रिकॉर्ड समुद्री मौजूदगी से कूटनीतिक संकट
विवादित दियाओयू दाओ द्वीपों के आसपास के जलक्षेत्र में चीन की समुद्री गतिविधियां अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई हैं। 2025 के अंत तक चीन के तटरक्षक जहाजों ने इस क्षेत्र में 356 दिन गश्त की, जो 2024 में दर्ज 355 दिनों के पिछले रिकॉर्ड से अधिक है। यह बढ़ती मौजूदगी बीजिंग और टोक्यो के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ने के समय सामने आई है। इसकी वजह जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची के ताइवान में संभावित सैन्य हस्तक्षेप से जुड़े विवादास्पद बयान हैं। रिकॉर्ड समुद्री गश्त और तीखी बयानबाजी के मेल ने पूर्वी एशिया के सबसे अस्थिर क्षेत्रीय विवादों में से एक के बढ़ने की आशंकाएं पैदा कर दी हैं।
विषय-सूची
- रिकॉर्ड समुद्री मौजूदगी से कूटनीतिक संकट
- पूर्वी चीन सागर में ऐतिहासिक दावों की होड़
- क्षेत्रीय संप्रभुता पर जापान का नजरिया
- संप्रभुता विवाद से ताइवान संकट तक
- सैन्य और तटरक्षक बलों के बीच टकराव बढ़ा
- अमेरिका: जटिल गठबंधन में रणनीतिक अस्पष्टता
- छोटे द्वीपों से परे रणनीतिक महत्व
- क्षेत्रीय असर और भविष्य के जोखिम
- तनाव घटाने और समाधान के रास्ते
- मुख्य बिंदु
चीन के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता झांग शियाओगांग ने इन गश्तों का बचाव करते हुए कहा कि दियाओयू दाओ और उससे जुड़े टापू चीन का अभिन्न भूभाग हैं। उन्होंने जोर दिया कि इन जलक्षेत्रों में चीन के तटरक्षक बल की कार्रवाई समुद्री अधिकारों और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए वैध और कानूनी कदम हैं। झांग ने जापान को ऐसे कदमों से आगाह किया जिनसे स्थिति बिगड़ सकती है और परिणामों को लेकर कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया।
हम जापानी पक्ष से आग्रह करते हैं कि वह अपने शब्दों और कामों, दोनों में संयम बरते और ऐसी कोई कार्रवाई न करे जिससे स्थिति बिगड़ सकती है। वरना वह अपने ही पैर पर पत्थर गिराने के लिए उसे उठाने जैसा काम करेगा, झांग ने कहा।
जापान में सेनकाकू द्वीप कहलाने वाले दियाओयू दाओ द्वीपसमूह में पांच छोटे द्वीप और तीन चट्टानें हैं। ये पूर्वी चीन सागर में, ताइवान से लगभग 120 मील उत्तर-पूर्व और चीन के तट से 200 मील दूर स्थित हैं। कुल मिलाकर लगभग 5.69 वर्ग किलोमीटर के छोटे भूभाग के बावजूद, ये निर्जन क्षेत्र चीन-जापान संबंधों में तनाव का केंद्र बन गए हैं। दोनों देश इन पर ऐतिहासिक और कानूनी संप्रभुता का दावा करते हैं।
पूर्वी चीन सागर में ऐतिहासिक दावों की होड़
2012 के श्वेतपत्र में दर्ज चीन का आधिकारिक रुख है कि दियाओयू दाओ प्राचीन काल से चीन का अभिन्न भूभाग रहा है। बीजिंग मिंग राजवंश (1368-1644) के समय के ऐतिहासिक अभिलेखों का हवाला देता है। इनमें 1403 में प्रकाशित "अनुकूल हवा के साथ यात्रा" भी शामिल है, जिसमें इन द्वीपों के नाम का सबसे पुराना ज्ञात उल्लेख मिलता है। चीनी अधिकारी बाद की सदियों के नक्शों और दस्तावेजों का भी हवाला देते हैं, जिनमें इन द्वीपों को चीनी अधिकार क्षेत्र में, खास तौर पर छिंग राजवंश के दौरान ताइवान के प्रशासनिक भूभाग के हिस्से के रूप में दिखाया गया है।
चीनी दस्तावेजों के अनुसार, रयूक्यू (आज का ओकिनावा) जाने वाले शाही दूत नियमित रूप से दियाओयू दाओ का इस्तेमाल नौवहन के संकेत के रूप में करते थे। चीनी भूभाग और रयूक्यू के बीच की सीमा हेई शुई गोउ (आज की ओकिनावा गर्त) दर्ज की गई थी, जो चीवेई यू और कुमे द्वीप के बीच स्थित है। चीन का तर्क है कि इस समुद्री सीमा ने चीनी संप्रभु भूभाग और विदेशी क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से अलग किया था।
क्षेत्रीय संप्रभुता पर जापान का नजरिया
जापान इतिहास का बिल्कुल अलग विवरण पेश करता है। जापान का विदेश मंत्रालय कहता है कि जनवरी 1895 में जापान द्वारा शामिल किए जाने के समय सेनकाकू द्वीप टेरा नलियस यानी अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी के दावे में नहीं आने वाला क्षेत्र थे। टोक्यो का तर्क है कि सावधानीपूर्वक किए गए सर्वेक्षण में उस अवधि से पहले किसी अन्य देश के नियंत्रण का कोई संकेत नहीं मिला था, इसलिए उस समय लागू अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे के तहत जापान का इन्हें अपने भूभाग में शामिल करना वैध था।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सैन फ्रांसिस्को शांति संधि के तहत सेनकाकू द्वीप ओकिनावा के हिस्से के रूप में अमेरिकी प्रशासन के अधीन आ गए। जापान इसे इस बात की पुष्टि मानता है कि ये द्वीप जापानी भूभाग का हिस्सा हैं। 1972 में अमेरिका और जापान के बीच हुए ओकिनावा प्रत्यावर्तन समझौते से इन द्वीपों के प्रशासनिक अधिकार जापान को वापस मिले। टोक्यो इसे युद्ध के बाद की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में जापानी संप्रभुता लगातार कायम रहने का और सबूत बताता है।
जापानी अधिकारी यह भी कहते हैं कि 1895 में द्वीपों को अपने भूभाग में शामिल किए जाने के बाद करीब 75 साल तक चीन ने जापान की संप्रभुता को चुनौती नहीं दी। जापान का दावा है कि इन द्वीपों में चीन की दिलचस्पी 1970 के दशक में ही उभरी, जब सर्वेक्षणों से आसपास के समुद्रतल में तेल और प्राकृतिक गैस के संभावित भंडार का संकेत मिला। जापान के मुताबिक, इससे पता चलता है कि चीन का दावा ऐतिहासिक अधिकारों के बजाय आर्थिक हितों से प्रेरित है।
संप्रभुता विवाद से ताइवान संकट तक
मौजूदा तनाव द्वीपों से आगे बढ़कर व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों, खासकर ताइवान के मुद्दे से जुड़ गया है। 7 नवंबर 2025 को जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने संसदीय समिति से कहा कि चीन का ताइवान पर सैन्य हमला जापान के लिए "अस्तित्व के लिए खतरा पैदा करने वाली स्थिति" हो सकता है। इससे जापान को अपने सहयोगी अमेरिका के साथ सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करने का आधार मिल सकता है।
ये टिप्पणियां ताइवान के बारे में जापान की पारंपरिक रणनीतिक अस्पष्टता से बड़ा बदलाव थीं। बीजिंग ने इन्हें चीन के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप और एक-चीन सिद्धांत का उल्लंघन माना। चीनी अधिकारियों की प्रतिक्रिया तेज और कड़ी थी। विदेश मंत्रालय ने "दृढ़ विरोध" जताया और जापान के समक्ष कड़ा विरोध दर्ज कराया।
चीन के उप विदेश मंत्री सुन वेइदोंग ने चीन में जापान के राजदूत केंजी कनासुगी को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया और कहा कि ताइवान का सवाल चीन के मूल हितों के केंद्र में है। सुन ने कहा कि ताइवान चीन का पवित्र भूभाग है और ताइवान के सवाल का समाधान कैसे हो, यह तय करने का अधिकार सिर्फ चीनी लोगों को है; किसी बाहरी ताकत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए।
ताइवान का सवाल चीन के मूल हितों के केंद्र में है और यह ऐसी लाल रेखा तथा अंतिम सीमा है जिसे लांघा नहीं जा सकता, सुन ने विरोध दर्ज कराते हुए जापानी राजदूत से कहा।
सैन्य और तटरक्षक बलों के बीच टकराव बढ़ा
कूटनीतिक तनाव का असर विवादित द्वीपों के आसपास समुद्र और हवा में बढ़ी गतिविधियों के रूप में दिखा है। हाल की घटनाओं में दोनों देशों के तटरक्षक जहाज और सैन्य संसाधन शामिल रहे हैं, जिससे आकस्मिक रूप से स्थिति बिगड़ने की चिंता बढ़ी है। जापानी सूत्रों के अनुसार, 2024 में चीन के तटरक्षक जहाजों ने सेनकाकू द्वीपों के आसपास के जलक्षेत्र में लगातार रिकॉर्ड 158 दिनों तक मौजूदगी बनाए रखी और यह सिलसिला 2025 में भी जारी रहा।
हालिया टकराव अधिक बार और अधिक खतरनाक ढंग से होने लगे हैं। एक घटना में चीनी और जापानी तटरक्षक जहाज विवादित द्वीपों के पास आमने-सामने आ गए। चीनी तटरक्षक बल ने कहा कि उसने इलाके से एक जापानी मछली पकड़ने वाली नौका को खदेड़ा और "जरूरी नियंत्रण उपाय" किए। जापान का दावा था कि उसने एक जापानी नौका के पास आए दो चीनी जहाजों को रोका और वहां से हटाया।
हवाई क्षेत्र के उल्लंघन ने इन टकरावों को और चिंताजनक बना दिया है। एक गंभीर घटना में चीनी हेलीकॉप्टर और जापानी नागरिक विमान, दोनों द्वीपों के पास विवादित हवाई क्षेत्र में दाखिल हुए। चीन ने टकराव के लिए जापान को जिम्मेदार ठहराया। उसका कहना था कि जापानी नागरिक विमान ने चीनी हवाई क्षेत्र में "अवैध रूप से घुसपैठ" की, जिसके बाद चीन के तटरक्षक जहाज से भेजे गए हेलीकॉप्टर ने उसका पीछा कर उसे बाहर खदेड़ा। हालांकि, जापान ने दावा किया कि चीनी तटरक्षक हेलीकॉप्टर ने जापानी हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया। जापान के अनुसार, चीन की ओर से यह चौथी ऐसी घुसपैठ थी।
अमेरिका: जटिल गठबंधन में रणनीतिक अस्पष्टता
इस विवाद में अमेरिका की स्थिति नाजुक है। उसे जापान के साथ सुरक्षा गठबंधन और चीन के साथ अपने जटिल संबंधों के बीच संतुलन साधना पड़ता है। निक्सन प्रशासन के समय से अमेरिकी नीति द्वीपों की संप्रभुता के सवाल पर तटस्थ रही है। अमेरिका लगातार कहता आया है कि वह इस पर कोई रुख नहीं रखता कि किस देश का कानूनी दावा अधिक मजबूत है।
हालांकि, 1972 से अमेरिकी नीति यह रही है कि 1960 की अमेरिका-जापान सुरक्षा संधि इन द्वीपों पर लागू होती है। संधि के अनुच्छेद 5 के तहत अमेरिका "जापान के प्रशासनाधीन क्षेत्रों" पर सशस्त्र हमले की स्थिति में "साझा खतरे का सामना करने" के लिए प्रतिबद्ध है। संप्रभुता और प्रशासन के बीच यह अंतर वॉशिंगटन को कानूनी विवाद में किसी का पक्ष लिए बिना जापान को सुरक्षा प्रतिबद्धता का भरोसा देने देता है।
हाल के अमेरिकी प्रशासनों ने इस सुरक्षा प्रतिबद्धता पर अधिक जोर दिया है। 2014 में राष्ट्रपति ओबामा पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि अनुच्छेद 5 सेनकाकू द्वीपों पर लागू होता है। ट्रंप और बाइडन, दोनों प्रशासनों ने इस रुख को दोहराया। राष्ट्रपति बाइडन ने "हमारी सुरक्षा संधि के अनुच्छेद 5 के तहत जापान की रक्षा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता" की पुष्टि की, जिसमें सेनकाकू द्वीप भी शामिल हैं।
अमेरिका का यह रुख जटिल स्थिति पैदा करता है। चीन की गश्तें संप्रभुता और प्रशासनिक नियंत्रण के बीच के अंतर का फायदा उठाने और जलक्षेत्र में बीजिंग की अपनी प्रशासनिक मौजूदगी दिखाने की कोशिश लगती हैं। जापान के साथ संधि के तहत अपनी प्रतिबद्धता के कारण अमेरिका के किसी घटना में खिंचने की आशंका पहले से अस्थिर स्थिति को और खतरनाक बना देती है।
छोटे द्वीपों से परे रणनीतिक महत्व
विश्लेषकों का कहना है कि सेनकाकू/दियाओयू विवाद का महत्व द्वीपों के अपने अंतर्निहित मूल्य से कहीं अधिक हो गया है। ये क्षेत्र छोटे और निर्जन हैं और यहां आर्थिक संसाधनों की पुष्टि सीमित है। फिर भी, तीन आपस में जुड़ी बातों के कारण इनका महत्व बढ़ा है: प्रतीकात्मक अर्थ, घरेलू राजनीति में उपयोगिता और चीन-जापान के बीच प्रतिस्पर्धा।
प्रतीकात्मक रूप से, ये द्वीप गहरे ऐतिहासिक आक्रोश और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन गए हैं। चीन के लिए यह विवाद 19वीं सदी के अंत से चले आ रहे जापानी विस्तारवाद के प्रतिरोध और ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी के सामने अपने हितों की रक्षा करने की चीन की क्षमता की परीक्षा है। जापान के लिए द्वीपों पर नियंत्रण बनाए रखना, टोक्यो की नजर में चीनी दबाव के खिलाफ क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए अहम है।
घरेलू स्तर पर यह विवाद दोनों पक्षों के राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करता है। संप्रभुता पर सख्त रुख राष्ट्रवादी मतदाताओं को आकर्षित करता है और अंतरराष्ट्रीय मामलों में ताकत दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी इस मुद्दे से अपनी राष्ट्रवादी साख मजबूत करती है और घरेलू चुनौतियों से ध्यान हटाती है। जापान में चीनी घुसपैठ के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंतित मतदाताओं को पसंद आती है।
ये द्वीप सैन्य, कूटनीतिक और कानूनी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी दांव-पेच का केंद्र भी हैं। हर गश्त, विरोध और बयान तुलनात्मक बढ़त हासिल करने की जारी होड़ का हिस्सा बन जाता है। इस "सुरक्षा दुविधा" में एक पक्ष के रक्षात्मक कदम दूसरे पक्ष को आक्रामक लगते हैं। इससे विवादित भूभाग के सीमित अंतर्निहित मूल्य के बावजूद तनाव बढ़ाते रहने का दबाव बनता है।
क्षेत्रीय असर और भविष्य के जोखिम
दियाओयू/सेनकाकू विवाद अकेला नहीं है, बल्कि पूर्वी एशिया में समुद्री तनाव के व्यापक पैटर्न का हिस्सा है। जापान और दक्षिण कोरिया के बीच ताकेशिमा/दोक्दो, जापान और रूस के बीच उत्तरी क्षेत्रों तथा दक्षिण चीन सागर के द्वीपों को लेकर चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों के बीच भी ऐसे ही विवाद हैं। एक-दूसरे पर चढ़ते इन दावों से जटिल सुरक्षा माहौल बनता है, जिसमें स्थानीय घटनाएं व्यापक क्षेत्रीय टकराव भड़का सकती हैं।
ताइवान से जुड़ाव इस स्थिति को और जटिल बनाता है। बीजिंग द्वीप के पास नियमित सैन्य अभ्यास समेत ताइवान पर दबाव बढ़ा रहा है। ताइवान से सिर्फ 110 किलोमीटर की दूरी पर होने के कारण जापान किसी भी संघर्ष में संभावित अग्रिम मोर्चा बन सकता है। ताइवान संकट में संभावित जापानी हस्तक्षेप पर ताकाइची की टिप्पणियों ने इस परिदृश्य को अधिक स्पष्ट कर दिया है और दियाओयू/सेनकाकू विवाद में दांव को बढ़ा दिया है।
चीन की ओर से हाल में अपने नागरिकों को जापान यात्रा के बारे में चेतावनी देना और वहां पढ़ाई न करने की सलाह देना, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों तक तनाव बढ़ाने का असामान्य कदम है। इन उपायों का जापानी विश्वविद्यालयों और कारोबारों पर बड़ा असर पड़ सकता है। इससे पता चलता है कि बीजिंग सैन्य और कूटनीतिक माध्यमों से आगे भी अपने दबाव का इस्तेमाल करने को तैयार है।
विश्लेषकों ने चेताया है कि समुद्री मौजूदगी बढ़ने, अधिक आक्रामक बयानबाजी और सैन्य गतिविधियों के विस्तार से आकस्मिक तनाव बढ़ने के लिए खतरनाक हालात बन रहे हैं। दोनों पक्षों के अधिक उन्नत जहाज और विमान क्षेत्र में तैनात होने से टक्कर या गलत आकलन का जोखिम बढ़ता है। समुद्र या हवा में घटनाओं से निपटने के लिए प्रभावी संकट-प्रबंधन तंत्र विकसित करने में चीन और जापान की सीमित सफलता के कारण दोनों पक्षों को सामरिक घटना के तेजी से रणनीतिक संकट में बदलने का खतरा है।
तनाव घटाने और समाधान के रास्ते
मौजूदा तनाव के बावजूद विशेषज्ञों ने विवाद को संभालने के कई रास्ते सुझाए हैं। भरोसा बढ़ाने वाले उपायों में समुद्री बलों के बीच हॉटलाइन, विवादित जलक्षेत्र में आमने-सामने होने पर लागू होने वाले सहमत नियम और व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने के लिए संयुक्त आपदा-प्रतिक्रिया अभ्यास शामिल हो सकते हैं। ऐसे उपाय मूल संप्रभुता विवाद का समाधान नहीं करेंगे, लेकिन आकस्मिक तनाव बढ़ने का जोखिम घटा सकते हैं।
आसपास के जलक्षेत्र में संसाधनों का संयुक्त विकास सहयोग का एक और संभावित रास्ता है। 2008 में चीन और जापान विवादित क्षेत्रों में गैस और तेल की संयुक्त खोज के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमत हुए थे, हालांकि चीन में घरेलू आलोचना के बाद इसे लागू करने की प्रक्रिया रुक गई। ऐसी व्यवस्था फिर शुरू करने से कठिन संप्रभुता के सवाल को अलग रखते हुए आर्थिक सहयोग को प्रोत्साहन मिल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता या न्यायिक फैसले के जरिए कानूनी समाधान सैद्धांतिक रूप से संभव है, लेकिन राजनीतिक रूप से कठिन है। जापान आम तौर पर तीसरे पक्ष से फैसला कराने का विरोध करता रहा है। संभवतः उसे चिंता है कि उसके खिलाफ फैसला आने से उसका रुख कमजोर हो सकता है। दक्षिण चीन सागर पर 2016 के मध्यस्थता फैसले को चीन ने खारिज कर दिया था, जिससे संकेत मिलता है कि अपने क्षेत्रीय विवादों में वह अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रियाओं को अपनाने के लिए खास उत्सुक नहीं है।
आखिरकार, सार्थक प्रगति के लिए बीजिंग और टोक्यो, दोनों में ऐसे राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत होगी जो राष्ट्रवादी कथाओं और क्षेत्रीय स्थिरता तथा आर्थिक सहयोग के बीच संतुलन साध सके। दोनों देशों में मौजूदा घरेलू दबावों को देखते हुए निकट भविष्य में ऐसे नेतृत्व की संभावना कम दिखती है। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में दियाओयू/सेनकाकू विवाद पूर्वी एशिया में तनाव का स्थायी स्रोत बना रहेगा।
मुख्य बिंदु
- चीन के तटरक्षक जहाजों ने 2025 में दियाओयू दाओ के जलक्षेत्र में 356 दिन गश्त की, जो विवादित द्वीपों के आसपास समुद्री मौजूदगी का नया रिकॉर्ड है
- चीन के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता झांग शियाओगांग ने गश्त को वैध और कानूनी बताया तथा जापान से संयम बरतने का आग्रह किया
- ताइवान संकट में संभावित सैन्य हस्तक्षेप पर जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची की टिप्पणियों के बाद तनाव बढ़ा
- चीन मिंग राजवंश के समय से ऐतिहासिक संप्रभुता का दावा करता है, जबकि जापान का कहना है कि 1895 में शामिल किए जाने के समय ये द्वीप टेरा नलियस थे
- अमेरिका संप्रभुता के सवाल पर तटस्थ रहता है, लेकिन कहता है कि जापान के साथ उसकी सुरक्षा संधि जापानी प्रशासन के तहत आने वाले इन द्वीपों पर लागू होती है
- हालिया घटनाओं में तटरक्षक बलों के बीच टकराव, हवाई क्षेत्र का उल्लंघन और 2024 में लगातार रिकॉर्ड 158 दिनों तक चीनी समुद्री मौजूदगी शामिल है
- निर्जन द्वीपों के अंतर्निहित आर्थिक मूल्य से परे यह विवाद प्रतीकात्मक, घरेलू राजनीतिक और प्रतिस्पर्धी आयाम रखता है
- चीन ने जापान आने को लेकर अपने नागरिकों के लिए यात्रा और पढ़ाई संबंधी सलाह जारी की है, जो कूटनीतिक और समुद्री कदमों के साथ आर्थिक दबाव का संकेत है
- विश्लेषकों ने संकट-प्रबंधन तंत्र विकसित करने में सीमित सफलता के बावजूद आकस्मिक तनाव बढ़ने के जोखिम में इजाफे की चेतावनी दी है
- यह विवाद ताइवान, दक्षिण चीन सागर और अन्य क्षेत्रीय संघर्षों समेत व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों से जुड़ा है






