कसौटी पर

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इंडोनेशिया में चीन की निकेल रणनीति: खनिजों पर प्रभुत्व का मॉडल बाजार की कसौटी पर

नियंत्रण का ढाँचा: चीन ने कैसे खड़ा किया निकेल साम्राज्य

पिछले दशक में चीनी कंपनियों ने इंडोनेशिया में एक पूरी तरह एकीकृत आपूर्ति शृंखला खड़ी की है, जो वैश्विक खनिज प्रभुत्व के लिए एक खाका पेश करती है। इस रणनीति ने 2014 में इंडोनेशिया द्वारा निकेल अयस्क के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के बाद जोर पकड़ा। इस कदम से अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को देश के भीतर ही खनिजों का प्रसंस्करण करना पड़ा। जहां पश्चिमी कंपनियां हिचकिचाईं, वहीं चीनी कंपनियों ने निर्णायक कदम उठाए। निजी इस्पात समूह त्सिंगशान ग्रुप ने 2009 में इंडोनेशिया के बिंतांग डेलापन ग्रुप के साथ संयुक्त उद्यम के जरिए प्रवेश किया और निर्यात प्रतिबंध लागू होने के बाद तेजी से अपना कारोबार बढ़ाया।

विषय-सूची
  1. नियंत्रण का ढाँचा: चीन ने कैसे खड़ा किया निकेल साम्राज्य
  2. इंडोनेशिया का संसाधन राष्ट्रवाद और निर्भरता का जाल
  3. बाजार पलटने पर: गनबस्टर में हिसाब-किताब
  4. पर्यावरणीय क्षरण और समुदायों का विस्थापन
  5. वॉशिंगटन की रणनीतिक दुविधा
  6. मॉडल का विस्तार: जकार्ता से किन्शासा तक
  7. मुख्य बिंदु
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बेल्ट एंड रोड पहल के तहत प्रमुख परियोजना के रूप में इंडोनेशिया मोरोवाली औद्योगिक पार्क (IMIP) उभरा। साधारण स्मेल्टर परिसर से विकसित होकर यह समर्पित बंदरगाहों, कोयला-आधारित बिजलीघरों और लॉजिस्टिक्स प्रणालियों वाले विशाल औद्योगिक शहर में बदल गया। इन भौतिक निवेशों के साथ चीनी वित्तपोषण का स्वरूप भी विकसित हुआ। 2000 से 2013 के बीच, चीन के निर्यात-आयात बैंक जैसे नीतिगत बैंकों ने शुरुआती बुनियादी ढाँचा वित्तपोषण उपलब्ध कराया। 2013 के बाद सरकारी वाणिज्यिक बैंकों ने जोखिम बांटने के लिए सिंडिकेटेड ऋण दिए, जिससे औद्योगिक पार्कों के भीतर छोटी परियोजनाओं को भी मदद मिली।

पश्चिमी प्रतिस्पर्धियों को उपलब्ध न होने वाले इस वित्तपोषण तंत्र ने तेजी से पूंजी लगाने और अधिक जोखिम उठाने की क्षमता दी। चीनी कंपनियों ने उच्च-दबाव अम्ल निक्षालन (HPAL) तकनीक का व्यावसायीकरण किया। यह तकनीक इंडोनेशिया के प्रचुर, कम श्रेणी वाले लेटराइट भंडार को मिश्रित हाइड्रॉक्साइड अवक्षेप (MHP) में बदलती है, जो इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों के लिए एक अहम पूर्ववर्ती पदार्थ है। ऑस्ट्रेलिया और पापुआ न्यू गिनी में इसी तरह के प्रसंस्करण के पश्चिमी प्रयास लागत बढ़ने के कारण विफल रहे, लेकिन चीनी इंजीनियरिंग सफल रही। आज चीनी कंपनियां इंडोनेशिया की लगभग 75 प्रतिशत निकेल शोधन क्षमता नियंत्रित करती हैं और दुनिया के परिष्कृत निकेल उत्पादन में करीब 60 प्रतिशत की हिस्सेदार हैं।

इंडोनेशिया का संसाधन राष्ट्रवाद और निर्भरता का जाल

जकार्ता की डाउनस्ट्रीमिंग नीतियों का लक्ष्य देश के विशाल निकेल भंडार से अधिक मूल्य हासिल करना था। ये भंडार वैश्विक आपूर्ति के 42 प्रतिशत से अधिक हैं। पहले के प्रतिबंधों को आगे बढ़ाते हुए 2020 में कच्चे निकेल अयस्क के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को सफलतापूर्वक आकर्षित किया। यह निवेश 2019 के 3.56 अरब डॉलर से बढ़कर 2022 में 10.96 अरब डॉलर हो गया। निकेल निर्यात से होने वाली आय 2013 के लगभग 6 अरब डॉलर से बढ़कर 2022 में करीब 30 अरब डॉलर पहुंच गई, जिससे रोजगार पैदा हुआ और इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बना।

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हालांकि, इस सफलता के पीछे संरचनात्मक असंतुलन छिपा है। कच्चे माल पर इंडोनेशिया का नियंत्रण है, लेकिन प्रसंस्करण तकनीक, पूंजी और बाजार तक पहुंच पर चीनी कंपनियों का दबदबा है। राष्ट्रवादी स्वामित्व कानूनों के कारण अधिकतर स्थानीय स्वामित्व वाली इंडोनेशियाई खनन कंपनियों को चीनी प्रसंस्करणकर्ताओं को सरकारी तौर पर तय कीमतों पर अयस्क बेचना पड़ता है, जो अंतरराष्ट्रीय दरों से काफी कम हैं। वहीं, चीनी कंपनियों को 15 से 20 साल तक की आयकर छूट और घरेलू बाजार दायित्व (DMO) के तहत सब्सिडी वाले कोयले तक पहुंच जैसे बड़े वित्तीय प्रोत्साहन मिलते हैं। DMO के तहत कीमत 75 डॉलर प्रति टन तक सीमित है, जबकि 2023 में वैश्विक दरें 350 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई थीं।

2020 से पहले निकेल अयस्क पर आंशिक प्रतिबंध (जिसमें स्मेल्टर विकास में प्रगति करने वाली कंपनियों को अयस्क निर्यात परमिट दिए जाते थे) और औद्योगिक पार्कों के भीतर परमिट हासिल करना, निकेल प्रसंस्करण कंपनियों को इंडोनेशिया में निवेश के लिए वास्तव में पर्याप्त था।

नतीजा यह है कि लगभग एकाधिकार की स्थिति बन गई है, जिसमें मूल्यवर्धन से होने वाले ज्यादातर लाभ चीनी कंपनियों को मिलते हैं। निर्यात प्रतिबंधों के जरिए इंडोनेशियाई अधिकारियों ने अल्पकालीन सौदेबाजी की ताकत हासिल की है, लेकिन दीर्घकालीन संरचनात्मक शक्ति बीजिंग के पास है। जकार्ता स्थित एक बैंकर के अनुसार, 2020 से पहले का आंशिक निर्यात प्रतिबंध और औद्योगिक पार्कों के परमिट, मौजूदा महंगे प्रोत्साहनों के बिना भी निवेश आकर्षित करने के लिए पर्याप्त होते। मौजूदा प्रोत्साहनों का मुख्य लाभ चीनी प्रसंस्करणकर्ताओं को मिलता है।

बाजार पलटने पर: गनबस्टर में हिसाब-किताब

रणनीतिक योजनाओं के विपरीत चलने वाले जिंस बाजारों के बीच 2025 में इस मॉडल की नाजुकता सामने आई। चीन के जिआंगसू डेलोंग निकेल इंडस्ट्री के समर्थन वाली PT गनबस्टर निकेल इंडस्ट्री (GNI) की सुलावेसी स्थित विशाल स्मेल्टिंग परियोजना ढहने के कगार पर है। सालाना 18 से 19 लाख मीट्रिक टन निकेल पिग आयरन बनाने के लिए तैयार इस संयंत्र की कई उत्पादन लाइनें बंद हो चुकी हैं, जबकि ऋणदाता आपातकालीन वित्तपोषण पर चर्चा के लिए बैठक कर रहे हैं। जिआंगसू डेलोंग अपनी चार प्रमुख इंडोनेशियाई परियोजनाओं में से तीन से बाहर हो चुका है और उसे सालाना 30 करोड़ डॉलर तक का नुकसान हुआ है।

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यह संकट नए उत्पादन की बाढ़ से पैदा हुआ, जिसने वैश्विक निकेल कीमतों को 40 प्रतिशत से अधिक गिरा दिया और लाभ की उम्मीदों को घाटे में बदल दिया। अधूरे बुनियादी ढाँचे, बिजली की ऊंची लागत और आपूर्ति की समयसीमा चूकने पर लगने वाले जुर्माने ने GNI की मुश्किलें और बढ़ा दीं। यह संयंत्र इंडोनेशिया के कुल परिष्कृत उत्पादन का करीब 10 से 12 प्रतिशत हिस्सा है। इसलिए इसके संभावित बंद होने से वैश्विक आपूर्ति का 5 से 6 प्रतिशत प्रभावित हो सकता है।

इन दबावों के साथ चीन के भीतर हो रहा तकनीकी बदलाव भी जुड़ गया है। इंडोनेशिया ने जहां इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए निकेल वाली बैटरियों पर बड़ा दांव लगाया, वहीं चीनी निर्माता तेजी से लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरियां अपना रहे हैं, जिनमें निकेल नहीं होता। इंडोनेशिया में इलेक्ट्रिक वाहन असेंबली संयंत्र के लिए BYD का 1 अरब डॉलर का निवेश LFP तकनीक का इस्तेमाल करता है, जो जकार्ता की निकेल-आधारित औद्योगिक रणनीति से सीधे टकराता है। चीन में निकेल-आधारित बैटरी रसायन की बाजार हिस्सेदारी घटने के साथ ही इंडोनेशियाई उत्पादकों को अपने सबसे बड़े ग्राहक से कमजोर होती मांग का सामना करना पड़ रहा है, ठीक उसी समय जब वैश्विक अधिक आपूर्ति अपने चरम पर है।

पर्यावरणीय क्षरण और समुदायों का विस्थापन

निकेल उछाल की भारी पर्यावरणीय और सामाजिक कीमत चुकानी पड़ी है, खासकर सुलावेसी और मालुकु में। PT वेले इंडोनेशिया के सोराकोवो ब्लॉक में निकेल खनन का सबसे लंबे समय से चल रहा पट्टा है और इससे बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हुई है। माइटी अर्थ के विश्लेषण के अनुसार, पेड़ों के आवरण के नुकसान के मामले में सोराकोवो इंडोनेशियाई निकेल खदानों में पहले स्थान पर है। 2014 से 2022 के बीच यहां 14,559 हेक्टेयर जमीन साफ की गई। कंपनी ने खनन योग्य क्षेत्रों में 14,137 हेक्टेयर प्रमुख जैव विविधता क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें तोवुती झील के पास का अहम आवास क्षेत्र भी शामिल है।

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स्थानीय समुदायों को विस्थापन और प्रदूषण का सामना करना पड़ रहा है। लोएहा राया में पुश्तैनी जमीन पर सफेद काली मिर्च उगाने वाले किसानों को पहले से सलाह-मशविरा किए बिना ड्रिलिंग गतिविधियों का सामना करना पड़ा है। तलछट के कारण झरनों का पानी दूषित होने से कुछ खेत अनुपयोगी हो गए हैं।

हम यहां कंपनी के खनन का विस्तार करने को लेकर बहुत चिंतित हैं। जब ड्रिलिंग की खोज शुरू होती है, तो लोग खेती करने से डरते हैं।

2013 में संवैधानिक न्यायालय ने आदिवासी समुदायों के प्रथागत जंगलों को मान्यता देने का फैसला दिया था। इसके बावजूद भूमि अधिकार के दावे सत्यापन प्रक्रिया में अटके हुए हैं, जिससे समुदाय विस्तार के जोखिम के सामने असुरक्षित हैं।

प्रसंस्करण का बुनियादी ढाँचा भी भारी उत्सर्जन करता है। निकेल स्मेल्टरों को बिजली देने के लिए बनाए गए कैप्टिव कोयला बिजलीघर अब इंडोनेशिया की कुल कोयला क्षमता का 23 प्रतिशत हैं। निर्माणाधीन संयंत्रों की संख्या चालू संयंत्रों से अधिक है। स्वास्थ्य अध्ययनों का अनुमान है कि प्रसंस्करण गतिविधियों से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण सालाना मौतें 2020 में 215 से बढ़कर 2030 तक करीब 5,000 हो सकती हैं। इससे जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं की लागत सालाना 3.4 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है।

वॉशिंगटन की रणनीतिक दुविधा

इंडोनेशियाई निकेल को लेकर अमेरिका के सामने कठिन विकल्प हैं। संसाधन राष्ट्रवाद की नीतियों के कारण अमेरिकी खनन कंपनियां काफी हद तक देश से बाहर हो चुकी हैं। निर्यात प्रतिबंधों पर विवाद के बाद न्यूमोंट माइनिंग ने 2016 में पूरी तरह देश छोड़ दिया, जबकि फ्रीपोर्ट मैकमोरन को 2018 में ग्रासबर्ग तांबा खदान का बहुमत नियंत्रण छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। अनिवार्य हिस्सेदारी हस्तांतरण कानून और अप्रत्याशित नियम पश्चिमी कंपनियों को हतोत्साहित करते हैं, जबकि चीनी सरकारी समर्थित कंपनियां उतार-चढ़ाव सह सकती हैं और कम मुनाफे पर काम कर सकती हैं।

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अमेरिका की हालिया भागीदारी सीमित और असहज रही है। फोर्ड मोटर कंपनी ने 2023 में वेले इंडोनेशिया और चीन की हुआयू कोबाल्ट के साथ 4.5 अरब डॉलर की साझेदारी की घोषणा की, ताकि HPAL संयंत्र बनाया जा सके। यह इस हकीकत को दिखाता है कि चीनी कंपनियों के साथ सहयोग के बिना पश्चिमी वाहन निर्माता इंडोनेशियाई निकेल हासिल नहीं कर सकते। अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच मुक्त व्यापार समझौता न होने के कारण इंडोनेशियाई निकेल मुद्रास्फीति न्यूनीकरण अधिनियम के तहत स्वच्छ वाहन कर छूट के योग्य नहीं है। वहीं, विदेशी प्रभाव वाली इकाइयों पर सख्त प्रतिबंधों के चलते पहुंच और मुश्किल हो जाती है।

कुछ नीति निर्माता इंडोनेशिया से बाहर वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाएं बनाने की दलील देते हैं, लेकिन इसके लिए भारी निवेश और दीर्घकालीन औद्योगिक नीति की जरूरत होगी। कुछ अन्य लोग आपूर्ति समझौतों और अल्पांश हिस्सेदारी के जरिए इंडोनेशिया से सीधे जुड़ने का सुझाव देते हैं। दोनों ही तरीकों के लिए अमेरिकी कंपनियों को नियामकीय स्पष्टता और वित्तपोषण देने हेतु सरकारों के बीच लगातार समन्वय जरूरी है। फिर भी, दुनिया के सबसे बड़े निकेल आपूर्तिकर्ता तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए वॉशिंगटन के पास फिलहाल कोई सुसंगत रणनीति नहीं है।

मॉडल का विस्तार: जकार्ता से किन्शासा तक

इंडोनेशिया में चुनौतियों के बावजूद चीन इस मॉडल को दूसरी जगहों पर दोहराने की ओर बढ़ता दिख रहा है। बीजिंग की 2023 की बाहरी निवेश रिपोर्ट में विदेशों में आर्थिक सहयोग क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय विस्तार के प्रमुख मंच बताया गया है, जहां बुनियादी ढाँचे और औद्योगिक विकास के जरिए बाजार तक पहुंच बनाई जाती है। पेरू में तांबा खनन और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) में कोबाल्ट प्रसंस्करण के निवेश में यह रणनीति पहले से दिखाई दे रही है।

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DRC में चीनी कंपनियों ने कोबाल्ट के नए निर्यात कोटे के अनुरूप खुद को ढाला है। 2026 और 2027 के लिए निर्यात सीमा सालाना 96,600 मीट्रिक टन तय की गई है, जो 2024 के स्तर का लगभग आधा है। आपूर्ति को इस तरह नियंत्रित करना इंडोनेशिया की उस रणनीति से मिलता-जुलता है, जिसमें नीतिगत उपायों के जरिए घरेलू प्रसंस्करण को बढ़ावा दिया गया, जबकि उससे बनी मूल्य शृंखलाओं पर चीनी कंपनियों का नियंत्रण रहा। चीन ने 2024 के अंत से अपने उच्च-शुद्धता वाले क्लास 1 निकेल भंडार को भी दोगुना कर लिया है। इससे वैश्विक आपूर्ति पर पकड़ बनाए रखते हुए घरेलू उद्योग को कीमतों के उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए रणनीतिक भंडार तैयार हुआ है।

स्थानीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए जैसे-जैसे अधिक देश इंडोनेशिया के निर्यात प्रतिबंधों की नकल करने पर विचार कर रहे हैं, चीनी कंपनियों ने लक्षित देशों में परिस्थितियों के अनुसार ढलने और मूल्य शृंखला में आगे बढ़ने की क्षमता दिखाई है। वे पूंजी, तकनीक और उन परिस्थितियों में काम करने की इच्छा लेकर आती हैं, जो पश्चिमी निवेशकों को हतोत्साहित करती हैं। इंडोनेशिया का अनुभव बताता है कि मजबूत शासन, पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और विविध साझेदारियों के बिना संसाधन-संपन्न देशों को एक निर्भरता के बदले दूसरी निर्भरता अपनाने का जोखिम है: कच्चे माल के निर्यात की जगह ऐसा औद्योगीकरण, जिस पर दूसरों का नियंत्रण हो।

मुख्य बिंदु

  • चीनी कंपनियां इंडोनेशिया की लगभग 75 प्रतिशत निकेल शोधन क्षमता और दुनिया के परिष्कृत निकेल उत्पादन के 60 प्रतिशत पर नियंत्रण रखती हैं। मोरोवाली जैसे औद्योगिक पार्कों के जरिए उन्होंने लगभग एकाधिकार स्थापित किया है।
  • इंडोनेशिया के निर्यात प्रतिबंधों ने सफलतापूर्वक निवेश आकर्षित किया और निर्यात मूल्य 6 अरब डॉलर से बढ़ाकर 30 अरब डॉलर किया, लेकिन इससे चीनी तकनीक, पूंजी और बाजारों पर संरचनात्मक निर्भरता पैदा हुई।
  • निकेल की कीमतों में 40 प्रतिशत गिरावट और ऐसी लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरियों की ओर मांग का रुख, जिनमें निकेल की जरूरत नहीं होती, ने चीन समर्थित बड़ी परियोजनाओं को संकट में डाल दिया है।
  • पर्यावरणीय कीमत में सुलावेसी में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, स्थानीय किसानों को प्रभावित करने वाला जल प्रदूषण और 2030 तक सालाना करीब 5,000 मौतों का अनुमानित स्वास्थ्य प्रभाव शामिल है।
  • इंडोनेशियाई निकेल तक पहुंचने के लिए अमेरिका के पास कोई सुसंगत रणनीति नहीं है। संसाधन राष्ट्रवाद के कारण अमेरिकी खनन कंपनियां देश छोड़ चुकी हैं, जबकि चीनी कंपनियों ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली है।
  • चीन औद्योगिक पार्कों और सरकारी समर्थित वित्तपोषण के जरिए अहम खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं पर नियंत्रण स्थापित कर इंडोनेशिया के मॉडल को कोबाल्ट के लिए कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और तांबे के लिए पेरू में दोहरा रहा है।
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