निर्माण क्षेत्र में ठहराव
टोक्यो -- जापान का निर्माण उद्योग, जो परंपरागत रूप से युद्धोत्तर आर्थिक चमत्कार का एक स्तंभ रहा है, ठप होने की कगार पर है। जापान की लगभग 70% बड़ी और मध्यम आकार की निर्माण कंपनियों का कहना है कि वे वित्त वर्ष 2026 में नई बड़ी निर्माण परियोजनाएं हाथ में नहीं ले पाएंगी। भविष्य की इन परियोजनाओं को ठुकराने की वजह मांग या वित्तपोषण की कमी नहीं, बल्कि कहीं अधिक बुनियादी बाधा है: श्रमिकों की गंभीर कमी। श्रमबल का यह संकट निजी और सार्वजनिक निवेश को सीमित कर रहा है और पूरे द्वीपसमूह में आर्थिक विकास में बाधा डाल रहा है।
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हालात इस हद तक बिगड़ गए हैं कि देशभर में कारखानों और व्यावसायिक इमारतों की परियोजनाओं का लंबित काम बढ़ता जा रहा है। अधूरे ऑर्डर रिकॉर्ड 15 ट्रिलियन येन, यानी करीब 103 अरब डॉलर, तक पहुंच गए हैं। यह बाधा अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डाल रही है। हालिया विश्लेषणों के मुताबिक, श्रमिकों की कमी से जापान की जीडीपी के 2.6% के बराबर संभावित अवसरों का नुकसान हो रहा है। अहम बुनियादी ढांचे और आवास के लिए जिम्मेदार निर्माण क्षेत्र इस जनसांख्यिकीय संकट के केंद्र में है।
श्रमिक नहीं जुटा पाने के कारण बड़ी कंपनियां कारोबार ठुकराने को मजबूर हैं। जो कंपनियां आम तौर पर सरकारी बुनियादी ढांचा ठेकों या व्यावसायिक विकास परियोजनाओं के लिए आक्रामक प्रतिस्पर्धा करती थीं, वे अब केवल इसलिए बोलियां लगाने से इनकार कर रही हैं क्योंकि उनके पास काम पूरा करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं। क्षमता की यह सीमा एक ऐसी विरोधाभासी स्थिति पैदा कर रही है जिसमें मांग तो बहुत है, लेकिन आपूर्ति संभव नहीं। इसके चलते लॉजिस्टिक्स केंद्रों से लेकर सेमीकंडक्टर कारखानों तक, हर तरह की परियोजनाओं में देरी हो रही है। ये कारखाने जापान की तकनीकी प्रतिस्पर्धा के लिए बेहद अहम हैं।
कमी के पीछे जनसांख्यिकीय आपातस्थिति
इस संकट की जड़ जापान की जनसांख्यिकीय संरचना में है। देश जनसांख्यिकीय चौराहे पर खड़ा है, जहां कम जन्मदर और बूढ़ी होती आबादी उसकी अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रभाव के लिए खतरा बन रही है। 2008 में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद से जापान की आबादी लगातार घट रही है। कर आधार सिकुड़ने और उम्र से जुड़ा खर्च बढ़ने के साथ सार्वजनिक वित्त और श्रम बाजार पर दबाव तेज हो रहा है।
भविष्य के अनुमान चिंताजनक हैं। शोध के अनुसार, इस दशक के अंत तक जापान में 34 लाख श्रमिकों की कमी होगी और 2040 तक यह आंकड़ा 1.1 करोड़ तक पहुंच जाएगा। श्रमबल में यह गिरावट कोई अस्थायी घटना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संरचनात्मक हकीकत है। कामकाजी उम्र की आबादी घट रही है, क्योंकि सेवानिवृत्त हो रहे बेबी-बूमर पीढ़ी के लोगों की जगह लेने के लिए कम युवा श्रमबल में शामिल हो रहे हैं। निर्माण क्षेत्र में कामगारों की औसत उम्र तेजी से बढ़ रही है। अब निर्माण श्रमिकों में 36% से अधिक की उम्र 55 साल से ज्यादा है, जबकि 29 साल से कम उम्र के कामगारों की आमद काफी घट गई है।
यह जनसांख्यिकीय गिरावट देशभर में एक जैसी नहीं है। ग्रामीण इलाकों की आबादी शहरी केंद्रों की तुलना में तेजी से घट रही है। इससे भौगोलिक असंतुलन पैदा हुआ है: जहां श्रमिकों की जरूरत अधिक है, वहां स्थानीय आबादी खत्म होती जा रही है। हालांकि बड़े शहरों में भी कुशल कामगारों की भारी कमी है। कामकाजी उम्र की आबादी में गिरावट से आर्थिक उत्पादकता और कर राजस्व घटता है। इससे एक दुष्चक्र बनता है, जिसमें सरकार के पास लोगों को काम के लिए प्रोत्साहित करने या सामाजिक सुरक्षा देने के संसाधन कम पड़ जाते हैं।
आर्थिक गतिरोध और कारोबारों का बढ़ता दिवालियापन
श्रमिकों की कमी के अब व्यापक आर्थिक स्तर पर स्पष्ट परिणाम दिख रहे हैं। बैंक ऑफ जापान कमजोर आर्थिक गतिविधियों की मुख्य वजह ठहरी हुई मांग के बजाय श्रमिकों की पुरानी कमी को तेजी से मान रहा है। केंद्रीय बैंक के नजरिये में यह बदलाव अहम है, क्योंकि इससे नीतिगत दिशा बदलती है। प्रोत्साहन के जरिये अपस्फीति से लड़ने के बजाय बैंक अब आपूर्ति क्षमता की कमी से पैदा हो रही वेतन-प्रेरित महंगाई से जूझ रहा है।
"मेरी राय में ... उत्पादन अंतर वास्तव में पहले ही सकारात्मक दायरे में पहुंच चुका है और आपूर्ति क्षमता की कमी कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव डाल रही है," बैंक ऑफ जापान के सख्त रुख वाले बोर्ड सदस्य नाओकी तमुरा ने कहा।
यह स्थिति बताती है कि जापान अपस्फीति के खिलाफ दशकों से चली आ रही लड़ाई से निकलकर आपूर्ति-पक्ष की बाधाओं के दौर में प्रवेश कर रहा है। कंपनियां पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहीं, इसकी वजह ग्राहकों की कमी नहीं, बल्कि श्रमिकों की कमी है। कारखानों से लेकर होटलों और रेस्तरां तक, जापानी कारोबार अपनी पूरी क्षमता से कम पर चल रहे हैं।
कारोबारों पर बढ़ते दबाव के कारण कई कंपनियां बंद हो रही हैं। अप्रैल में जापान में कम से कम 10 मिलियन येन के कर्ज वाली कंपनियों के दिवालिया होने के 828 मामले सामने आए। संबंधित महीने के लिए यह 11 साल का उच्चतम स्तर है। इनमें ज्यादातर छोटी कंपनियां थीं, जिनका कारोबारी आधार कमजोर है। बढ़ती कीमतों और श्रम लागत के कारण उनकी आय पर दबाव पड़ा। निर्माण क्षेत्र में दिवालियापन के 152 मामले आए, जो पिछले साल से 4.1% अधिक हैं। ये कंपनियां बढ़ती श्रम लागत ग्राहकों पर डालने में असमर्थ थीं या संचालन के लिए कर्मचारी नहीं जुटा पाईं, जिसका सीधा नतीजा ये बंदियां हैं।
दरवाजे खोलना: विदेशी श्रमिकों की दुविधा
श्रमिकों की कमी पूरी करने की कोशिश में जापान ने विदेशी कामगारों का सहारा लिया है। सरकार ने सीमित रुख से धीरे-धीरे अधिक खुली, हालांकि सतर्क, आव्रजन नीति की ओर कदम बढ़ाया है। विदेशी श्रमिकों की संख्या 2008 में पांच लाख से कुछ कम थी, जो 2024 में बढ़कर 23 लाख हो गई। इस बढ़ोतरी के बावजूद विदेशी नागरिक कुल आबादी और श्रमबल का केवल करीब 2% हैं, जो ओईसीडी के 10% औसत से काफी कम है।
इस कमी से निपटने के लिए जापान ने विशेष वीजा श्रेणियां शुरू की हैं। 2019 में शुरू की गई निर्दिष्ट कुशल श्रमिक प्रणाली (एसएसडब्ल्यूएस) के तहत जापान निर्माण, नर्सिंग और विनिर्माण जैसे गंभीर श्रमिक-कमी वाले उद्योगों में काम के लिए तैयार मध्यम-कौशल वाले विदेशी नागरिकों को प्रवेश दे सकता है। हाल ही में सरकार ने 2027 से तकनीकी इंटर्न प्रशिक्षण कार्यक्रम (टीआईटीपी) की जगह नया कौशल विकास रोजगार कार्यक्रम (ईएसडी) शुरू करने की योजना घोषित की, जिसका उद्देश्य काम की स्थितियों और कर्मचारियों को बनाए रखने की क्षमता में सुधार करना है।
हालांकि, विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता अब भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील और व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण है। श्रमिकों की बड़ी कमी अब भी बनी हुई है। जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी के शोध के मुताबिक, आर्थिक विकास बनाए रखने के लिए जापान को 2030 में 41.9 लाख प्रवासी श्रमिकों की जरूरत होगी। मौजूदा वृद्धि दर के हिसाब से भी देश में 7.7 लाख श्रमिक कम पड़ेंगे। इसके अलावा, विदेशी कामगारों को जापानी समाज और कार्यस्थलों में शामिल करना अब भी जारी प्रक्रिया है। भाषा की बाधाएं और सांस्कृतिक अंतर अक्सर उन्हें काम पर बनाए रखने में अड़चन बनते हैं।
तकनीक से उम्मीद: स्वचालन और श्रमिकों की क्षमता में वृद्धि
मानव श्रमिकों की कमी से जूझते हुए जापान का कॉरपोरेट क्षेत्र तकनीक अपनाने की रफ्तार बढ़ा रहा है। देश की अत्यधिक वृद्ध होती आबादी नवाचार की दिशा तय कर रही है और बढ़ती उम्र को तकनीकी अवसर में बदल रही है। निर्माण उद्योग में यह बदलाव "आई-कंस्ट्रक्शन" के बढ़ते चलन में दिखता है। यह सरकार समर्थित पहल है, जिसमें उत्पादकता बढ़ाने के लिए सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) का इस्तेमाल किया जाता है।
कोमात्सु जैसे अग्रणी निर्माण उपकरण निर्माता, श्रमिकों की जगह पूरी तरह लेने के बजाय उनकी क्षमता बढ़ाने के लिए "आईसीटी निर्माण उपकरण" तैयार कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, आईसीटी बुलडोजर और खुदाई मशीनें ऑपरेटरों की मदद के लिए सेंसर और जीपीएस का इस्तेमाल करती हैं। पहले सटीक ढलान बनाने जैसे काम में वर्षों का अनुभव लगता था, लेकिन अब मशीन मार्गदर्शन की मदद से कम कुशल श्रमिक भी यह काम कर सकते हैं। इससे कम उम्र और कम अनुभव वाले श्रमिक भी तुरंत उत्पादक बन पाते हैं और अनुभवी श्रमिकों के सेवानिवृत्त होने से पैदा हुई कौशल की कमी घटती है।
निर्माण स्थलों पर ड्रोन और स्वचालित वाहन भी आम होते जा रहे हैं। जापानी कंपनियों और सिलिकॉन वैली के स्टार्टअप के बीच साझेदारी से निर्माण स्थलों के 3डी नक्शे बनाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ा है, जिससे सर्वेक्षण में लगने वाला समय काफी घट गया है। एक अन्य बड़ी निर्माण कंपनी ओबायाशी कॉर्पोरेशन ने स्वचालित ढुलाई रोबोट विकसित किए हैं। ये रोबोट निर्माण स्थलों पर सामग्री पहुंचा सकते हैं और अकेले लिफ्ट का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, जिससे खतरनाक या दोहराव वाले कामों में मानव श्रम की जरूरत घटती है।
तकनीक का यह रुझान निर्माण क्षेत्र से आगे भी फैल रहा है। करीब 70 साल की औसत उम्र वाले किसानों के कारण दबाव झेल रहा कृषि क्षेत्र स्वचालित ट्रैक्टर और ड्रोन निगरानी अपना रहा है। परिवहन क्षेत्र में, ट्रकों के एक-दूसरे के पीछे स्वचालित रूप से चलने वाली प्लाटूनिंग तकनीक का ड्राइवरों की कमी से निपटने के लिए परीक्षण किया जा रहा है। सटीक विनिर्माण के लिए अपनी प्रतिष्ठा का लाभ उठाकर जापान "जनसांख्यिकीय जरूरतों से प्रेरित तकनीक" में अग्रणी बनने की कोशिश कर रहा है। वह समान रूप से बूढ़ी होती आबादी का सामना कर रहे दूसरे देशों को भी ये समाधान बेच रहा है।
दुनिया के लिए चेतावनी
जापान का मौजूदा संघर्ष विकसित दुनिया के बाकी देशों के लिए खतरे की घंटी है। जापान में आबादी के बूढ़े होने की रफ्तार भले ही असाधारण हो, लेकिन दूसरी विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी तेजी से इसी राह पर बढ़ रही हैं। यूरोप और उत्तरी अमेरिका के श्रम बाजारों में दिख रही तंगी उस जनसांख्यिकीय संकट के शुरुआती संकेत हैं, जिसका सामना जापान पहले ही कर रहा है।
जापान का अनुभव दिखाता है कि श्रमिकों की कमी से संभावित आर्थिक उत्पादन हाथ से निकल जाता है। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि 2023 में विकसित अर्थव्यवस्थाओं की जीडीपी काफी अधिक हो सकती थी, अगर नियोक्ता खाली पड़े पदों को भर पाते। दूसरे देशों में जनसांख्यिकीय गिरावट बढ़ने पर वे जापान के समाधानों की ओर देखेंगे। विदेशी श्रमिकों को व्यवस्थित रूप से शामिल करना हो या स्वचालन और रोबोटिक्स को तेजी से अपनाना, जापान जिस राह पर चलेगा, उससे अहम सबक मिलेंगे।
देश एक निर्णायक मोड़ पर है। उसे कुशल, उम्रदराज श्रमबल पर पारंपरिक निर्भरता और तकनीक तथा आव्रजन के जरिये आधुनिकीकरण की तत्काल जरूरत के बीच संतुलन बनाना होगा। अगर वह सफल रहा, तो जनसांख्यिकीय बोझ को स्वचालन और वृद्ध देखभाल के वैश्विक बाजार में नेतृत्व की ताकत में बदल सकता है। अगर वह नाकाम रहा, तो 2026 में ठुकराई गई निर्माण परियोजनाओं से दिखने वाला आर्थिक ठहराव स्थायी स्थिति बन सकता है।
निष्कर्ष
- जापान की लगभग 70% बड़ी और मध्यम आकार की निर्माण कंपनियों का कहना है कि श्रमिकों की कमी के कारण वे वित्त वर्ष 2026 में नई बड़ी परियोजनाएं स्वीकार नहीं कर सकतीं।
- निर्माण क्षेत्र के लंबित ऑर्डर रिकॉर्ड 15 ट्रिलियन येन (103 अरब डॉलर) तक पहुंच गए हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में बड़ी बाधा पैदा हुई है।
- तेजी से बूढ़ी होती आबादी और कम जन्मदर के कारण 2040 तक जापान में 1.1 करोड़ श्रमिकों की कमी होने का अनुमान है।
- श्रमिकों की कमी से वेतन-प्रेरित महंगाई बढ़ रही है और कंपनियों के दिवालियापन 11 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं।
- बैंक ऑफ जापान के मुताबिक, मांग की कमी के बजाय आपूर्ति की सीमाएं अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी बाधा हैं।
- विदेशी श्रमिकों की संख्या बढ़कर 23 लाख हो गई है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। 2030 तक 7.7 लाख श्रमिकों की कमी का अनुमान है।
निर्माण उद्योग घटते श्रमबल की क्षमता बढ़ाने के लिए "आई-कंस्ट्रक्शन" तकनीक अपना रहा है, जिसमें स्वचालित ड्रोन और आईसीटी से लैस मशीनें शामिल हैं।






