अमेरिका और सहयोगी देश महत्वपूर्ण खनिजों पर चीन का दबदबा खत्म करने की होड़ में

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अमेरिका और सहयोगी देश महत्वपूर्ण खनिजों पर चीन का दबदबा खत्म करने की होड़ में

रणनीतिक आवश्यकता बनी सर्वोच्च प्राथमिकता

चीन के महत्वपूर्ण खनिजों पर वैश्विक निर्भरता घटाने के लिए अमेरिका एक तात्कालिक कूटनीतिक पहल की अगुवाई कर रहा है। इसके तहत 4 फरवरी को सहयोगी देशों की एक अहम बैठक बुलाई गई है। विदेश मंत्रियों की इस बैठक का उद्देश्य ऐसे संसाधनों की आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने और उन्हें मजबूत करने पर व्यापक समझौता करना है, जो आधुनिक तकनीक और राष्ट्रीय रक्षा की जीवनरेखा बन चुके हैं। यह पहल बीजिंग की ओर से दुर्लभ मृदा तत्वों के निर्यात पर पाबंदियां लगाए जाने के बाद सामने आई है। व्यापार समझौते के जरिए इन उपायों को अस्थायी रूप से टाला गया था, लेकिन इनसे अमेरिका को मजबूत विकल्प तैयार करने के प्रयास तेज करने पड़े। चीनी अधिकारी इन अहम संसाधनों पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल भू-राजनीतिक दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं। ऐसे में वॉशिंगटन अपने सहयोगियों को साथ लेकर खनिज सुरक्षा का नया ढांचा तैयार कर रहा है, जो आर्थिक दबाव और आपूर्ति में रुकावटों का सामना कर सके।

विषय-सूची
  1. रणनीतिक आवश्यकता बनी सर्वोच्च प्राथमिकता
  2. वैश्विक बाजार पर चीन का भारी दबदबा
  3. महत्वपूर्ण खनिजों का परिदृश्य
  4. अमेरिका की बहुआयामी रणनीति
  5. वैश्विक समन्वय और सहयोगी देशों की प्रतिक्रिया
  6. नीतिगत सिफारिशें और विधायी कदम
  7. आगे की राह: चुनौतियां और समयसीमा
  8. चीन की रणनीतिक गणना
  9. निचोड़

दांव पर लगी चीजें व्यापार संतुलन और आर्थिक आंकड़ों से कहीं बढ़कर हैं। महत्वपूर्ण खनिज इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों और नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों से लेकर उन्नत लड़ाकू विमानों और सेमीकंडक्टर निर्माण तक, हर चीज का आधार हैं। वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच तनाव बढ़ने के साथ, चीनी आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भर हुए बिना इन सामग्रियों को सुरक्षित करना राष्ट्रीय सुरक्षा की मूल प्राथमिकता बन गया है। आगामी बैठक इस कमजोरी से निपटने के लिए अब तक का सबसे महत्वपूर्ण समन्वित अंतरराष्ट्रीय प्रयास है। इसमें प्रमुख हितधारक ऐसी रणनीति तैयार करने के लिए जुटेंगे, जो आने वाले दशकों में वैश्विक संसाधन नेटवर्क को नया रूप दे सकती है।

अमेरिकी अधिकारियों ने जोर देकर कहा है कि महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करना ट्रंप प्रशासन की शीर्ष प्राथमिकता है। वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट विदेश मंत्री मार्को रुबियो और व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर के साथ इस प्रयास का नेतृत्व कर रहे हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय खनिज नीति के जटिल परिदृश्य में आगे बढ़ना बड़ी चुनौती है, खासकर जब सहयोगी देशों के विविध आर्थिक हितों और नियामक ढांचों के बीच तालमेल बिठाना हो।

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वैश्विक बाजार पर चीन का भारी दबदबा

मौजूदा कूटनीतिक प्रयास की तात्कालिकता समझने के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं पर चीन के विशाल प्रभुत्व को जानना जरूरी है। चीन केवल जमीन से इन सामग्रियों का खनन नहीं करता, बल्कि उसने खनन, प्रसंस्करण, शोधन और विनिर्माण को जोड़ने वाला एक व्यापक तंत्र खड़ा किया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के तांबे, लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और दुर्लभ मृदा तत्वों में से 47% से 87% तक का शोधन चीन में होता है। इससे बीजिंग को उन वैश्विक उद्योगों पर असाधारण दबदबा मिलता है, जो इन प्रसंस्कृत सामग्रियों पर निर्भर हैं। कच्चे खनिजों को उन्नत तकनीकों में इस्तेमाल लायक बनाने से पहले जटिल रासायनिक शोधन से गुजरना पड़ता है।

दुर्लभ मृदा तत्वों की बात करें तो स्थिति और भी चौंकाने वाली है। इन रणनीतिक सामग्रियों के वैश्विक खनन में चीन की हिस्सेदारी करीब 70% और प्रसंस्करण क्षमता में 90% है। यह दबदबा संयोग से नहीं बना। इसके पीछे दशकों का सुनियोजित सरकारी निवेश और औद्योगिक नीति है, जिसकी शुरुआत 1992 में देंग शियाओपिंग की इस प्रसिद्ध टिप्पणी के बाद जोर पकड़ने लगी थी कि “मध्य पूर्व के पास तेल है, चीन के पास दुर्लभ मृदा तत्व हैं।” दुनिया भर में दुर्लभ मृदा तत्वों के भंडार मौजूद हैं, लेकिन चीन ने इन सामग्रियों के कुशल प्रसंस्करण के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा और विशेषज्ञता व्यवस्थित रूप से विकसित की। अक्सर कीमतें इतनी कम रखी गईं कि प्रतिस्पर्धियों के लिए बाजार में उतरना आर्थिक रूप से अव्यावहारिक हो गया।

बीजिंग ने दिखाया है कि वह इस दबदबे को कूटनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने को तैयार है। 2010 में पूर्वी चीन सागर में क्षेत्रीय विवाद के दौरान चीन ने जापान को दुर्लभ मृदा तत्वों का निर्यात रोक दिया था। इस कदम ने अमेरिकी और सहयोगी अधिकारियों को चीन की आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता के रणनीतिक जोखिमों के प्रति सचेत किया। हाल ही में चीन ने जापान के सैन्य इस्तेमाल के लिए भेजे जाने वाले महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्यात पाबंदियां लगाईं और ऐसे उत्पादों पर भी उपायों की घोषणा की, जिनमें चीनी दुर्लभ मृदा तत्वों की मामूली मात्रा हो या जिन्हें चीनी तकनीक से बनाया गया हो। ये पाबंदियां अमेरिका के विदेशी प्रत्यक्ष उत्पाद नियम से मिलती-जुलती हैं और इनके तहत दुनिया भर की कंपनियों को उन उत्पादों के लिए भी लाइसेंस लेना पड़ सकता है, जिनमें चीनी सामग्री की मात्रा केवल 0.1% हो।

चीन ने दशकों से खदानों और खनिज प्रसंस्करण में निवेश किया है और अब कच्चे अयस्कों तथा शोधन के साथ-साथ आगे की विनिर्माण प्रक्रिया पर भी उसका नियंत्रण है,” सिडनी विश्वविद्यालय के यूनाइटेड स्टेट्स स्टडीज सेंटर की दुर्लभ मृदा विशेषज्ञ हेली चैनर ने कहा। “इस तरह उसने शुरू से अंत तक की आपूर्ति शृंखलाएं खड़ी कर ली हैं।
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महत्वपूर्ण खनिजों का परिदृश्य

महत्वपूर्ण खनिजों में 50 से अधिक तत्व और पदार्थ शामिल हैं, जिन्हें अमेरिका ने आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी घोषित किया है। इस सूची में तांबे और लिथियम जैसी परिचित औद्योगिक धातुओं से लेकर नियोडिमियम जैसे कम चर्चित तत्व भी शामिल हैं। नियोडिमियम से शक्तिशाली चुंबक बनाए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहन मोटरों, पवन टर्बाइनों और उच्च प्रदर्शन वाले स्पीकरों में होता है। इन सामग्रियों को “महत्वपूर्ण” उनकी कमी के कारण नहीं, बल्कि उनकी अनिवार्यता के कारण माना जाता है: विनिर्माण में इनकी थोड़ी मात्रा भी जरूरी होती है और कई उपयोगों के लिए इनके व्यावहारिक विकल्प मौजूद नहीं हैं।

चीन पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहे देशों के लिए शोधन प्रक्रिया शायद सबसे बड़ी चुनौती है। जमीन से खनिज निकालना जटिल आपूर्ति शृंखला का केवल पहला कदम है। विनिर्माण में इस्तेमाल लायक बनने के लिए कच्चे अयस्क को अलग करने, सांद्रित करने और रासायनिक प्रसंस्करण से गुजरना पड़ता है। आपूर्ति शृंखला के इस मध्य चरण का प्रसंस्करण रासायनिक रूप से जटिल, संसाधन-प्रधान और अक्सर पर्यावरण के लिए नुकसानदेह होता है। नई प्रसंस्करण सुविधाएं बनाने के लिए भारी निवेश चाहिए। दुर्लभ मृदा तत्वों की रिफाइनरी की औसत लागत करीब 500 मिलियन डॉलर है। ऐसी सुविधाएं चालू करने में लगने वाला लंबा समय विविधीकरण के तेज प्रयासों को और मुश्किल बनाता है।

आधुनिक जीवन में महत्वपूर्ण खनिजों का इस्तेमाल कई ऐसी जगहों पर होता है, जिनकी ओर उपभोक्ताओं का शायद ही ध्यान जाता है। लिथियम-आयन बैटरियां स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर बड़े पैमाने की ऊर्जा भंडारण प्रणालियों तक को बिजली देती हैं। दुर्लभ मृदा चुंबकों से इलेक्ट्रिक कारों की छोटी मोटरें और उन्नत हथियारों के सटीक दिशा-निर्देशन तंत्र काम करते हैं। एफ-35 लड़ाकू विमान के रडार ऐरे, सोनार प्रणालियों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं में भी इन सामग्रियों का इस्तेमाल होता है। यहां तक कि कंप्यूटर हार्ड ड्राइव, मेडिकल इमेजिंग उपकरण और कैटेलिटिक कन्वर्टर जैसी रोजमर्रा की चीजें भी इन विशेष तत्वों की स्थिर आपूर्ति पर निर्भर हैं। महत्वपूर्ण खनिजों तक भरोसेमंद पहुंच न होने पर पूरे औद्योगिक क्षेत्र ठप पड़ सकते हैं। अमेरिकी वाहन उद्योग के अधिकारियों ने चेताया है कि आपूर्ति में रुकावट से कुछ ही हफ्तों में अमेरिका का ऑटोमोबाइल उत्पादन रुक सकता है।

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अमेरिका की बहुआयामी रणनीति

ट्रंप प्रशासन ने चीन पर निर्भरता घटाने के लिए एक व्यापक रणनीति बनाई है, जो एक साथ कई मोर्चों पर काम करती है। घरेलू स्तर पर अधिकारियों ने अनुमति प्रक्रिया को सरल बनाकर, वित्तीय प्रोत्साहन देकर और सीधे सरकारी निवेश के जरिए अमेरिकी खनन और प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है। रक्षा विभाग ने हाल ही में अमेरिका की दुर्लभ मृदा उत्पादक कंपनी एमपी मटीरियल्स में 400 मिलियन डॉलर के बदले 15% हिस्सेदारी ली। इसके तहत प्रमुख उत्पादों के लिए न्यूनतम कीमत तय की गई और खरीद का ऐसा समझौता किया गया, जो मांग की गारंटी देता है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी का यह मॉडल उन परियोजनाओं में निवेश लाने के लिए जरूरी भरोसा देता है, जिन्हें अस्थिर कमोडिटी बाजार में पूंजी जुटाने में दिक्कत हो सकती है।

प्रशासन ने संघीय भूमि पर खनिजों की खोज का दायरा बढ़ाया है और लंबी अनुमति प्रक्रिया को सरल बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं। अमेरिका में नई खदान बनाने में फिलहाल औसतन 29 साल लगते हैं, जो दुनिया में दूसरी सबसे लंबी अवधि है। इसकी वजह संघीय, राज्य और स्थानीय नियमों का एक-दूसरे पर लागू होना है। किसी एक परियोजना के लिए 30 तक परमिट की जरूरत पड़ सकती है, जिनमें से कई एक-दूसरे की पुनरावृत्ति होते हैं। इस प्रक्रिया में सुधार को दोनों दलों का समर्थन मिला है। ट्रंप और बाइडेन, दोनों प्रशासन ने पर्यावरण संरक्षण बनाए रखते हुए अनुमति प्रक्रिया तेज करने के प्रयासों का समर्थन किया है।

यह मानते हुए कि केवल घरेलू संसाधन अमेरिकी मांग पूरी नहीं कर सकते, रणनीति में सहयोगी देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को भी प्राथमिकता दी गई है। अमेरिका ने यूक्रेन के साथ खनिज समझौता किया है और उन देशों के साथ समझौते करने की कोशिश कर रहा है, जिनके पास बड़े भंडार हैं, लेकिन जिनका प्रसंस्करण ढांचा चीन के दबदबे में नहीं है। वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने न्यूनतम कीमतें तय करने और भविष्य की खरीद व्यवस्था लागू करने के महत्व पर जोर दिया है, ताकि बाजार में स्थिरता बनी रहे। उन्होंने कहा कि अमेरिका इन उपायों को केवल दुर्लभ मृदा तत्वों तक सीमित रखने के बजाय “कई उद्योगों में” लागू करेगा।

व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने मजबूत आपूर्ति शृंखलाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से महत्वपूर्ण खनिजों के आर्थिक रूप से टिकाऊ बाजार बनाने की जरूरत पर जोर दिया है। इस तरीके में घरेलू उत्पादन के प्रोत्साहन को सहयोगी देशों में रणनीतिक निवेश के साथ जोड़ा गया है, ताकि आपूर्तिकर्ताओं का विविध नेटवर्क बनाया जा सके और किसी एक जगह की रुकावट से पूरी व्यवस्था प्रभावित न हो। इस रणनीति में विकास वित्त निगम, निर्यात-आयात बैंक और रक्षा उत्पादन अधिनियम के वित्तीय साधनों का इस्तेमाल कर मित्र देशों में खनन और प्रसंस्करण परियोजनाओं को समर्थन देना भी शामिल है।

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वैश्विक समन्वय और सहयोगी देशों की प्रतिक्रिया

4 फरवरी को होने वाली सहयोगी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक, खनिजों पर चीन के दबदबे से निपटने के व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयास का नया कदम है। जनवरी में जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और कनाडा समेत जी7 देशों के वित्त मंत्रियों ने वॉशिंगटन में ऑस्ट्रेलिया, मेक्सिको, दक्षिण कोरिया और भारत के अधिकारियों के साथ आपूर्ति शृंखला की मजबूती पर चर्चा की। जापान की वित्त मंत्री सात्सुकी कातायामा ने पत्रकारों से कहा कि “दुर्लभ मृदा तत्वों के लिए चीन पर निर्भरता जल्द घटाने की जरूरत पर व्यापक सहमति” है। उन्होंने अल्प, मध्यम और दीर्घकालीन अवधि के लिए नीतिगत उपायों का खाका भी पेश किया।

“मैंने इन उपायों के प्रति प्रतिबद्धता के महत्व पर जोर दिया,” कातायामा ने कहा। प्रस्तावों में श्रम स्थितियों और मानवाधिकारों के सम्मान जैसे मानकों पर आधारित बाजार बनाना शामिल है। उन्होंने सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों के समर्थन, कर और वित्तीय प्रोत्साहन, व्यापार और शुल्क संबंधी उपायों, क्वारंटीन उपायों तथा न्यूनतम कीमत तय करने समेत कई नीतिगत साधनों के इस्तेमाल का भी जिक्र किया।

यूरोपीय देशों ने इस चुनौती से निपटने के लिए तात्कालिकता और सतर्कता, दोनों का रास्ता अपनाया है। अमेरिका ने यूरोपीय संघ के कुछ सदस्य देशों को द्विपक्षीय समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रोत्साहित किया है, जबकि यूरोपीय आयोग ने सामूहिक सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने के लिए एकजुट रुख बनाए रखने की सलाह दी है। जर्मनी के वित्त मंत्री लार्स क्लिंगबेल ने जोर दिया है कि यूरोप को महत्वपूर्ण कच्चे माल की अपनी आपूर्ति विकसित करने के लिए तेजी से कदम उठाने होंगे। उन्होंने चेताया कि “शिकायत करने या खुद पर तरस खाने से हमें कोई मदद नहीं मिलेगी, हमें सक्रिय होना होगा।” उन्होंने बताया कि जी7 बैठक में दुर्लभ मृदा तत्वों के लिए न्यूनतम कीमत और आपूर्ति बढ़ाने वाली साझेदारियों पर चर्चा हुई, लेकिन बातचीत अभी शुरू ही हुई है और कई मुद्दे अनसुलझे हैं।

दक्षिण कोरिया के वित्त मंत्री कू युन-चोल ने तुलनात्मक लाभ के आधार पर वैश्विक मूल्य शृंखलाओं को मजबूत करने के महत्व पर जोर दिया है। उनका खास ध्यान मजबूत आपूर्ति शृंखलाओं के लिए महत्वपूर्ण खनिजों के पुनर्चक्रण पर है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया इस प्रयास में प्रमुख साझेदार बनकर उभरे हैं। दोनों के पास खनिजों के बड़े भंडार और स्थापित खनन उद्योग हैं। महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ मृदा तत्वों के खनन तथा प्रसंस्करण में आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए हाल ही में हुआ अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया ढांचा, चीन से इतर आपूर्ति नेटवर्क बनाने की दिशा में एक अहम कदम है। दोनों सरकारें 8.5 अरब डॉलर मूल्य की परियोजनाओं में हिस्सेदारी लेने को तैयार हैं।

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नीतिगत सिफारिशें और विधायी कदम

थिंक टैंकों और नीति विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा मजबूत करने के लिए विस्तृत सुझाव दिए हैं। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने सात विशिष्ट उपाय सुझाए हैं। इनमें घरेलू खनन विकास के समन्वय के लिए नया ब्यूरो ऑफ माइंस बनाना, अमेरिकी उद्योगों की सुरक्षा के लिए प्रोत्साहन विकसित करना और खनिज परियोजनाओं को बेहतर वित्तपोषण देने के लिए अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय विकास वित्त निगम में सुधार करना शामिल है। इन सिफारिशों में घरेलू उत्पादन बढ़ाने और रणनीतिक अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां विकसित करने के संतुलित तरीके की जरूरत पर जोर दिया गया है।

एक खास तौर पर अहम सिफारिश में तांबे को आंतरिक विभाग की महत्वपूर्ण खनिज सूची में शामिल करने की बात कही गई है। हालांकि इसे फिलहाल महत्वपूर्ण खनिज नहीं माना जाता, लेकिन 2022 में अमेरिका में तांबे की खपत 1.8 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी। चीन के बाद वह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता था। बुनियादी ढांचे, स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों, रक्षा उपयोगों, इलेक्ट्रॉनिक्स और वाहन प्रणालियों के लिए तांबा जरूरी है। अकेले कृत्रिम बुद्धिमत्ता उद्योग को डेटा सेंटर के बुनियादी ढांचे के लिए 2025 से 2028 के बीच हर साल 200,000 मीट्रिक टन तक तांबे की जरूरत पड़ सकती है, जिससे पहले से सीमित आपूर्ति पर दबाव और बढ़ेगा। तांबे को महत्वपूर्ण खनिज घोषित करने से वह मौजूदा और भविष्य के प्रोत्साहनों के दायरे में आ जाएगा और घरेलू शोधन क्षमता में निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस ने धातुओं के लिए एक व्यापक औद्योगिक रणनीति की पैरवी की है, जिसमें घरेलू खनन के जरिए उत्पादन को देश में वापस लाने और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाएं विकसित करने के बीच संतुलन हो। उसके विश्लेषण के अनुसार, आशावादी स्थितियों में भी 2035 तक अमेरिका का घरेलू उत्पादन केवल जस्ता और मोलिब्डेनम की अनुमानित मांग पूरी कर पाएगा। औद्योगिक विस्तार और बिजली ग्रिड के आधुनिकीकरण के लिए तांबे, ग्रेफाइट, लिथियम, चांदी, निकल और मैंगनीज का बड़ा आयात फिर भी जरूरी होगा। यह हकीकत पूर्ण आत्मनिर्भरता की कोशिश करने के बजाय सहयोगी देशों के साथ भरोसेमंद साझेदारियां विकसित करने की अहमियत दिखाती है।

खनिकों और प्रसंस्करणकर्ताओं के साथ एमपी मटीरियल्स समझौते की तर्ज पर गारंटीशुदा कीमत के अनुबंध साझा लाभ व्यवस्था के जरिए निवेशकों को निश्चितता दे सकते हैं। व्यापक शुल्क लगाने के बजाय, जिससे घरेलू निर्माताओं की लागत बढ़ सकती है, अंतर की भरपाई वाले अनुबंध एक तय कीमत स्थापित कर सकते हैं और बाजार की ताकतों को काम करने दे सकते हैं। इससे संरक्षणवादी उपायों से पैदा होने वाली आर्थिक विकृतियों के बिना निवेशकों को कीमतों का भरोसा मिलता है।

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आगे की राह: चुनौतियां और समयसीमा

चीन पर निर्भरता घटाने पर तात्कालिक जोर के बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाएं बनाने के लिए लंबे समय तक लगातार प्रयास करने होंगे। अडामस इंटेलिजेंस के विश्लेषकों का अनुमान है कि “नीतिगत और निवेश की गति लगातार बनी रहने पर” अमेरिका और उसके सहयोगियों को बढ़ती मांग पूरी करने लायक व्यापक और मजबूत आपूर्ति शृंखलाएं बनाने में 10 से 15 साल लगेंगे। यह समयसीमा बताती है कि केवल खदानें ही नहीं, बल्कि पूरे प्रसंस्करण तंत्र खड़े करना कितना जटिल है, ताकि वे चीन के स्थापित बुनियादी ढांचे से मुकाबला कर सकें।

आयात के मौजूदा आंकड़े चुनौती का पैमाना दिखाते हैं। अमेरिका हर साल चीन से करीब 10,000 टन दुर्लभ मृदा चुंबक आयात करता है, जबकि यूरोप का आयात 25,000 टन से अधिक है। इलेक्ट्रिक वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों और रक्षा उपयोगों के विस्तार से अगले दशक में दोनों क्षेत्रों की मांग कई गुना बढ़ने का अनुमान है। चीन से इतर स्रोतों के जरिए यह मांग पूरी करने के लिए खनन क्षमता बढ़ानी होगी, प्रसंस्करण सुविधाएं बनानी होंगी और चुंबक तथा बैटरी के पुर्जों जैसे अंतिम उत्पादों की विनिर्माण क्षमता विकसित करनी होगी।

अडामस इंटेलिजेंस के संस्थापक और प्रबंध निदेशक रयान कास्टिलॉक्स ने कहा कि चीन के प्रस्तावित निर्यात नियंत्रण से मौजूदा आपूर्ति शृंखला की रुकावटें भी “मामूली असुविधा” लगने लग सकती हैं। अगर नए नियम पूरी तरह लागू हुए तो चीनी सामग्री या तकनीक की मामूली मात्रा वाले उत्पादों के लिए भी लाइसेंस लेना होगा। इससे मौजूदा अड़चनें और असेंबली लाइन में रुकावटें कई गुना बढ़ सकती हैं। इस आशंका ने वैकल्पिक स्रोत विकसित करने के प्रयास तेज किए हैं, लेकिन तकनीकी विशेषज्ञता की कमी, पर्यावरण संबंधी चिंताएं और पूंजी की जरूरतें अब भी बड़ी बाधाएं हैं।

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के पोस्टडॉक्टरल फेलो रॉस चैंडलर ने कहा, “राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत होने पर भी इन जटिल परियोजनाओं के लिए अनुमति, वित्तपोषण और तकनीकी क्षमता बढ़ाने की प्रक्रिया को बहुत तेज नहीं किया जा सकता।” चीन पर निर्भरता घटाने के प्रयास को उन्होंने “कई दशकों तक चलने वाली प्रक्रिया” बताया।
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चीन की रणनीतिक गणना

पश्चिमी देश निर्भरता घटाने के लिए लामबंद हो रहे हैं, वहीं विश्लेषकों का मानना है कि चीन की निर्यात नियंत्रण रणनीति पर फिर से विचार करने की जरूरत पड़ सकती है। दुर्लभ मृदा तत्वों पर पाबंदियों को कूटनीतिक साधन के रूप में इस्तेमाल करने के नतीजे पहले मिले-जुले रहे हैं। कई बार इससे वही विविधीकरण प्रयास तेज हुए हैं, जिन्हें रोकने की कोशिश बीजिंग करता है। 2010 में जब चीन ने जापान को निर्यात सीमित किया, तब विश्व व्यापार संगठन ने फैसला दिया कि ये उपाय अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का उल्लंघन करते हैं। इसके बाद बीजिंग ने पाबंदियां हटा लीं, लेकिन जापान और अन्य देशों ने वैकल्पिक स्रोत विकसित करने शुरू कर दिए। मौजूदा पाबंदियों का भी ऐसा ही असर होता दिख रहा है। अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ जैसे बड़े उपभोक्ता घरेलू शोधन क्षमता फिर से बना रहे हैं और दूसरे आपूर्तिकर्ताओं के साथ संबंध मजबूत कर रहे हैं।

ईस्ट एशिया फोरम के विश्लेषकों का कहना है कि कड़े निर्यात नियंत्रणों ने चीन के संसाधन-समृद्ध साझेदारों को वॉशिंगटन के साथ नजदीकी बढ़ाने और संभावित चीनी पाबंदियों से अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को बचाने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया है। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के नेतृत्व में चीन के साथ आर्थिक संबंध स्थिर करने की कोशिश कर रहे ऑस्ट्रेलिया ने भी महत्वपूर्ण खनिज ढांचे के जरिए अमेरिका के साथ सहयोग गहरा करने का फैसला किया। यह संकेत देता है कि चीन की संसाधन कूटनीति उसका दबदबा मजबूत करने के बजाय चीन से इतर आपूर्ति तंत्र को मजबूत कर रही हो सकती है।

कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि चीन अधिक लक्षित, नियम-आधारित तरीका अपनाकर लाभ उठा सकता है। इसमें वैध राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं पर ध्यान दिया जाए और भरोसेमंद साझेदारों के साथ खुला व्यापार जारी रखा जाए। जापान और यूरोपीय संघ जैसे साझेदारों को व्यापक पाबंदियों से छूट देने पर विविध आर्थिक नेटवर्क बनाए रखने और दबाव डालने की धारणा कम करने में मदद मिल सकती है। वैश्विक आपूर्ति शृंखला केंद्र के रूप में चीन की भूमिका में अधिक पूर्वानुमेयता और स्थिरता लाने से बाहरी दबाव के बावजूद सहयोगी संबंध कायम रह सकते हैं और पश्चिमी देशों के वैकल्पिक स्रोत विकसित करने के साथ-साथ बाजार में चीन की हिस्सेदारी भी बनी रह सकती है।

आखिरकार, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं की होड़ अमेरिका और चीन के बीच व्यापक भू-राजनीतिक तनाव को दर्शाती है। खनिजों पर निर्भरता घटाने से रणनीतिक प्रतिस्पर्धा खत्म नहीं होगी, लेकिन इससे भविष्य के संघर्षों में बीजिंग की आर्थिक दबाव बनाने की क्षमता सीमित हो सकती है। विविधीकरण की यह कोशिश कितनी सफल होगी, यह आने वाले दशक में लगातार राजनीतिक प्रतिबद्धता, बड़े वित्तीय निवेश और प्रभावी अंतरराष्ट्रीय समन्वय पर निर्भर करेगा।

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निचोड़

  • चीन के महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता घटाने के लिए अमेरिका अंतरराष्ट्रीय प्रयास की अगुवाई कर रहा है। सहयोगी देशों के विदेश मंत्रियों की अहम बैठक 4 फरवरी को तय है।
  • दुर्लभ मृदा तत्वों की वैश्विक प्रसंस्करण क्षमता के 70% से 90% तक पर चीन का नियंत्रण है। अन्य महत्वपूर्ण खनिजों में भी उसकी बड़ी हिस्सेदारी है, जिससे उसे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर काफी दबदबा मिलता है।
  • इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियां, रक्षा प्रणालियां और सेमीकंडक्टर निर्माण समेत आधुनिक तकनीक के लिए महत्वपूर्ण खनिज जरूरी हैं।
  • अमेरिकी रणनीति में अनुमति प्रक्रिया सरल बनाकर और वित्तीय प्रोत्साहन देकर घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ विविध आपूर्ति नेटवर्क बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां करना शामिल है।

  • चीन से इतर आपूर्ति शृंखलाएं बनाने के लिए 10 से 15 साल तक लगातार निवेश करना होगा। फिलहाल अमेरिका हर साल 10,000 टन और यूरोप 25,000 टन दुर्लभ मृदा चुंबक आयात करता है।
  • चीनी सामग्री या तकनीक की मामूली मात्रा वाले उत्पादों पर चीन के हालिया निर्यात नियंत्रणों ने पश्चिमी देशों और उनके सहयोगियों के विविधीकरण प्रयास तेज कर दिए हैं।

    नीति विशेषज्ञ पूर्ण आत्मनिर्भरता के बजाय घरेलू विकास और रणनीतिक अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को मिलाकर संतुलित तरीका अपनाने की सलाह देते हैं।

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