गर्म होती सर्दियों और कीटों के प्रकोप से माउंट ज़ाओ के हिम दानव तेज़ी से हो रहे हैं विरल

पढ़ने में 16 मिनट
गर्म होती सर्दियों और कीटों के प्रकोप से माउंट ज़ाओ के हिम दानव तेज़ी से हो रहे हैं विरल

बदलाव की दहलीज़ पर सर्दियों का नाज़ुक अजूबा

हर सर्दियों में माउंट ज़ाओ की ऊँची ढलानों पर सदाबहार फर के पेड़ भुतहा सफ़ेद आकृतियों में बदल जाते हैं। स्थानीय लोग इन्हें जुह्यो कहते हैं—हवा, बादलों और ठंड से बने हिम दानव। अच्छे वर्षों में ये आकृतियाँ पर्वतश्रेणी पर कतारों में उभरती हैं। यह एक मौन सेना जैसी दिखती है, जो पूरे जापान और उससे दूर-दराज़ से भी पर्यटकों को आकर्षित करती है। यह नज़ारा दुर्लभ है और अब और दुर्लभ होता जा रहा है। हालिया वैज्ञानिक शोध में पाया गया है कि ये हिम दानव तेज़ी से विरल हो रहे हैं। यह उस भू-दृश्य के लिए चेतावनी है, जो लंबे समय से मौसम और जंगलों के स्वास्थ्य के नाज़ुक संतुलन पर निर्भर रहा है।

विषय-सूची
  1. बदलाव की दहलीज़ पर सर्दियों का नाज़ुक अजूबा
  2. माउंट ज़ाओ पर हिम दानव कैसे बनते हैं
  3. ये आकृतियाँ इतनी कम जगहों पर क्यों दिखती हैं?
  4. एक सदी की तस्वीरों में घटते दानव
  5. जलवायु का दबाव, कीट और सर्दियों का बदलता गणित
  6. पर्यटन की नाज़ुक डोर
  7. क्या समय रहते जंगल फिर उगाया जा सकता है?
  8. पर्यटक अभी कैसे मदद कर सकते हैं
  9. मुख्य बातें

जुह्यो हाथ से बनाई गई मूर्तियाँ नहीं हैं। ये राइम आइस यानी पाले की बर्फ़ की परतें हैं, जो तब बनती हैं जब अतिशीतित बादलों की बूंदें पेड़ों की हवा की ओर वाली सतहों से टकराते ही जम जाती हैं। ज़ाओ में इस प्रक्रिया के लिए कई स्थितियों का एक साथ होना ज़रूरी है। लगातार चलने वाली पश्चिमी हवाएँ 26 मीटर प्रति सेकंड तक की रफ़्तार से बह सकती हैं। सतह के पास की हवा का तापमान हिमांक के करीब होना चाहिए—शिखर पर लगभग शून्य से 6.3 से शून्य से 0.1 डिग्री सेल्सियस तक। बादलों में असामान्य रूप से बड़ी मात्रा में तरल पानी होना चाहिए। जब ये स्थितियाँ एक साथ मिलती हैं, तो बर्फ़ की परतें झींगे की पूँछ जैसी लकीरों में बढ़ती हैं। पास-पास के पेड़ मिलकर ऊँची सफ़ेद आकृतियाँ बना लेते हैं, जो सर्दियों की रोशनी में जीवंत लगती हैं।

मौसम विज्ञान, स्थलाकृति और वनस्पति का ऐसा मेल बहुत कम जगहों पर देखने को मिलता है। पृथ्वी पर कहीं और की तुलना में उत्तरी जापान में ये स्थितियाँ अधिक बार बनती हैं। यही वजह है कि ज़ाओ से आई ख़बर सिर्फ़ एक पहाड़ तक सीमित नहीं है। लंबे समय से इन पर नज़र रखने वाले लोग और हाल में आए पर्यटक अब विरल आकृतियाँ, पतली रूपरेखाएँ और कई जगह उन पेड़ों के नंगे तने देखते हैं, जहाँ कभी हिम दानव खड़े होते थे। यह बदलाव मापा जा सकता है। इसका संबंध गर्म होती सर्दियों और कीटों के हमले से प्रभावित जंगलों, दोनों से है।

यामागाता के उन समुदायों के लिए, जो सर्दियों के पर्यटन पर निर्भर हैं, दाँव पर सिर्फ़ भावनाएँ ही नहीं, रोज़गार भी लगा है। होटल, रेस्तरां और स्की कारोबार हर मौसम की योजना उन हफ्तों के इर्द-गिर्द बनाते हैं, जब जुह्यो अपने चरम पर होते हैं।

विज्ञापन

माउंट ज़ाओ पर हिम दानव कैसे बनते हैं

हिम दानवों का मूल आधार आओमोरी तोदोमात्सु है, जिसे मैरीज़ फर (Abies mariesii) भी कहते हैं। यह उप-अल्पाइन क्षेत्र में उगने वाला सदाबहार पेड़ है, जो ज़ाओ की ऊँची ढलानों पर घने झुरमुटों में पाया जाता है। निचले बादलों में मौजूद अतिशीतित बूंदें जापान सागर की ओर से तेज़ पश्चिमी हवाओं के साथ आती हैं। ये बूंदें शून्य डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर भी तरल रहती हैं, लेकिन किसी सतह से टकराते ही जम जाती हैं। बार-बार चलने वाले झोंके हर शाखा के हवा की ओर वाले हिस्से पर बर्फ़ की नई परतें जमा देते हैं। इससे झींगे की पूँछ जैसी लकीरें बनती हैं, जो जुह्यो को तराशी हुई आकृति देती हैं। जब कई हफ्तों तक तूफ़ान आते रहते हैं, तो ये आकृतियाँ मोटी होती जाती हैं और पास-पास के पेड़ मिलकर कई मीटर चौड़ी मूर्तियों का रूप ले लेते हैं।

दो बातें ज़ाओ को ख़ास बनाती हैं। पहली, पहाड़ की स्थिति और आकार सर्दियों की हवाओं को केंद्रित करते हैं, जिससे वे लंबी अवधि तक दिशा बदले बिना पश्चिम से आती हैं। दूसरी, मैरीज़ फर की सदाबहार पत्तियाँ बूंदों के जमने के लिए अनगिनत सतहें देती हैं। पर्णपाती पेड़ों के पत्ते झड़ जाते हैं, इसलिए उन पर पाले की वैसी मोटी परत नहीं बनती। नतीजा सिर्फ़ पेड़ पर जमी बर्फ़ नहीं है। यह भौतिकी से बना एक अलौकिक भू-दृश्य है—मानो प्रकृति की 3डी प्रिंटिंग, जो लगातार बनी रहने वाली ठंड, स्थिर हवा के गलियारे और नमी से भरे बादलों पर निर्भर करती है।

ये आकृतियाँ इतनी कम जगहों पर क्यों दिखती हैं?

दुनिया भर की पर्वतश्रेणियों पर राइम आइस बन सकती है, लेकिन घनी कतारों में खड़ी मोटी, एक-दूसरे से जुड़ी आकृतियों वाले असली जुह्यो के लिए बहुत विशिष्ट स्थितियाँ चाहिए। जापान का तोहोकू क्षेत्र, जो जापान सागर की ओर है, उन गिनी-चुनी जगहों में से एक है जहाँ सही पेड़, हवा और बादलों की स्थितियाँ एक बार में कई हफ्तों तक बनी रहती हैं। ऐतिहासिक रूप से, जुह्यो उत्तर में होक्काइडो से लेकर जापान सागर के तट पर इशिकावा प्रीफेक्चर तक देखे जाते थे। हाल के दशकों में इनका फैलाव घटा है। अब भरोसेमंद नज़ारे ज़ाओ, आओमोरी की हक्कोदा पर्वतश्रेणी, इवाते का माउंट हाचिमांताई, अकिता का माउंट मोरियोशिज़ान और फुकुशिमा व यामागाता के बीच फैले माउंट आज़ुमायामा जैसी चोटियों तक सिमट गए हैं। सर्दियाँ गर्म होने के साथ, उन ऊँचाइयों का स्तर ऊपर खिसक गया है जहाँ पर्याप्त ठंड रहती है। कुछ उत्तरी इलाकों में अब उन ऊँचाइयों पर शंकुधारी पेड़ों के झुरमुट नहीं हैं, जहाँ आवश्यक स्थितियाँ बन सकें।

एक सदी की तस्वीरों में घटते दानव

स्थानीय लोगों को इन आकृतियों का विरल होना कई सालों से साफ़ दिख रहा है। अगस्त 2025 में यामागाता विश्वविद्यालय के एमेरिटस प्रोफ़ेसर और लंबे समय से चल रहे जुह्यो शोध समूह के प्रमुख फुमिताका यानागिसावा की अगुवाई वाली शोध टीम ने इन बदलावों को आँकड़ों में दर्ज किया। ज़ाओ की चोटी के आसपास एक ही जगह से 1933 से खींची गई तस्वीरों का विश्लेषण करके, समूह ने हर सर्दी की आकृतियों को मोटाई के छह-बिंदु पैमाने पर आँका और अलग-अलग संरचनाओं की चौड़ाई मापी।

नतीजे लंबे समय से जारी गिरावट दिखाते हैं। 1930 के दशक में कई आकृतियाँ पाँच से छह मीटर चौड़ी थीं और हिम दानवों की कतारें क्षितिज तक फैली दिखती थीं। युद्ध के बाद के दशकों तक इनकी चौड़ाई आम तौर पर दो से तीन मीटर रह गई थी। 2019 के बाद से कई आकृतियाँ आधा मीटर या उससे भी कम चौड़ी हैं। कुछ जगहों पर वे पतले स्तंभों जैसी रह गई हैं, जिनके हवा की ओर वाले हिस्से पर पाले की परत बहुत कम है। टीम इस बदलाव के पीछे एक साथ काम कर रहे दो कारणों को ज़िम्मेदार मानती है। पहाड़ पर सर्दियों का तापमान बढ़ रहा है। साथ ही, मेज़बान पेड़ कीटों से कमज़ोर हो गए हैं, जिससे बर्फ़ के टिकने के लिए पत्तियाँ कम बची हैं और सही ऊँचाई पर स्वस्थ पेड़ों के झुरमुट भी कम हुए हैं।

कीटों से हुए नुकसान की कहानी गंभीर है। 2013 के आसपास, टॉर्ट्रिक्स मॉथ की इल्ली ने ज़ाओ पर्वतश्रेणी में मैरीज़ फर के पेड़ों की सुईनुमा पत्तियाँ चट कर दीं। लगभग 2015 से छाल भृंगों ने इन कमज़ोर पेड़ों पर हमला करना शुरू किया। ये भृंग कमज़ोर पेड़ों को निशाना बनाते हैं और छाल के नीचे सुरंगें बनाकर उन्हें पूरी तरह मार सकते हैं। यामागाता के अधिकारियों का अनुमान है कि करीब 23,000 फर के पेड़ मर चुके हैं, यानी प्रीफेक्चर की ओर के कुल पेड़ों के लगभग पाँचवें हिस्से जितने। सुईनुमा पत्तियों और बारीक शाखाओं के बिना पाले को टिकने के लिए बहुत कम जगह मिलती है। तेज़ तूफ़ानों वाली सर्दियों में भी नंगे तनों पर बर्फ़ की वे परतें नहीं बन सकतीं, जिनसे बड़े-बड़े जुह्यो बनते हैं।

हालिया सर्दियाँ दिखाती हैं कि अलग-अलग ऊँचाइयों पर नुकसान कितना असमान हो सकता है। एक खास तौर पर ठंडी और बर्फ़ीली सर्दी में, जहाँ पेड़ स्वस्थ थे वहाँ 1,500 से 1,600 मीटर की ऊँचाई पर बड़ी आकृतियाँ फिर दिखीं। लेकिन 1,600 मीटर से ऊपर जंगल के बड़े हिस्से मर चुके थे या टूट गए थे और भू-दृश्य में कंकाल जैसे तने बिखरे थे। यह पैटर्न बताता है कि जलवायु के संकेत के साथ जंगलों पर दबाव की समस्या भी जुड़ी है; इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है।

यानागिसावा इस बदलाव को मापने योग्य और नज़रअंदाज़ करना मुश्किल बताते हैं। अपनी टीम के निष्कर्ष पेश करते हुए उन्होंने कहा कि तस्वीरों का रिकॉर्ड अब उस बात की पुष्टि करता है, जिसे नियमित रूप से आने वाले लोग वर्षों से देख रहे हैं।

अब इस बात का मात्रात्मक प्रमाण मौजूद है कि बर्फ़ के दानव कितने सिकुड़ गए हैं।
विज्ञापन

जलवायु का दबाव, कीट और सर्दियों का बदलता गणित

उत्तरी जापान में अब भी सर्दियाँ ठंडी होती हैं और बड़े तूफ़ान भी आते हैं। फिर भी, लंबे समय के औसत बदल रहे हैं। पास के यामागाता शहर में दिसंबर से मार्च के बीच का औसत तापमान पिछले 120 वर्षों में लगभग 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। जापान के अल्पाइन क्षेत्रों में 1980 के दशक से तापमान बढ़ने की रफ़्तार वैश्विक औसत से अधिक रही है। देशभर में जापान मौसम विज्ञान एजेंसी के मुताबिक, पिछली एक सदी में औसतन करीब 1.3 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ा है। होक्काइडो में 100 वर्षों में यह बढ़ोतरी लगभग 1.6 डिग्री सेल्सियस है। अगर प्रभावी कदम इस रुझान को धीमा नहीं करते, तो अनुमान है कि इस सदी के अंत तक जापान का तापमान 20वीं सदी के आख़िरी दौर के आधार स्तर की तुलना में करीब 4.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है।

जुह्यो के लिए सर्दियों के तापमान और बादलों की बनावट में छोटे बदलाव भी बड़े असर डाल सकते हैं। पाले की परत बनने की प्रक्रिया बादलों के भीतर मौजूद अतिशीतित तरल पानी पर निर्भर करती है। गर्म हवा सर्दियों के तूफ़ानों की ऊँचाई के साथ बदलती संरचना को प्रभावित करती है और उन समयावधियों को घटा सकती है, जब बूंदों का तापमान सही दायरे में रहता है। तापमान में एक या दो डिग्री का बदलाव तय कर सकता है कि बूंदें पेड़ पर जमती हैं या गीली बर्फ़ बनकर गिरती हैं और शाखाओं से फिसल जाती हैं। गर्म मौसम के दौर मौसम भी छोटा कर देते हैं। जब बसंत जैसी गर्मी जल्दी आ जाती है, तो हिम दानव तेज़ी से पिघलते हैं और उन्हें देखने के दिनों की कुल संख्या घट जाती है।

जंगलों का स्वास्थ्य भी इन मौसमों के साथ मिलकर असर डालता है। जिन फर के पेड़ों की पत्तियाँ झड़ गई हों, वे कम बर्फ़ पकड़ते हैं और उनकी झींगे की पूँछ जैसी चौड़ी लकीरें नहीं बनतीं। गर्मियों के गर्म और सर्दियों के हल्के रहने के बाद छाल भृंगों की आबादी बढ़ सकती है। इससे उनके जीवित रहने की दर बढ़ती है और एक मौसम में कई पीढ़ियाँ पनप सकती हैं। कभी-कभी तूफ़ान अब भी प्रभावशाली आकृतियाँ बनाते हैं और कुछ सर्दियों में ठंड व हवा का आदर्श मेल भी मिलता है। लेकिन ज़ाओ की तस्वीरों के रिकॉर्ड में दर्ज लंबे समय का रुझान पतली आकृतियों, चरम नज़ारे वाले कम दिनों और उस निचली सीमा के लगातार ऊपर खिसकने की ओर इशारा करता है जहाँ पर्याप्त ठंड रहती है।

विज्ञापन

पर्यटन की नाज़ुक डोर

हिम दानव ज़ाओ की सर्दियों की अर्थव्यवस्था का अहम आधार हैं। हर मौसम में दसियों हज़ार पर्यटक चोटी तक जाने वाली रोपवे की सवारी के लिए कतार में लगते हैं। होटल और सराय सबसे अच्छे नज़ारे वाले हफ्तों के इर्द-गिर्द कार्यक्रम तय करते हैं। स्कीयर और स्नोबोर्डर इन आकृतियों के बीच से निकलते हुए अपनी रफ़्तार धीमी कर लेते हैं। साफ़ शामों में गाइड के साथ होने वाले रात के दौरों में सबसे चमकदार हिम दानवों को दिखाया जाता है। सोशल मीडिया पर इनकी तस्वीरें दुनिया भर में फैलती हैं और हर साल नए मेहमानों को यामागाता तक खींच लाती हैं।

यह सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि नज़ारा कितना भरोसेमंद है। जनवरी या फरवरी में अच्छे नज़ारे वाले दिन कम होते हैं। महीने में अक्सर बस कुछ ही दिन ऐसे होते हैं, जब बादल छँटते हैं और हवा शांत होती है। गर्म होती सर्दियों और कीटों से हुए नुकसान ने नतीजों को और अनिश्चित बना दिया है। पिघलाव वाले एक हफ्ते के बाद या कीटों के प्रकोप वाले खराब साल में आने वाले पर्यटकों को विशाल आकृतियों की जगह विरल पेड़ों की कतारें और उन पर बर्फ़ की जगह-जगह जमी परतें दिख सकती हैं। उम्मीद और वास्तविकता के बीच का यह अंतर उन छोटे कारोबारों के लिए मायने रखता है, जो लौटकर आने वाले मेहमानों और लोगों की सिफ़ारिशों पर निर्भर हैं।

स्थानीय एजेंसियों ने पर्यटकों को यथार्थवादी योजना बनाने में मदद देने के लिए जानकारी देना बढ़ाया है। रोपवे पर दृश्यता और आकृतियों के बनने से जुड़े अपडेट दिए जाते हैं। पर्यटन ब्यूरो ऐसे लचीले यात्रा कार्यक्रम सुझाते हैं, जिनमें गर्म पानी के सोते, स्थानीय भोजन और संग्रहालय शामिल हों। मकसद जुह्यो की अहमियत कम करना नहीं है—ये अब भी सबसे बड़ा आकर्षण हैं—बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कमज़ोर वर्षों में भी यात्रियों की यात्रा अच्छी रहे।

क्या समय रहते जंगल फिर उगाया जा सकता है?

समुदायों के समूह, शोधकर्ता और सरकारी एजेंसियाँ जुह्यो के लिए ज़रूरी परिस्थितियों को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। मार्च 2023 में यामागाता प्रीफेक्चर ने जुह्यो पुनरुद्धार सम्मेलन शुरू किया। यह एक स्थायी परिषद है, जो वैज्ञानिकों, स्थानीय अधिकारियों, कारोबारों और निवासियों को साथ लाती है। इसका लक्ष्य जहाँ संभव हो फर के पेड़ों के झुरमुट फिर तैयार करना, स्वस्थ हिस्सों की रक्षा करना और सदी भर के दबाव से पहाड़ी जंगलों को उबारने के लिए ज़रूरी ज्ञान जुटाना है।

2019 से स्थानीय वन कार्यालय ने प्राकृतिक रूप से उगे मैरीज़ फर के 190 से अधिक छोटे पौधों को निचली ढलानों से रोपवे स्टेशन के पास शिखर क्षेत्र में स्थानांतरित किया है। इनके बढ़ने की रफ़्तार धीमी है। इन पेड़ों को परिपक्व होने में 50 से 70 साल लगते हैं, इसलिए आज का काम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सौगात है। कर्मचारी पौधों के जीवित रहने की निगरानी करते हैं, रोपण के अलग-अलग घनत्व आज़माते हैं और खेत के चूहों से कुछ भूखंडों को नुकसान पहुँचने के बाद उनकी सुरक्षा के तरीके जाँचते हैं। कई शंकुधारी जंगलों में मृत पेड़ों की साफ़-सफ़ाई के लिए कटाई, गंभीर रूप से संक्रमित सामग्री को हटाना और टॉर्ट्रिक्स मॉथ व छाल भृंगों की लक्षित निगरानी जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। इन प्रयासों से मिले सबक ज़ाओ की अनूठी परिस्थितियों में भी लागू किए जा रहे हैं।

युवा निवासी भी इस काम का हिस्सा हैं। ज़ाओ से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित मुरायामा टेक्निकल हाई स्कूल के वानिकी और पर्यावरण विज्ञान पाठ्यक्रम के छात्र 2022 से मैरीज़ फर के पौधे लगा रहे हैं और उन्हें बेहतर ढंग से उगाने के तरीकों का अध्ययन कर रहे हैं। यामागाता वन कार्यालय की मदद से वे पहाड़ से छोटे पौधे इकट्ठा करते हैं, कलम लगाने के प्रयोग करते हैं और स्वस्थ पौधे उगाने के लिए नर्सरी के तरीके आज़माते हैं। उनका काम मौसम नहीं बदल सकता, लेकिन इससे उस संसाधन को मज़बूती मिलती है जिस पर जुह्यो निर्भर हैं—सही ऊँचाई पर उगे मज़बूत फर के पेड़ों के जीवित झुरमुट।

स्थानीय नेता चुनौती के पैमाने को लेकर यथार्थवादी हैं। दोबारा रोपण से गर्म सर्दियों को पलटा नहीं जा सकता। लेकिन इससे क्षतिग्रस्त जंगलों की संरचना फिर बन सकती है और ठंड व तेज़ हवा के दौर लौटने पर पहाड़ को बेहतर मौका मिल सकता है। लंबे समय में बढ़ते तापमान को कम करने वाली व्यापक जलवायु कार्रवाई के साथ मिलकर, ये उपाय आने वाली पीढ़ियों के लिए इस घटना को अपनी आँखों से देखने की संभावना बनाए रखते हैं।

विज्ञापन

पर्यटक अभी कैसे मदद कर सकते हैं

यात्री मौसम को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन हिम दानवों की देखभाल करने वाले स्थानों को समर्थन दे सकते हैं। स्थानीय संचालकों को चुनना, आकृतियों के बीच तय रास्तों पर चलना और पेड़ों के तनों या शाखाओं को न छूना, पाले की परत के नीचे मौजूद जीवित पेड़ों की रक्षा करता है। ऊपर जाने से पहले रोपवे और मौसम की ताज़ा जानकारी देखने से खराब दृश्यता वाले दिनों में भीड़ कम करने में मदद मिलती है। जो पर्यटक और योगदान देना चाहते हैं, वे जंगलों की देखभाल करने वाले सामुदायिक समूहों और मैरीज़ फर के पेड़ लगाने व उनकी रक्षा करने वाले स्वयंसेवी कार्यक्रमों का समर्थन कर सकते हैं।

सोच-समझकर लिए गए फ़ैसले दबाव झेल रहे इस भू-दृश्य को बनाए रखने में मदद करते हैं। हिम दानव हर साल कुछ ही हफ्तों के लिए दिखते हैं, लेकिन उनके मेज़बान पेड़ सालभर जीवित रहते हैं और उन्हें दशकों तक देखभाल की ज़रूरत होगी।

विज्ञापन

मुख्य बातें

  • जुह्यो यानी हिम दानव माउंट ज़ाओ पर मैरीज़ फर के पेड़ों पर बनते हैं। तेज़ पश्चिमी हवाएँ अतिशीतित बूंदों को पेड़ों तक लाती हैं, जो टकराते ही जमकर पाले की मोटी परतें बनाती हैं।
  • यामागाता विश्वविद्यालय की अगुवाई में हुए नए विश्लेषण में 1933 से एक ही जगह से खींची गई तस्वीरों की तुलना की गई। इसमें आकृतियों की मोटाई में लंबे समय की गिरावट मिली: 1930 के दशक में पाँच से छह मीटर चौड़ाई से घटकर 2019 के बाद से कई जगहों पर लगभग आधा मीटर।
  • कीटों ने इन आकृतियों के मेज़बान पेड़ों को भारी नुकसान पहुँचाया है। टॉर्ट्रिक्स मॉथ का प्रकोप लगभग 2013 में शुरू हुआ और करीब 2015 से छाल भृंगों ने हमला किया। यामागाता की ओर अनुमानित 23,000 फर के पेड़ मर चुके हैं।
  • गर्म होती सर्दियाँ पाले की परत बनने के लिए अनुकूल समय घटाती हैं। यामागाता में दिसंबर से मार्च का औसत तापमान 120 वर्षों में लगभग 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है और जुह्यो बनने की न्यूनतम ऊँचाई ऊपर खिसक गई है।
  • ठंडी और तूफ़ानी सर्दियों में 1,500 से 1,600 मीटर की ऊँचाई पर कुछ स्वस्थ झुरमुट अब भी बड़ी आकृतियाँ बनाते हैं, जबकि इससे ऊपर के इलाकों में बड़े पैमाने पर पेड़ मर गए हैं और तने नंगे खड़े हैं।
  • हिम दानव ज़ाओ के सर्दियों के पर्यटन का आधार हैं और दसियों हज़ार पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। लेकिन हालात की बढ़ती अनिश्चितता से कारोबारों के लिए निराशाजनक मौसम का जोखिम बढ़ रहा है।
  • मार्च 2023 में शुरू हुआ यामागाता का जुह्यो पुनरुद्धार सम्मेलन जंगल बहाली के प्रयासों का समन्वय करता है। 2019 से शिखर क्षेत्र में फर के 190 से अधिक पौधे स्थानांतरित किए गए हैं। जंगल के उबरने में कई दशक लगेंगे।
  • मुरायामा टेक्निकल हाई स्कूल के छात्र मैरीज़ फर के पौधे तैयार कर रहे हैं और रोपण के तरीकों को परख रहे हैं। यह पीढ़ियों तक चलने वाला सामुदायिक प्रयास जंगलों के स्वास्थ्य को बहाल करने में मदद कर रहा है।
  • मज़बूत कदम न उठाए गए तो जापान में लंबे समय से जारी तापमान वृद्धि का रुझान आगे भी जारी रहने की आशंका है। इस सदी के उत्तरार्ध में सामान्य से गर्म सर्दियों के दौरान हिम दानव शायद बनें ही नहीं।
  • पर्यटक तय रास्तों पर चलकर, मौसम की जानकारी लेकर और स्थानीय संरक्षण प्रयासों का समर्थन करके मदद कर सकते हैं। ये छोटे कदम बर्फ़ के नीचे मौजूद जीवित पेड़ों की रक्षा करते हैं।
यह लेख शेयर करें

आपको यह भी पसंद आ सकता है